स्वधर्मे निधनं श्रेय:
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। × × × × आपने उच्च वर्णके लोगोंमें जिन बुराइयोंकी चर्चा की है, वे वस्तुत: उनमें हैं। वैसे तो आज पूरे समाजमें दोष आ गया है और ऊँच-नीच सभी वर्ण एवं जातिके लोग झूठ, कपट, चोरी, अनाचार आदि दोषोंमें लिप्त हैं; किंतु उच्च वर्णोंमें ये दोष अधिक आये हैं और उनका उत्तरदायित्व भी समाजके प्रति अधिक है, यह बात भी सर्वथा ठीक है। इन दोषोंको दूर करनेके लिये जो भी उचित प्रयत्न हो सके, वे प्रशंसनीय हैं; लेकिन यह बात सदा ध्यानमें रखनेकी होती है कि बुराई सदा बुराई रहेगी और अच्छाई अच्छाई रहेगी। यह एक स्पष्ट सर्वमान्य बात है कि आज समाजके अधिकांश लोग झूठ बोलते हैं, राजकर्मचारी छिपकर घूस लेते हैं। यह होनेपर भी कोई इस बातका समर्थन नहीं करेगा कि जब छिपकर झूठ और घूसखोरी चलती ही है, तब उन्हें प्रत्यक्ष होने देना चाहिये और उन्हें ठीक मान लेना चाहिये। इसी प्रकार जो दूसरी बुराइयाँ होती हैं, उन्हें इसलिये कि वे छिपकर तो होती ही हैं, प्रत्यक्ष स्वीकार नहीं किया जा सकता। जबतक बुराई छिपकर होती है, वह बुराई रहती है, उसके दूर होनेकी आशा रहती है, उसपर भय और लज्जाका अंकुश रहता है; लेकिन जब वही खुलकर करनेकी आज्ञा पा लेती है, तब वह बुराई न रहकर प्रथा हो जाती है, तब उसके दूर होनेकी आशा ही नहीं होती, तब वह व्यापक हो जाती है।
आपने एक वर्णके दूसरे वर्णोंमें अनाचारके उदाहरण दिये हैं, विधवाओंके असंयमकी चर्चा की है और परिणामस्वरूप सभी वर्णोंमें परस्पर विवाह तथा विधवा-विवाहका समर्थन किया है। इस सम्बन्धमें आपने जो पुराने उदाहरण दिये हैं, उनके सम्बन्धमें मतभेद होना स्वाभाविक है। यह आप भी मानेंगे कि आपने ये घटनाओंके उदाहरण दिये हैं। ये इतिहास हैं। साधारण नियम ऐसा नहीं। नियम तो स्मृतियोंमें हैं। उनमें ऐसी आज्ञाएँ नहीं हैं, जिनसे इन घटनाओंका समर्थन हो। उन नियमोंके रहते भी जो गिने-चुने महापुरुषोंमें नियमके विपरीत उदाहरण मिलते हैं, उनका कोई बड़ा कारण होना चाहिये—यह स्वीकार करना होगा। ऐसी घटनाएँ अपवाद होती हैं और अपवादसे नियम नहीं बदलते। महर्षियोंके चरित, महाराज शान्तनुका निषादकन्यासे विवाह, कुन्ती, द्रौपदी आदिके चरित अपवाद हैं और उनके कारण हैं। उन कारणोंके सम्बन्धमें विवाद एवं मतभेद सम्भव है, पर वे सामान्य नियमके उदाहरण नहीं हैं, यह आप मानेंगे ही।
मुख्य प्रश्न तो यह है कि वर्ण-व्यवस्था या जाति-प्रथा रहनी चाहिये या नहीं? इस सम्बन्धमें बड़े-बड़े विद्वानों या समाजशास्त्रियोंने विचार कर लिया है कि कर्मके अनुसार वर्ण-व्यवस्थाका निर्णय करके समाजकी व्यवस्था चलायी नहीं जा सकती। एक माताके एक पुत्रको शूद्र और एकको ब्राह्मण ठहराकर अलग-अलग वर्ण एवं उनके व्यवहार चल नहीं सकते। एक ही व्यक्तिके कर्म आज बहुत श्रेष्ठ हैं, कुछ दिनोंमें बहुत हीन हो सकते हैं। इस सम्बन्धमें मैं विवाद नहीं करना चाहता। हम सनातनधर्मियोंका विश्वास है कि शास्त्रोंमें जन्मसे ही जाति और वर्ण-व्यवस्थाका विधान है और उसके अनुसार आचरण करनेसे ही मनुष्यका कल्याण होता है।
अब अनाचार-दोषके कारण जो वर्णसंकरता आ गयी है, वह विचारणीय है। यह वर्णसंकरता कुछ अंशमें आयी है—इसमें तो सन्देह नहीं। आपके उदाहरणोंकी सच्चाईमें सन्देह करनेका कारण नहीं है; लेकिन इसका उपाय यही है कि जाति-बहिष्कार आदि पुरानी प्रथाएँ फिर जीवित की जायँ। इन दोषोंको दूर करनेका प्रयत्न हो। यह न हो सके तो इन दोषोंसे जहाँ कुछ संख्यामें, चाहे संख्या भले बड़ी हो, कुछ परिवार ही भ्रष्ट हुए हैं, वहाँ पूरा समाज अस्त-व्यस्त हो जायगा विवाह-शादी वर्णसे बाहर करनेमें। वर्ण-व्यवस्थाका आधार ही नष्ट हो जायगा। जो लोग इस प्रकार सभी वर्णोंमें परस्पर विवाहादिके समर्थक हैं, उनकी दृष्टिसे तो कोई दोष आया नहीं। अनाचारके कारण अन्त्यज-संतति ब्राह्मण-घरमें ब्राह्मण कहलाती या ब्राह्मण-संतति अन्त्यज घरमें अन्त्यज कहलाती और वहीं उनके सम्बन्धादि होते हैं; क्योंकि वे तो ऐसे वर्ण बाहरके सम्बन्धोंके समर्थक ही हैं। यदि दोष आता है तो उनकी दृष्टिमें, जो वर्णव्यवस्था और वर्ण एवं जातिमें ही विवाहके समर्थक हैं। उनकी दृष्टिसे इस दोषके कारण पूरी व्यवस्थाको ही नष्ट कर देना उचित नहीं हो सकता। दोष जबतक दोष हैं—उनको दूर करनेका प्रयत्न चल सकता है। समाजमें कुछ तो निर्दोष रहेंगे ही। अनजानमें हुए दोष दोष न माने जाने चाहिये—इस न्यायसे तो केवल कुछ दोषी परिवार ही दोषी रहेंगे। इसे न मानें तो बहुत अधिक पवित्र परिवार बचेंगे, लेकिन इस दोषको खुली स्वीकृति देनेसे तो पवित्रताका आधार ही नष्ट हो जायगा।
जो बात वर्णान्तर-विवाहके सम्बन्धमें कही गयी है, वही विधवा-विवाहके सम्बन्धमें है। जो आचार-दोष आते हैं, उन्हें रोकनेका प्रयत्न तो ठीक है; किंतु संयमके आधारको नष्ट करना ही ठीक नहीं है। यह बात बहुत महत्त्वकी है और ध्यान देनेकी है कि हिंदू धर्मशास्त्र संख्याको महत्त्व नहीं देते—वहाँ संयम और श्रेष्ठताको महत्त्व दिया गया है। अतएव यदि कठोर नियम-संयमको स्थिर रखकर थोड़ी संख्याके लोगोंको भी आत्मनियमन और आत्मदर्शनकी ओर बढ़ाते हैं तो वे नियम आदरणीय हैं। बड़ी संख्या नियम नहीं रख पाती, इसीलिये नियम उठाये नहीं जाने चाहिये।
मन्दिर-प्रवेश, जनेऊ-धारण, गायत्री-जप या वेद-पाठ आदिके सम्बन्धमें यह बात विचार करनेकी है कि मन्दिरकी मूर्ति सामान्यत: तो पत्थर, धातु आदिकी ही है, जनेऊ सूत ही है और गायत्रीके शब्द और वेदमन्त्र भी सामान्य दृष्टिसे शब्द ही हैं। यदि कोई इन्हें पत्थर आदि, सूत, साधारण शब्द मानकर ही यह होड़ करे कि ‘क्योंकि ऊँचे वर्णके लोग इनका सेवन करते हैं और मैं आचरणमें उनसे अच्छा हूँ, अत: मैं भी करूँगा’ तब तो बात दूसरी है। तब तो उससे तर्क करना व्यर्थ है, पर मन्दिरकी मूर्तिमें देवता मानकर किसी आध्यात्मिक लाभकी आशासे पूजा करने जाना है, यदि किसी ऐसे ही लाभकी आशासे जनेऊ पहनना और गायत्री-जप करना तथा वेद पढ़ना है तो यह देखना होगा कि मन्दिरके देवतामें पत्थरकी अपेक्षा यह विशेषता क्यों आयी और कैसे उसका पता लगा। यही बात जनेऊ, गायत्री, वेदमन्त्रके सम्बन्धमें है। इन विषयोंमें शास्त्रको छोड़कर कोई प्रमाण नहीं। जब शास्त्र मानते हैं, तब वहाँकी पूरी बात माने बिना कोई लाभ नहीं। आधी बात मानना, आधी न मानना तो कुछ मानना नहीं है। उससे कोई लाभ नहीं। शास्त्र ही कहते हैं कि मन्दिरमें किनको जाना चाहिये, किनको नहीं जाना चाहिये। गायत्री, जनेऊ, वेदपाठ किनको करना चाहिये, किनको नहीं। मान लीजिये कि ‘द्विजाति आचरणभ्रष्ट है।’ ‘मन्दिरमें छिपकर शूद्र जाते हैं।’ यह सब अनुचित है। जो ऐसा करते हैं, पाप करते हैं। ऐसे लोग मन्दिर, जनेऊ, गायत्रीसे कुछ लाभ पा नहीं सकते, लेकिन उनके दुरुपयोगको देखकर दूसरे लोग भी दुरुपयोग करना चाहें तो उन्हें क्या लाभ होगा? शास्त्रकी मर्यादा तोड़कर इन कार्योंके करनेसे केवल यह अभिमान भले बढ़ जाय कि हम भी मन्दिरमें जाते हैं, यज्ञोपवीत पहनते और गायत्री-जप करते हैं, पर लाभ क्या होगा? शास्त्रके अनुसार तो यह अपराध होगा।
देखिये—भूल जड़में ही है। आपने मान लिया है कि ‘जिनके कर्म बुरे हैं, वे नीच हैं, शूद्र हैं और जिनके कर्म अच्छे हैं, वे शूद्र-घरमें उत्पन्न हुए हों तो ब्राह्मण हैं।’ सनातन धर्मकी मान्यता ऐसी नहीं है। जाति जन्मसे मानी जाती है। ब्राह्मणकुलमें जिसका जन्म हुआ है, वह अत्यन्त नीच कर्म ही करता रहे तो वह घृणाके योग्य तो है, त्याज्य है, पर है ब्राह्मण ही। ब्राह्मणाधम आप उसे कह सकते हैं, पर जिन कर्मोंके करनेका उसे अधिकार है, जैसे जनेऊ पहनना, मन्दिरमें जाना आदि, उसे प्राप्त हैं। अवश्य ही यज्ञादिमें तथा दानमें उसका त्याग करना चाहिये। अपने नीच कर्मोंका फल वह इस जीवनके बाद पावेगा। वह किसी अधम योनिमें जायगा। पर उसने जो पूर्वजन्ममें अच्छे कर्म किये, उससे इस योनिमें आया। अब इसका स्थान इस जन्ममें तो उसका है ही। उसका शरीर पवित्र कर्मोंका परिणाम, अत: मूलत: पवित्र है। अबके कर्म उसे आगे पवित्र करेंगे। जैसे जिस विद्यार्थीने किसी कक्षामें परीक्षा पास कर ली, वह अगली कक्षामें बैठनेका अधिकारी हो गया। अब वह न पढ़ेगा तो फेल होगा। दोष करेगा तो निकाला जायगा, पर अभी तो न पढ़नेपर भी बैठनेका अधिकारी है उसी कक्षाका।
इसी प्रकार अन्त्यज जातिमें जिसका जन्म है, वह यदि पवित्र आचरणसे, नियमपूर्वक धर्मका आचरण करते हुए रहता है तो वह सबके द्वारा प्रशंसित होगा। आदर पावेगा। भगवान्का भजन करके भगवान्को प्राप्त कर लेगा। यों वह महात्मा हो सकता है, लेकिन वह ब्राह्मण नहीं हो सकता। उसके श्रेष्ठ कर्म उसे अगले जन्ममें ब्राह्मण या उससे भी ऊपर देवता बना सकते हैं। पर उसका यह जन्म उसके पिछले कर्मोंके फलसे मिला है। इस जन्मके कर्म उसके शरीरको शुद्ध नहीं कर देंगे। वह मन्दिर-प्रवेश, यज्ञोपवीत-धारण, गायत्री-जप, वेद-पाठादि करे तो यह मर्यादाभंग होगा। इससे उसे लाभ नहीं होगा; क्योंकि उसका शरीर जिस कर्मसे प्रकट हुआ है, वे कर्म ऐसे नहीं कि इनके प्रभावको ग्रहण करें। उलटे उसकी आध्यात्मिक हानि होगी। वह अपराध तो होगा ही मर्यादानाशका। जैसे किसी छोटी कक्षाका विद्यार्थी खूब परिश्रम करे तो परीक्षामें पास होकर ऊपरकी कक्षामें चला जायगा, लेकिन यह मानकर कि ‘मैं श्रम करता हूँ, आज्ञापालन करता हूँ, ऊपरकी कक्षाका विद्यार्थी पढ़ता नहीं, उलटे आचार करता है, तो मैं उससे श्रेष्ठ हूँ।’ वह ऊपरकी कक्षामें जा बैठे, उनकी पुस्तकें पढ़ने लगे तो अपना पाठ भूल जायगा। वह पाठ भी समझ न सकेगा और निकाला जायगा या दण्ड पावेगा सो अलग।
सबसे अच्छी बात तो यह है, जो भगवान्ने गीतामें कही है—
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।
अपने कुल, जाति, वर्णके लिये जो धर्म शास्त्रमें बताये हैं, वही उस जातिके लिये श्रेष्ठ एवं परलोकमें उन्नति करनेवाले हैं। दूसरी जाति या वर्णके धर्म समाजमें चाहे ऊँचे ही माने जाते हों, पर वे दूसरी जातिके हैं। उनका आचरण वही जाति करे तो ठीक, दूसरोंके लिये वे भयावह—भय (क्लेश-पतन) देनेवाले हैं। सत्य, अहिंसा, दान, दया, क्षमा, संतोष आदि तो सबके धर्म हैं, पर मन्दिरमें देव-पूजन, गायत्री-जप, वेद-पाठ, यज्ञोपवीत-धारण, सन्ध्या आदि धर्म तो वर्ण या जातिके हैं। वे जिनके लिये हैं, उन्हींको लाभ पहुँचाते हैं। दूसरा देखा-देखी उन्हें करने जाय तो उसे हानि ही होगी। जैसे वैद्य ही जानता है कि कौन-सी दवा किसे हानि करेगी और किसे लाभ, वैसे ही सर्वज्ञ महर्षियोंने जातियोंके कारणरूप कर्मोंकी शक्ति जानकर ऐसे कर्मोंमें अधिकार निश्चित किया है।
दूसरे क्या करते हैं—यह देखना मनुष्यके लिये उतना आवश्यक नहीं है, जितना यह कि वह स्वयं क्या है और क्या करता है। दूसरोंमें दोष है, दूसरे अपराध करते हैं तो एक सर्वनियन्ता, सर्वशक्तिमान्, परम न्यायी परमात्मा भी तो है ही। वह स्वयं उनका दण्ड-विधान करेगा। हम दूसरोंका दोष देखने जाकर अपनेमें उन दोषोंके संस्कार बढ़ाते हैं। हमें बड़ी सूक्ष्मतासे अपने दोष देखने चाहिये और अपने छोटे-से-छोटे दोषको भी जड़-मूलसे उखाड़ फेंकनेका प्रयत्न करना चाहिये। शास्त्रोंपर श्रद्धा करके परम्परागत नियमोंका पालन करते हुए भगवन्नामका जप और भगवान्का निरन्तर स्मरण सबके कल्याणका साधन है।