भगवान‍्की अमोघ कृपा

संसारमें नर-नारियोंके चित्त स्वाभाविक ही लौकिक पदार्थोंकी कामनासे व्याकुल रहते हैं और जबतक इन्द्रिय-मन-बुद्धि इस कामना-कलुषसे कलंकित रहते हैं, तबतक भगवान‍्की उपासना करता हुआ भी मनुष्य अपने उपास्य देवतासे स्पष्ट या अस्पष्टरूपसे कामनापूर्तिकी ही प्रार्थना करता है। यही नर-नारियोंका स्वभाव हो गया है। इसीसे वे भगवद्भावके परम सुखसे वंचित रहते हैं। असलमें उपासनाका पवित्रतम उद्देश्य ही है—भगवद्भावसे हृदयका सर्वथा और सर्वदा परिपूर्ण रहना। परंतु वह हृदय यदि नश्वर धन-जन, यश-मान, विषय-वैभव, भोग-विलास आदिकी लालसासे व्याकुल रहता है तो उसमें भगवद्भाव नहीं आता और उपासनाका उद्देश्य सिद्ध नहीं होता; किंतु सत्संगके प्रभावसे यदि कोई भगवान‍्की अमोघ कृपाका आश्रय ग्रहण कर लेता है तो दयामय भगवान् अनुग्रह करके उसके हृदयसे विषय-भोगकी कामना-वासनाको हटाकर उसमें अपने चरणारविन्द-सेवनकी वासना उत्पन्न कर देते हैं।