शिवधनुष चिन्मय था
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि जनकपुरका वह धनुष जिसे श्रीरामचन्द्रजीने तोड़ा था अथवा जिसके टूटनेकी लीलामात्र हुई थी, मूलत: भगवान् शंकरके पिनाकसे प्रकट हुआ था। भगवान् शंकर सच्चिदानन्दमय परमेश्वर हैं। उनका धनुष, उनका वाहन, उनके आभूषण सब कुछ चिन्मय हैं—दिव्य हैं। उन्हींके स्वरूप हैं। भगवान् शिवने श्रीरामचन्द्रजीकी उस विवाहलीलामें योग देनेके उद्देश्यसे उसके अंगरूपमें ही उस धनुषको प्रकट किया था। बहुत पहलेसे ही वह जनकपुरमें इसी दिव्य सुयोगके लिये रखा गया था। उस धनुषमें घटने, बढ़ने, हलके होने और भारी होनेकी भी स्वाभाविक शक्ति थी।
जिस समय वन्दीजनोंने राजा जनकका प्रण सुनाया, उस समय जिनके मनमें कुछ विचार था, जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीकी महिमा और उस धनुषकी दिव्यतासे परिचित थे, वे राजा तो उस धनुषके पास ही नहीं गये—
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं।
चाप समीप महीप न जाहीं॥
परंतु जो मूर्ख थे, अभिमानी थे, वे प्रतिज्ञा सुनते ही दौड़ पड़े उसे तोड़नेके लिये। उन्हें यह भय था कि हमसे पहले पहुँचकर कोई दूसरा न तोड़ डाले। वे तमक-तमककर उठते, धनुषमें हाथ लगाते, उसे उठानेके लिये बल लगाते; परंतु जब उठा नहीं पाते, तब लजाकर लौट आते थे। उस समय गोस्वामीजीने एक बड़ी सुन्दर बात कही है—
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।
मानो शूरवीर राजाओंकी भुजाओंको पाकर वह धनुष अधिक- अधिक—बड़ा-बड़ा होता जाता था और उनका बल पाकर गरुआता—भारी होता जाता था।
—इन पंक्तियोंद्वारा धनुषकी चिन्मयता और दिव्यताकी ओर संकेत किया गया है। अत: दस हजार योद्धा जब एक साथ लगे, तब वह धनुष उनके लिये उतना ही बड़ा और उतना ही भारी हो गया। राजा यह नहीं समझ सके कि धनुष बढ़ रहा है; वे जब जाते उन्हें हाथ लगानेके लिये धनुष मिल जाता था।
सीताजी भगवान्की स्वरूपभूता साक्षात् आह्लादिनी शक्ति हैं। वे धनुषकी इस दिव्यताको जानती हैं, अतएव मन-ही-मन उसकी प्रार्थना करती हैं—
... ... ... ......।
अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥
निज जडता लोगन्ह पर डारी।
होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥
सीताजीकी इच्छाशक्तिका प्रभाव धनुषपर पड़ा; वह बहुत छोटा और हलका हो गया। इसका आभास गोस्वामीजी महाराज गीतावली (पद-संख्या ९२)-में देते हैं—
दाहिनो दियो पिनाकु, सहमि भयो मनाकु।
इत्यादि
रामायण भगवान्की लीलाका मधुर ग्रन्थ है, प्रेमपूर्वक पाठ करके इसके रसामृतका पान करना चाहिये। व्यर्थकी शंकाओंमें पड़नेसे कोई लाभ नहीं। शेष भगवत्कृपा।