भगवान्का मंगल-विधान
पुरुषार्थ करनेवालेको यदि असफलता मिलती है, तो वह अपने कर्ममें त्रुटि तथा दूसरोंको बाधक मानकर दु:खी होता है। प्रारब्धवादी असफलतामें अपने भाग्यको कोसकर दु:खी होता—रोता है। पर जो प्रत्येक फलमें भगवान्की कृपासे भरा हुआ भगवान्का मंगल-विधान देखता है, वह न तो प्रचुर सम्पत्तिमें हर्षित होता है, न भारी विपत्तिमें रोता है। वह शान्तिपूर्ण चित्तसे निरन्तर अनुकूलता—प्रतिकूलता—दोनोंमें भगवान्का मंगलमय विधान मानकर उसीमें कल्याण मानता हुआ आनन्दमग्न रहता है। वह हर अवस्थामें भगवान्की सुहृदता तथा कृपाके दर्शन करता है।