आसुरी शक्तियोंपर विजय पानेके लिये भगवदाराधन और देवाराधन कीजिये!

भारतीय संस्कृति प्राणिमात्रमें एक ‘भगवान्’ और ‘आत्मा’ मानती है। इसीलिये प्राणिमात्रका हितचिन्तन उसका सहज स्वभाव है। सबमें परस्पर प्रेम रहे, सब सबका हित-साधन करें, कोई किसीसे द्वेष-वैर न करे, सब सबको सुख पहुँचानेका प्रयत्न करें—यह हमारा आदर्श है। इसीसे भारतका यह स्वाभाविक नारा है—

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्॥

‘सब सुखी हों, सब तन-मनसे नीरोग हों, सभीको कल्याणका साक्षात्कार हो और दु:खका भाग किसीको न मिले।’ परंतु इस परम पवित्र आदर्शपर विश्वके मनुष्य चलते रहें, इस आदर्शका पालन-संरक्षण और विस्तार हो, इसके लिये प्रयत्न तथा इसमें बाधा देनेवाली प्रबल आसुरी शक्तियोंका दमन आवश्यक है। आसुरी शक्तिके दमनमें उसका भी हित है। दमन न होनेपर वह यदि बढ़ती चली जायगी तो उत्तरोत्तर उसका पापपूर्ण विस्तार होता जायगा, जो उसके लिये भी परिणाममें अत्यन्त घातक होगा। जैसे अपने ही किसी अत्यन्त सड़े हुए अंगको ऑपरेशनके द्वारा निकलवा देना आवश्यक होता है, उसी प्रकार विश्वमानव-शरीरके सड़े हुए अंगका भी ऑपरेशन आवश्यक है। फिर, जहाँ भौतिक राज्य-संचालनके द्वारा भगवान‍्की पूजा करनी है, वहाँ तो सुरक्षाका प्रयत्न भी भगवत्पूजाका एक आवश्यक अंग है। हमलोगोंने शान्ति और अहिंसाके नामपर इसकी ओर ध्यान नहीं दिया, इसीसे आज दुर्दान्त चीन और पाकिस्तान भारतपर आक्रमण करनेकी बड़ी तैयारी कर रहे हैं और इस समय चीनके द्वारा सैन्यसंग्रहके अतिरिक्त आक्रमणकी कोई क्रिया न होनेपर भी पाकिस्तानने तो जहाँ-तहाँ आक्रमण भी आरम्भ कर दिया है। इनके इस बढ़े हुए रोगका नाश करके इन्हें नीरोग बनाकर इनका हित-साधन करना अत्यन्त आवश्यक है। अतएव भारतको अपना बल-विक्रम, शौर्य-वीर्य इतना बढ़ा लेना चाहिये कि किसीका भी भारतकी ओर ललचायी दृष्टिसे देखनेका साहस न हो और भारतकी जो भूमि अन्यायपूर्वक दबा ली गयी है, उसे भी लौटा देना पड़े। इस दिशामें हमारी सरकारको पूरा प्रयत्न करना चाहिये और जनताको हर तरहसे उसमें सरकारकी सहायता करनी चाहिये।

भारत सदासे ही शान्ति चाहता है और वह सदा ही शान्ति चाहता रहेगा; पर यदि उसपर कोई अन्यायपूर्वक आक्रमण करना चाहेगा तो उसको पूरा दण्ड दिया जायगा—यह हमारी नीति होनी चाहिये।

परंतु यह स्मरण रखना चाहिये कि केवल भौतिक बल-विक्रमसे ही काम नहीं चलेगा। पूर्ण विजय प्राप्त करनेके लिये ‘अध्यात्मबल’—दैवी बलकी परम आवश्यकता है। अतएव मूर्खतावश भारतपर आक्रमण करनेवाले इन देशोंकी बुद्धि शुद्ध करनेके लिये और भारतके अजेय बलके सामने इनका साहस सदाके लिये नष्ट हो जाय, इसके लिये स्थान-स्थानपर भगवदाराधन और देवाराधनका पवित्र कार्य होना चाहिये। वैदिक और तान्त्रिक विष्णुयाग, रुद्रयाग, गायत्रीपुरश्चरण, सहस्रचण्डी, लक्षचण्डी आदिके द्वारा शक्तिकी आराधना, मृत्युंजय आदिके द्वारा भगवान् शंकरकी उपासना, वाल्मीकीय रामायण तथा रामचरितमानसके सम्पुटित पारायण, रामरक्षास्तोत्र, नारायणकवच, शिवकवच आदिके अनुष्ठान, बगलामुखीके अनुष्ठान, अखण्ड नामकीर्तन तथा सामूहिक प्रार्थनाके आयोजन सर्वत्र होने चाहिये।

हम अपने देशवासियोंका ध्यान नम्रतापूर्वक इधर खींचते हुए उनसे निवेदन करते हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रमें तन-मन-धनसे यथाशक्ति सरकारकी सहायता करते हुए ही विशेषरूपसे भगवदाराधन और देवाराधनकी ओर ध्यान देकर इन अनुष्ठानोंका आयोजन उत्साहपूर्वक करें-करायें, भगवान‍्की कृपापर विश्वास रखें। जहाँ भगवान‍्का आश्रय होगा और पर्याप्त बल होगा, वहाँ विजय सुनिश्चित है।

जहाँ कृष्ण योगेश्वर प्रभु हों,

जहाँ धनुर्धारी हों पार्थ।

मेरे मतसे वहाँ सदा श्री,

विजय, भूति ध्रुव नीति यथार्थ॥