शास्त्रका उद्देश्य
......सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला। धन्यवाद! आपने ‘कल्याण’ के अंकमें श्रीलॉवेल फिल्मोर महोदयके लेखमें जो पढ़ा है कि ‘केवल मंगलके लिये बोलिये’ सो ठीक ही है। पुराणोंमें भी ऐसे भाववाले वचन बहुत उपलब्ध होते हैं; यह भी आपका अनुभव सत्य है! अपने यहाँका तो यह सिद्धान्त ही है कि सम्पूर्ण जगत्का कल्याण मनाया जाय, सबकी मंगल-कामना की जाय—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
इसमें सन्देह नहीं कि अग्निपुराण आदि कुछ पुराणोंमें मारण, मोहन, उच्चाटन आदिके मन्त्र भी मिलते हैं तथा भगवती पीताम्बरा (बगलामुखी) आदिके मन्त्रोंमें भी स्तम्भन, कीलन एवं विनाशन आदिका उल्लेख देखा जाता है, तथापि वहाँ सबके लिये समान रूपसे यह सब करनेका विधान नहीं है। वेदों, शास्त्रों और पुराणोंका तात्पर्य तो हिंसाकी ओरसे सबको निवृत्त करनेमें ही है। मनुष्यकी बाह्यवृत्तियोंको अन्तर्मुखी करनेमें ही शास्त्र सदा संलग्न रहते हैं। इसीलिये यज्ञ अथवा अनुष्ठान आदिका अंग बनाकर ही कहीं-कहीं हिंसाके अनुमोदक वचन उपलब्ध होते हैं। व्यापक हिंसावृत्तिका निरोध करनेके लिये ही शास्त्रने एक उपाय निकाला है; उसका कहना है ‘यदि तुम्हारा कोई शत्रु है और तुम उसे मारना ही चाहते हो तो स्वयं न मारो, देवताकी आराधना करो, देवता ही उसे यथोचित दण्ड देंगे।’ इस प्रकार उसे हिंसाकर्मसे निवृत्त करनेका ही प्रयत्न किया गया है। शास्त्रों और वेदोंकी मुख्य आज्ञा तो यही है—
‘मा हिंस्यात् सर्वा भूतानि’
‘किसी भी जीवको न मारो।’
विधिसे निषेध ही बलवान् होता है। अत: हिंसाका निवारण ही शास्त्रका मुख्य ध्येय है। इसी प्रकार कटुवचन न बोलनेके लिये ही शास्त्र आज्ञा देता है। अपने-अपने स्वभाव और गुणके अनुसार सात्त्विक, राजस और तामस तीन प्रकारके मनुष्य होते हैं। सात्त्विक मनुष्य स्वाभाविक ही शान्त, क्षमाशील और सदाचारी होता है। वह राग-द्वेषमूलक हिंसामें कभी प्रवृत्त ही नहीं होता। रजोगुणी और तमोगुणी प्रकृतिके मानव ही हिंसामें रुचि रखते हैं। ऐसे लोग भी नितान्त हिंसक न बन जायँ, इसके लिये शास्त्रोंने कुछ आभिचारिक कर्मोंका वर्णन किया है। तात्पर्य यह कि तुम्हें किसीको दण्ड देना हो तो भी आराधना ही करो।’ साथ ही यह भी बतलाया है कि ‘निष्कामभावसे की हुई आराधना ही सबसे श्रेष्ठ है।’
इसके अतिरिक्त हम राग-द्वेष-काम-क्रोधादि आभ्यान्तरिक दोषोंको ही चोर तथा अपना शत्रु मानकर उनके नाशके लिये अनुष्ठान कर सकते हैं। शास्त्रोंमें इन दोषोंको भी चोर, डाकू और शत्रु बतलाया गया है और इनके वशमें न होनेकी तथा इन्हें विविध उपायोंद्वारा मारनेकी आज्ञा दी गयी है।
पुराणोंके वचन परस्पर-विरुद्ध या मिथ्या नहीं हैं। उनमें जिस कर्मका जैसा विधान और फल बताया गया है, वह सभी ठीक है। शास्त्रोक्त सात्त्विक कर्म तो ठीक हैं ही, आभिचारिक कर्म भी विधिपूर्वक किये जानेपर फल देते हैं। तथापि शास्त्रका उद्देश्य असत् से सत् की ओर, मिथ्यासे सत्यकी ओर और अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ही ले जाना है। अत: उनकी मुख्य शिक्षा यही है कि मनुष्य कटु, अप्रिय एवं असत्य न बोले। किसीको भी मन, वाणी अथवा शरीरसे कभी कष्ट न पहुँचावे। सदा, सर्वत्र, सब प्रकारसे सभीका कल्याण चाहे। भिन्न-भिन्न प्रकारके कर्मोंका जो वर्णन है, वह भिन्न-भिन्न अधिकारियोंके लिये ही है, परंतु सभीको उच्चतम अधिकारी बनाकर आध्यात्मिक उन्नतिके पथपर पहुँचना ही शास्त्रोंका उद्देश्य है। अत: शास्त्रीय वचनोंमें कहीं भी विरोध या विरोधाभासकी गन्ध भी नहीं है। शेष भगवत्कृपा।