स्त्रीसंगका त्याग आवश्यक है
सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। समाचार जाने। आपने अपने मनकी जो स्थिति लिखी, उसपर विचार करनेसे प्रतीत होता है कि आपके मनमें अभी छिपी हुई प्रबल वासना है। यह स्थिति केवल आपकी ही नहीं है, बहुतोंकी है। मनकी इस दशामें आपके लिये यही श्रेयस्कर है कि आप बार-बार रोकर भगवान्से प्रार्थना करें। प्रार्थनामें बड़ी शक्ति है। इससे असम्भव मानी जानेवाली बात भी भगवत्कृपासे सम्भव हो जाती है, इसपर आप विश्वास करें।
जहाँतक हो स्त्रीचिन्तन और स्त्रीदर्शनका सर्वथा त्याग करें। शास्त्रोंमें आठ प्रकारके मैथुन बतलाये हैं—
श्रवणं कीर्तनं केलि: प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्।
संकल्पोऽध्यवसायश्च कार्यनिर्वृत्तिरेव च॥
‘स्त्री-सम्बन्धी बात सुनना, कहना, स्त्रियोंको देखना, उनके साथ खेलना, एकान्तमें बात करना, प्राप्त करनेका निश्चय करना, प्रयत्न करना और सहवास करना।’
इन सभीसे बचना आवश्यक है। स्त्री-सम्बन्धी साहित्यका पढ़ना, पत्रोंमें सिनेमाकी अभिनेत्रियोंके चित्र देखना और सिनेमा देखना—इस दुर्वासनाको बढ़ानेमें बहुत सहायक होते हैं। इनसे मनमें विकार पैदा होता है। स्त्रियोंके साथ बात करनेसे विकार बढ़ता है, स्पर्श करनेपर वह मानो पूरा बढ़ जाता है। इसीलिये स्त्री-दर्शनतकका निषेध किया गया है और उसे पाप माना गया है।
आजकल जो स्कूल-कॉलेजोंमें बालक-बालिकाएँ और स्त्री-पुरुष एक साथ पढ़ते हैं, यह बहुत ही हानिकारक है। देखने और बातचीत करते समय मनमें जो एक सुखासक्ति-सी प्रतीत होती है, मन वहाँसे हटना नहीं चाहता—यही छिपे विकारका लक्षण है।
मनमें रहनेवाली वासनाको यदि पनपनेका अवसर नहीं मिलता, उसे पुष्ट होनेको खुराक नहीं मिलती और लगातार विरोधी वातावरण मिलता है तो वह धीरे-धीरे क्षीण होकर मर जाती है। वैसे ही जैसे दीर्घकालतक जल न मिलनेपर वृक्षकी जड़ सूख जाती है और वह मर जाता है; परंतु यदि उसे जल मिलता रहा तो वह सदा हरा-भरा रहेगा एवं बढ़ेगा। उसमें यथासमय फूल और फल भी पैदा होंगे। इसी प्रकार पुरुषकी छिपी कामवासनामें यदि देखना, सुनना, एकान्तमें मिलना और बातचीत करना चलता रहता है तो वासना बढ़कर प्रत्यक्ष कामनाका रूप धारण कर लेती है और फिर मनुष्यका पतन हो जाता है।
इसलिये जहाँतक बने, सात्त्विक साहित्यका सेवन करना, सात्त्विक पुरुषोंके संगमें रहना, निरन्तर सात्त्विक कार्योंमें लगे रहना, इन्द्रियोंके द्वारा मनके सामने सदा-सर्वदा सत्-वस्तुओंको ही रखना, जिससे वह सात्त्विक चिन्तनमें ही लगा रहे और भगवान्के नित्य स्मरणका अभ्यास करना चाहिये। इससे कामवासनाका नाश होता है।
प्रतिदिन आदित्यहृदय और सूर्यकवचका पाठ करने, गायत्री-जपने तथा सूर्यदेवसे प्रार्थना करनेसे भी कामवासनाका नाश होता है; परंतु केवल पाठ-प्रार्थना करे तथा स्त्रियोंका संग न छोड़े तो उससे वैसे ही विशेष लाभ नहीं होता, जैसे दवा लेनेके साथ-साथ बार-बार कुपथ्य करनेवाले रोगीको लाभ नहीं होता। श्रीमद्भागवतमें तो कहा है—
‘स्त्रीणां स्त्रीसंगिंनां संगं त्यक्त्वा दूरत आत्मवान्।’
‘स्त्रियोंका ही नहीं, स्त्रियोंके संग करनेवालोंका भी संग दूरसे ही त्याग देना चाहिये।’