शीघ्र भगवत्प्राप्ति कैसे हो?

सप्रेम हरिस्मरण! आपका पत्र मिला था। उत्तरमें देर हुई, इसके लिये क्षमा करें। आपने शीघ्र-से-शीघ्र भगवत्प्राप्ति होनेका उपाय पूछा सो इसका उपाय मैं क्या बताऊँ—यह तो भगवान‍्के अधिकारकी चीज है और एकमात्र उनकी कृपासे ही हो सकती है। भगवान‍्के बदलेमें हमारे पास ऐसी कौन-सी चीज है, जिसे देकर हम भगवान‍्को पा लें। उनकी अकारण कृपापर विश्वास और उनको पानेकी एकान्त लालसा—ये दो ही ऐसे साधन हैं, जिनसे भगवान‍्के शीघ्र मिलनेकी सम्भावना की जा सकती है। अपने पुरुषार्थसे भगवान‍्को प्राप्त करना कठिन है। अपना सारा पुरुषार्थ उनके चरणोंपर निक्षेप करके उनकी महती कृपाकी प्रतीक्षा करनी चाहिये और चित्तमें ऐसी व्याकुलता उत्पन्न हो जानी चाहिये कि भगवान‍्के बिना एक क्षण भी रहा न जाय। ऐसी उत्कट उत्कण्ठा होनी चाहिये, जैसी प्यासेको जलकी होती है। जिसके प्राण प्याससे छटपटा रहे हों, वह किसी भी दूसरी वस्तुसे संतुष्ट नहीं हो सकता अथवा मछली जलके लिये जैसे छटपटाती है, उसी प्रकार भगवान‍्के लिये प्राणोंमें छटपटाहट होनी चाहिये। भक्त वृत्रासुरने भगवान‍्से कहा है—‘सर्वसौभाग्यनिधे! मैं तुमको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डलका साम्राज्य, पातालका एकच्छत्र राज्य, योगकी सारी सिद्धियाँ—यहाँतक कि मोक्ष भी नहीं चाहता। जैसे पक्षियोंके पंखहीन बच्चे अपनी माँकी बाट देखते रहते हैं, जैसे भूखसे बिलबिलाते हुए बछड़े अपनी माता गौका दूध पीनेके लिये आतुर रहते हैं और जैसे परदेश गये हुए पतिसे मिलनेके लिये उसकी वियोगिनी पत्नी व्याकुल रहती है, वैसे ही हे कमलनेत्र! मेरा मन आपके दर्शनके लिये छटपटा रहा है।’

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं

न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।

न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा

समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥

अजातपक्षा इव मातरं खगा:

स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता:।

प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा

मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥

(श्रीमद्भा० ६। ११। २५-२६)

पर भगवान‍्के लिये ऐसी व्याकुलता होना सहज नहीं है। भगवत्कृपासे ही ऐसा होना सम्भव है। महत्त्वपूर्ण भजनके प्रभावसे जब भगवान‍्की अहैतुकी कृपामें विश्वास होता है, तभी भगवत्कृपाका अनुभव होता है और भगवत्कृपासे ही भगवान‍्का महत्त्व समझमें आता है एवं तभी भगवान‍्की प्राप्तिके लिये व्याकुलता होती है। भगवान‍्का महत्त्व जाननेके लिये भगवत्प्रेमियोंका संग करना बहुत आवश्यक है। असलमें मुख्य वस्तु है—भजन। भगवत्प्राप्तिकी इच्छाकी अपेक्षा भी भजनकी इच्छाका अधिक महत्त्व है। बस, भजन बनता रहे। भगवत्प्राप्ति तो जब भगवान् चाहेंगे, तभी होगी। भजन करना तो हमारे अधिकारमें है। भगवान‍्ने कान दिये हैं, जीभ दी है, मन दिया है। इनके द्वारा भगवद‍्गुणश्रवण, भगवन्नाम-गुण-गान और भगवत्स्वरूपका मनन-ध्यान करना हमारा काम है। इसमें हम जितना ही आलस्य-प्रमाद करते हैं, उतना ही कर्तव्यसे गिरते हैं। भगवान‍्से भी यही माँगना चाहिये कि भजन निरन्तर बनता रहे। भजनमें कोई शर्त न हो। शर्त हो तो यही कि कभी भजनमें भूल न हो। भजनकी क्षणभरकी भूल चित्तमें अत्यन्त व्याकुलता पैदा कर दे। देवर्षि नारदजीने भगवान‍्के विस्मरणमें परम व्याकुलताको ही भक्ति कहा है—‘तद्विस्मरणे परमव्याकुलता।’ शर्त न रहनेसे भजन छूटेगा भी नहीं। जिस भजनसे कोई दूसरा फल पानेकी इच्छा होती है, मनोऽनुकूल फल न मिलने या उसके मिलनेमें देर होनेसे वह भजन तो छूट सकता है; परंतु जिस भजनका उद्देश्य ही भजन हो, वह कैसे छूटेगा। वह तो, जितना बढ़ेगा, उतनी ही उसकी प्रवृत्ति बढ़ेगी; क्योंकि वही तो प्राप्त करनेकी वस्तु है। लाभमें लोभ बढ़ता है। इसी तरह भजनसे भजन बढ़ेगा और जहाँ भजन है, वहाँ भगवान् हैं ही—

अतएव विश्वास करके भगवद्भजन करनेमें ही दत्तचित्त होना चाहिये—

बिनु बिस्वास भगति नहिं

तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ

जीव न लह बिश्रामु॥

बारि मथें घृत होइ बरु

सिकता ते बरु तेल।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ

यह सिद्धांत अपेल॥