श्रीकृष्णका स्वरूप-तत्त्व

सप्रेम हरिस्मरण! कृपापत्र मिला। आपके प्रश्नोंपर क्रमश: विचार किया जाता है—

१—भगवान् वृन्दावन छोड़कर कहीं नहीं जाते तो सर्वव्यापी कैसे हुए? यह शंका भगवान‍्के स्वरूप और स्वभावको न जाननेके कारण ही उठायी जाती है। भगवान् प्रेमस्वरूप हैं, प्रेमकी निधि हैं, प्रेममें ही प्रकट होते हैं, प्रेमियोंके साथ रहने, उन्हें सुख देने तथा उनके साथ प्रेममयी लीलाएँ करनेमें ही उनको आनन्द मिलता है। भगवान् शंकरका कथन है—‘हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥’ भगवान् सर्वत्र व्यापक हैं, कण-कणमें उनकी स्थिति है; किंतु प्रेमसे ही वे प्रकट होते हैं। ब्रह्मरूपसे, निर्गुण-निराकार स्वरूपसे वे सर्वत्र हैं, सर्वदा हैं और सबमें हैं; इसको कौन अस्वीकार कर सकता है? किंतु सगुण-साकार विग्रह, जो कोटि-कोटि कन्दर्पका दर्प दलन करनेवाला है, सर्वत्र नहीं—प्रेमधाममें ही प्रकट हुआ होता है। प्रेमके भूखे बाँकेविहारी प्रेमधाम वृन्दावन छोड़कर और कहाँ रह सकते हैं? जहाँ श्रीकृष्णको तन, मन, प्राण समर्पित करनेवाली प्रेममयी गोपियाँ नहीं हैं, श्रीकृष्णको ही जीवन-सर्वस्व मानकर तदेकप्राण होकर रहनेवाली श्रीराधारानी नहीं हैं तथा श्यामसुन्दरको सुख पहुँचानेके लिये ही जीवन धारण करनेवाले प्रेमी ग्वाल-बाल नहीं हैं, वहाँ प्रेमपरवश श्रीकृष्ण कैसे रह सकते हैं? अत: जो श्रीकृष्णको पाना चाहता है, वह वृन्दावनका आश्रय ले, गोपी, ग्वाल-बाल तथा श्रीराधारानीकी कृपा प्राप्त करे; तभी वह गोपीवल्लभकी रूपमाधुरीका पान कर सकता है। जिसके हृदयरूपी व्रजमें वृन्दावन, गोप-बाल, गोपी, श्रीराधा तथा श्रीकृष्णकी प्यारी गौएँ हैं, जो इन सबके साथ श्रीकृष्णको अपने हृदय-मन्दिरमें बिठाकर उनका चिन्तन करता है, वह श्रीकृष्णको शीघ्रतापूर्वक पा सकता है।

भगवान् सूर्यका प्रकाश तीनों लोकोंमें सर्वत्र व्यापक है; वह प्रकाश सूर्यमण्डलसे आता है; उसका केन्द्र सूर्यमण्डल है। जहाँतक प्रकाश जाता है, वहाँतक सूर्यमण्डल नहीं जाता; वह उससे छोटा है, तो भी इस पृथ्वीसे बहुत बड़ा है। उस मण्डलमें रहनेवाले अधिदेवतारूप जो भगवान् आदित्य हैं, जिन्हें नारायण अथवा सूर्यनारायण कहते हैं, जिनके परम सुन्दर कमनीय विग्रहमें यथास्थान केयूर, मकर-कुण्डल, किरीट, हार आदि भी शोभा पाते हैं। वे अपने मण्डलसे भी छोटे हैं तथा सदा अपने धाममें ही रहते हैं; परंतु वह प्रकाश और वह मण्डल सब उन्हींसे हैं। यदि वे न हों तो प्रकाश अथवा मण्डलकी सत्ता ही न रहे। सूर्यके उस अधिदैवरूपकी प्राप्तिके लिये आदित्यलोकमें ही जाना पड़ेगा, वरुणलोकमें नहीं; किंतु वे कारणरूपसे या तेज-प्रकाशरूपसे सभी लोकोंमें व्यापक हैं। यही बात श्रीकृष्णके सम्बन्धमें भी है। इनके सर्वत्र व्यापकरूपको ‘ब्रह्म’ कहा गया है, जिसकी उपमा प्रकाशसे दी गयी है। यह निर्गुण-निराकार रूप है। श्रीकृष्णका जो दूसरा रूप सगुण-निराकार है, वह मण्डलके स्थानपर है; इसी रूपको हम ‘परमात्मा’ कहते हैं। इसका भी अन्तरात्मभूत जो स्वरूप है, वही ‘भगवान्’ कहलाता है। यह भगवान् ही ‘श्रीकृष्ण’ हैं। ये अपने मण्डलमें, अपने नित्य-धाम वृन्दावनमें ही रहते हैं। जहाँ प्रकट होते हैं, वहाँ वृन्दावनको साथ लेकर ही प्रकट होते हैं अथवा यों कहिये कि जहाँ ये प्रकट होते हैं वहीं वृन्दावन है। इस प्रकार श्रीकृष्णके ही तीन रूप भगवान्, परमात्मा और ब्रह्म नाम धारण करते हैं। तीनोंकी सत्ता श्रीकृष्णसे ही है। श्रीमद्भागवतमें भी कहा है—

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥

भगवत्स्वरूपके ज्ञाता इस बातको जानते हैं कि भगवान् सर्व-व्यापक हैं। जो सर्वव्यापी तत्त्व है, वह कभी कोई भी स्थान छोड़कर कहीं नहीं जाता। वह कहाँ नहीं है, जहाँ जाय? सर्वत्र वही-वह तो है। जिनके पास आँख है, वे सर्वत्र उसीका दर्शन करते हैं, दूसरे लोग नहीं—‘चक्षुष्मन्तोऽनुपश्यन्ति नेतरेऽतद्विदो जना:।’ इस दृष्टिसे भी, यह कहना कि भगवान् वृन्दावन छोड़कर कभी कहीं नहीं जाते, सर्वथा सत्य है। इससे उनकी व्यापकता ही सिद्ध होती है। जो सर्वत्र व्यापक नहीं है, वह एक स्थानसे दूसरे स्थानपर गये बिना रह नहीं सकता। श्रीकृष्ण वृन्दावनसे तथा श्रीराम अयोध्यासे अन्यत्र नहीं जाते; इस कथनका यह भी अर्थ है कि वृन्दावनमें ‘श्रीकृष्णका ही दर्शन होता है और साकेतधाममें श्रीरामका ही।’

२—गोपियाँ श्रीकृष्णको ही कान्तभावसे भजती थीं, यह ठीक है। फिर उन्होंने सांसारिक पति क्यों किया—यह शंका ठीक नहीं। गोपियोंने कभी सांसारिक पति नहीं किया। उनकी दृष्टिमें न संसार था, न सांसारिक पति। वे तो बचपनसे ही श्रीकृष्णको पतिरूपमें पानेके लिये ही आराधना करती थीं—‘नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नम:।’ जब ब्रह्माजीने ग्वाल-बालोंको चुरा लिया था, उस वर्ष ग्वाल-बालके रूपमें केवल श्रीकृष्ण गौएँ चराते रहे। उस समय गौ, ग्वाल-बाल, लकुटी, रस्सी, बछड़ा आदि सब कुछ श्रीकृष्ण ही थे। उन्हीं दिनों गोप-कुमारियोंका विवाह श्रीकृष्णके साथ हुआ। साधारण लोग इस रहस्यको नहीं जानते थे, किंतु श्रीकृष्णप्राणा गोपियाँ इस रहस्यसे अनभिज्ञ नहीं थीं। वे ग्वाल-बाल भी वस्तुत: उन्हें अपनी पत्नी नहीं मानते थे।

३—माधुर्य-भावके उपासकको लौकिक विषय-सुख और सुविधाओंसे परम विरक्त होकर ही प्रिया-प्रियतमके चरणोंमें परम अनुरक्त होना चाहिये। उनके विरहमें रोना, उन्हींको आर्तभावसे पुकारना ही उनकी प्राप्तिका सर्वोत्तम उपाय है। अपना जीवन, अपना सर्वस्व उनपर निछावर करके उन्हींका होकर रहना और उन्हींके लिये जीवन धारण करना चाहिये।

४—आपको बचपनमें श्रीराम-मन्त्रकी दीक्षा मिली है, पर आप श्रीनन्दनन्दनके हाथों बिक गये हैं तो इससे कोई हानि नहीं है। श्रीराम और श्रीनन्दनन्दन एक ही हैं। आपकी रुचि श्रीनन्दनन्दनमें है तो उन्हींका भजन करें। श्रीकृष्ण-प्रेमी संतसे दीक्षा लेनेमें भी कोई हर्ज नहीं है। भगवान‍्के चरणोंमें निश्छल अनुराग होना ही जीवके लिये परम पुरुषार्थ है।