विकार क्या है?
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपको मेरी बातोंसे संतोष होता है, यह आपका प्रेम है। आपके प्रश्नोंका उत्तर संक्षेपमें नीचे लिख रहा हूँ—
(१) आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पाँचों तत्त्व प्रकृत अवस्थामें शुद्ध और विकृत अवस्थामें अशुद्ध हैं। भगवान्के संकल्पसे जब प्रकृतिमें वैषम्यके कारण क्षोभ होता है, तब वह महत्तत्त्व अहंकार आदिके रूपमें परिणत होने लगता है। यह विपरिणाम ही विकार है। इस प्रकार कार्यावस्था ही विकृतावस्था है और कारणावस्था प्रकृतावस्था है। आकाश आदि पंचभूत भी विकार ही हैं। अत: वे अशुद्ध ही कहे जायँगे। जब कारणावस्थामें स्थित होंगे, उस समय इनका यह वैकारिक रूप विलीन हो जायगा। प्रत्येक कार्य अपने कारणमें विलीन होकर अन्ततोगत्वा साम्यावस्थामें स्थित प्रकृतिमात्र रह जाती है; फिर वह प्रकृति भी परमात्मासे अभिन्न रहती है। यही आत्यन्तिक प्रलय है। इस दृष्टिसे आकाश आदिको अपने विशुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति प्रलयकालमें ही होती है। अपेक्षाकृत पृथ्वीसे जल, जलसे अग्नि, अग्निसे वायु और वायुसे आकाश अधिक शुद्ध है। अत: पृथ्वीकी शुद्धि जलसे, जलकी शुद्धि अग्निसे, अग्निकी वायुसे और वायुकी आकाशसे होती है। यह तो हुई दार्शनिक दृष्टि।
व्यवहार-दृष्टिसे पृथ्वी वहीं अशुद्ध होती है, जहाँ मल, मूत्र, थूक, जूठन, शव, मद्य, मांस, हड्डी आदि अपवित्र वस्तुएँ पड़ी हों। उन्हें बुहारकर साफ कर दें। गंदी चीजें दूर हटा दें और स्थानको झाड़-बुहारकर गोबर और जलसे लीप दिया जाय तो वहाँकी भूमि शुद्ध हो जाती है। पक्की जमीन हो तो उसे जलसे धोकर शुद्ध किया जा सकता है। जल यदि बहता हुआ है तो शुद्ध है। नदी, कुआँ और तालाब आदिका जल शुद्ध है! तालाब आदिमें भी बहुत थोड़ा जल हो तो वह ग्राह्य नहीं है। अच्छे बर्तनमें रखे हुए जलमें भी यदि कोई अपवित्र वस्तु पड़ जाय या कोई जीव मर जाय तो वह अशुद्ध एवं अग्राह्य हो जाता है। जलके आन्तरिक दोषको दूर करनेके लिये उसे छान लेना तथा औटा लेना चाहिये। अग्नि चिताकी ही अशुद्ध मानी गयी है, अन्यत्रकी अग्नि वायुके स्पर्शमात्रसे शुद्ध है। घनी आबादीकी वायु अशुद्ध होती है, क्योंकि उसमें गंदे नाले तथा मल-मूत्रादिकी दुर्गन्ध मिली रहती है। खुले स्थान या मैदानमें, नदीके किनारे अथवा वाटिकामें फूलोंकी सुगन्ध लेकर बहनेवाली वायु शुद्ध मानी गयी है। होम या धूपके धूमसे भी वायुकी शुद्धि मानी गयी है। आकाश किसी बाह्यदोषसे दूषित नहीं होता, अत: वह नित्य शुद्ध है।
वैदिक सिद्धान्त तो यही है कि आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल तथा जलसे पृथिवीकी उत्पत्ति हुई है—‘आकाशाद् वायु:, वायोरग्नि:, अग्नेराप:, अद्भॺ: पृथिवी।’ देखनेमें भी यही आता है कि सूर्यके अधिक तापसे वर्षा होती है। गरमीके बाद वर्षा होनेका यही रहस्य है। शरीरमें ज्वर होनेपर पसीना निकलता है, तब ज्वर शान्त हो जाता है। वह गरमी जलरूपमें परिणत होकर निकलती है। अत: जल एक स्वतन्त्र तत्त्व है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजनके योगसे जल बनता है। यह वैज्ञानिकोंका मत हो सकता है; उनके मतपर हम कोई आलोचना नहीं करना चाहते, परंतु अपने यहाँके शास्त्रीय सिद्धान्तपर अनास्था प्रकट करनेका मुझे कोई कारण दिखायी नहीं देता। ‘आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा।’ यह सिद्धान्त प्रसिद्ध है। सूर्यसे वृष्टि और वृष्टिसे अन्न—यह सब जानते हैं। इससे भी तेजस्तत्त्वसे जलतत्त्वकी उत्पत्ति सिद्ध होती है।
(२) भगवान्के नामका स्मरण और कीर्तन ही एक ऐसा परम पवित्र कार्य है, जो सदा और सब अवस्थाओंमें किया जा सकता है; उससे दोष तो कभी होता ही नहीं, सदा परम लाभ-ही-लाभ होता है।
(३) मूत्रत्यागके समय भी जल ले जाना चाहिये और पेशाब कर लेनेके बाद ऊपरकी खाल हटाकर उसे अच्छी तरह धो देना चाहिये। फिर हो सके तो मिट्टी लगाकर, नहीं तो केवल जलसे ही हाथ धोना तथा जिस पात्रमें जल ले गये हों, उस पात्रको भी माँज-धोकर शुद्ध कर लेना चाहिये। जल ऐसी दुर्लभ वस्तु नहीं, जो उपलब्ध न हो सके। यात्राके समय सदा साथमें लोटा-डोर रखना चाहिये। कभी जलके बिना भी मूत्रत्यागका अवसर आ जाय तो मूत्रत्यागके पश्चात् इन्द्रियको सूखी मिट्टी या बालूसे सुखा देना चाहिये तथा बालू-मिट्टीसे ही हाथ साफ कर लेना चाहिये। इतनेपर भी जो सूक्ष्म अशुद्धि रह जाती है, उसीके कारण सुबह-शाम वस्त्र बदलकर सन्ध्योपासना की जाती है। मूत्रत्यागके पश्चात् कुल्ला भी अवश्य करना चाहिये। मल-मूत्रके समय मुखमें भी कुछ विकृति देखी जाती है, इसीसे थूक या लारकी मात्रा कुछ बढ़ जाती है; अत: मूत्रत्यागके बाद हाथ धोकर खूब कुल्ला करके मुँह साफ कर लेना चाहिये। चेष्टा करनेपर कुल्ला करने या हाथ धोनेके लिये जल प्राय: मिल ही जाता है।
(४) मलत्याग करनेके पश्चात् गुदाका जितना भाग बाहरसे धोना सम्भव हो, उसे प्रयत्नपूर्वक साफ कर देना चाहिये। जो भाग अधिक अंदर है उसमें मल रहनेपर भी बाह्य शुद्धिमें अन्तर नहीं पड़ता। वास्तवमें तो स्वस्थ मनुष्य जब मल त्याग करता है, तब प्राय: मल बँधा हुआ गिरता है; अत: वह कहीं लगता नहीं, केवल गुदाद्वारपर ही कुछ लगता है,अत: धोनेपर वह ठीक ही हो जाता है।
मल-मूत्र शरीरमें वहीं है, जहाँ उसका स्थान है। अंदर उसके होते हुए भी हम बाहरसे नहा-धोकर शुद्ध हो सकते हैं। बाह्य शुद्धिसे सम्पन्न होनेपर पूजा-पाठका अधिकार हो जाता है। अन्त:शुद्धि तो भावसे होती है। आपके मनमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अहंकार आदि दोष न हों और दया, सत्य, प्रेम, परोपकार, क्षमा, सरलता आदिके भाव बढ़ने लगें तो समझना चाहिये कि आप भीतरसे भी शुद्ध हैं। शरीरके भीतर केवल मल-मूत्र ही नहीं—अस्थि, मज्जा, मेद, रक्त, पीब, कफ, पित्त आदि बहुत-से दूषित और अपवित्र पदार्थ हैं, इन सबका समुदाय ही तो शरीर है। ‘मलायत्तं बलं पुंसाम्’ इस वैद्यकके वचनानुसार मनुष्यका बल मलके ही अधीन है। यदि आप जुलाब लेकर सारा-का-सारा मल गिरानेका प्रयत्न करें तो आपके लिये उठकर खड़ा होना भी कठिन हो जायगा। बाह्य शुद्धि या शौचाचारका फल यही है कि शरीरगत दोषोंपर भी दृष्टि जाय और फिर इस शरीरको दोषका आगार समझकर इसकी ओरसे राग और ममता हट जाय। इसमें आसक्ति न रहे। देहासक्तिसे छूटनेपर मनुष्य आध्यात्मिक मार्गमें शीघ्र उन्नति कर सकता है।
(५) छूआछूतका विचार भी शास्त्रीय है। कौन पवित्र है कौन अपवित्र? किसका स्पर्श करना चाहिये किसका नहीं? इसपर शास्त्रोंमें विशद विवेचन मिलता है। शास्त्रकार महर्षियोंने इसको माना और महत्त्व दिया है, अत: हमें भी मानना चाहिये; क्योंकि कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें शास्त्र ही प्रमाण हैं। मक्खियाँ भी अशुद्ध हैं, अतएव उन्हें उड़ा दिया जाता है। अस्पतालोंमें जालीदार किवाड़ लगते हैं, जिससे मक्खियाँ न पहुँचें। मच्छरोंसे बचनेके लिये मसहरी लगायी जाती है। बिल्लीको भगाया जाता है। चूहोंको चूहेदानीमें पकड़कर घरसे दूर छोड़नेकी चेष्टा की जाती है—यह सब इसीलिये होता है कि हम इनके स्पर्शसे बचें। ये हमारे भोजन और वस्त्रको अपने स्पर्शसे दूषित न करें। इतनेपर भी उनसे जो स्पर्श हो जाता है, उसके लिये हम विवश हैं। वहाँ विवश हैं, इसलिये सर्वत्र विवश हों, जान-बूझकर छूआछूतका विचार ही छोड़ दें—ऐसा मानना भ्रम है।
गाड़ीमें, मेलेमें, जहाज या नावपर तथा लंबी बिछी हुई दरी आदिपर बैठे हुए मनुष्य एक-दूसरेसे छू जाते हैं, ऐसे स्थानोंपर शरीर-स्पर्शका दोष शास्त्रकारोंने भी नहीं माना है। वहाँ छूट दी गयी है। परंतु जहाँ ऐसी विवशता नहीं है, वहाँ तो इनका विचार रखना ही चाहिये। यह विचार किसीको ऊँच-नीच समझनेके कारण नहीं है। जैसे रजस्वला-दशामें माता, बहिन और स्त्री भी स्पर्शके योग्य नहीं रहती; परंतु अस्पृश्य होकर भी वह नीच नहीं समझी जाती। इसी प्रकार ‘अस्पृश्य’ मानी हुई जातियाँ अपने जन्मगत तथा संस्कारगत दोषोंके कारण अस्पृश्य हैं; पर वे नीच नहीं हैं। सब अपने ही भाई हैं। ब्राह्मण ‘अग्रज’ बड़े भाई हैं तो ‘अन्त्यज’ छोटे भाई हैं। सब एक ही शरीरके अंग हैं। हम पैर आदिको छूकर हाथ धोते हैं और मस्तकको छूकर पवित्र मानते हैं। पर दोनोंमें आत्मभाव सम है। इसी प्रकार अस्पृश्य भाइयोंके साथ भी आत्मभाव समान रखकर उनकी सुख-सुविधा एवं मान-मर्यादाका ध्यान हमें अवश्य रखना ही चाहिये; परंतु अकारण स्पर्श नहीं करना चाहिये। यह शास्त्रकी मर्यादा है। इसके पालनसे सवर्णों और अस्पृश्योंका भी कल्याण है।
मिठाई आदि जो बाजारी दूकानोंपर बिकती हैं, वे किसी भी दृष्टिसे खानेयोग्य नहीं हैं। वे अस्वास्थ्यकर होती हैं और स्पर्शदोषसे दूषित भी। विचारवान् लोग दूकानकी चीजें नहीं खाते। साग-सब्जी, अनाज आदि कच्ची चीजें घरमें आनेपर पुन: उनका संस्कार होता है; अत: उन्हें बाजारसे लेनेमें कोई हर्ज नहीं है। कलम, दावात, कुर्सी, मेज, बर्तन आदि भी धोयी जा सकती है; अत: उनका स्पर्श-दोष अकिंचित्कर है। धर्मग्रन्थ, जहाँतक हो सके, अशुद्ध हाथोंसे नहीं छूना चाहिये। बाहरसे आनेवाली पुस्तकें एक बार तो अनेक प्रकारके लोगोंसे छुई जाती हैं, परंतु घरमें आनेपर इस बातका ध्यान रखना चाहिये कि अशुद्ध हाथोंसे न छुई जायँ। अपनी बुद्धि, विवेक तथा शक्तिके अनुसार स्पर्शदोषसे बचनेका प्रयत्न करना मनुष्यका कर्तव्य है। विवशताकी दशामें वह उत्तरदायी नहीं है।
(६) चमड़ेका बटुआ रखना आधुनिक फैशन ही है, इसे नहीं रखना चाहिये। रखते हैं तो यह आदर्श नहीं है। चमड़ा छूनेके बाद बिना हाथ धोये पवित्र वस्त्रपर तथा खाने-पीनेकी वस्तुओंपर हाथ नहीं लगाना चाहिये। जूतेके लिये भी यही बात है। दूसरे, चमड़ेके लिये गौ-बछड़े आदि जीवोंकी बड़ी हत्या होती है। इसलिये भी चमड़ेका व्यवहार नहीं करना चाहिये। आचार-विचार ठीक रखनेके लिये सत्संग तथा सद्ग्रन्थोंका स्वाध्याय करना चाहिये। अनजानमें जो भूलें हुई हैं, उनके दोषसे बचनेके लिये भगवन्नाम-जप करना चाहिये। गंगा-स्नान भी पवित्र करता है।
(७) जब दोनों अपना स्वार्थ छोड़कर एक-दूसरेको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करें, तब जीवन प्रेममय और सुखमय हो सकता है। आप चेष्टा करें कि ‘मुझे सुख मिले या न मिले’ स्त्रीको सुख पहुँचाना है। जब स्त्रीको आपका यह भाव मालूम हो जायगा, तब वह भी इसी प्रकार आपके लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देगी।
(८) बाजारका दूध आजकल प्राय: अविश्वसनीय है। घर गाय हो अथवा सामने दूध दुहा लिया जाय तभी शुद्ध दूध मिल सकता है।
(९) मनुष्ययोनि ही कर्मक्षेत्र है। मनुष्य ही नूतन कर्म करनेका अधिकारी है। उसीके किये हुए शुभाशुभ कर्म सुख-दु:खरूप फल देनेवाले हैं। अन्य जीव तो अपने किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं। आज जो पशु-पक्षी आदि योनियोंमें हैं, वे अपने मानव-जन्ममें किये हुए कर्मोंका ही फल भोग रहे हैं। उनके द्वारा कोई नवीन कर्म नहीं बनता। किसी भी जीवको तबतक नहीं मारना चाहिये, जबतक कि उसके द्वारा अनेक निर्दोष जीवोंके लिये प्राण-संकटका भय न हो। खेती नष्ट करनेवाले पशुको भगा देना चाहिये, मारनेकी आवश्यकता नहीं। मनुष्यको यह अधिकार है कि वह अपनी जीविका तथा अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये प्रयत्न करे। इस प्रयत्नमें वह दूसरे जीवोंको दूर हटा सकता है, परंतु किसी जीवकी हिंसा न करे। खानेके लिये तो किसी प्राणीका कभी भी वध न करे। मत्स्य, मांस और मद्य आदिका सर्वथा त्याग कर दे।
इस समय जो कर्म शुभ या अशुभ हमारे द्वारा होते हैं, वे स्वतन्त्र कर्म हैं उन्हींको ‘क्रियमाण’ भी कहते हैं। ये कर्म समाप्त होनेके बाद संचितकी श्रेणीमें आ जाते हैं। इस संचित राशिमेंसे कुछ कर्म छाँटकर फल भुगतानेके लिये पृथक् किये जाते हैं। उन्हींका नाम ‘प्रारब्ध’ है। जैसे एक आदमीने चार अपराध किये हैं। वे चारों संचितमें हैं। जब जिस अपराधका दण्ड उसको दिया गया, उस समय वही अपराध उसके लिये प्रारब्ध बन गया। प्रारब्धकर्मके अनुसार ही शरीर, धन, आयु और सुख-दु:ख आदि भोग प्राप्त होते हैं।
(१०) संतान प्रारब्धवश होती है—यह मान लेनेपर भी सदा ही भोगपरायण रहनेकी प्रेरणा कैसे मिलती है? ‘मरणं विन्दुपातेन, जीवनं विन्दुधारणात्’ वीर्य-धारणसे ही जीवन सुरक्षित रहता है। अधिक भोगासक्त मनुष्य क्षयके शिकार होकर शीघ्र ही कालके गालमें चले जाते हैं, अत: स्त्री-प्रसंग ऋतुकालमें एक या दो बार किसी नियत दिनको करना चाहिये। फिर महीनेभर अखण्ड ब्रह्मचर्य। इससे भोग और संयम दोनों निभ सकते हैं। संयमके द्वारा मनुष्य पारमार्थिक साधन—भगवत्प्राप्तिके लिये प्रयत्न कर सकता है। मानव-शरीर केवल भोग भोगनेके लिये नहीं मिला है। इसके द्वारा मोक्ष अथवा भगवान्को पा लेनेमें ही इसकी सच्ची सार्थकता है। स्त्रीकी प्राप्तिमात्र प्रारब्धका फल है। अधिक सम्भोग अथवा संयम नूतन कर्म हैं। सम्भोगसे हानि और संयमसे लाभ प्रत्यक्ष हैं। अत: सम्भोगसे विरत होनेका अभ्यास करना चाहिये। कामकी प्रबल इच्छा होनेपर अपनी स्त्रीके साथ न्यायत: सम्भोग कर सकते हैं, पर चेष्टा रखनी चाहिये कि कामेच्छा उत्तरोत्तर कम होती रहे और भगवान्को प्राप्त करनेकी अभिलाषा उत्तरोत्तर बढ़े। अनर्गल स्त्री-सहवासादि करना अनाचार है और अनेकों रोगोंका कारण है। काम-क्रोध प्रबल शत्रु हैं। भगवान्ने गीतामें कामको शत्रु बताकर उसे मारनेकी स्पष्ट आज्ञा दी है। इसको मारनेका शस्त्र है ज्ञान, अपने स्वरूपका स्मरण। मैं आत्मा हूँ, परमात्मासे अभिन्न हूँ। मुझपर क्षुद्र काम-क्रोध शासन करें—यह लज्जाकी बात है। मेरी शक्ति अमोघ है। मनसे काम-क्रोधको निकालना ही होगा। विषय क्षणभंगुर हैं, नाशवान् हैं; मनुष्यके तेज और विवेकका नाश करनेवाले हैं, अत: इनसे बचना चाहिये। भगवान् परम सुन्दर हैं, सुखद हैं, नित्य हैं, मधुर हैं, वहाँ नित्य आनन्द है; इसलिये मनको उन्हींमें लगाना चाहिये। ऐसा निश्चय कर अभ्यास और वैराग्यका अवलम्बन करके मनको भगवान्के चिन्तनमें लगावे। मनमें ‘राम’ के आते ही ‘काम’ भागकर अन्यत्र चला जायगा। फिर भक्तवत्सल भगवान्के स्वरूप-चिन्तनका निरतिशय आनन्द उठाते रहिये। भगवान्की कृपा सबपर है। आप यदि उन्हें पानेका अभ्यास करेंगे तो भगवत्कृपा और बढ़ेगी तथा भगवान् स्वयं आपके पास आ जायँगे।
(११-१२) भगवान्से मिलनेकी इच्छा सदा बढ़ाते रहें; इससे चिन्तन बढ़ेगा। फिर भगवान्के लिये व्याकुलता होगी और भगवान् आपके स्नेहपाशमें खिंचकर आ जायँगे। श्रीकृष्ण अपनी ओर खींचते भी हैं और भक्तकी ओर खिंच भी आते हैं। इस प्रकार उभयत: आकर्षणके कारण ही वे ‘कृष्ण’ हैं। जब भगवान् अपना लेंगे, तब उनके स्पर्शका सुख नित्य-निरन्तर होता रहेगा।
(१३) भगवान्का स्वरूप चिन्मय है, दिव्य है; अत: उसमें पार्थिव शरीरकी भाँति कोई विकार नहीं है। इसके सिवा उनमें नित्य किशोरावस्था है। किशोरावस्थामें मूँछ होती ही नहीं। हमारा शरीर वैसा नहीं है; अत: हमें मूँछ मुड़ाकर वैसा बननेकी आवश्यकता नहीं।
(१४) भगवत्-मिलनका सुख भगवान्की कृपासे ही साध्य है। आप भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ाइये, फिर भगवान् आपसे दूर नहीं रह सकते। शेष भगवत्कृपा।