शरणार्थियोंके प्रति हमारा कर्तव्य

सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला, धन्यवाद। बंगाल और पंजाबके लोगोंपर जो संकट आया उसके विषयमें आपका विचार अवगत हुआ। यह सत्य है कि मनुष्य अथवा समाजपर जो संकट आता है, वह उसके पूर्वकृत पापकर्मोंका ही परिणाम है। बंगालियों और पंजाबियोंके जो दोष आपने दिखाये हैं, वे ठीक हो सकते हैं; उनके तथा अन्य निन्दित कर्मोंके कारण ही उन्हें इतने भारी दु:खका सामना करना पड़ा है, यह बात उनके ही समझनेकी है। वे इस कर्मफलके रहस्यको समझें, सावधान हों और यदि सचमुच ही उनके द्वारा बुरे कर्म होते हों तो अबसे भी वे उनको छोड़ दें। सुख चाहें तो शास्त्रोक्त पुण्यकर्म तथा भगवान‍्का भजन करें।

यह तो उनकी बात हुई; अब यह देखना चाहिये कि हमारा और आपका उनके प्रति कुछ कर्तव्य है कि नहीं? किसी भी दु:खी जीवको कष्ट पाते देख, हम यह कह दें कि ‘यह तो अपने पापोंका फल भोगता है, हमें इसकी सहायता नहीं करनी चाहिये’ तो सिद्धान्तत: वह बात ठीक होनेपर भी व्यवहारत: हमारे द्वारा बड़ा भारी पाप हो जाता है। यह तो कोई नहीं जानता कि पूर्वजन्ममें किसने कैसे कर्म किये हैं और उन कर्मोंका भयानक फल कब प्रकट हो जायगा। आज पंजाबी और बंगाली संकटमें हैं, कलको दूसरे भाई भी हो सकते हैं। हम और आप सदा कष्टसे बचे ही रहेंगे, ऐसी गारंटी कोई नहीं दे सकता। ऐसी दशामें प्रत्येक मनुष्यका, चाहे वह साधु, गृहस्थ, धनी, राजा, रईस या गरीब ही क्यों न हो, यही कर्तव्य है कि वह अपनी शक्तिके अनुसार अपने संकटमें पड़े हुए देशवासी भाइयोंकी सब तरहसे सच्चे हृदयसे सहायता करे। जो शक्ति रहते हुए सहायता करनेसे मुख मोड़ता है, वह निश्चय ही पाप करता है। हमारी तो यही कामना होनी चाहिये—

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥

हमलोगोंका कर्तव्य सबको सुख पहुँचाना, दु:खमें सबकी सहायता करना ही है।

आशा है, इन पंक्तियोंको पढ़कर संकटमें पड़े हुए पंजाबी, सिंधी और बंगाली भाइयोंपर आपकी सहानुभूति बढ़ेगी। इस समय पंजाब, सिन्ध और बंगालसे आये हुए हमारे भाई-बहिनोंकी जो दशा है, उसमें उनकी तन, मन, धनसे सेवा-सहायता करना भगवान‍्की ही सेवा करना है।