त्याग-तपस्या ही धर्म है

सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। उन बहिनका यह कथन सर्वथा उचित है कि ‘उपदेश करना सहज है; परंतु पालन करना कठिन है। सभी स्त्रियाँ पतिव्रता बनना और कहलाना पसंद करती हैं; पर पतिव्रताकी व्याख्या क्या है? सीता, सावित्री, दमयन्ती आदि पतिव्रताकी श्रेणीकी स्त्रियोंसे पूछा जाय कि हमारी स्थितिमें तुम कैसे इस व्रतको रखतीं......।’ इसके पश्चात् उन बहिनकी आपने जो परिस्थिति लिखी, वह भी अवश्य विचारणीय है। उनका त्याग, तप, धर्मपालन, सेवा, संयम सभी सराहनीय है और हिंदू-देवीके सर्वथा योग्य है। हिंदू-स्त्री त्याग और बलिदानकी जीवित प्रतिमा है। स्वार्थी पुरुषोंके साथ उसकी तुलना करना तो उसे उसके गौरवयुक्त पदसे नीचे उतारना है। उक्त बहिन ‘पतिके घर और बच्चोंके साथ अपने कर्तव्यका पालन भरसक करती हैं, परंतु तब दु:खी हो जाती हैं जब वह उन व्यक्तियोंसे अवहेलना पाती हैं, जिनके ऊपर उसने अपने पतिके सुखोंको निछावर कर दिया।’ सो ऐसी परिस्थितिमें उनको दु:ख होना भी अस्वाभाविक नहीं है। त्यागमूर्ति हिंदू-देवियोंके साथ जो लोग दुर्व्यवहार करते हैं, वे बहुत बड़ा अपराध करते हैं और इसका कुफल उनको तथा समाजको भी भोगना पड़ेगा, परंतु हिंदू-देवी तो अपना धर्म देखती है। जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त प्रत्येक क्षण त्यागके लिये ही है, वह यही करती है और इसीमें उसका गौरव है। अनादिकालसे अबतक उसने बड़े-बड़े कष्टोंका सामना करके अपने इस क्षुरधारा-व्रतको निभाया है। उन बहिनको भी अपने इसी पवित्र व्रतकी ओर देखना चाहिये।

मेरी उन बहिनके साथ हार्दिक सहानुभूति है और मैं चाहता हूँ कि उनको शान्ति प्राप्त हो। यह सत्य है कि उनकी मनोव्यथा कितनी और कैसी है, मैं उसका सच्चा अनुमान भी नहीं कर सकता। इस हालतमें मैं जो कुछ कहूँगा सो उनके कथनानुसार वस्तुत: परिस्थितिके ज्ञानसे रहित केवल परोपदेशमात्र ही होगा। यथार्थ उत्तर तो कोई तपोमूर्ति अनुभूतिसम्पन्न देवी ही दे सकती हैं तथापि जब आपने पूछा है, तब मैं संक्षेपमें अपने विचार निवेदन करता हूँ। श्रीसीताजी, सावित्री और दमयन्ती क्या कहतीं—इसका उत्तर तो वे ही दे सकती हैं; पर पातिव्रतकी व्याख्या तो है—‘केवल त्याग और तपस्याकी साधना और इसके साधनमें गौरवकी अनुभूति।’ इस साधनामें क्लेश तो भारी-से-भारी आ सकते हैं; परंतु मानसिक दु:ख नहीं होता। यह कल्पना या भावना नहीं है, आज भी हजारों-लाखों हिंदू-देवियोंका त्यागमय संतोषयुक्त जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। स्त्री हो या पुरुष, मानव-शरीरका लक्ष्य है—‘भगवत्प्राप्ति’। कायिक भोग तो अवस्थानुसार प्रत्येक योनिमें ही प्राप्त होते हैं। पुरुषके लिये भगवत्प्राप्तिके अनेक साधन हैं; पर स्त्रीके लिये तो पातिव्रत ही एक प्रधान साधन है। भगवान‍्की किस प्रकार सर्वार्पणबुद्धिसे तथा निष्काम प्रेमसे सेवा-भक्ति करनी चाहिये, इसका जीता-जागता आदर्श हिंदू-स्त्रीका पतिव्रतधर्म है। इसीलिये हिंदू-स्त्री अपने पतिको परमेश्वर मानकर सदा सर्वात्मना उनकी सेवा करती है और इसी भजनके द्वारा वह परमात्माकारवृत्ति लाभ करके अन्तमें भगवान‍्को पा लेती है। पुरुष यदि स्वार्थवश अपनेको परमेश्वर कहकर स्त्रीसे पुजवाना चाहता है तो वही बड़ी भूल करता है; परंतु स्त्रीका उसको परमेश्वर मानकर अनन्यभावसे उसका सेवन करना तो उसकी भगवत्प्राप्तिकी पवित्र साधना है। इसी तत्त्वको समझकर उन बहिनको इस साधनामें तत्पर रहना चाहिये और परमेश्वरके मंगलविधानसे उनके लिये जैसा जो कुछ बन गया है, उसके लिये तनिक भी पश्चात्ताप न करके अपनी परिस्थितिका सदुपयोग करना चाहिये।

वे जिन सज्जनसे पवित्र नि:स्वार्थभावसे मिलती हैं, सो यदि भाव पवित्र रहे तो कोई बुरी बात नहीं है; परंतु यदि कहीं कोई छिपी वासना हो तो कभी इसका परिणाम दूसरे प्रकारका भी हो सकता है। वासना होनेपर, अब भी गहराईसे देखा जाय तो किसी एक अज्ञात विलक्षण आकर्षणके रूपमें उसका पता लग सकता है। पता न भी लगे तब भी वासनाका होना सम्भव है। बहुत बार छिपी वासनाएँ धर्म, कर्तव्य और पवित्र प्रेमका बाना पहनकर प्रकट होती हैं तथा इन पवित्र नामोंपर मनुष्यको गिरानेका मीठा प्रयत्न किया करती हैं। इसलिये सावधान रहना चाहिये और जहाँतक बने, अपने मनको भगवान‍्की मंगलमयी लीला-कथाओंके स्मरण-चिन्तनमें लगाना चाहिये। यों भगवान‍्के नाते प्रेम तो प्राणिमात्रके साथ करना चाहिये और जो अपने हितैषी हों, अपने साथ सहानुभूति रखते हों, उनके प्रति तो प्रेम होना स्वाभाविक ही है। पर देखना यही है कि उस प्रेममें कहीं कोई आसक्ति तो नहीं है। अवश्य ही उसे ढूँढ़नेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये और ऐसा मान लेना ही चाहिये कि कहीं-न-कहीं मेरे मनमें आसक्ति है, जो मुझे भगवत्प्राप्तिकी साधनासे हटा सकती है। आसक्तिके ढूँढ़नेके प्रयत्नमें या उनको भुलानेकी चेष्टामें तो सम्भव है, उनका चिन्तन और भी बढ़ जाय। प्राय: ऐसा हुआ करता है। अतएव ऐसा न करके जीवनका प्रधान लक्ष्य समझकर श्रीभगवान‍्में ही चित्त लगानेका प्रयत्न करना चाहिये। भगवत् -चरित्रोंके पठन, गीताके अभ्यास और भगवन्नामके जापसे इसमें बड़ी सहायता मिल सकती है। जीवनभर दु:खका भार सहनेपर भी यदि भगवान‍्में मन लग गया तो जीवनको सार्थक समझना चाहिये।

इन पंक्तियोंसे उन बहिनको यदि कोई रास्ता मिला तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी।