तकदीर और तदबीर

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद। उत्तरमें निवेदन है कि तकदीर और तदबीरका ही प्रश्न उठा करता है, तजबीजका नहीं। किंतु आपने अपने पत्रमें तकदीर और तजबीजका प्रश्न उठाया है। अत: यहाँ मैं संक्षेपमें दोनों ही प्रश्नोंपर कुछ निवेदन कर रहा हूँ।

तकदीरका अर्थ है प्रारब्ध या भाग्य और तदबीरका अर्थ है पुरुषार्थ, प्रयत्न अथवा उद्योग। तजबीज कहते हैं बुद्धि-विचारद्वारा किये हुए एक निर्णय या फैसलेको। तकदीर अथवा प्रारब्ध क्या वस्तु है—यह भी जान लेना परम आवश्यक है। पूर्वजन्मोंमें अपनेद्वारा किये हुए कर्मको ‘दैव’ कहते हैं।

पूर्वजन्मकृतं कर्म तद् दैवमिति कथ्यते।

यही तकदीर अथवा भाग्य है। कर्म तीन प्रकारके होते हैं—क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। वर्तमान कालमें जो कर्म किया जा रहा है, वह क्रियमाण है। एक कर्म समाप्त करके मनुष्य सदा नया कार्य करता रहता है। जो कर्म समाप्त हो जाता है, वह संचित (जमा) हो जाता है। जैसे किसान खेती करके अन्न पैदा करता है। जब वह खेत जोतता-बोता है, तब वह उसका क्रियमाण कर्म होता है। खेतसे जो अन्न पैदा होता है, उसको वह अपने घरमें संग्रह करके रखता है। यह संग्रह ही संचित है। उस संचित अन्नमेंसे वह कुछ अन्न अलग करके दैनिक खर्चके लिये काममें लाता है। खर्चके लिये अलग किया हुआ जो अन्न है, वही उपभोगमें आनेके कारण प्रारब्ध, भाग्य या तकदीर नाम धारण करता है। जिसने अच्छा अन्न पैदा करके जमा कर रखा है, वह अच्छा खाता है। जो खराब अन्न जमा किये हुए है, वह खराब खाता है। इसी प्रकार पूर्वजन्मोंके संचित कर्ममेंसे कुछ कर्म मनुष्यको उपभोगके लिये प्राप्त होते हैं। उन फलदानोन्मुख कर्मोंको ही प्रारब्ध, दैव, भाग्य या तकदीर कहते हैं। उन कर्मोंके अनुसार ही हमें इस जन्ममें शरीर, धन, आयु तथा सुख-दु:ख आदि प्राप्त होते हैं।

लोग कहते हैं, ‘जो भाग्यमें बदा है वह मिलेगा। हमारा भाग्य खोटा है, हमारा भाग्य अच्छा है इत्यादि।’ यह अलग-अलग भाग्य कौन बनाता है? ईश्वर तो समदर्शी हैं, वे किसीका भाग्य बुरा और किसीका अच्छा क्यों बनायेंगे? हम स्वयं ही अपने अच्छे-बुरे भाग्यके विधाता हैं। दूसरे शब्दोंमें एक जन्मकी तदबीर ही दूसरे जन्ममें तकदीर बनकर आती है। पहले जन्मोंका पुरुषार्थ ही दूसरे जन्ममें भाग्य कहलाता है। वस्तुत: पहलेके जन्मोंके पुरुषार्थका ही नाम अगले जन्मोंमें ‘भाग्य’ हो जाता है। अत: वे दोनों एक ही हैं। ऐसी स्थितिमें किसको छोटा कहा जाय और किसको बड़ा। जब दोनों एक ही वस्तु है, तब समता क्या की जाय। तथापि कालभेदसे दोनोंके अलग-अलग नाम हैं और व्यवहार-दृष्टिमें दोनों दो माने जाते हैं। इस दशामें दोनों ही अपने-अपने स्थानपर बड़े हैं। पुरुषार्थने भाग्यको बनाया है, इसलिये पुरुषार्थ बड़ा है। इसी प्रकार भाग्यने पुरुषार्थको परास्त करके मनुष्यको सुख-दु:खकी प्राप्ति करायी है। अत: वह भी बड़ा है। हमारा यह जन्म सुख-दु:खकी प्राप्तिके लिये भाग्यके द्वारा नियन्त्रित है। साधारण पुरुषार्थ भाग्यके विधानको मिटा नहीं सकता; अत: उसका महत्त्व भी मानना ही पड़ेगा। दो आदमी एक साथ व्यापार करते हैं। योग्यतामें एक बहुत अच्छा है, चतुर है, शिक्षित है, परिश्रमी है, ईमानदार है और दूसरा इन सभी बातोंमें अयोग्य है। तथापि योग्य कहा जानेवाला कभी-कभी भारी घाटेमें पड़ता देखा गया है और अयोग्य दिन-दूनी रात-चौगुनी उन्नति करता चला जाता है। समान योग्यता और समान प्रयत्नवाले दो मनुष्य भी प्राय: असमान फलके भागी होते देखे गये हैं। यही भाग्यका खेल है। भाग्यसे साधारण प्रयत्न भी अधिक फलता है और दुर्भाग्यसे असाधारण प्रयास भी असफल होता देखा गया है। इस प्रकार तकदीर बड़ी जान पड़ती है, पर इस तकदीरको बनाया है तदबीरने ही। अत: तदबीरका, पुरुषार्थका महत्त्व भी कभी कम नहीं हो सकता। इस जन्ममें भी महान् पुरुषार्थसे कभी-कभी भाग्य भी पलटता देखा जाता है। शास्त्रोंमें इसके अनेक दृष्टान्त हैं। मार्कण्डेयजीकी बहुत कम आयु थी, परंतु उनके पुरुषार्थने ही उन्हें अजर-अमर बना दिया। सती सावित्रीके पुरुषार्थने मरे हुए सत्यवान‍्को भी जिला दिया और उन्हें चार सौ वर्षकी नयी आयु प्राप्त करवा दी।

तजबीज तो बुद्धिका कार्य है और बुद्धिपर तकदीर या भाग्यका नियन्त्रण रहता है। भाग्यसे यदि दु:ख आनेवाला है तो बुद्धिका निर्णय भी दु:खमें डालनेवाला ही होगा। अत: भाग्यके सामने तजबीजकी वैसे कोई हस्ती नहीं है; परंतु सत्संग-स्वाध्यायके द्वारा यदि बुद्धिको शुद्ध ‘संयत’ तथा भगवदभिमुखी बना दिया जाय तो उस शुद्ध बुद्धिसे किये हुए कर्म सुखदायक ही होते हैं। पर इस प्रकार बुद्धिको शुद्ध बनाना भी पुरुषार्थ ही है।

सदा, सर्वत्र, सर्वथा भगवान् ही सबसे महान् हैं। उनकी कृपासे सब कुछ सम्भव है। अत: भगवान‍्की शरण लेकर सदा उनका स्मरण करते हुए न्यायोचित पुरुषार्थ करते रहना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।