व्यक्तिपूजन
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। ‘कल्याण’ में प्रकाशित लेखोंको देखकर आपने समझ लिया कि मैं कोई बड़ा महात्मा हूँ, सो यह आपकी भूल है। इधर-उधरसे सामान बटोरकर उसे लेखरूपमें लिख देनेसे कोई महात्मा नहीं होता। मोदीकी दूकानमें हर तरहके मेवा और बढ़िया-बढ़िया पदार्थ रहते हैं, इससे वह उन वस्तुओंके पैदा करनेवाला बगीचा नहीं हो जाता। इसी प्रकार ‘कल्याण’ में मैं शास्त्रोंके आधारपर ज्ञान, वैराग्य और भक्तिपर लेख लिख देता हूँ। वस्तुत: मैं वैसा ही साधारण मनुष्य हूँ, जैसे और बहुत-से हैं। मनुष्यके स्वरूपका वास्तविक चित्र उसके हृदयसे मिलता है, बाहरी व्यवहारसे नहीं और हृदयका पता दूसरोंको लगता नहीं। मैं कैसा हूँ, क्या हूँ, इसे मैं ही जान सकता हूँ। एक आदमी बाहरसे बहुत सज्जन और भला आदमी मालूम होता है, वह अंदरसे बड़ा दम्भी और पापी हो सकता है और एक आदमी जो बाहरसे साधारण दीखता है, वास्तवमें बड़ा महात्मा हो सकता है। जो लोग बाहरसे अपनेको महात्मा सजाते और प्रकट करते हैं, उनमेंसे अधिकांश प्राय: महात्मा नहीं होते। धोतीमें सभी नंगे हैं, भगवान् लाज बचाते हैं! क्या कहूँ। भगवत्प्रेमकी बात तो अलग रही। मनुष्योंमें परस्पर मित्रताका जैसा प्रेम होना चाहिये, जिसकी कुछ कल्पना तो मनमें आती है, पर सचमुच अपने अंदर वैसा मैत्री-प्रेम भी मैं किसीके प्रति नहीं पाता। दैवी सम्पत्तिके गुण—जिनकी प्रशंसा बार-बार मैं किया करता हूँ—ध्यान देकर देखता हूँ तो अपने अंदर उनमेंसे बहुतोंका अभाव ही दीखता है। न सारी इन्द्रियाँ और मन-बुद्धि ही भगवान्में लगते हैं। काम-क्रोधादि भी हैं ही। ऐसी सूरतमें आप ही बताइये, यदि मैं आपके या अन्य किसीके कहनेसे अपनेको महात्मा समझ लूँ तो इसका अर्थ यही होगा कि मैं अपने-आपको भी ठगना चाहता हूँ। हाँ, इतना अवश्य प्रतीत होता है कि करुणासागर भगवान्की मुझपर अनन्त कृपा है। सो यह उनका स्वभाव है। इसमें मेरा कोई महत्त्व नहीं। पर उस कृपाका पूरा अनुभव होनेपर मनुष्यकी जैसी स्थिति होनी चाहिये—जिसकी कुछ कल्पना मेरे मनमें होती है—देखता हूँ तो अपनेको वैसी स्थितिमें नहीं पाता; इससे यह भी सिद्ध होता है कि भगवत्कृपाका भी यथार्थ अनुभव मुझे नहीं है। बस, यही समझिये कि मैं उनका नाम लेकर जगत्में आरामसे अपनी जीवनयात्रा चलानेवाला एक अल्पज्ञ जीव हूँ। इससे अधिक कुछ नहीं।
मनुष्यको बड़ा मीठा लगता है अपना सम्मान। यद्यपि नाम-रूपके सम्मान, पूजन या यश-कीर्तिका कुछ भी यथार्थ महत्त्व नहीं है; क्योंकि नामकी कल्पना जन्मके बाद होती है और वह बदलनेवाला तथा मिटनेवाला होता है; एवं रूप तो जन्मसे मृत्युतक ही रहता है, परंतु मनुष्य मोहवश मरनेके बाद भी शरीरके नामरूपकी पूजार्चना, यश-कीर्ति और मान-सम्मानकी चाह करता है और इसके लिये जीवनकालमें नाना प्रकारके स्वाँग रचकर सदा अपने-आपको ही धोखा देता रहता है। भक्त है तो उसे भगवान्के नित्य शाश्वत दिव्य नाम-रूपको छोड़कर अन्य नाम-रूपसे क्या मतलब? और ज्ञानी है तो नाम-रूपका मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर ही वह ज्ञानी बना है। फिर उसका मिथ्या नाम-रूपसे क्या लेन-देन? अत: नाम-रूपका मोह न ज्ञानीको होता है न भक्तको। वह होता है नाम-रूपके गुलामको। पर बड़ा मोह है! नाम-रूपकी गुलामीकी निन्दा करके भी मनुष्य नाम-रूपका व्यामोह नहीं छोड़ सकता। इसीसे वह भगवान्के स्थानपर अपनेको बैठाकर भगवत्पूजाकी जगह निन्दनीय व्यक्ति पूजाका प्रचार-प्रसार करता है। भगवान्की कृपासे ही इस मोहसे मनुष्य छूट सकता है! नहीं तो, जो लोग बहुत जोरके शब्दोंमें व्यक्ति-पूजाका विरोध करते हैं, वे ही, दूसरे लोगोंके मनोंमें अपने नाम-रूपके प्रति श्रद्धाका विशाल वृक्ष सपुष्प और सफल देखना चाहते हैं। मैं यह नहीं कहता कि मुझे अपने नाम-रूपकी तारीफ बुरी मालूम होती है। निन्दा जरूर बुरी मालूम होती है। हाँ, विचार करनेपर कभी-कभी निन्दामें लाभ और स्तुतिमें हानि मालूम होती है। इस समय कुछ विवेक जाग्रत् है, इसीसे आपकी सेवामें यह निवेदन कर रहा हूँ कि आप मेरी तारीफ करके मुझे गिरानेका प्रयत्न मत कीजिये। यद्यपि आप गिरानेके लिये नहीं करते। आपका भाव शुद्ध है, परंतु मेरी कमजोरी इतनी है कि मैं तारीफके बोझको सहन न करके गिर जा सकता हूँ। इसीसे कभी-कभी ऐसी प्रार्थना भी किया करता हूँ कि भगवान् ऐसे मित्रोंसे बचावें। अपनी दीनता देखकर और भगवान्की दयालुता देखकर यह भरोसा अवश्य होता है कि भगवान्ने अवश्य ही मुझे अपना लिया है—
सकल अंग पद बिमुख नाथ
मुख नामकी ओट लई है।
है तुलसी परतीति एक
प्रभु मूरति कृपामई है॥
आपको, मुझको, सबको श्रीभगवान्के अचिन्त्यानन्त महान् गुणोंका गान करना चाहिये। उनके दिव्य नाम-रूप-लीला आदिकी भरपेट तारीफ करनी चाहिये और अपनी स्मृतिको उनके पादपद्मोंके रज:कणोंमें मिलाकर सर्वदा भुला देना चाहिये। तभी हमलोग वस्तुत: भगवान्का नाम-गान करनेके अधिकारी हो सकेंगे। श्रीचैतन्यमहाप्रभुने कहा है—
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:॥
जो अपनेको जूतोंके नीचे आनेवाले राहके तिनकेसे भी अधिक नीच मानता है, जो वृक्षसे बढ़कर सहनशील है और मानरहित होकर सबको मान देनेवाला है, उसीके द्वारा श्रीहरि सदा कीर्तनीय होते हैं। विशेष भगवत्कृपा!