भक्ति-तत्त्वका दिग्दर्शन

शास्त्रोंकी आलोचना करते समय सबसे पहले अनुबन्धचतुष्टय अर्थात् अधिकारी, सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजनका विचार किया जाता है। अतएव भक्ति-शास्त्रके अनुबन्धचतुष्टय क्या है? श्रीमन्महाप्रभु चैतन्यदेव कहते हैं कि भक्ति-शास्त्रके प्रति श्रद्धावान् व्यक्ति ही इसका अधिकारी है। ‘वाच्य-वाचक: सम्बन्ध:।’ इस शास्त्रका प्रतिपाद्य विषय है—‘उपास्य-तत्त्व’। अतएव शास्त्रका उपास्य-तत्त्वके साथ वाच्य-वाचक सम्बन्ध है। उपास्य-तत्त्व श्रीकृष्णकी प्राप्तिका उपाय ‘अभिधेय’ है। अतएव भक्ति अभिधेय है और श्रीकृष्ण-प्रेमकी प्राप्ति ही इसका ‘प्रयोजन’ है।

१. अधिकारी (जीव-तत्त्व)

जब भक्ति-शास्त्रका अधिकारी श्रद्धावान् जीव है, तब यह सहज ही जिज्ञासा होती है कि जीव-तत्त्व क्या है और वह श्रद्धावान् होता कैसे है। पद्मपुराणके उत्तरखण्डमें जीव-तत्त्वके विषयमें जामाता मुनि कहते हैं—

ज्ञानाश्रयो ज्ञानगुणश्चेतन: प्रकृते: पर:।

न जातो निर्विकारश्च एकरूप: स्वरूपभाक्॥

अणुर्नित्यो व्याप्तिशीलश्चिदानन्दात्मकस्तथा।

अहमर्थोऽव्यय: क्षेत्री भिन्नरूप: सनातन:॥

अदाह्योऽच्छेद्य अक्लेद्य अशोष्याक्षर एव च।

एवमादिगुणैर्युक्त: शेषभूत: परस्य वै॥

मकारेणोच्यते जीव: क्षेत्रज्ञ: परवान् सदा।

दासभूतो हरेरेव नान्यस्यैव कदाचन॥

आत्मा न देवो न नरो न तिर्यक् स्थावरो न च।

न देहो नेन्द्रियं नैव मन: प्राणो न चापि धी:॥

न जडो न विकारी च ज्ञानमात्रात्मको न च।

स्वस्मै स्वयंप्रकाश: स्यादेकरूप: स्वरूपभाक्॥

अहमर्थ: प्रतिक्षेत्रं भिन्नोऽणुर्नित्यनिर्मल:।

तथा ज्ञातृत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वनिजधर्मक:॥

परमात्मैकशेषत्वस्वभाव: सर्वदा स्वत:।

अर्थात् जीव देह नहीं है, ज्ञानका आश्रय है। ज्ञान उसका गुण है। जैसे अग्निका गुण दाह है, सूर्यका गुण प्रकाश है, उसी प्रकार जीवका गुण ज्ञान है। वह चेतन है, प्रकृतिके परे है। जैसे काष्ठमें व्यापक अग्नि काष्ठसे भिन्न है, उसी प्रकार देही (जीव) देहसे भिन्न है, इन्द्रिय, मन, प्राण या बुद्धि भी नहीं है। वह अजन्मा है, निर्विकार है, सदा एकरूप रहता है। अणु है, नित्य है, व्यापक है, चित् और आनन्दस्वरूप है। ‘अहम्’-शब्द-वाच्य, अविनाशी, क्षेत्री (शरीररूप क्षेत्रका स्वामी) शरीरसे भिन्नरूप, सदा रहनेवाला, अदाह्य, अच्छेद्य, अक्लेद्य, अशोष्य, अक्षर आदि गुणोंसे युक्त है। जीव समस्त पदार्थोंका द्रष्टा और प्रकाशक है तथा स्वयं अपना भी द्रष्टा और प्रकाशक है। वह न जड है और न जडसे पैदा हुआ है। जीव केवल श्रीहरिका दास है और किसीका नहीं। वह देवता नहीं, मनुष्य नहीं, न तिर्यक् है, न स्थावर है। वह ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है, कर्मानुसार उसका गमनागमन होता है। परमात्माका शेषत्व-अनन्यदासत्व ही जीवका स्वभाव है।

ये जीव असंख्य हैं, अनन्त हैं। जल, स्थल और अन्तरिक्षमें कोई स्थान ऐसा नहीं, जो जीवोंसे खाली हो। जीवके सम्बन्धमें श्रीसनातन गोस्वामीके प्रश्नोंका उत्तर देते हुए श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्यदास।

कृष्णेर तटस्था शक्ति भेदाभेद प्रकाश॥

अर्थात् स्वरूपत: जीव श्रीकृष्णका नित्यदास है, वह श्रीकृष्णकी तटस्था शक्ति है, भेद और अभेदरूपमें प्रकाशित होता है। शास्त्रोंमें अन्तरंगा, बहिरंगा और तटस्था-भेदसे श्रीभगवान‍्की तीन शक्तियोंका उल्लेख पाया जाता है। श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

कृष्णेर स्वाभाविक तिन शक्ति-परिणति।

चित् -शक्ति, जीवशक्ति आर मायाशक्ति॥

अर्थात् श्रीभगवान‍्की स्वभावत: तीन शक्तियोंमें परिणति होती है—चित्-शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्तिमें। चित्-शक्ति ही अन्तरंगा शक्ति है, मायाशक्ति बहिरंगा तथा जीवशक्ति तटस्था। श्रीनारदपांचरात्रमें भी लिखा है—

यत्तटस्थं तु चिद्रूपं स्वसंवेद्याद् विनिर्गतम्।

रञ्जितं गुणरागेण स जीव इति कथ्यते॥

अर्थात् चित् पदार्थ स्वसंवेद्य मूलरूपसे निकलकर तटस्थ होकर रहता है। गुणरागके द्वारा रंजित वह तटस्थ चिद्रूप ही जीव कहलाता है। भगवान‍्ने गीतामें भी कहा है—

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥

अर्थात् पूर्वोक्त आठ प्रकारकी अपरा प्रकृतिसे भिन्न एक मेरी जीवरूप परा प्रकृति है, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है। अर्थात् जैसे देहीके द्वारा यह देह धारण किया जाता है, उसी प्रकार असंख्य-असंख्य जीवोंके द्वारा जल, स्थल और अन्तरिक्षरूप अनन्त ब्रह्माण्ड धारण किया जाता है।

अब यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि ‘जब जीव स्वयं भगवान् की, श्रीकृष्णकी तटस्था शक्ति है, तब फिर श्रीकृष्ण-तत्त्व है क्या?’ वेद-वेदान्त आदि शास्त्रोंकी चरम आलोचना करनेसे ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण अखिल प्रेम-रसानन्दमूर्ति हैं। वे नित्य रस-स्वरूप हैं, नित्य प्रेम-स्वरूप हैं तथा नित्य आनन्द-स्वरूप हैं। सूर्यकी किरणके समान, अग्निके स्फुलिंगके समान जीव इस अखिल प्रेम-रस-आनन्द-स्वरूप श्रीकृष्णका ही अंश है। अतएव विशुद्ध प्रेम-रस-आनन्द ही जीवका प्रकृत स्वरूप या स्वभाव है। आनन्द ही ब्रह्म है; एवं परमानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ही परम तत्त्व हैं। इस आनन्दसे ही जीवोंकी उत्पत्ति होती है तथा आनन्दमें ही जीवोंका लय होता है। श्रुति भी कहती है—

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्धॺेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।

अर्थात् ब्रह्म आनन्दस्वरूप है। आनन्दसे ही भूतगण उत्पन्न होते हैं, आनन्दसे वे जीवित रहते हैं, आनन्दमें गमन करते हैं तथा आनन्दमें ही प्रवेश करते हैं।

अतएव प्रेमानन्द ही जीवका प्रकृत स्वरूप है फिर यह इस संसारमें इतना दु:खी क्यों है? श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं कि जीव श्रीकृष्णकी तटस्था शक्ति है, उनकी अन्तरंगा और बहिरंगा शक्तियोंके मध्यमें स्थित है। अन्तरंगा शक्तिके आकर्षणको प्राप्तकर जीव श्रीकृष्णोन्मुख होता है—नित्यानन्द नित्य-सुखका भोग करता है, परंतु बहिरंगा शक्तिके आकर्षणसे वह मायामुग्ध होकर सांसारिक क्लेशोंको भोगता है। श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

कृष्ण भुलि सेइ जीव अनादि बहिर्मुख।

अतएव माया तारे देय संसार दु:ख॥

कभू स्वर्गे उठाय, कभू नरके डुबाय।

अर्थात् वही अनादि जीव श्रीकृष्णको भूलकर जब बहिर्मुख होता है, तब माया उसको सांसारिक दु:ख प्रदान करती है। कभी ऊपर उठाकर स्वर्गमें ले जाती है तो कभी नरकमें डुबा देती है। अविद्या या माया श्रीभगवान‍्की परिचारिका है। भगवद्विमुख जीवोंका अपने प्रभुकी अवज्ञा करना वह सहन नहीं कर सकती, इसीलिये दण्डविधान करती है। अतएव भगवद्विमुखता ही दु:खका हेतु है और इस मायासे निस्तार पानेका एकमात्र उपाय है—भगवान‍्के सम्मुख होना। गीतामें भी भगवान् कहते हैं—

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥

अर्थात् यह दैवी त्रिगुणमयी मेरी माया दुरत्यय है, इससे पार पाना कठिन है। जो मेरी शरणमें आ जाते हैं, वे ही इस मायासे निस्तार पाते हैं। श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं—

भक्त्याहमेकया ग्राह्य: श्रद्धयाऽऽत्मा प्रिय: सताम्।

भक्ति: पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्॥

(श्रीमद्भागवत ११। १४। २१)

‘हे उद्धव! मैं श्रद्धापूर्वक की हुई एकमात्र भक्तिसे ही वशमें होता हूँ; क्योंकि मैं संतोंकी आत्मा और प्रिय हूँ। मेरी दृढ़भक्ति चाण्डालको भी जातिदोषसे पवित्र करती है।’ अतएव भक्ति ही श्रीकृष्ण-प्राप्तिका उपाय है। भक्तिके द्वारा श्रीकृष्ण-प्रेमकी प्राप्ति होती है। प्रेमसे दु:ख दूर होता है और संसार-यातना तिरोहित हो जाती है। परंतु इस प्रेमका मुख्य प्रयोजन श्रीकृष्ण-प्रेमका आस्वादन ही है।

२-सम्बन्ध (भगवत्तत्त्व)

वेदादि समस्त शास्त्र सब प्रकारसे श्रीकृष्णके ही तारतम्यको प्रकट करते हैं। अर्थात् श्रीकृष्ण ही परतम हैं, उनके ऊपर कोई दूसरा उपास्य-तत्त्व नहीं है—यही सब शास्त्रोंका अभिप्राय है। श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

कृष्णेर स्वरूपविचार सुन सनातन।

अद्वय ज्ञान-तत्त्व व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन॥

सर्व आदि सर्व अंशी किशोर शेखर।

चिदानन्द देह सर्वाश्रय सर्वेश्वर॥

अर्थात् हे सनातन! अब श्रीकृष्णके स्वरूपके विषयमें मैं कहता हूँ, तुम सुनो। कृष्ण अद्वय ज्ञानतत्त्व हैं और वे ही व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन हैं। वे सबके आदिकारण हैं, सब उन्हींके अंश हैं, वे अंशी हैं। वे किशोरशेखर श्रीकृष्ण चिदानन्दमूर्ति हैं, सबके आश्रय हैं, सर्वेश्वर हैं। ब्रह्मसंहितामें कहा है—

ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम्॥

(५-१)

अर्थात् श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं, सच्चिदानन्दविग्रह हैं, अनादि हैं और (सबके) आदि—मूलकारण हैं। गोविन्द सब कारणोंके कारण हैं अर्थात् उनका कारण कोई नहीं। श्रीमद्भागवतमें कहा है—

वदन्ति तत् तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥

(१। २। ११)

अर्थात् तत्त्ववेत्तागण जिसको अद्वय ज्ञान-तत्त्व कहते हैं, वही ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्—इन तीन शब्दोंसे अभिहित होता है।

एक ही अद्वयतत्त्वकी यह त्रिविध अनुभूति है। जैसे दूरसे दीखनेवाला सूर्यका विस्तृत प्रकाश समीपसे गोलाकार ज्योति:पिण्डके रूपमें तथा और भी समीप जानेपर उसमें विराजित भगवान् सूर्यदेवके रूपमें मूर्तिमान् दिखायी देता है, उसी प्रकार ज्ञानके उदयकालमें साधकके शुद्ध सात्त्विक हृदय-पटपर जो भगवद्विग्रहका आलोक प्रतिफलित होता है, उसे ब्रह्म कहते हैं। यह सत्तामात्र आलोक ही निर्गुणवादियोंके द्वारा निर्गुण, निराकार, निर्विशेष, निष्क्रिय आदि नामोंसे पुकारा जाता है। यही आलोकपुंज जब बिम्बरूपसे साधकके हृदयाकाशमें प्रतिभात होता है, तब इसे ‘परमात्मा’ कहते हैं। योगीजन इसका प्रादेशमात्र दीपकलिका-ज्योतिके समान दर्शन करते हैं। इसीको जगत‍्का ‘अन्तर्यामी’ माना जाता है। ये ‘ब्रह्मानुभव’ और ‘परमात्मदर्शन’ दोनों ही भगवत्तत्त्वके अंशबोधमात्र हैं। इस ‘ब्रह्मके’ प्रतिष्ठान और ‘परमात्मा’ के अधिष्ठानभूत परम-तत्त्वको ही ‘भगवान्’ कहते हैं। भक्तोंको प्रेमांजनच्छुरित नेत्रोंसे अचिन्त्य-अनन्त-गुणसम्पन्न, षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् श्यामसुन्दररूपके मधुर दर्शन होते हैं। ब्रह्मतत्त्वके सम्बन्धमें उपनिषद् कहते हैं—

ॐ एकमेवाद्वितीयम्। सत्यं ज्ञानमानन्दं ब्रह्म।

—सम्भवत: इस श्रुतिका अवलम्बन करके ही श्रीकृष्णको अद्वय ज्ञानतत्त्वकी संज्ञा दी गयी है। वही परम ब्रह्म भगवान् हैं। उपर्युक्त भागवतीय श्लोककी व्याख्या करते हुए श्रीजीवगोस्वामी लिखते हैं—

अद्वयत्वं चास्य स्वयंसिद्धतादृशातादृशतत्त्वान्तराभावात् स्वशक्त्यैकसहायत्वात् परमाश्रयं तं विना तासामसिद्धत्वाच्च।

अर्थात् स्वयंसिद्ध तादृश और अतादृश (सजातीय और विजातीय) तद्भिन्न किसी अन्य तत्त्वके न होनेके कारण तथा एकमात्र स्वशक्तिपर अवलम्बित होनेके कारण और अन्य सब शक्तियोंके परम आश्रय होनेके कारण श्रीकृष्ण ही अद्वयतत्त्व हैं। उनके बिना कोई शक्ति कार्य नहीं कर सकती। श्रुति भी कहती है—

परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते

स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च॥

(श्वेताश्वतर० ६।९)

अत: स्पष्ट है कि परम ब्रह्मकी नाना प्रकारकी शक्तियाँ हैं। उनमें ज्ञान, बल और क्रिया स्वाभाविक हैं, जिनके प्रभावसे जगद्-व्यापार आदि कार्य सम्पन्न होते रहते हैं। उसी परम ब्रह्मका नाम श्रीकृष्ण है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है—

कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।

जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥

(श्रीमद्भा० १०। १४। ५५)

‘हे महाराज! तुम इन श्रीकृष्णको सम्पूर्ण जीवात्माओंका आत्मा जानो, जो वैसे होकर भी जगत‍्के हितके लिये अपनी योगमायाके प्रभावसे सर्वसाधारणके सामने सांसारिक जीवके समान जान पड़ते हैं।’

यह श्रीकृष्णतत्त्व ही है, जिससे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड उत्पन्न होकर विधृत हो रहे हैं; इसका समर्थन आधुनिक ज्योतिर्विज्ञानके द्वारा भी होता है। रात्रिके समय नील आकाशकी ओर देखिये। अनन्त नक्षत्रमालाएँ रजतके समान शुभ्र किरणोंसे युक्त दीख पड़ेंगी। वे यद्यपि देखनेमें अति क्षुद्र हैं, फिर भी वस्तुत: उनमें अनेकों तारे सूर्यकी अपेक्षा भी कई लाख गुना बड़े हैं। यह सूर्य भी, जो इतना छोटा दीख पड़ता है, इस पृथ्वीकी अपेक्षा चौदह लाख गुना बड़ा है। परंतु जो नक्षत्रपुंज आकाशमें हम देखते हैं, वे वस्तुत: अनन्त आकाशमें फैली असंख्य नक्षत्रराशिके करोड़वें अंशके बराबर हैं। इससे विश्वब्रह्माण्डकी विशालता और असीमताका सहज ही अनुमान किया जा सकता है। इनमेंसे एक-एक नक्षत्र-विशेषको केन्द्रमें लेकर अनेकों ग्रह अपने उपग्रहों और उल्कापुंजोंके साथ भ्रमण कर रहे हैं। जैसे पृथ्वी, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो—ये नौ ग्रह सूर्यकी परिक्रमा करते हुए सौरमण्डलका निर्माण करते हैं, वैसे इस अनन्त आकाशमें असंख्य सौरमण्डल हैं। सबकी रचना और गतिविधि विलक्षण ही हैं। वे नाना प्रकारके रक्त, नील, पीत आदि वर्णोंसे युक्त हैं। उनके प्रकाश और तापमें भी निरन्तर परिवर्तन देखा जाता है। एम०फ्लेमेरिअन नामक फ्रेंच ज्योतिर्विद्ने स्वान, ह्वेल तथा हाइड्रा प्रभृति नक्षत्रपुंजोंके विषयमें बतलाया है कि ये नक्षत्रपुंज कुछ दिनोंतक प्रकाशकिरणोंको बिखेरकर अन्धकारमें विलीन हो जाते हैं। सम्भवत: इनमें हमारी पृथ्वीकी दृष्टिसे दो-दो, तीन-तीन महीनोंका रात-दिन होता है। यह अनन्त विलक्षणताओंसे युक्त अनन्त तारकाराशि केन्द्राकर्षण और केन्द्रापकर्षण—दो विभिन्न शक्तियोंके द्वारा विधृत होकर जीवन-यापन कर रही हैं। यदि ये आकर्षणशक्तियाँ न होतीं तो ब्रह्माण्डकी सारी व्यवस्था ही नष्ट हो जाती। अनन्त सौरमण्डल इसी आकर्षण-शक्तिके बलपर अवस्थित है। इससे यह सहज ही कल्पना की जा सकती है कि इस अनन्त कोटि ब्रह्माण्डका एक ऐसा भी केन्द्र है, जिसके आकर्षणसे ये दृष्टादृष्ट, कल्पित, कल्पनातीत, अनुमित और अनुमानातीत निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड आकृष्ट होकर उसमें विधृत हो रहे हैं। वे सर्वाकर्षक, सर्वाधार, सर्वपोषक, सर्वाश्रय, निखिल आकर्षण और निखिल शक्तिके परमाश्रय और परमाधार श्रीकृष्ण गोविन्द ही हैं।

पाठकोंको इस विवेचनसे ‘श्रीकृष्ण’ शब्दकी वैज्ञानिक निरुक्ति सहज ही समझमें आ सकती है। वस्तुत: श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं; जो सर्वापेक्षा बृहत्तम है, वही श्रीकृष्ण हैं—

यदेव परमं ब्रह्म सर्वतोऽपि बृहत्तमम्।

सर्वस्यापि बृंहणत्वात् कृष्ण इत्यभिधीयते॥

‘जो परम ब्रह्म है, सबसे बृहत्तम है, सबको फैलाये हुए है, वही श्रीकृष्ण कहलाता है।’ बृहद् गौतमीतन्त्रमें भी आया है—

अथवा कर्षयेत् सर्वं जगत् स्थावरजंगमम्।

कालरूपेण भगवांस्तेनायं कृष्ण उच्यते॥

अर्थात् भगवान् सारे स्थावर-जंगम जगत‍्को कालरूपसे आकर्षित कर रहे हैं, इसी कारण वे श्रीकृष्ण कहलाते हैं।

सम्बन्ध-तत्त्वमें अवतारवाद

इस जगत‍्में सच्चिदानन्दविग्रह श्रीभगवान् जो अपने रूपको प्रकट करते हैं, वह उनका अपना रूप प्रकट करना ही अवतार कहलाता है। वे अशेषकल्याणगुणमय हैं। दया उनका विशिष्ट गुण है। जीवके प्रति श्रीभगवान‍्की दयाको सभी धर्म-विश्वासी स्वीकार करते हैं। परंतु जब जीवके परित्राणका उपाय प्रदर्शन करनेके लिये वे जगत‍्में अवतीर्ण होते हैं, तब उनकी दयाका प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त होता है। अन्य किसी अवस्थामें उनकी दया वैसे समुज्ज्वलरूपमें प्रकाशित नहीं होती। श्रीमद्भागवतमें कहा है—

तथायं चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया।

स्वानां चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत्॥

(१। ७। २५)

अतएव श्रीभगवान‍्के अवतारका उद्देश्य है—पृथ्वीके भारका हरण तथा अनन्यभावविशिष्ट अपने भक्तोंके अनुध्यानमें सहायता करना। भगवान् स्वरूपशक्तिके विलासरूपमें इस जगत‍्में अपने रूपको प्रकट करते हैं। भक्तोंको सुख देनेके लिये ही उनकी श्रीमूर्ति प्रपंचमें आविर्भूत होती है। गीतामें भगवान् स्वयं कहते हैं—

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

धर्म ही जीवके मंगलका हेतु है। धर्मकी उन्नतिसे ही जीवकी उन्नति होती है। धर्मसे च्युत होना ही जीवका अध:पतन है। इस धर्मकी रक्षाके लिये ही श्रीभगवान् इस धराधाममें अवतीर्ण होते हैं। उपर्युक्त श्लोककी टीकामें श्रीमधुसूदन सरस्वतीके कथनका अभिप्राय यह है कि कर्मफलके भोगके लिये जीवका जन्म होता है। कर्मानुसार जीव देह ग्रहण करता है। परंतु जो सर्वकारणोंके कारण तथा सर्वकर्मातीत हैं, उनका देहधारण कर्माधीन नहीं है और न उनका शरीर ही भौतिक शरीर है। इसी कारण बृहद् विष्णुपुराणमें कहा गया है—

यो वेत्ति भौतिकं देहं कृष्णस्य परमात्मन:।

स सर्वस्माद् बहिष्कार्य: श्रौतस्मार्तविधानत:॥

भाष्यकार श्रीशंकराचार्यजी भी कहते हैं—

स च भगवान् ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभि: सदा सम्पन्नस्त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं स्वां मायां प्रकृतिं वशीकृत्याजोऽव्ययो भूतानामीश्वरो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावोऽपि सन् स्वमायया देहवान् इव जात इव च लोकानुग्रहं कुर्वन् लक्ष्यते, स्वप्रयोजनाभावेऽपि भूतानुजिघृक्षया।

अर्थात् ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेजके द्वारा सदा सम्पन्न वे भगवान् अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी माया, प्रकृतिको वशीभूत करके, निखिल भूतोंके ईश्वर तथा अज, अव्यय, नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव होते हुए भी अपनी मायाके द्वारा देहवान‍्के समान प्रकट होते हुए-से तथा उनका अपना कोई प्रयोजन न होनेपर भी सृष्ट जीवोंके प्रति अनुग्रहकी इच्छासे संसारका कल्याण करते हुए दीख पड़ते हैं।

श्रीभगवान‍्की प्रकृति भौतिक नहीं है, उनका श्रीविग्रह भौतिक नहीं है—इस बातको श्रीमद्रामानुजाचार्य, श्रीमधुसूदन सरस्वती, श्रीमद्विश्वनाथ चक्रवर्ती, श्रीमान् बलदेव विद्याभूषण तथा महाभारतके टीकाकार श्रीमान् नीलकण्ठ प्रभृतिने शास्त्र और युक्तिके अनुसार सुस्पष्टरूपसे प्रमाणित कर दिया है। श्रीभगवान‍्ने गीतामें स्वयं अपने श्रीमुखसे कहा है—

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।

सारांश यह है कि भगवान‍्के जन्म और कर्म दिव्य हैं, भौतिक नहीं। श्रीजीव गोस्वामी कहते हैं कि ‘ईश्वरका ज्ञानादि जैसे नित्य है, देह भी वैसे ही नित्य है। उनमें देह-देहीका भेद नहीं। जीवदेह जैसे चेतनाविहीन होनेपर ‘शव’ बन जाता है, भगवद्देहके बारेमें ऐसी बात नहीं; वह सदा ही चिदानन्दरसमय बना रहता है। अतएव श्रीविग्रह सच्चिदानन्दस्वरूप भजनीय है।’ वे श्रीभगवत्संदर्भमें लिखते हैं—

यदात्मको भगवान् तदात्मिका व्यक्ति:। किमात्मको भगवान्? ज्ञानात्मक: ऐश्वर्यात्मक: शक्त्यात्मकश्च।

अर्थात् भगवान् जैसे हैं, वैसे ही उनकी अभिव्यक्ति होती है। भगवान् कैसे हैं? वे ज्ञानस्वरूप हैं, ऐश्वर्यस्वरूप हैं और शक्तिस्वरूप हैं। भगवान‍्के स्वरूपसे भगवद्देह भिन्न नहीं है। जो स्वरूप है, वही विग्रह है। विज्ञान-आनन्द भगवान‍्का स्वरूप है, अतएव भगवद्विग्रह भी विज्ञानानन्दमय है। भगवान् रसस्वरूप हैं, अतएव श्रीभगवद्विग्रह भी रसमय है। भगवान् गीतामें कहते हैं—

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

अर्थात् मूढ़लोग मुझको भौतिक मानव-देह धारण किये हुए समझकर मेरी अवज्ञा करते हैं। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि सर्वव्यापक परम ब्रह्म सीमित मानव-देह कैसे धारण कर लेता है। इसका उत्तर यह है कि जो सर्वव्यापक है, निराकार, निर्विकार है, वह सर्वशक्तिमान् भी है। अतएव वह साकाररूपमें प्रकट हो, इसमें कुछ भी असम्भव या अयौक्तिक नहीं है। दुर्गासप्तशतीमें श्रीअम्बिका देवीके प्राकट्यके विषयमें लिखा है—

अतुलं तत्र तत्तेज: सर्वदेवशरीरजम्।

एकस्थं तदभून्नारी व्याप्तलोकत्रयं त्विषा॥

भाव यह है कि सम्पूर्ण देवताओंके शरीरका सूक्ष्म अतुल तेज एकत्र होकर नारीके रूपमें प्रकट हुआ और उस तेजसे तीनों लोक व्याप्त हो उठे। अर्थात् सूक्ष्मसे स्थूलरूप प्रकट हुआ।

वेदादि शास्त्रोंमें देवताओंकी विग्रहवत्ता भी स्वीकृत हुई है। निरुक्तकार यास्कमुनि कहते हैं—

अथाकारचिन्तनं देवतानाम्। पुरुषविधा: स्युरित्येकम्। चेतनावद्भि: स्तुतयो भवन्ति। तथाभिधानानि। अथापि पौरुषविधिकैरङ्गै: संस्तूयन्ते।

(३। ७। २। ६)

अर्थात् वेद-मन्त्रोंमें मनुष्योंके समान आकारविशिष्ट रूपमें देवताओंका चिन्तन होता है, चेतनके समान उनकी स्तुतियाँ होती हैं तथा पुरुषके समान उनके अंगादिका वर्णन पाया जाता है। मन्त्रोंमें मनुष्यके समान अश्व-सैन्य-गृहादिसे युक्त विग्रहरूपमें उनकी उपलब्धि होती है।

श्रीशंकराचार्यने ब्रह्मसूत्र १। ३। २७ के शारीरक भाष्यमें लिखा है—

एकस्यापि देवतात्मनो युगपद् अनेकस्वरूपप्रतिपत्ति: सम्भवति।

अर्थात् एक देवताका आत्मा भी अनेक स्वरूप ग्रहण कर सकता है। योगी भी कायव्यूहका विस्तार कर सकता है। जैसे—

आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ।

योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत्॥

प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित्कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्।

संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव॥

अर्थात् हे राजन्! योगबलको प्राप्त करके योगी सहस्रों शरीर धारण कर सकता है और उन सबके द्वारा पृथ्वीपर विचरण कर सकता है। किसी शरीरसे विषयोंको प्राप्त करता है तो किसी शरीरके द्वारा उग्र तप करता है और फिर उन शरीरोंको अपने भीतर इस प्रकार समेट लेता है जैसे सूर्य अपनी रश्मियोंको बटोर लेता है।

योगदर्शनमें आया है—

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोग:।

अर्थात् मन्त्र-जपसे इष्टदेवताके दर्शन होते हैं। अतएव जब देवता और मनुष्य इस प्रकार शरीर धारण करनेमें समर्थ हैं, तब सर्वशक्तिमान् प्रभुके लिये अवतारविग्रह धारण करना सर्वथा सम्भव है। इसमें किसी प्रकारकी शंकाके लिये स्थान ही नहीं है। अब यहाँ भगवान‍्के विविध अवतारोंके विषयमें कुछ दिग्दर्शन कराया जाता है—

(क) पुरुषावतार

भगवान‍्के पुरुषावतारके विषयमें सात्वततन्त्रमें आता है—

विष्णोश्च त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदु:।

एकं तु महत: स्रष्ट्ट द्वितीयं त्वण्डसंस्थितम्।

तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते॥

विष्णुभगवान‍्के तीन रूप शास्त्रमें निर्दिष्ट हुए हैं। उनमें जो प्रकृतिके अन्तर्यामी हैं और महत्तत्त्वके स्रष्टा हैं, उनका नाम प्रथम पुरुष है। जो ब्रह्माण्डके और जीव-समष्टिके अन्तर्यामी हैं, उनका नाम द्वितीय पुरुष है तथा जो सर्वभूतोंके अथवा व्यष्टि जीवके अन्तर्यामी हैं, उनका नाम तृतीय पुरुष है।

प्रलयकालीन, वासनाबद्ध, भगवद्विमुख जीवोंके प्रति करुणावश भगवान् सृष्टिकी इच्छा करते हैं, जिससे वे जीव संसारमें कर्म करते हुए भगवत्सान्निध्य प्राप्त करनेकी चेष्टा करें और वासनाजालसे मुक्त हों। इस इच्छासे भगवान् पुरुषरूप होकर प्रकृतिकी ओर देखते हैं। इससे प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न होता है और गुणत्रयमें वैषम्य होकर महत्तत्त्वसे लेकर क्षित्यादिपर्यन्त सारे तत्त्वोंकी सृष्टि होती है। ये प्रथम पुरुष ही इस सृष्टिके कर्ता हैं। इनको महाविष्णु या संकर्षण कहते हैं। इनका रूप विराट् है।

इस महदादि सृष्टि और असंहत कारण-तत्त्वोंको परस्पर सम्मिलित करनेके लिये प्रथम पुरुष अंशत: अनेक रूप होकर उनमें प्रवेश करते हैं। यह प्रविष्ट अंश ही द्वितीय पुरुष है। ये अपने प्रबल आकर्षणके द्वारा उनको वक्रगति प्रदान करते हैं। इस प्रकार ये तत्त्व वक्रगतिविशिष्ट होकर, पंचीकृत दशामें, चक्राकारमें आवर्तित और आकुंचित होकर केन्द्र-विच्छिन्न होकर अनन्त ब्रह्माण्डका आकार धारण करते हैं। द्वितीय पुरुष इस ब्रह्माण्डके सृष्टिकर्ता हैं, इनको गर्भोदशायी और प्रद्युम्न आदि नामोंसे अभिहित किया जाता है। ये भी विराट्‍‍रूप हैं।

द्वितीय पुरुषद्वारा सृष्ट ब्रह्माण्ड सूक्ष्म होता है। स्थूल सृष्टिके लिये द्वितीय पुरुषसे विविध अवतारोंका प्रादुर्भाव होता है। उनमें जो पालनकर्ता विष्णु हैं, उन्हींको तृतीय पुरुष कहते हैं। ये व्यष्टि जीवनके अन्तर्यामी हैं, इन्हें क्षीरोदशायी और अनिरुद्ध भी कहते हैं। ये चतुर्भुज हैं, इन्हें अन्तर्यामी परमात्मा भी कहा जाता है।

(ख) गुणावतार

स्थूल-सृष्टि या चराचर-सृष्टिके लिये गुणावतारोंका प्रयोजन होता है। उनमें सृष्टिकर्ता रजोगुणविशिष्ट ब्रह्मा, संहारकर्ता तमोगुणविशिष्ट रुद्र तथा पालनकर्ता सत्त्वगुणविशिष्ट विष्णु हैं।

(ग) लीलावतार

भगवान‍्के जिन अवतारोंमें विश्रामरहित, विविध विचित्रताओंसे पूर्ण, नित्य नूतन उल्लास-तरंगोंसे युक्त, स्वेच्छाधीन कार्य दृष्टिगोचर होते हैं, उनको लीलावतार कहते हैं। लीलावतार पूर्ण अंश और आवेश-भेदसे तीन प्रकारके होते हैं। कल्पावतार और युगावतार—सबका समावेश लीलावतारके उक्त तीन भेदोंके अन्तर्गत हो जाता है। एकमात्र श्रीकृष्ण ही पूर्णावतार हैं। श्रीमद्भागवतके अनुसार १४ मन्वन्तरावतार हैं। जैसे—

१-यज्ञ—ये स्वायम्भुव मन्वन्तरके पालक हैं। इनके पिताका नाम रुचि और माताका नाम आकूति था।

२-विभु—स्वारोचिष मन्वन्तरके पालक हैं। पिता वेदशिरा,माता तुषिता।

३-सत्यसेन—औत्तमीय मन्वन्तरके पालक। पिता धर्म, माता सूनृता।

४-हरि—तामसीय मन्वन्तरके पालक और गजेन्द्रको मोक्ष देनेवाले। पिता हरिमेध और माता हरिणी।

५-वैकुण्ठ—रैवतीयमन्वन्तरके पालक। पिता शुभ, माता विकुण्ठा।

६-अजित—चाक्षुषीय मन्वन्तरके पालक। पिता वैराज, माता सम्भूति। ये ही कूर्मरूपधारी हैं।

७-वामन—वैवस्वत मन्वन्तरके पालक। पिता कश्यप, माता अदिति।

८-सार्वभौम—सावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता देवगुह्य,माता सरस्वती।

९-ऋषभ—दक्षसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता आयुष्मान् माता अम्बुधारा।

१०-विष्वक्सेन—ब्रह्मसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता विश्वजित्, माता विषूची।

११-धर्मसेतु—धर्मसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता आर्यक, माता वैधृता।

१२-सुधामा—रुद्रसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता सत्यसह, माता सूनृता।

१३-योगेश्वर—देवसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता देवहोत्र, माता बृहती।

१४-बृहद्भानु—इन्द्रसावर्णीय मन्वन्तरके पालक। पिता सत्रायन, माता विनता।

कल्पावतार—२५ हैं—जैसे (१)चतुस्सन (सनत्कुमार, सनक, सनन्दन और सनातन), (२) नारद; ये दोनों अवतार ब्राह्म कल्पमें आविर्भूत होते हैं और सभी कल्पोंमें विद्यमान रहते हैं। (३) वाराह—इनका दो बार आविर्भाव होता है, पहला ब्राह्म कल्पके स्वायम्भुव मन्वन्तरमें ब्रह्माके नासारन्ध्रसे और दूसरा ब्राह्म कल्पके चाक्षुष मन्वन्तरमें जलसे। (४) मत्स्य, (५) यज्ञ, (६) नर-नारायण, (७) कपिल, (८) दत्तात्रेय, (९) हयशीर्ष, (१०) हंस, (११) ध्रुवप्रिय या पृश्निगर्भ, (१२) ऋषभ, (१३) पृथु—ये १३ अवतार स्वायम्भुव मन्वन्तरमें होते हैं। (१४) नृसिंह, (१५) कूर्म, (१६) धन्वन्तरि, (१७) मोहिनी, (१८)वामन, (१९) परशुराम, (२०) रामचन्द्र, (२१)व्यास, (२२)बलराम, (२३)श्रीकृष्ण, (२४) बुद्ध और (२५) कल्कि। इनमें अन्तिम आठ वैवस्वत मन्वन्तरके अवतार हैं।

युगावतार ४ हैं—सत्ययुगमें शुक्ल, त्रेतामें रक्त, द्वापरमें श्याम और कलिमें कृष्ण। यज्ञ और वामन अवतारोंका समावेश। मन्वन्तरावतार तथा कल्पावतार दोनोंमें होता है।

सम्बन्ध-तत्त्वमें श्रीकृष्ण

ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् एक ही अद्वय तत्त्वके वाचक शब्द हैं। परंतु साधकोंके भावानुसार ये तीनों शब्द तीन विभिन्न अर्थोंमें व्यवहृत होते हैं। जहाँ किसी गुणका प्रकाश नहीं है, तादात्म्य साधनके द्वारा साधकके हृदयमें जब वैसे तत्त्वकी स्फूर्ति होती है, तब उसको ब्रह्म कहते हैं। बिम्बज्योतिरूपसे दीखनेवाले अन्तर्यामीको योगी परमात्मा कहते हैं और भक्तकी साधनामें सर्वगुणपरिपूर्ण-अशेषकल्याणगुणमय श्रीभगवत्तत्त्वकी स्फूर्ति होती है। वे ऐश्वर्य-वीर्यादि अशेष कल्याणगुणोंके निधान परम तत्त्व ही श्रीभगवान् हैं। श्रीजीवगोस्वामी श्रीकृष्ण-संदर्भमें लिखते हैं—

एवं च आनन्दमात्रं विशेष्यं समस्ता: शक्तयो विशेषणानि विशिष्टो भगवान् इत्यायातम्। तथा चैवं वैशिष्ट्ये प्राप्ते पूर्णाविर्भावत्वेन अखण्डतत्त्वरूपोऽसौ भगवान्—ब्रह्मा तु स्फुटमप्रकटितवैशिष्ट्याकारत्वेन तस्यैव असम्यग् आविर्भाव इत्यायातम्॥

अर्थात् शक्तिविशिष्टताके साथ परम तत्त्वका जो पूर्ण आविर्भाव है, वही भगवत् शब्दवाच्य है। ब्रह्म उसका असम्यक् आविर्भावमात्र है। ब्रह्ममें शक्तिकी स्फूर्ति परिलक्षित नहीं होती; परंतु अवतारोंमें शक्तिकी लीला परिलक्षित होती है। अतएव श्रीभगवत्-शक्ति-प्रकटनका तारतम्य ही अंशत्व, पूर्णत्व, पूर्णतरत्व और पूर्णतमत्वका परिमापक है। श्रीजीवगोस्वामीने ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ इस भागवतीय श्लोककी व्याख्यामें श्रीवृन्दावनविहारी श्रीकृष्णको पूर्णतम कहकर निर्देश किया है। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें भी लिखा है—

पूर्णो नृसिंहो रामश्च श्वेतद्वीपविराड् विभु:।

परिपूर्णतम: कृष्णो वैकुण्ठे गोकुले स्वयम्॥

वैकुण्ठे कमलाकान्तो रूपभेदाच्चतुर्भुज:।

गोलोकगोकुले राधाकान्तोऽयं द्विभुज: स्वयम्॥

अस्यैव तेजो नित्यं च चित्ते कुर्वन्ति योगिन:।

भक्त: पादाम्बुजं तेज: कुतस्तेजस्विना विना॥

(ब्रह्मवैवर्त, श्रीकृष्णजन्मखण्ड, पूर्वार्द्ध अध्याय ९)

अर्थात् नृसिंह, राम और श्वेतद्वीपके विराट् विभु—ये पूर्ण हैं। परंतु वैकुण्ठमें और गोकुल (वृन्दावन)-में श्रीकृष्ण ही परिपूर्णतम हैं। वैकुण्ठमें कृष्णकी विलासमूर्ति कमलापति नारायण विराजित हैं। वहाँ वे चतुर्भुज हैं। गोलोकमें तथा गोकुलमें स्वयं द्विभुज राधाकान्त हैं। इन्हींके तेजका योगिजन नित्य चिन्तन करते हैं, भक्तगण इन्हींके चरण-कमलोंकी छटाका ध्यान करते हैं।

इसके अतिरिक्त माधुर्य-रसयुक्त ऐश्वर्य बहुत ही सुखकर होता है। श्रीकृष्णमें जैसा परमैश्वर्य और परम माधुर्यका पूर्णतम समावेश देखा जाता है, वैसा अन्यत्र कहीं देखनेमें नहीं आता। विष्णुपुराणमें कहा गया है—

समस्तकल्याणगुणात्मकोऽसौ

स्वशक्तिलेशावृतभूतवर्ग:।

इच्छागृहीताभिमतोरुदेह:

संसाधिताशेषजगद्धितो य:॥

(६। ५। ८४)

अर्थात् वे सम्पूर्ण कल्याण-गुणोंके स्वरूप हैं, उन्होंने अपनी माया-शक्तिके लेशमात्रसे सम्पूर्ण प्राणियोंको व्याप्त किया है और अपने इच्छानुसार मनमाने विविध देह धारण करते हैं और जगत‍्का अशेष कल्याण-साधन करते हैं। यह अनन्तगुणविशिष्ट परम तत्त्व ही भगवान् हैं तथा भागवतके अकाट्य प्रमाणके अनुसार श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। श्रीलघुभागवतामृतमें कहा गया है—

इति प्रवरशास्त्रेषु तस्य ब्रह्मस्वरूपत:।

माधुर्यादिगुणाधिक्यात् कृष्णस्य श्रेष्ठतोच्यते॥

अत: कृष्णोऽप्राकृतानां गुणानां नियुतायुतै:।

विशिष्टोऽयं महाशक्ति: पूर्णानन्दघनाकृति:॥

अर्थात् मुख्य-मुख्य शास्त्रोंमें माधुर्यादि गुणकी अधिकताके कारण ब्रह्मस्वरूपकी अपेक्षा श्रीकृष्णकी श्रेष्ठता वर्णित की गयी है। अतएव असंख्य अप्राकृत गुणोंसे युक्त होनेके कारण श्रीकृष्ण महाशक्तिमान् और पूर्णानन्दघन हैं।

भगवान् स्वयं गीतामें कहते हैं—

यद् यद् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत् तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥

अर्थात् हे अर्जुन! ऐश्वर्ययुक्त, सम्पत्तियुक्त तथा बलप्रभावादिके आधिक्यसे युक्त जितनी वस्तुएँ हैं, उन सबको मेरी शक्तिके लेशसे उत्पन्न हुआ जानो। तथा—

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्॥

‘हे अर्जुन! मेरी विभूतिके विषयमें तुमको इतना अधिक जाननेसे क्या प्रयोजन—मैं अपनी प्रकृतिके एक अंश अन्तर्यामी पुरुष अर्थात् परमात्मरूपसे इस जड-चेतनात्मक जगत‍्को व्याप्त करके अवस्थित हूँ।’

भगवान‍्के ऐश्वर्यका अन्त नहीं है। श्रीमन्महाप्रभु श्रीकृष्णलीलाके सम्बन्धमें श्रीसनातनजीसे कहते हैं कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण चिरकिशोर हैं। प्रकट और अप्रकट-भेदसे उनकी लीला दो प्रकारकी है। वे जब प्रकट-लीला करनेकी इच्छा करते हैं, तब पहले पिता-माता और भक्तोंको आविर्भूत करते हैं, उसके बाद स्वयं आविर्भूत होते हैं। श्रीकृष्ण सम्पूर्ण भक्तिरसोंके आश्रय हैं तथा नित्यलीलामें विलास करते हैं। नरलीलाका अनुकरण करनेमें विभिन्न वयस् होनेपर भी वे चिरकिशोर हैं। उनकी सारी लीलाएँ नित्य हैं। ब्रह्माण्ड अनन्त हैं, एक-एक ब्रह्माण्डमें क्षण-क्षणमें पूतना-वध आदि सारी लीलाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

श्रीकृष्णका प्रकट प्रकाशकाल १२५ वर्ष है; जिसमें वे व्रजमें अपना प्रकट लीला-विलास करते हैं। श्रीकृष्ण-लीलामें भी तारतम्य पाया जाता है। व्रजधाममें श्रीकृष्ण सम्पूर्ण ऐश्वर्यसे परिपूर्णतम रूपमें प्रकाशित होते हैं, अतएव व्रजमें वे पूर्णतम हैं, मथुरामें पूर्णतर हैं और द्वारकामें पूर्ण। श्रीकृष्ण सर्वत्र एक ही हैं; परंतु केवल उनके ऐश्वर्य-माधुर्यके प्रकाशके तारतम्यमें पूर्णतमता, पूर्णतरता और पूर्णता प्रकटित होती है। जैसे एक ही चन्द्र विभिन्न तिथियोंमें कला-किरणोंको प्रकाशित करते हुए पूर्णिमाकी रात्रिमें पूर्णतमताको प्राप्त होता है, व्रजमें भी उसी प्रकार श्रीकृष्ण अपने पूर्णतम ऐश्वर्य और माधुर्यको प्रकाशित करते हैं।

इसी कारण वृन्दावन धामकी महामहिमा है। भगवान् स्वयं श्रीमुखसे कहते हैं—

इदं वृन्दावनं रम्यं मम धामैव केवलम्।

पंचयोजनमेवास्ति वनं मे देहरूपकम्॥

कालिन्दीयं सुषुम्णाख्या परमामृतवाहिनी।

अत्र देवाश्च भूतानि वर्तन्ते सूक्ष्मरूपत:॥

सर्वदेवमयश्चाहं न त्यजामि वनं क्वचित् ।

आविर्भावस्तिरोभावो भवत्येव युगे युगे॥

तेजोमयमिदं रम्यमदृश्यं चर्मचक्षुषा।

‘यह रम्य वृन्दावन ही मेरा एकमात्र धाम है। यह पाँच योजन विस्तारवाला वन मेरा देह ही है। यह कालिन्दी परम अमृतरूप जलप्रवाहित करनेवाली मेरी सुषुम्णा नाड़ी है। यहाँ देवतागण सूक्ष्मरूपसे निवास करते हैं और सर्वदेवमय मैं इस वृन्दावनको कभी नहीं त्यागता। केवल युग-युगमें इसका आविर्भाव और तिरोभाव होता है। यह रम्य वृन्दावन तेजोमय है, चर्मचक्षुके द्वारा यह देखा नहीं जा सकता।’

पद्मपुराणके पातालखण्डमें आया है—

यमुनाजलकल्लोले सदा क्रीडति माधव:।

अर्थात् श्रीकृष्ण यमुना-जलकी तरंगोंमें वहाँ सदा क्रीडा करते हैं। श्रीजीवगोस्वामी इस श्लोककी व्याख्या करते हुए लिखते हैं—

यमुनाया जलकल्लोले यत्र एवम्भूते वृन्दावने इति प्रकरणाल्लब्धम्।

अजहल्लक्षणासे तीर-ह्रदादि अर्थ भी लिया जा सकता है। तीरका अर्थ यहाँ वृन्दावन ही लक्षित है। श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

सर्वोपरि श्रीगोकुल व्रजलोक धाम।

श्रीगोलोक श्वेतद्वीप वृन्दावन नाम॥

सर्वग अनन्त विभु कृष्णतनु सम।

उपर्यधो व्यापि आछे नाहिक नियम॥

ब्रह्माण्डे प्रकाश तार कृष्णेर इच्छाय।

एकई स्वरूप तार नाहि दुई काय॥

चिन्तामणि भूमि कल्पवृक्षमय वन।

चर्मचक्षे देखे तारे प्रपंचेर सम॥

प्रेमनेत्रे देखे तार स्वरूप प्रकाश।

गोप गोपी संगे याहा कृष्णेर विलास॥

अर्थात् सबसे ऊपर श्रीगोकुल अथवा व्रजलोक धाम है, जिसे ‘श्रीगोलोक’, ‘श्वेतद्वीप’ तथा ‘वृन्दावन’ नामसे पुकारते हैं। वह श्रीकृष्णके शरीरके समान सर्वव्यापी, अनन्त, विभु है। ऊपर और नीचे व्याप्त है, उसका कोई हेतु नहीं है। श्रीकृष्णकी इच्छासे ही वह ब्रह्माण्डमें प्रकाशित हो रहा है। वह एकमात्र चैतन्यस्वरूप है; देह-देहीके समान उसका द्विविध रूप नहीं है। वहाँ भूमि चिन्तामणिके समान तथा वन कल्पवृक्षमय हैं। चर्मचक्षुओंसे देखनेपर वह वृन्दावन-धाम प्रपंचके समान दीखता है। प्रेमनेत्रसे देखनेपर उसके स्वरूपका प्रकाश होता है और गोप-गोपांगनाओंके साथ श्रीकृष्णकी विलासलीला प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है।

यह अनन्त विश्व-ब्रह्माण्ड श्रीकृष्णकी चित्-शक्तिके द्वारा विरचित है, यह सब कुछ उन्हींकी महिमा है—इससे सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि वे कितने महान् और कितने ऐश्वर्यशाली हैं। शास्त्रमें कहा गया है कि जो निरतिशय बृहत् है, जिससे बड़ा और कुछ नहीं है, वही ब्रह्म है; प्राकृत-अप्राकृत अनन्तकोटि विश्व-ब्रह्माण्ड ब्रह्ममें अवस्थित हैं। ब्रह्म सर्वाधार है, परंतु उस ब्रह्मके भी प्रतिष्ठान, आधार श्रीकृष्ण हैं। गीतामें उन्होंने कहा है—‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्।’ अतएव श्रीकृष्ण क्या वस्तु हैं, यह इससे समझा जा सकता है। इसीलिये श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

एई मत षडैश्वर्य-पूर्ण अवतार।

ब्रह्मा विष्णु अन्त ना पाय जीव कोन छार॥

अर्थात् श्रीकृष्णका पूर्णावतार इस प्रकार षडैश्वर्योंसे पूर्ण है। उनका ब्रह्मा और विष्णु भी जब अन्त नहीं पाते, तब बेचारा मिट्टीका पुतला जीव क्या पता पा सकता है। ब्रह्मसंहितामें कहा गया है—

गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले च तस्य

देवीमहेशहरिधामसु तेषु तेषु।

ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येन

गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥

अर्थात् श्रीकृष्णके निजधाम गोलोक श्रीवृन्दावनके नीचे परव्योम है, जिसे विष्णुलोक भी कहते हैं, तथा देवीलोक अर्थात् मायालोक, शिवलोक आदि लोक परव्योमके नीचे हैं। इन लोकोंमें तत्तद्देवोंके प्रभावोंका जो विधान करते हैं, उन गोलोकविहारी आदिपुरुष गोविन्दको मैं भजता हूँ।

श्रीकृष्णका ऐश्वर्य और माधुर्य

भगवान् श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका अन्त नहीं है। एक बार श्रीमन्महाप्रभुने श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा कि मैं तुमसे एकपादविभूतिकी बात कह रहा हूँ, श्रवण करो। श्रीकृष्णकी त्रिपादविभूति मन और वाणीके अगोचर है। त्रिपादविभूतिकी तो बात ही क्या, एकपादविभूतिका भी कोई अन्त नहीं पा सकता। परिदृश्यमान एक-एक सौर जगत् एक-एक ब्रह्माण्ड है। इस प्रकारके ब्रह्माण्ड असंख्य हैं। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें एक सृष्टिकर्ता, एक संहारकर्ता और एक पालनकर्ता हैं। इनका साधारण नाम चिरलोकपाल है।

श्रीकृष्णकी द्वारका-लीलाके समय एक दिन इस ब्रह्माण्डके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा उनके दर्शनार्थ द्वारकामें आये। उन्होंने आकर द्वारपालके द्वारा अपने आगमनकी सूचना दी। श्रीकृष्णने द्वारपालसे कहा—‘कौन ब्रह्मा आये हैं, उनका नाम क्या है? पूछकर आओ।’ द्वारपालने ब्रह्माके पास आकर तदनुसार पूछा। सुनकर ब्रह्मा विस्मित होकर बोले—‘मैं सनक-पिता चतुर्मुख ब्रह्मा हूँ।’ द्वारपालने श्रीकृष्णके पास जाकर ब्रह्माके उत्तरको निवेदन किया। श्रीकृष्णने ब्रह्माको अंदर बुलानेकी आज्ञा दी। ब्रह्माने आकर श्रीकृष्णके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया। श्रीकृष्णने उनका यथायोग्य पूजा-सत्कार करके आनेका कारण पूछा। ब्रह्मा बोले—‘मैं अपने आनेका कारण पीछे निवेदन करूँगा; पहले यह तो बतलाइये कि आपने द्वारपालके द्वारा जो पुछवाया कि ‘कौन ब्रह्मा आये हैं’—इसका कारण क्या है? क्या ब्रह्माण्डमें मेरे सिवा कोई और ब्रह्मा भी हैं?’

ब्रह्माके इस प्रश्नको सुनकर श्रीकृष्ण मुसकराये और तत्काल ही उस सभामें अनेकों ब्रह्माओंका आविर्भाव हो गया। उनमें कोई तो दस मुखका था, कोई बीस मुखका, कोई सौ मुखका, कोई सहस्रमुख, कोई लक्षमुख। इन असंख्य ब्रह्माओंके साथ-साथ लक्ष-कोटि नेत्रोंवाले इन्द्र प्रभृति देवता भी आये। उनको देखकर चतुर्मुख ब्रह्माके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे सब ब्रह्मा आकर कोटि-कोटि मुकुटोंके द्वारा श्रीकृष्णके पादपीठको स्पर्श करने लगे और प्रार्थना करने लगे कि ‘हे प्रभो! इन दासोंका किसलिये आपने आह्वान किया है?’ श्रीकृष्ण बोले—‘कोई विशेष प्रयोजन नहीं है। आपलोगोंको देखनेकी इच्छासे ही बुलाया है।’ इसके बाद श्रीकृष्णने उनको एक-एक करके विदा किया। चतुर्मुख ब्रह्मा विस्मित नेत्रोंसे यह सब देख रहे थे; अन्तमें श्रीकृष्णके चरणोंमें नमस्कार करते हुए बोले—‘प्रभो! मेरा संशय निवृत्त हो गया; जो सुनना-जानना चाहता था, वह प्रत्यक्ष देख लिया।’ इतना कहकर ब्रह्मा श्रीकृष्णसे आज्ञा प्राप्तकर अपने धामको चले गये।

गोलोक अर्थात् गोकुल, मथुरा और द्वारका—इन तीन धामोंमें श्रीकृष्ण नित्य अवस्थान करते हैं। ये तीनों धाम उनके स्वरूपैश्वर्यद्वारा पूर्ण हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर होकर भी प्रभु अपनी योगमायासे इस गोलोकधाममें लीला करते हैं। उनकी यह गोप-लीलामूर्ति उन वैकुण्ठादि लोकोंकी अधीश्वर-मूर्तियोंकी अपेक्षा भी बहुत अधिक चमत्कारपूर्ण है।

श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-

मायाबलं दर्शयता गृहीतम्।

विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धे:

परं पदं भूषणभूषणांगम्॥

(३। २। १२)

‘श्रीभगवान‍्ने अपनी योगमायाका प्रभाव दिखानेके लिये मानव-लीलाके योग्य जो श्रीविग्रह धारण किया था, वह स्वयं प्रभुके चित्तको विस्मित करनेवाला था, सौभाग्य और ऐश्वर्यका परम धाम था तथा आभूषणोंको भी भूषित करनेवाला था’। श्रीभगवान‍्की अन्यान्य देवलीलाओंकी अपेक्षा यह मानव-लीला अधिक मनोहर है। इसमें भगवान‍्की चित्-शक्तिका अद‍्भुत प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इसकी मनोहरताका लेश भी किसी देवलीलामें नहीं पाया जाता। यही बात भगवान‍्ने स्वयं अपने श्रीमुखसे कही है—

स्वस्य देवादिलीलाभ्यो मर्त्यलीला मनोहरा।

अहो मदीयचिच्छक्ते: प्रभावं पश्यताद‍्भुतम्॥

दिव्यातिदिव्यलोकेषु यद‍्गन्धोऽपि न सम्भवेत् ।

श्रीमद्भागवतमें इसी रूपकी महिमाका संकेत करते हुए कहते हैं—

गोप्यस्तप: किमचरन् यदमुष्य रूपं

लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।

दृग्भि: पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-

मेकान्तधाम यशस: श्रिय ऐश्वरस्य॥

(१०। ४४। १४)

रंगस्थलमें श्रीकृष्णका दर्शन करके मथुरानगरीकी रमणियाँ बोलीं कि ‘जो लावण्यका सार है, जिसकी तुलनामें भी कोई दूसरा रूप नहीं रखा जा सकता, फिर उससे बढ़कर तो हो ही कैसे सकता है, जिसकी रमणीयता स्वयंसिद्ध है तथा जो क्षण-क्षण नूतन बना रहता है, जो महान् ऐश्वर्य, शोभा और यशका एकान्त आश्रय है तथा जो औरोंके लिये दुर्लभ है, श्रीकृष्णके उस रूपको गोपिकाएँ निरन्तर नयनोंके द्वारा पान करती रहती हैं। अतएव बतलाओ, उन्होंने कौन-सा तप किया है?’ तथा—

यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण-

भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्।

नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभि: पिबन्त्यो

नार्यो नराश्च मुदिता: कुपिता निमेश्च॥

(श्रीमद्भा० ९। २४। ६५)

‘मकराकृति कुण्डलोंके द्वारा शोभायमान मनोहर कर्णयुगल तथा गण्डयुगलसे जो मुखमण्डल श्रीसम्पन्न हो रहा है, जिसमें विलासयुत मन्दमधुर मुसकान विराज रही है तथा जो नित्य आनन्दमय है, श्रीकृष्णके उसी मुखाम्बुजको नेत्रद्वारा पान करके नर-नारीगण आनन्दसे परितृप्त हो रहे हैं तथा उस दर्शनमें बाधा डालनेवाले निमेषोन्मेषको सहन न करके इनके गिरानेवाले निमिके प्रति कोप प्रकाशित कर रहे हैं।’

श्रीभगवान‍्का भजन करनेवालोंके लिये उनके गुणोंमें माधुर्यकी ही प्रधानता है। गोपीगण माधुर्यमूर्ति श्रीभगवान‍्की प्रियतमा उपासिका हैं। श्रीबिल्वमंगलका श्रीकृष्णकर्णामृत, जयदेवका श्रीगीतगोविन्द, सूरदास, विद्यापति और चण्डीदासकी पदावलियाँ आदि ग्रन्थ श्रीकृष्ण-माधुर्य-वर्णनके अशेष अमृत-भंडार हैं। श्रीमद्भागवतकी तो बात ही क्या, अन्यान्य ग्रन्थोंमें श्रीकृष्णलीलाका सहस्रों स्थलोंपर वर्णन प्राप्त होनेपर भी श्रीमद्भागवत और महाभारतमें विस्तृतरूपसे भगवान‍्की माधुर्यमयी तथा ऐश्वर्यमयी लीलाका रसास्वादन प्राप्त होता है। महर्षि व्यासने अपने इन महान् ग्रन्थोंमें स्पष्ट लिख दिया है कि ‘श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं।’

श्रीमद्भागवत, दशम स्कन्धके तृतीय अध्यायमें श्रीकृष्णके जन्म-प्रसंगका वर्णन है। जब कारागारमें वसुदेवके यहाँ श्रीकृष्ण चतुर्भुज नारायणरूपमें अवतीर्ण हुए, तब उस रूपको देखकर वसुदेव और देवकी विस्मयापन्न हो उठे। देवकी उस चतुर्भुज रूपके तेजको सह न सकनेके कारण प्रार्थना करने लगीं—

उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम्।

शंखचक्रगदापद्मश्रिया जुष्टं चतुर्भुजम्॥

(श्रीमद्भा० १०। ३।३०)

अर्थात् ‘हे विश्वात्मन्! शंख-चक्र-गदा-पद्मकी शोभासे युक्त अपने इस अलौकिक चतुर्भुज रूपका उपसंहार करो।’ भक्तवत्सल भगवान‍्ने तत्काल ही द्विभुजधारी प्राकृत शिशुका आकार ग्रहण किया। वसुदेवजीने उनकी आज्ञासे उस प्राकृत शिशुको नन्दजीके घर पहुँचा दिया। ऐसा माना जाता है कि श्रीकृष्णका जब कंसके कारागारमें ऐश्वर्यमय रूपमें आविर्भाव हुआ, उसी समय मधुररूपमें वे यशोदाके यहाँ भी प्रकट हुए थे। वसुदेवजी जब शिशु कृष्णको लेकर यशोदाके सूतिकागृहमें पहुँचे, उसी समय वसुदेवनन्दन उन यशोदानन्दन परिपूर्णतम लीला-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णमें प्रविष्ट हो गये और बदलेमें वे नन्दात्मजा महामायाको ले आये। श्रीकृष्णकी प्रेमानन्द-माधुर्यमयी लीलाका श्रीगणेश नन्दजीके घरसे ही प्रकट होता है। मानव-शिशुका ऐसा भुवन-मोहन रूप और कहीं देखनेमें नहीं आता। श्रीकृष्ण सर्वप्रथम अपने रूपके अनन्त सौन्दर्य-माधुर्यसे गोप-गोपिकाओंके चित्तको आकर्षित करते हैं। श्रीभगवान‍्के जितने रूप प्रकट हुए हैं, ऐसा सुन्दर सच्चिदानन्द विग्रह और कहीं प्रकट नहीं हुआ। इस रूप-माधुर्यसे मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी आकृष्ट हो जाते हैं।

इसके बाद पूतना-मोचन, तृणावर्त-वध, कंसासुर-वध, बकासुर-वध, अघासुर-प्रलम्बासुर-शंखचूड़-अरिष्ट-केशी-व्योमासुर-वध, कंसके महलमें कुवलयापीड गजराजका वध इत्यादि कार्योंमें श्रीकृष्णका असीम वीर्य-पराक्रम, असीम सुहृद्वात्सल्य तथा असीम लोकानुग्रहका परिचय प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवतमें कंस-वध श्रीकृष्णके आविर्भावके प्रथम कारणरूपमें वर्णित है। एक गोप-बालक श्रीकृष्णका अनेक यदुवीरोंको भीषण त्रास देनेवाले दुर्धर्ष और दुर्दण्ड प्रतापशाली महाबली कंसको युद्धमें क्षणभरमें पछाड़ना उनकी भगवत्ताको प्रकट करता है। उसके बाद उन्होंने प्रबल शक्तिशाली मगध-सम्राट् जरासंधको, जिसने सैकड़ों राजाओंको पराजित करके उनको कारागृहमें डालकर उनके राज्य हड़प लिये थे, नीति-बलसे भीमके द्वारा मल्लयुद्धमें मरवा डाला। जरासंधके पास अपार सैनिक बल था। उसकी सैन्यशक्तिका कुछ अनुमान इस बातसे लगाया जा सकता है कि महाभारतके युद्धमें उभय-पक्षमें कुल मिलाकर केवल अठारह अक्षौहिणी सेना थी, जब कि जरासंधने तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना साथ लेकर सत्रह बार श्रीकृष्ण-पालित मथुरापुरीपर चढ़ाई की, किंतु प्रत्येक बार उसे मुँहकी खाकर तथा अपनी सारी सेनाको खपाकर लौट जाना पड़ा। श्रीकृष्ण उसे हर बार इसी आशासे जीता छोड़ देते थे कि वह दुबारा विशाल वाहिनी लेकर मथुरापर चढ़ आयेगा और इस प्रकार घर बैठे उन्हें पृथ्वीका भार हरण करनेका अवसर हाथ लगेगा। अठारहवीं बार दूसरे प्रबलतर शत्रु कालयवनको भी साथ-ही-साथ आक्रमण करते देखकर प्रभु अपनी यादवी सेनाको संहारसे बचानेके उद्देश्यसे संग्राम भूमिसे भाग खड़े हुए और इसी बीचमें समुद्रके बीच द्वारकापुरी बसाकर समस्त मथुरावासियोंको उन्होंने योगबलसे वहाँ पहुँचा दिया। अन्तमें भीमसेनके द्वारा जरासंधको भी मरवाकर श्रीकृष्णने बंदीगृहसे राजाओंको मुक्त किया और इस प्रकार दुर्बलोंके ऊपर सबलके अत्याचारको समाप्त कर दिया। इसके बाद नरकासुर, बाणासुर, कालयवन, पौण्ड्रक, शिशुपाल, शाल्व आदिके वध भी साधारण पराक्रमके द्योतक नहीं हैं। इसीको लक्ष्य करके श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

स्थित्युद्भवान्तं भुवनत्रयस्य य:

समीहतेऽनन्तगुण: स्वलीलया।

न तस्य चित्रं परपक्षनिग्रह-

स्तथापि मर्त्यानुविधस्य वर्ण्यते॥

‘जो अनन्तगुणशाली भगवान् अपनी लीलासे त्रिभुवनकी सृष्टि, स्थिति और संहार करते रहते हैं, उनके लिये शत्रुपक्षका निग्रह करना कोई चमत्कारकी बात नहीं है, तथापि उन्होंने मनुष्यके समान युद्धमें असाधारण युद्धनैपुण्य दिखलाकर और विजय प्राप्त करके संसारके लोगोंके सामने वीरताका आदर्श उपस्थित किया, इसीलिये उसका वर्णन किया जाता है।’

इस अलौकिक ऐश्वर्य-लीलाके बीच श्रीभगवान‍्ने जो अति विलक्षण प्रेम—माधुर्यकी लीला प्रदर्शित की है, उसका आभास श्रीउद्धवजीको व्रजमें दूत बनाकर भेजनेकी लीलामें मिलता है। भागवत, दशम स्कन्धके ४६ वें अध्यायमें श्रीकृष्ण गोपियोंको अपना संदेश भेजते समय अपने प्रिय सखा भक्तप्रवर श्रीउद्धवजीसे कहते हैं—‘हे उद्धव! तुम व्रजमें जाओ, मेरी विरह-विधुरा गोपिकाएँ मुझको न देखकर मृतवत् पड़ी हुई हैं। मेरी बात सुनाकर तुम उन्हें सान्त्वना दो। उनके मन-प्राण-बुद्धि और आत्मा दिन-रात मुझमें ही अर्पित हैं। वास्तवमें मेरा मन ही उनका मन बना हुआ है, मेरे ही प्राणोंसे वे अनुप्राणित हैं। मेरे सिवा और कुछ वे नहीं जानतीं; उन्होंने मेरे लिये लोकधर्म, वेदधर्म तथा देहधर्म—सबका परित्याग कर दिया है। वे व्रजबालाएँ दिन-रात केवल मेरा ही चिन्तन करती हैं, विरहकी उत्कण्ठामें वे विह्वल हो रही हैं; मेरे स्मरणमें, मेरे ध्यानमें विमुग्ध पड़ी हुई हैं तथा मुझको देखनेकी आशामें अतिक्लेशसे जीवन-यापन कर रही हैं।’

श्रीकृष्णके इस सरल हृदयगत भावोच्छ्वाससे सहज ही जाना जाता है कि उनका हृदय प्रेम-रस-माधुर्यसे इतना परिपूर्ण है! आगे चलकर एकादश स्कन्धके द्वादश अध्यायमें श्रीकृष्ण पुन: उद्धवजीसे कहते हैं—‘हे उद्धव! व्रजबालाओंकी बात मैं तुमसे क्या कहूँ। श्रीवृन्दावनमें वे सुदीर्घ कालतक मेरे संग-सुखको प्राप्त कर चुकनेके बाद भी उस सुदीर्घकालको एक क्षणके समान बीता हुआ समझती थीं। इस समय मेरे चले आनेके कारण आधा क्षण भी उनके लिये कोटि कल्पोंके समान क्लेशप्रद हो रहा है। उनको जब मेरा संग प्राप्त होता था, तब वे अपना गेह-देह-मन-प्राण-आत्मा सब कुछ भूल जाती थीं। जिस प्रकार नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपनेको खो देती हैं, ध्यानमग्न मुनिगण जैसे समाधिमें अपने-आपको खो देते हैं, गोपियाँ भी मुझको पाकर उसी प्रकार आत्म-विस्मृत हो जाती थीं। हे उद्धव! व्रजबालाओंके भाव-रस, ध्यान-धारणा योगीश्वरोंकी ध्यान-समाधिसे भी अधिक प्रगाढ़ हैं।’ इस कथासे श्रीकृष्णके महागाम्भीर्यमय माधुर्यभावका परिचय प्राप्त होता है। श्रीरासलीलामें उन्होंने जिस महान् माधुर्यका निदर्शन-प्रदर्शन किया है, उसकी तुलना कहीं नहीं है। उसको प्रकट करनेके लिये उपयुक्त भाषाका अभाव है, मानवी भाषामें कभी वह भाव प्रकाशित ही नहीं किया जा सकता। रासलीलाके अवसानमें उन्होंने गोपी-प्रेमके महान् माधुर्यको अपने हृदयमें अनुभव करके कहा था कि ‘मैं तुमलोगोंके प्रेमका सदाके लिये ऋणी हूँ। तुम लोगोंने दुरन्त—दुश्छेद्य गृहशृंखला, समाज-बन्धन, लोक-धर्म और वेदधर्मका त्याग करके, आर्यपथको छोड़कर मेरे प्रति जो प्रेम प्रदर्शित किया है, मैं कदापि तुम्हारे इस अनवच्छिन्न, अनवद्य, अव्यभिचारी प्रेमका बदला नहीं चुका सकता। मैं तुम्हारे प्रेम-ऋणका ऋणी होकर चिरकालके लिये तुम्हारे चरणोंमें बँध गया। इस ऋणके परिशोधका साधन मेरे पास नहीं है, तथापि यदि तुम्हारे भावमें तुम्हारा अनुशीलन कर सकूँ, रात-दिन तुम्हारे भावमें विभोर हो सकूँ, तुम्हारा गुण-कीर्तन करते-करते, तुम्हारा नाम जपते-जपते, तुम्हारा रूप ध्यान करते-करते दिन-रात बिता सकूँ तो वही तुम्हारे सामने मेरा कृतज्ञताज्ञापन तथा आत्मप्रसाद-प्राप्तिका यत्किंचित् उपाय होगा।’

सांदीपनि मुनिके आश्रममें रहते हुए श्रीकृष्ण स्वल्पकालमें ही चौदह विद्याओं और चौंसठ कलाओंमें पारंगत हो गये। हम युद्ध-कलाकी शिक्षाके लिये सांदीपनि मुनिके गुरुकुलको धन्यवाद दें, अथवा यमुनातटस्थ केलिकुंजसमलंकृत, गोपबालाविलसित रास-स्थलीको धन्यवाद दें—समझमें नहीं आता। जो रण-रंगमें रुद्रलीलाके ताण्डवनृत्यमें विश्वविजयी महागुरु हैं, वे ही रासलीलामें व्रजबालाओंको नृत्यशिक्षाके लिये गुरुरूपमें वरण करते हैं—इसका चिन्तन करते-करते मन भावना-सिन्धुकी तरंगोंमें तरंगायमाण होने लगता है।

श्रीकृष्णकी शिक्षाके सम्बन्धमें श्रीमद्भागवतमें जो वर्णन है, वह अद‍्भुत है। श्रीकृष्णकी राजनीतिके विषयमें जगत‍्में आन्दोलन और आलोचना होती आ रही है और होती रहेगी। परंतु महाभारतमें जो हमें विशाल, विपुल राजनीतिकी सामग्री प्राप्त होती है, व्यास-भीष्म आदि जो नीतिका उपदेश देते हैं, वह समस्त नीति एक श्रीकृष्णमें मूर्तिमान् होकर नित्य विराजती है। युद्ध-नीतिमें श्रीकृष्णकी अपूर्व बुद्धि तथा संग्राममें उनकी असीम शक्तिका वर्णन महाभारतमें पद-पदपर प्राप्त होता है। जो वृन्दावनमें वन-वन धेनु चराते और वंशी बजाते थे, वे ही पांचजन्य-शंखके मधुर-घोर निनादसे, कौमोदकी गदाके भीषण प्रहारसे, शार्ङ्गधनुषके सुतीक्ष्ण शराघातसे, सुदीर्घ धूमकेतुसम कृपाण और खड्ग तथा अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्रके प्रभावसे देवताओं और मनुष्योंको भीषण त्रास देनेवाले दुर्धर्ष और दुर्दान्त दैत्योंको संत्रस्त और निहत करके अपने बल-वीर्य और पराक्रमकी पराकाष्ठा प्रदर्शित करते हैं। कहाँ तो यमुना-पुलिनमें, कुंज-काननमें मुरलीके मधुर नादसे व्रजबालाओंको आकुलित करना और कहाँ पांचजन्यके भीषण निनादसे समरांगणको प्रकम्पित करना! चरित्रका ऐसा पूर्णतम बहुमुखी विकास और कहाँ मिल सकता है?

श्रीकृष्णके दिव्य उपदेश श्रीमद्भगवद‍्गीतामें उपलब्ध हैं और भागवत, महाभारतादि शास्त्रोंमें नीति-धर्म और आचारसम्बन्धी उनके उपदेश भरे पड़े हैं। कर्णपर्वके ६९ वें अध्यायमें अर्जुनको श्रीकृष्णने धर्म-तत्त्वके सम्बन्धमें एक सूक्ष्म उपदेश प्रदान किया है। उपदेशका हेतु यह है कि अर्जुनने प्रतिज्ञा की थी कि जो व्यक्ति उन्हें गाण्डीव परित्याग करनेके लिये कहेगा, उसको वे मार डालेंगे। दैवात् जब कर्ण सेनानी होकर पाण्डव-सैन्यको मथने लगा और अर्जुन उसे पराजित न कर सके, तब युधिष्ठिरने रुष्ट होकर उन्हें उत्साहित करनेके उद्देश्यसे भर्त्सना करनी प्रारम्भ की—

धनुश्च तत् केशवाय प्रयच्छ

यन्ता भविष्यस्त्वं रणे केशवस्य।

तदाहनिष्यत् केशव: कर्णमुग्रं

मरुत्पतिर्वृत्रमिवात्तवज्र:॥

राधेयमेतं यदि नाद्यशक्त-

श्चरन्तमुग्रं प्रतिबाधनाय।

प्रयच्छान्यस्मै गाण्डीवमेतदद्य

त्वत्तो योऽस्त्रैरभ्यधिको वा नरेन्द्र:॥

(अ० ६८। २६-१/२—२७-१/२)

‘तुम अपना गाण्डीव-धनुष भगवान् श्रीकृष्णको दे दो तथा रणभूमिमें स्वयं इनके सारथि बन जाओ। फिर जैसे इन्द्रने हाथमें वज्र लेकर वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार ये श्रीकृष्ण भयंकर वीर कर्णको मार डालेंगे। यदि तुम आज रणभूमिमें विचरते हुए इस भयानक वीर राधापुत्र कर्णकी सामना करनेकी शक्ति नहीं रखते तो अब यह गाण्डीव-धनुष दूसरे किसी ऐसे राजाको दे दो, जो अस्त्र-बलमें तुमसे बढ़कर हो।’

धर्मराजके इस वचनको सुनकर सत्यसंकल्प अर्जुन पददलित नागराजके समान क्रुद्ध हो उठे और खड्ग उठाकर उनका शिरश्छेदन करनेके लिये उद्यत हो गये। श्रीकृष्ण वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने अर्जुनको रोकते हुए कहा—

अकार्याणां क्रियाणां च संयोगं य: करोति वै।

कार्याणामक्रियाणां च स पार्थ पुरुषाधम:॥

(कर्ण० ६९।१८)

‘पार्थ! जो करनेयोग्य होनेपर भी असाध्य हों तथा जो साध्य होनेपर भी निषिद्ध हों ऐसे कर्मोंसे जो सम्बन्ध जोड़ता है वह पुरुषोंमें अधम माना गया है।’

यही नहीं, यहाँ श्रीकृष्णने अहिंसाका उपदेश देते हुए कहा है—

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान् मतो मम।

अनृतां वा वदेद् वाचं न तु हिंस्यात् कथंचन॥

(कर्ण० ६९।२३)

‘तात! मेरे विचारसे प्राणियोंकी हिंसा न करना ही सबसे श्रेष्ठ धर्म है। किसीकी प्राणरक्षाके लिये झूठ बोलना पड़े तो बोल दे, किंतु उसकी हिंसा किसी तरह न होने दे।’

युद्ध-नीतिका उपदेश करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं—

अयुध्यमानस्य वधस्तथा शत्रोश्च मानद।

पराङ्मुखस्य द्रवत: शरणं चापि गच्छत:॥

कृतांजले: प्रपन्नस्य प्रमत्तस्य तथैव च।

न वध: पूज्यते सद्भिस्तच्च सर्वं गुरौ तव॥

(कर्ण० ६९।२५-२६)

‘मानद! जो युद्ध न करता हो, शत्रुता न रखता हो, संग्रामसे विमुख होकर भागा जा रहा हो, शरणमें आता हो, हाथ जोड़कर आश्रयमें आ पड़ा हो तथा असावधान हो, ऐसे मनुष्यका वध करना श्रेष्ठ पुरुष अच्छा नहीं समझते हैं। तुम्हारे बड़े भाईमें उपर्युक्त सभी बातें हैं।’

श्रीकृष्णने अर्जुनसे पुन: कहा—हे पार्थ! धर्मकी गति अतिसूक्ष्म है। किसी कार्यमें धर्म होता है तो किसी कार्यमें धर्मका क्षय होता है, इसका विचार करना सहज नहीं है।

सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम्।

तत्त्वेनैव सुदुर्ज्ञेयं पश्य सत्यमनुष्ठितम्॥

(कर्ण० ६९।३१)

‘सत्य बोलना उत्तम है। सत्यसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है, परंतु यह समझ लो कि सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए सत्यके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान अत्यन्त कठिन होता है।’

बड़ोंकी हत्या तलवारसे नहीं होती, उनके मुखपर दुर्वचन कहनेसे ही उनका वध हो जाता है। यही धर्म-तत्त्व है।

महाभारतके अन्तमें सारे नर-संहारका कारण अपनेको मानकर जब युधिष्ठिर विलाप करने लगे, तब भगवान‍्ने धर्मतत्त्वका सार उपदेश करते हुए उनसे कहा—

सर्वं जिह्मं मृत्युपदमार्जवं ब्रह्मण: पदम्।

एतावाञ् ज्ञानविषय: किं प्रलाप: करिष्यति॥

‘सब प्रकारकी कुटिलता ही मृत्युका आस्पद है और सरलता मोक्षका मार्ग है। इतना ही ज्ञातव्य विषय है। इस व्यर्थके प्रलापसे क्या लाभ?’

युधिष्ठिरको तत्त्वज्ञानका उपदेश देते हुए अन्तमें वे कहते हैं—

लब्धा हि पृथिवीं कृत्स्नां स तु स्थावरजंगमाम्।

ममत्वं यस्य नैव स्यात् किं तया स करिष्यति॥

‘महाराज! यदि किसीने सारी स्थावर-जंगमात्मक पृथ्वीको प्राप्त कर लिया, परंतु उसमें उसकी ममता नहीं है तो वह उस पृथ्वीको लेकर क्या करेगा।’

श्रीकृष्णके द्वारा प्रदत्त ऐसे अनेक उपदेशरत्न यत्र-तत्र शास्त्रोंमें बिखरे पड़े हैं। भगवद‍्गीता, उद्धवगीता, अनुगीता आदिमें आध्यात्मिक ज्ञानकी पराकाष्ठा प्राप्त होती है, इन ग्रन्थोंमें भगवान‍्के द्वारा उपदिष्ट अलौकिक सारे तत्त्वज्ञान भरे पड़े हैं। श्रीकृष्णके द्वारा जगत‍्के जीवोंके कल्याणार्थ दिये गये विभिन्न प्रकारके योग, ज्ञान, कर्म और भक्तिके साधनपरक उपदेश जो इन ग्रन्थोंमें प्रचुरताके साथ प्राप्त होते हैं, उनके सर्वज्ञत्वके द्योतक हैं, पूर्णतमत्वके परिचायक हैं।

३-अभिधेय तत्त्व

ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—परमतत्त्वके ये त्रिविध आविर्भाव उपासकोंकी विभिन्न धारणाओंके अनुसार शास्त्रमें वर्णित हैं। श्रीकृष्ण परमतत्त्वके पूर्णतम आविर्भाव हैं, यह उपर्युक्त सम्बन्धतत्त्वमें विविध प्रकारसे निर्दिष्ट किया जा चुका है। श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं, यह बात सुनकर चित्तमें स्वभावत: ही यह सद्वासना उत्पन्न होती है कि हृदयकी ऐसी अभिलषित वस्तुकी प्राप्ति कैसे हो सकती है। इस जिज्ञासाकी परितृप्तिके लिये ‘अभिधेय तत्त्व’ की अवतारणा की जाती है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें लिखा है—

श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति

भवदाराधनविधिं

यथा मातुर्वाणी स्मृतिरपि

तथा वक्ति भगिनी।

पुराणाद्या ये वा

सहजनिवहास्ते तदनुगा

अत: सत्यं ज्ञातं

मुरहर! भवानेव शरणम्॥

‘माता श्रुतिसे पूछा गया तो उन्होंने तुम्हारी आराधना करनेके लिये कहा। माता श्रुतिने जो बतलाया, बहिन स्मृतिने भी वही कहा। पुराण-इतिहास आदि भ्रातृवर्ग भी उन्हींके अनुगामी हैं; अर्थात् उन्होंने भी तुम्हारी आराधना करनेके लिये ही कहा है। अतएव हे मुरारि! एकमात्र तुम्हीं आश्रय हो, यह मैंने ठीक-ठीक जान लिया।’

यह कहा जा चुका है कि तटस्थाशक्तिरूप समस्त जीव श्रीकृष्णके ही विभिन्नांश हैं। वे जीव नित्यमुक्त और नित्य संसारी भेदसे दो प्रकारके हैं। जो सदा श्रीकृष्णके चरणोंमें उन्मुख रहते हैं, वे नित्यमुक्त हैं और उनकी गणना पार्षदोंमें होती है। इसके विपरीत जो जीव नित्य बहिर्मुख रहते हैं, वे ही नित्य संसारी हैं। वे अनादि बहिर्मुखताके वश होकर संसारके बन्धनमें पड़कर दु:ख-भोग करते हैं। बहिर्मुखताके कारण माया उनको बन्धनमें डालकर त्रितापसे संतप्त करती रहती है। जीव काम और क्रोधके वशीभूत होकर त्रिताप भोगता रहता है। संसारचक्रमें भ्रमण करते-करते जब जीवको साधु-संग प्राप्त होता है, तब उनके उपदेशसे संसार-रोगसे मुक्ति मिल जाती है। जीव कृष्णभक्ति प्राप्त करके पुन: श्रीकृष्णके चरणप्रान्तमें गमन करता है। अतएव संसारके त्रिविध तापोंसे निस्तार पानेके लिये जीवको सारी वासनाओंका परित्याग करके एकमात्र कृष्णभक्ति करना ही विधेय है।

श्रीकृष्णभक्ति ही सर्वप्रधान अभिधेय है। कर्म, योग और ज्ञान—ये तीनों भक्तिमुखापेक्षी हैं। भक्तिके फलकी तुलनामें कर्म, योग और ज्ञानके फल अति तुच्छ हैं। भक्तिकी सहायताके बिना कर्मादि अति तुच्छ फल प्रदान करनेमें भी समर्थ नहीं होते। भक्तिरहित कर्म और योग कुछ-कुछ फल प्रदान करके निवृत्त हो जाते हैं, परंतु वे फल चिरस्थायी नहीं होते। भक्तिरहित ज्ञान भी इसी प्रकार अकिंचित्कर होता है। श्रीमद्भागवतमें और भी कहा गया है—

तपस्विनो दानपरा यशस्विनो

मनस्विनो मन्त्रविद: सुमंगला:।

क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं

तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नम:॥

(२। ४।१७)

‘तपस्वी, दानशील, यशस्वी, मनस्वी, मन्त्र-जप करनेवाले तथा सदाचारी लोग अपना तप आदि जिसको समर्पण किये बिना कल्याणकी प्राप्ति नहीं कर सकते, उन मंगल यशवाले भगवान‍्को पुन:-पुन: प्रणाम करता हूँ।’

मुखबाहूरुपादेभ्य: पुरुषस्याश्रमै: सह।

चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादय: पृथक्॥

य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम्।

न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टा: पतन्त्यध:॥

(श्रीमद्भा० ११। ५।२-३)

‘विराट् पुरुषके मुख, बाहु, ऊरु और चरणोंसे सत्त्वादि गुण-तारतम्यके अनुसार पृथक्-पृथक् ब्राह्मण आदि वर्णों और आश्रमोंकी उत्पत्ति हुई है। जो इस वर्णाश्रमके साक्षात् जनक, नियन्ता एवं आत्मा उन ऐश्वर्यशाली पुरुषको नहीं भजते, अपितु उनकी अवज्ञा करते हैं, वे कर्मोंके द्वारा प्राप्त अपने अधिकारसे च्युत होकर नीचे गिर जाते हैं।’

जो लोग जान-बूझकर भगवत्पादपद्मोंकी भक्तिके प्रति अवज्ञा प्रकट करते हैं, ज्ञानके द्वारा उनके पापकर्मोंके दग्ध हो जानेपर भी इस अवज्ञाके अपराधसे उनका संसार-बीज नष्ट नहीं होता। श्रीकृष्ण-भक्तिके बिना मायाके पंजेसे छुटकारा पानेका कोई उपाय नहीं है। भगवान‍्ने कहा है—

सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।

अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥

(वा० रा० युद्ध० १८।३३)

अर्थात् ‘जो एक बार भी मेरे शरणागत होकर यह कहता हुआ कि हे प्रभो! मैं तुम्हारा हूँ, मुझसे रक्षाकी प्रार्थना करता है, मैं उसको सदाके लिये निर्भयताका वर दे देता हूँ, यह मेरा व्रत है।’

इसीलिये श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

(२। ३।१०)

‘बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह चाहे अकाम अर्थात् एकान्तभक्त हो, सर्वकाम अर्थात् इहामुत्र कर्मफलकी कामना करनेवाला हो अथवा मोक्ष चाहनेवाला हो, उसे तीव्र भक्तियोगके द्वारा परमपुरुष श्रीकृष्णकी आराधना करनी चाहिये।’

मनुष्यका चित्त स्वभावत: सकाम और स्वार्थके लिये व्याकुल होता है। जबतक देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी यह स्वार्थ-कामना वर्तमान है, तबतक चित्त भगवत्साधनाके द्वारा अपनी सुख-वासनाकी पूर्तिके लिये व्याकुल न होगा। साधना या उपासनाका प्रधानतम पवित्र उद्देश्य है—भगवद्भावके द्वारा हृदयको नित्य-निरन्तर पूर्ण किये रखना। परंतु नश्वर धन-जन, यश-मान, विषय-वैभव तथा भोग-विलासकी लालसामें यदि हृदय व्याकुल रहता है तो इससे साधनाके उद्देश्यकी सिद्धि नहीं होती। दयामय भगवान् जिसके प्रति अनुग्रह करते हैं, उसके हृदयसे विषय-भोगकी वासना और लालसाको तिरोहित कर देते हैं और अपने चरणोंमें अनुराग प्रदानकर विषय-वासनाको दूर कर देते हैं।

साधु-संग

सांसारिक वासनासे निष्कृति प्राप्त करना जीवके लिये सहज नहीं है। संतकी संगतिके बिना संसारकी निवृत्ति नहीं होती। पूर्वजन्मोंके शुभ कर्मोंके बिना तथा भगवत्कृपाके बिना साधु-संग मिलना दुर्घट है। सत्संग प्राप्त होनेपर श्रीकृष्णमें रति उत्पन्न होती है, अतएव साधुसंग भी भगवत्कृपासे ही प्राप्त होता है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है—

भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे-

ज्जनस्य तर्ह्यच्युत सत्समागम:।

सत्संगमो यर्हि तदैव सद‍्गतौ

परावरेशे त्वयि जायते मति:॥

(१०। ५१।५४)

‘हे अच्युत! जन्म-मृत्युरूप इस संसारका चक्कर काटते-काटते जब किसी मनुष्यकी संसार-वासनाके क्षयकी ओर प्रवृत्ति होती है, तब उसको साधुसंग प्राप्त होता है। साधुसंग प्राप्त होनेपर उनकी कृपासे संतोंके आश्रय तथा कार्य-कारणरूप जगत‍्के एकमात्र स्वामी आपमें रति उत्पन्न होती है।’

कभी-कभी भगवान् अपनी साधु-संततिको प्रेरित करके अपनी कृपाके योग्य जीवोंको संसार-बन्धनसे मुक्त करते हैं, कभी स्वयं अन्तर्यामीरूपसे उनके हृदयमें भक्ति-तत्त्वका प्रकाश करते हैं। उनकी कृपाकी इयत्ता नहीं है। श्रीचैतन्य-चरितामृतमें लिखा है—

कृष्ण यदि कृपा करेन कोन भाग्यवाने।

गुरु अन्तर्यामि रूपे शिखाय आपने॥

•••

साधुसंगे कृष्ण-भक्त्ये श्रद्धा यदि हय।

भक्तिफल प्रेम हय, संसार याय क्षय॥

अर्थात् यदि किसी भाग्यवान् जीवपर श्रीकृष्णकी कृपा होती है तो वे अन्तर्यामी गुरुके रूपमें उसको स्वयं शिक्षा देते हैं। यदि साधुसंगके फलस्वरूप श्रीकृष्ण-भक्तिमें श्रद्धा होती है तो वह भक्ति-साधन करता है और उसके फलस्वरूप उसे श्रीकृष्ण-प्रेम प्राप्त होता है तथा आवागमनरूप संसारका नाश हो जाता है। अतएव श्रद्धालु पुरुष ही भक्तिका अधिकारी है। भगवान् स्वयं कहते हैं—

जातश्रद्धो मत्कथासु निर्विण्ण: सर्वकर्मसु।

वेद दु:खात्मकान् कामान् परित्यागेऽप्यनीश्वर:॥

ततो भजेत मां प्रीत: श्रद्धालुर्दृढनिश्चय:।

जुषमाणश्च तान् कामान् दु:खोदर्कांश्च गर्हयन्॥

(श्रीमद्भा० ११। २०। २७-२८)

हम चित्तकी अनन्त कामनाओंसे निरन्तर व्याकुल रहते हैं। सागरकी तरंगोंके समान कामनाओंकी तरंगें एक-एक करके आती हैं और हमारे हृदयको विक्षुब्ध कर देती हैं; हम इसको समझते हैं, पर उनका परित्याग नहीं कर सकते। ऐसी अवस्थामें हम विवेक-वैराग्यका अधिकार प्राप्त करके ज्ञानकी साधनामें कैसे प्रवृत्त हो सकते हैं। संसारमें अत्यधिक आसक्तिके कारण भक्तियोगका अधिकारी होना भी असम्भव ही जान पड़ता है। परंतु श्रीभगवान‍्की आश्वासन-वाणी यहाँ भी हमारे भीतर आशाका संचार करती है। वे कहते हैं—‘अविद्याके महाप्रभावसे तुम सहसा सांसारिक कामनाओंका परित्याग नहीं कर सकते, यह सत्य है। परंतु मेरी कथामें श्रद्धावान् होकर, दृढ़निश्चयी होकर, प्रसन्नचित्त होकर दु:खप्रद कामनाओंका भोग करते समय भी उनको निन्दनीय समझते हुए मेरा भजन करते रहो।’ भक्ति स्वतन्त्र है; ज्ञानके लिये जैसे पहले विवेक-वैराग्य आवश्यक हैं, भक्तिके लिये उस प्रकारकी किसी पूर्वावस्थाकी अपेक्षा नहीं होती।

भक्तिर्हि स्वत: प्रबलत्वात् अन्यनिरपेक्षा।

श्रीभगवान् और भी कहते हैं—

तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य योगिनो वै मदात्मन:।

न ज्ञानं न च वैराग्यं प्राय: श्रेयो भवेदिह॥

(११। २०। ३१)

‘अतएव मेरी भक्तिसे युक्त तथा मुझमें लीन रहनेवाले योगीके लिये पृथक् ज्ञान-वैराग्यरूप साधन श्रेयस्कर नहीं?’ क्योंकि भक्तिकी साधनामें प्रवृत्त होनेपर ये स्वत: आविर्भूत होते हैं। श्रीमद्भागवतमें भी कहा है—

वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित:।

जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम्॥

(१। २। ७)

यों तो कर्म और ज्ञानकी साधनाके लिये भी श्रद्धा अपेक्षित है, क्योंकि श्रद्धाके बिना सम्यक् प्रवृत्ति नहीं होती। परंतु भक्तिमें सम्यक् प्रवृत्तिके लिये तो श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक है। श्रद्धाके बिना अनन्य भक्तिमें प्रवृत्ति सम्भव नहीं और होनेपर भी वह स्थायी नहीं होती। कर्म-परित्यागका अधिकार दो प्रकारसे होता है—ज्ञानमार्गमें वैराग्यके उदयके लिये और भक्तिमार्गमें श्रद्धाके उदयके लिये कर्म-त्याग प्रशस्त होता है। परंतु भक्ति-साधनामें श्रद्धासे भी बढ़कर महत्कृपाकी आवश्यकता होती है। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

रहूगणैतत् तपसा न याति

न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद् वा।

न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-

र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥

(५। १२। १२)

जडभरतजी कहते हैं—‘हे रहूगण! महापुरुषकी चरण-धूलिसे अभिषेक किये बिना धर्म-पालनके लिये कष्ट सहने, यज्ञोंके द्वारा देवताओंकी उपासनासे, अन्नादिके दानसे, गृहस्थोचित धर्मानुष्ठानसे, वेदाध्ययनसे अथवा मन्त्रोंके द्वारा वरुण, अग्नि और सूर्यकी उपासनासे भी मनुष्य भगवद्भक्ति प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं होता।’

यह श्रीकृष्ण-भक्ति जीवके लिये सर्वप्रधान कर्तव्य होनेपर भी वेदविहित नित्य-नैमित्तिक कर्म सबके लिये कर्तव्य हैं। श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं—

श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्ते उल्लङ्घॺ वर्तते।

आज्ञाच्छेदी मम द्वेषी मद्भक्तोऽपि न वैष्णव:॥

अर्थात् श्रुति-स्मृति भगवान‍्की ही आज्ञा हैं; और जो इनका उल्लंघन करता है, वह मेरा विद्रोही तथा द्वेषी है; वह मेरा भक्त या वैष्णव नहीं कहला सकता।

यह साधारण मनुष्यके लिये उपदेश है। इसके विपरीत श्रीमद्भगवद‍्गीताके उपसंहारमें भगवान‍्ने कहा है—

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

(१८। ६६)

यहाँ सर्व-कर्म-परित्यागका उपदेश दिया गया है। इससे भगवद्वाक्यमें परस्पर विरोधकी आशंका होती है। इसके समाधान-स्वरूप श्रीमद्भागवतमें भक्त उद्धवके प्रति श्रीभगवान् कहते हैं—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।

मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते॥

(११। २०। ९)

अर्थात् तभीतक वेदविहित कर्मोंका करना आवश्यक है जबतक निर्वेद (वैराग्य) न हो जाय और मेरी कथा सुननेमें तथा मेरा भजन करनेमें जबतक श्रद्धा न उत्पन्न हो।

भगवद्भक्तिके अधिकारी तीन प्रकारके होते हैं। भक्ति-रसामृत-सिन्धुमें श्रीरूप गोस्वामी कहते हैं—

शास्त्रे युक्तौ च निपुण: सर्वथा दृढनिश्चय:।

प्रौढश्रद्धोऽधिकारी य: स भक्तावुत्तमो मत:॥

य: शास्त्रादिष्वनिपुण: श्रद्धावान् स तु मध्यम:।

यो भवेत् कोमलश्रद्ध: स कनिष्ठो निगद्यते॥

अर्थात् जो शास्त्रमें तथा युक्तिमें निपुण है तथा सब प्रकारसे तत्त्वविचारके द्वारा दृढ़निश्चयी है, ऐसा प्रौढ़ श्रद्धावान् व्यक्ति भक्तिका उत्तम अधिकारी है। शास्त्रवचनमें विश्वास ही श्रद्धा कहलाता है। श्रद्धाके तारतम्यके अनुसार ही भक्तिके अधिकारीके तारतम्यका निर्णय किया जाता है। सर्वथा दृढ़निश्चयी वह है जो तत्त्वविचार, साधन-विचार तथा पुरुषार्थके विचारसे दृढ़निश्चयपर पहुँच गया है। युक्तिका अर्थ शास्त्रानुगा युक्ति है, स्वतन्त्र युक्ति नहीं। जो शास्त्रादिमें निपुण नहीं हैं, परंतु श्रद्धावान् हैं, वे मध्यम अधिकारी हैं। अनिपुणका अर्थ है—जो अपनी श्रद्धाके प्रतिकूल बलवान् तर्क उपस्थित होनेपर उसका समाधान नहीं कर सकता। बहिर्मुख व्यक्तिके कुतर्कसे क्षणमात्रके लिये चित्तके डोल जानेपर भी जो अपने विवेकद्वारा गुरुके उपदिष्ट अर्थमें विश्वास करते हैं, इस प्रकारके भक्त कनिष्ठ भक्त हैं। कुतर्कसे चित्तका कुछ क्षणोंके लिये हिल जाना ही कोमलत्व है। कुतर्कसे जिसका विश्वास बिलकुल ही नष्ट हो जाता है, उसको भक्त नहीं कह सकते। श्रीभगवान‍्ने स्वयं गीतामें चतुर्विध भक्तोंका उल्लेख किया है—

चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।

प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:॥

उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।

(७। १६—१८)

अर्थात् हे अर्जुन! वे सुकृती व्यक्ति, जो मेरी भक्ति करते हैं—चार प्रकारके होते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। जो अपना दु:ख दूर करनेके लिये भगवद्भजन करते हैं, वे आर्त हैं। सुख-प्राप्तिके लिये जो भजन करते हैं, वे अर्थार्थी हैं। संसारको अनित्य जानकर जो आत्मतत्त्वके ज्ञानकी इच्छासे भगवद्भजन करते हैं, वे जिज्ञासु हैं। ज्ञानी भक्त तीन प्रकारके होते हैं—इनमें एक श्रेणीके ज्ञानी भगवदैश्वर्यको जानकर भगवद्भजन करते हैं, दूसरी श्रेणीके ज्ञानी भगवन्माधुर्यको जानकर भजन करते हैं और तीसरी श्रेणीके ज्ञानी ऐश्वर्य और माधुर्य दोनोंको जानते हुए भजन करते हैं। इन चार प्रकारके भक्तोंमें ज्ञानी मेरा आत्मस्वरूप है, यह मेरा मत है; क्योंकि ज्ञानी परमगति-स्वरूप मेरा ही आश्रय लेते हैं। आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी भक्त तो सकाम होते हैं, उनमें अन्यान्य विषयोंके प्राप्त करनेकी वासना होती है; परंतु ज्ञानी भक्त मुझको छोड़कर और कुछ नहीं चाहता।

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥

(गीता ७। १९)

‘अनेक जन्मोंमें अर्जित पुण्यके प्रतापसे ज्ञानवान् इस चराचर विश्वको वासुदेवात्मक देखकर मेरी भक्तिमें लीन रहता है। ऐसा महात्मा नितान्त ही दुर्लभ है।’

शरणागति

श्रीकृष्णकी दयाका स्मरण होनेपर उनके प्रति भक्तिरससे चित्त अभिभूत हो जाता है। श्रीउद्धवजी कहते हैं—

अहो बकी यं स्तनकालकूटं

जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥

(श्रीमद्भा० ३। २।२३)

‘दुष्टा पूतनाने अपने स्तनोंमें कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्णको मार डालनेकी इच्छासे अपना स्तन पान कराया, किंतु परम दयामय श्रीकृष्णने उस मातृवेषधारिणी पूतनाको माताके समान सद‍्गति प्रदान की। अतएव श्रीकृष्णके सिवा दूसरा ऐसा दयालु कौन है, जिसकी शरणमें हम जायँ?’ इसलिये अन्य देवताओंको त्यागकर परम दयालु श्रीकृष्णके शरणापन्न होना जीवका परम कर्तव्य है। यहाँ शरणागतिका लक्षण जानना आवश्यक है। वह इस प्रकार है—

आनुकूल्यस्य संकल्प: प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्।

रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा।

आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड‍‍विधा शरणागति:॥

(वैष्णवतन्त्र)

शरणागति छ: प्रकारकी होती है—जैसे (१) भगवान‍्की अनुकूलताका संकल्प अर्थात् जो भगवद्भावके अनुकूल कर्तव्य हों, उनके पालनका नियम, (२)प्रतिकूलताका त्याग,(३) प्रभु हमारी निश्चय ही रक्षा करेंगे—यह विश्वास, (४) एकान्तमें अपनी रक्षाके लिये भगवान‍्से प्रार्थना, (५) आत्मनिवेदन और (६) कार्पण्य—अर्थात् हे प्रभो! ‘त्राहि माम्, त्राहि माम्’ कहते हुए अपनी कातरता प्रकट करना। इस शरणागतिकी महिमा स्वयं भगवान् श्रीमुखसे कहते हैं—

मर्त्यो यदा त्यक्तसमस्तकर्मा

निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे।

तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानो

मयाऽऽत्मभूयाय च कल्पते वै॥

(श्रीमद्भा० ११। २९।३४)

‘मनुष्य जब सारे कर्मोंका त्याग करके मुझे आत्मसमर्पण कर देता है, तब वह मेरा विशेष माननीय हो जाता है तथा जीवन्मुक्त होकर मेरे सदृश ऐश्वर्यप्राप्तिके योग्य हो जाता है।’

साधन-भक्ति

श्रीकृष्ण-प्रेम-भक्तिकी साधना ही साधन-भक्ति कहलाती है। जिन कर्मोंके अनुशीलनसे भगवान‍्में परा-भक्तिका उदय होता है, उसीका नाम साधन-भक्ति है। श्रीमद्भागवतमें लिखा है—

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।

अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति॥

(१। २। ६)

अर्थात् मनुष्यका परमधर्म वही है, जिसके द्वारा श्रीकृष्णमें अहैतुकी, अप्रतिहत (अखण्ड) भक्ति प्राप्त होती है, जिस भक्तिके बलसे वह आत्माकी प्रसन्नता लाभ करता है। साधन-भक्ति ही वह परमधर्म है। क्योंकि—

कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा।

नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥

‘इन्द्रिय-प्रेरणाके द्वारा जो साध्य है तथा प्रेमादि जिसके साध्य (फल) हैं, उसको ‘साधन-भक्ति’ कहते हैं तथा हृदयमें नित्य सिद्ध भावके आविर्भावका नाम ही साध्यता है।’

श्रवण आदि नवधा भक्ति ही साधन-भक्ति है। नित्य-सिद्ध वस्तु है श्रीभगवत्प्रेम। यह आत्माका नित्यधर्म है। अग्निमें दाहिका शक्ति तथा पुष्पोंमें सुगन्धके समान आत्माके साथ इसका समवाय सम्बन्ध है, अतएव यह नित्य वस्तु है। यह नित्यसिद्ध वस्तु उत्पाद्य नहीं है। परंतु श्रवण-कीर्तन आदिके द्वारा जब हृदयमें इसका उदय होता है, तब इसको ‘साध्य’ कह सकते हैं। इस प्रकार ‘साधनभक्ति’ और ‘साध्यभक्ति’ का विचार किया जाता है। साधन-भक्तिके दो भेद हैं, वैधी और रागानुगा। भक्तिके इन दोनों भेदोंके रहस्यको हृदयंगम करनेके लिये उत्तमा भक्ति या परा भक्तिके मार्गसे अग्रसर होना ठीक होगा। यही गीतोक्त परा भक्तिका उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है। यह ‘निष्काम-परा-भक्ति’ ब्रह्मज्ञानके बाद उदित होती है। भगवान् श्रीमुखसे कहते हैं—

ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥

भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

(गीता १८। ५४-५५)

उत्तमा भक्ति प्राप्त करनेके लिये जिस साधन-भक्तिका अनुशीलन करना पड़ता है, उसका अन्याभिलाषिताशून्य होना आवश्यक है। इसी प्रकार स्मृत्युक्त सकाम कर्म तथा तद्विपरीत शुद्ध ब्रह्मज्ञानके भाव भी उस अनुशीलनमें नहीं होते। इससे स्पष्ट हो जाता है कि निखिल वासनाओंका त्याग करते हुए केवल श्रीकृष्ण-प्रीत्यर्थ श्रीकृष्णका अनुशीलन ही उत्तमा भक्ति है। अर्थात् श्रीकृष्णके लिये सब प्रकारके स्वार्थका परित्याग अथवा श्रीकृष्ण-समुद्रमें एकबारगी आत्मविसर्जन ही उत्तमा भक्ति है। अपने स्वार्थकी तनिक भी वासना रहनेपर ‘उत्तमा भक्ति’ नहीं हो सकती। प्रवृत्तिमार्गमें स्वत्वकी कामना, धन-धान्य-बाहुल्यकी कामना मनुष्यके लिये स्वाभाविक है। इसके लिये भगवान‍्की अर्चना-वन्दना आदि करना निश्चय ही भक्तिका अंग होगा—इसमें कोई संदेह नहीं है, परंतु यह उत्तमा भक्ति नहीं होगी। आत्मविसर्जनके बिना उत्तमा भक्ति होती ही नहीं। शाण्डिल्य-भक्ति-सूत्रमें लिखा है—‘सा परानुरक्तिरीश्वरे।’ अर्थात् ईश्वरमें परा-अनुरक्ति ही भक्ति कहलाती है। भक्तिके लक्षण शास्त्रोंमें इस प्रकार लिखे हैं—

(१) अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्।

आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा॥

(२) अनन्यममता विष्णौ ममता प्रेमसंगता।

भक्तिरित्युच्यते भीष्मप्रह्रादोद्धवनारदै:॥

(३) सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्।

हृषीकेण हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते॥

(४) देवानां गुणलिंगानामानुश्रविककर्मणाम्।

सत्त्व एवैकमनसो वृत्ति: स्वाभाविकी तु या॥

अनिमित्ता भागवती भक्ति: सिद्धेर्गरीयसी।

जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा॥

यहाँ ‘ज्ञानकर्माद्यनावृतम्’ विशेषण विचारणीय है। ‘ज्ञान’ शब्द ब्रह्मके स्वरूप-लक्षणमें निर्दिष्ट हुआ है—जैसे ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’—(तैत्तिरीयोपनिषद्)। यहाँ ‘ज्ञान’ पदार्थ, द्रव्य, गुण या कर्म नहीं है। अन्यत्र ‘ज्ञान’ का प्रयोग मानसिक क्रियाके अर्थमें होता है—जैसे प्रपंच-पदार्थका ज्ञान। परंतु यहाँ ‘ज्ञान’ वह मानसिक क्रिया भी नहीं है। यह आत्मनिष्ठ गुण-विशेष है। इसके साथ मनका या चित्तवृत्तिका कोई सम्बन्ध नहीं है। चित्तवृत्तिके द्वारा उत्पन्न संवित् को भी ‘ज्ञान’ कहते हैं, परंतु यहाँ जिस ज्ञानकी बात हो रही है, वह है ‘ब्रह्मज्ञान’। परंतु वह सगुण ब्रह्मज्ञान नहीं है। यहाँ निर्विशेष-ब्रह्मज्ञान ही अभिप्रेत है, क्योंकि निर्विशेष-ब्रह्मज्ञान भक्तिका विरोधी है। ‘ज्ञानादिद्वारा अनावृत जो कृष्णानुशीलन’ है, उसीका नाम भक्ति है। अर्थात् यदि निर्विशेष-ब्रह्मज्ञान कृष्णानुशीलनमें समाविष्ट होता है तो उसकी भक्ति-संज्ञा नहीं होती। परंतु भगवत्तत्त्वके ज्ञानका निषेध यहाँ नहीं है; क्योंकि भगवत्तत्त्वका ज्ञान भक्तिका बाधक न होकर साधक ही होता है। इसी प्रकार स्वर्गादिजनक कर्मानुष्ठान भी भक्तिके बाधक हैं। अतएव कृष्णानुशीलनमें तादृश कर्मोंका संसर्ग नहीं चाहिये। परंतु इसका तात्पर्य यह नहीं कि कर्ममात्र ही बाधक हैं; क्योंकि भगवत्परिचर्या भी कर्मविशेष है। परंतु ऐसे कर्म भक्तिके बाधक न होकर साधक ही होते हैं।

इस प्रकार जान पड़ता है कि उत्तमा भक्तिके लक्षण इतने सुन्दररूपसे विवृत हुए हैं कि वेदान्तशास्त्रके चरम प्रान्तमें उपस्थित हुए बिना इस प्रकारकी भक्ति-साधनाका ज्ञान अति दुर्लभ है। फलत: वेदान्तशास्त्रका जो चरम लक्ष्य है, यह भक्ति साधकको उसी सुविशाल सुन्दर सरस राज्यमें उपस्थित करती है। वेदान्त ब्रह्मतत्त्वका निरूपण करते-करते जब ‘रसो वै स:। रसं ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दीभवति’—इस मन्त्रका उल्लेख करता है, तब उसको प्राप्त करनेके लिये श्रेष्ठतम साधन भक्ति ही होती है—इसमें कोई संदेह नहीं है।

ऋग्वेदके अनेक स्थलोंमें जीवके साथ भगवान‍्के मधुर सम्बन्धकी सूचना देनेवाले मन्त्र प्राप्त होते हैं। ‘हे अग्नि! तुम मेरे पिता हो। हे अग्नि! हम तुम्हारे हैं। तुम हमारा सब प्रकारसे कल्याण करो।’ इन सब मन्त्रोंके द्वारा यह सिद्ध होता है कि वैदिक ऋषिगण ब्रह्मतत्त्वको मधुमयरूपमें अनुभव कर चुके थे। ‘मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव:’—इस ऋग्मन्त्रसे यह स्पष्ट प्रकट होता है कि जिससे इस विश्वब्रह्माण्डकी उत्पत्ति हुई है, वह मधुमय है। उसके मधुमय होनेके कारण ही वायु मधु वहन करता है, सिन्धु मधु क्षरण करता है। हमारा अन्न मधुमय है, पृथिवीके रज:कण मधुमय हैं—इत्यादि वेदमन्त्रोंके द्वारा ज्ञात होता है कि अति प्राचीन कालमें भी आर्य ऋषिगण भगवान‍्की आधुनिक वैष्णवोंके समान रसमय, प्रेममय और मधुमय भावमें उपासना करते थे।

विष्णुमें अनन्य ममता अथवा प्रेमसंगत ममताको भक्ति कहते हैं। सम्पूर्ण उपाधियोंसे मुक्त भगवत्संलीन इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णका सेवन उत्तमा भक्ति है। श्रीमद्भागवतमें वैधी भक्तिके नौ अंग वर्णित हुए हैं, जैसे—

श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥

(७। ५। २३)

वैधी भक्तिके ये सब अंग ‘परा-भक्ति’ के साधक हैं तथा इनकी समष्टि ही परम धर्म है।

साधन-भक्तिद्वारा साध्य-भक्तिका उदय होता है। यह भक्तियोग अथवा साधन-भक्ति परा-भक्ति नहीं है, यह परम धर्म है। यह एक ओर जैसे परा-भक्तिका प्रकाशक है, वैसे ही उपनिषद्-ज्ञानका भी प्रकाशक है। इसके सिवा—

वासुदेवे भगवति भक्तियोग: समाहित:।

सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति॥

(४। २९। ३७)

‘भगवान् वासुदेव श्रीकृष्णकी भक्तिसे शीघ्र ही वैराग्य और ज्ञानकी प्राप्ति होती है।’

भक्तियोग अर्थात् साधन-भक्तिसे इस प्रकार उपनिषद्-ज्ञान प्रकाशित होता है और उसका परिपाक होनेपर साध्य-भक्ति या प्रेम-लक्षणा भक्ति प्रकट होती है।

भक्तिके प्रकार

‘भक्ति-संदर्भ’ में लिखा है कि रुचि आदिके द्वारा श्रीगुरुका आश्रय लेनेके बाद उपासनाके पूर्वांगस्वरूप उपास्यदेवका साम्मुख्य प्राप्त करनेकी चेष्टा करनी पड़ती है। इस प्रकार उपास्यदेवके सम्मुख होना ही उपासनाका पूर्वांग है। इस साम्मुख्यका श्रेष्ठतम उपाय है—भक्ति। भक्ति-संदर्भमें भक्तिके तीन प्रकार वर्णित हैं—आरोपसिद्धा, संगसिद्धा और स्वरूपसिद्धा। भक्तित्वका अभाव होनेपर भी भगवान‍्को अर्पण आदि जिन कर्मोंके द्वारा भक्तित्वकी प्राप्ति होती है, उन कर्मोंको ‘आरोपसिद्धा’ भक्ति कहते हैं और भक्तिके परिकरके रूपमें जो कार्य किये जाते हैं, उनको ‘संगसिद्धा’ भक्ति कहते हैं। ज्ञान और कर्म भक्तिके संगके रूपमें व्यवहृत होते हैं, अतएव इनको ‘संगसिद्धा’ भक्ति कहते हैं। स्वरूपसिद्धा भक्ति वह है, जो स्वत: भक्तिरूपमें प्रसिद्ध है। श्रवण-कीर्तनादि नवधा भक्ति स्वरूपसिद्धा भक्ति है। ‘भक्तिसंदर्भ’ ग्रन्थमें इसके सिवा अनेक भेदोपभेदसहित भक्तिका वर्णन किया गया है।

रागमयी भक्तिको ‘रागात्मिका’ भक्ति कहते हैं। व्रजवासियोंमें रागात्मिका भक्ति दृष्टिगोचर होती है। जो लोग व्रजवासियोंके समान अर्थात् श्रीकृष्णके दास-दासी, सखी-सखा तथा माता-पिता आदिके भावसे श्रीकृष्णको भजते हैं या भजनमें प्रवृत्त होते हैं, वे ‘रागानुगा भक्ति’ के साधक कहलाते हैं। जो भक्ति रागात्मिका भक्तिके अनुकरणके लिये होती है तथा उसी प्रकारके भावकी ओर साधकको परिचालित करती है, वही ‘रागानुगा भक्ति’ है। परंतु रागानुगा साधकके चित्तमें सख्यरस या अन्य किसी व्रजरसका उदय होनेपर भी वह अपनेको श्रीदाम, ललिता, विशाखा, श्रीराधा या नन्द-यशोदा आदिके रूपमें नहीं मानता। ऐसा करनेसे ‘अहंग्रह’ उपासना हो जाती है।

तत्तद्भावादिमाधुर्ये श्रुते धीर्यदपेक्षते।

नात्र शास्त्रं न युक्तिश्च तल्लोभोत्पत्तिलक्षणम्॥

‘श्रीभागवतादि शास्त्र सुनकर तत्तद्भावोंके माधुर्यका अनुभव करनेपर साधकका चित्त विधिवाक्य या किसी प्रकारकी युक्तिकी अपेक्षा नहीं करता, उसमें स्वत: प्रवृत्त हो जाता है। यही लोभोत्पत्तिका लक्षण है।’ अतएव श्रीमन्महाप्रभु कहते हैं—

लोभे व्रजवासीर भावेर करे अनुगति।

शास्त्रयुक्ति नाहिं माने रागानुगार प्रकृति॥

अर्थात् रागानुगाकी प्रकृति यह है कि उसका साधक लोभसे व्रजवासियोंके भावोंका अनुगमन करता है, शास्त्र और युक्तिपर ध्यान नहीं देता।

सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि।

तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारत:॥

कृष्णं स्मरञ् जनं चास्य प्रेष्ठं निजसमीहितम्।

तत्तत्कथारतश्चासौ कुर्याद् वासं व्रजे सदा॥

रागानुगा भक्तिका साधक दो प्रकारकी साधना करता है, साधकरूपसे वह उपास्यदेवका श्रवण-कीर्तन करता है और सिद्धरूपसे मनमें अपने सिद्धदेहकी भावना करता है। वह श्रीकृष्ण और उनके जनोंका स्मरण करता है। अपनेमें उनमेंसे अन्यतमकी भावना करता है और सदा-सर्वदा व्रजमें रहकर श्रीकृष्ण-सेवा करता है।

जो लोग मधुर-रसके रागानुगीय साधक हैं, वे श्रीललिता-विशाखा-श्रीरूपमंजरी आदिकी आज्ञासे श्रीराधा-माधवकी सेवा करें तथा स्वयं श्रीकृष्णका आकर्षण करनेवाले वेषमें सुसज्जित तथा श्रीराधिकाके निर्माल्यरूप वसन-आभूषणसे भूषित सखियोंकी संगिनीके रूपमें अपनी मनोमयी मूर्तिका चिन्तन करें। सनत्कुमारतन्त्रमें लिखा है—

आत्मानं चिन्तयेत्तत्र तासां मध्ये मनोरमाम्।

रूपयौवनसम्पन्नां किशोरीं प्रमदाकृतिम्॥

रागानुगीय साधक भक्त सखियोंके मण्डलमें अपनेको रूपयौवनसम्पन्ना किशोरीरूपमें चिन्तन करते हैं। श्रीनरोत्तमदास ठाकुरके ‘प्रेमभक्तिचन्द्रिका’ ग्रन्थमें ‘रागानुगा भक्ति’ वर्णित है। उस ग्रन्थके भाव दुरूह हैं। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीकृत ‘रागवर्त्मचन्द्रिका’ तथा ‘श्रीकृष्णकर्णामृत’, ‘श्रीकृष्णमाधुरी’ आदि ग्रन्थ इस विषयमें द्रष्टव्य हैं।

श्रीरागानुगा भक्ति जिनके हृदयमें प्रादुर्भूत हो गयी है, वे सिद्धदेहमें श्रीराधा-माधवकी कुंजसेवा करके निरतिशय परमानन्दमें निमग्न रहते हैं। ऐसे साधकजन साधनराज्यके भूषण हैं। योगीन्द्रगणदुर्लभा रागानुगा भक्ति बहुत साधनके द्वारा प्राप्त होती है।

प्रयोजन-तत्त्व

इस संसारमें प्रयोजनके बिना कोई कार्य नहीं करता। भगवत्साधनाका भी प्रयोजन है और वह प्रयोजन है प्रेम। प्रेमकी पूर्वावस्थाका नाम है ‘भाव या रति’। साधन-भक्तिके परिपाकमें अथवा भक्तिकी कृपासे भावभक्तिका उदय होता है। जब श्रीकृष्णमें प्रीतिके कारण उनमें मन संलग्न रहना चाहता है, तब भाव ही रति नामसे अभिहित होता है। यह भाव मनकी अवस्था (विकार) विशेषका नाम है। विषय-रस-निमग्न व्यक्तिका चित्त जब भगवत्-उन्मुख होता है तथा भगवद्भावमें विभावित होता है, श्रीभगवान‍्का चिन्तन करनेमें रस लेता है, तब कहना पड़ेगा कि उसके अंदर भाव उत्पन्न हो गया है।

श्रीराधिकाका चित्त अन्यान्य बालिकाओंके समान बाल्यक्रीड़ामें रत था। सहसा उन्हें एक दिन चित्रपटमें मुरलीधर श्रीकृष्णकी भुवनमोहिनी श्रीमूर्ति देखनेको मिली। सुना, इनका नाम श्यामसुन्दर है। दूरसे आती हुई वंशीध्वनि उनके कानोंमे प्रविष्ट हुई, उसी क्षण उनके मनमें प्रेम-विकार उत्पन्न हुआ। बाल्यक्रीड़ासे मन हट गया। क्षणभरमें चित्त बदल गया। योगिनीके समान वे शिखिपिच्छचूडालंकृत वंशीधर श्यामसुन्दरके ध्यानमें निमग्न हो गयीं। उनकी आहार-निद्रा छूट गयी, सखियोंके साथ आलाप-संलाप बन्द हो गया। वे घरके कोनेमें बैठकर श्यामसुन्दरके रूपका ध्यान करने लगीं। इसीका नाम भाव है। यह प्रेमकी प्रथम अवस्था है।

भाव चित्तको रंजित करता है, चित्तकी कठोरता दूर करके उसको कोमल बनाता है। यह ह्लादिनीशक्तिका वृत्तिविशेष है और इसकी अपेक्षा कोटिगुना आनन्दरूप आह्लादिनीशक्तिके साररूप वृत्तिको रति कहते हैं।

जिनके हृदयमें यथार्थ प्रेमका अंकुर उत्पन्न हो गया है, प्राकृतिक दु:खसे उनको दु:ख-बोध नहीं होता, वे सर्वदा ही श्रीकृष्णके परिचिन्तनमें काल-यापन करते हैं, प्रेमांकुर उत्पन्न होनेके पूर्व निम्नांकित नौ लक्षण उदित होते हैं, जैसे (१) क्षान्ति—क्षोभके कारणोंके उपस्थित होनेपर भी चित्तका अक्षुब्ध दशामें स्थित रहना क्षान्ति कहलाता है। तितिक्षा, क्षमा, मर्ष इसके नामान्तर हैं। (२) अव्यर्थकालत्व—प्रेमी-भक्त श्रीकृष्णके सिवा अन्य किसी विषयमें क्षणभरके लिये चित्तको नहीं लगने देता। (३) विरति—भगवत्-विषयके सिवा प्रेमीके चित्तमें अन्य किसी विषयकी कभी भी रुचि नहीं होती। (४) मानशून्यता; (५) आशाबन्ध—निरन्तर श्रीकृष्णकी प्राप्तिकी आशा बँधी रहती है। (६) समुत्कण्ठा; (७) नाम-स्मरणमें रुचि; (८) भगवद‍्गुणाख्यानमें आसक्ति और (९) उनकी लीला-भूमिमें प्रीति।

प्रेमाविष्ट चित्तकी उच्चतम दशामें नाना प्रकारके विवश भावोंका आविर्भाव होता है। इस दशामें प्राय: बाह्यज्ञान नहीं रहता।

धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि।

अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा॥

‘जिस धन्य-पुरुषके चित्तमें इस नवीन प्रेमका उदय होता है, उसकी वाणी और क्रियाके रहस्यको शास्त्रप्रणेता भी नहीं जान सकते।’ श्रीमद्भागवतने इस सम्बन्धमें एक अति सुन्दर प्रमाण दिया है—

एवंव्रत: स्वप्रियनामकीर्त्या

जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै:।

हसत्यथो रोदिति रौति गाय-

त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्य:॥

(११। २। ४०)

‘उपर्युक्त साधनप्रणालीके अनुसार साधना करनेवाला स्वप्रिय श्रीभगवान‍्के नामका कीर्तन करते-करते श्रीभगवान‍्में अनुराग हो जानेके कारण द्रवितचित्त होकर कभी हँसता है; कभी रोता है, कभी उच्चस्वरसे प्रलाप करता है। कभी गाता और कभी उन्मत्तके समान नाचने लगता है। वह साधक स्वभावत: जन-साधारणके आचार-व्यवहारसे बहिर्भूत होकर कार्य करता है।’

मधुरा-रतिमें भाव और महाभाव उच्चतर और उच्चतम अवस्थाएँ कहलाती हैं। भावकी चरम सीमामें अनुराग प्राप्त होता है। भाव ही अनुरागका महान् आश्रय है। अनुरागके दृष्टान्तमें गोपी-प्रेमका उल्लेख किया जा सकता है। परंतु गोपी-प्रेम क्या वस्तु है, यह बतलाना कठिन है। तथापि सुरसिक प्रेमी भक्तगण आदिपुराणसे गोपी-प्रेमामृतकी दो-एक बातें लेकर भक्तोंको समझानेकी चेष्टा करते हैं। श्रीचैतन्य-चरितामृतके चतुर्थ अध्यायमें गोपी-प्रेमका माहात्म्य वर्णन करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं—

कामगन्धहीन स्वाभाविक गोपीप्रेम।

निर्मल उज्ज्वल शुद्ध येन दग्ध हेम॥

कृष्णेर सहाय गुरु, बान्धव, प्रेयसी।

गोपिका हयेन प्रिया, शिष्या, सखी, दासी॥

गोपिका जानेन कृष्णेर मनेर वांछित।

प्रेम सेवा परिपाटी इष्टसेवा समाहित॥

अर्थात् गोपी-प्रेम स्वभावत: काम-गन्धशून्य होता है; वह तपाये हुए स्वर्णके समान निर्मल, उज्ज्वल और शुद्ध होता है। गोपिकाएँ श्रीकृष्णकी सहायिका, गुरु, शिष्या, प्रिया, बान्धव, सखी, दासी—सब कुछ हैं। गोपिकाएँ श्रीकृष्णके मनकी अभिलाषा, प्रेम-सेवाकी परिपाटी तथा इष्ट-सेवामें लगे रहना अच्छी तरह जानती हैं, दूसरा कोई नहीं जानता। भागवतके दशम स्कन्धमें श्रीरासलीलाके ३२ वें अध्यायके २१वें श्लोकमें प्रेमिक भगवान् श्रीकृष्ण अपने श्रीमुखसे कहते हैं—

एवं मदर्थोज्झितलोकवेद-

स्वानां हि वो मय्यनुवृत्तयेऽबला:।

मया परोक्षं भजता तिरोहितं

मासूयितुं मार्हथ तत्प्रियं प्रिया:॥

‘हे अबलागण! यह जानता हुआ भी कि तुमलोगोंने मेरे लिये लोक और वेदका तथा स्वजनोंका परित्याग कर दिया है, मैं तुम्हारे निरन्तर ध्यान-प्रवाहको बनाये रखनेके लिये तथा प्रेमालाप श्रवण करनेके लिये समीपमें रहता हुआ भी अन्तर्हित हो गया था। हे प्रियागण! मैं तुम्हारा प्रिय हूँ। मेरे प्रति दोषदृष्टि रखना योग्य नहीं है।’

गोपी-प्रेमके विषयमें अधिक क्या कहा जाय, इस प्रेमकी तुलना संसारमें है ही नहीं। परंतु इस प्रेमका प्रकृत-आश्रय गोपी-हृदयके सिवा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। ‘उज्ज्वलनीलमणि’ ग्रन्थमें कहा गया है—

वरामृतस्वरूपश्री: स्वं स्वरूपं मनो नयेत् ।

स रूढश्चाधिरूढश्चेत्युच्यते द्विविधो बुधै:॥

‘यह महाभाव श्रेष्ठ अमृतके तुल्य स्वरूप-सम्पत्ति धारण करके चित्तको निज स्वरूप प्रदान करता है। पण्डितलोग इस महाभावके रूढ़ और अधिरूढ़—दो भेद बतलाते हैं।’

जिस महाभावमें सारे सात्त्विक भाव उद्दीप्त होते हैं, उसको रूढ़-भाव कहते हैं। रास-रस-निमग्ना गोपियोंमें स्वरभंग, कम्प, रोमांच, अश्रु, स्तम्भ, वैवर्ण्य, स्वेद तथा मूर्च्छा—ये आठों सात्त्विक भाव परिलक्षित होते हैं। अब अधिरूढ़ महाभावका लक्षण कहते हैं—

रूढोक्तेभ्योऽनुभावेभ्य: कामप्याप्ता विशिष्टताम्।

यत्रानुभावा दृश्यन्ते सोऽधिरूढो निगद्यते॥

‘जहाँ रूढ़भावोक्त अनुभवोंसे आगे बढ़कर सात्त्विक भाव किसी विशिष्ट दशाको प्राप्त होते हैं, उसको अधिरूढ़-भाव कहते हैं।’ इसका एक उदाहरण दिया जाता है—

लोकातीतमजाण्डकोटिगमपि

त्रैकालिकं यत् सुखं

दु:खं चेति पृथग् यदि स्फुटमुभे

ते गच्छत: कूटताम्।

नैवार्भासतुलां शिवे तदपि त-

त्कूटद्वयं राधिका-

प्रेमोद्यत्सुखदु:खसिन्धुभवयो-

र्विन्देत बिन्दोरपि॥

एक दिन श्रीश्रीराधिकाजीके प्रेमके विषयमें जिज्ञासा करनेपर श्रीशंकरजीने पार्वतीजीसे कहा—‘हे शिवे! लोकातीत—वैकुण्ठगत तथा कोटि-कोटि ब्रह्माण्डगत त्रिकालसम्बन्धी सुख-दु:ख यदि विभिन्नरूपमें राशिभूत हों, तो भी वे दोनों श्रीराधाजीके प्रेमोद्भव सुख-दु:ख-सिन्धुके एक बूँदकी भी तुलना नहीं कर सकते।’ इसी अधिरूढ़ महाभावका एक दूसरा उदाहरण पद्यावलीसे दिया जाता है—

पंचत्वं तनुरेतु भूतनिवहा:

स्वांशे विशन्तु स्फुटं।

धातारं प्रणिपत्य हन्त शिरसा

तत्रापि याचे वरम्।

तद्वापीषु पयस्तदीयमुकुरे

ज्योतिस्तदीयांगण-।

व्योम्नि व्योम तदीयवर्त्मनि धरा

तत्तालवृन्तेऽनिल:॥

श्रीश्रीराधाजी श्रीललिताजीसे कहती हैं कि ‘हे सखि! श्रीकृष्ण यदि लौटकर व्रजमें नहीं आते तो निश्चय ही मैं इस जीवनमें उनको नहीं पाऊँगी। अतएव अब इतना कष्ट उठाकर इस शरीरकी रक्षा करनेका कोई प्रयोजन नहीं है। शरीर भी चला जाय—यह पंचत्वको प्राप्त होकर स्पष्टरूपसे आकाशादि स्वकारणरूप भूतोंमें लीन हो जाय। परंतु मैं विधातासे हाथ जोड़कर यह प्रार्थना करती हूँ कि मेरे शरीरके पाँचों भूत प्रियतम श्रीकृष्णसे सम्पर्कित भूतोंमें ही विलीन हों—जलतत्त्व उस बावड़ीके जलमें मिले जहाँ श्रीकृष्ण जल-विहार करते हों, तेजस्तत्त्व उस दर्पणमें समा जाय जिसमें श्रीकृष्ण अपना मुख देखते हों, आकाशतत्त्व उस आँगनके आकाशमें चला जाय, जिसमें श्रीकृष्ण क्रीड़ा करते हों, पृथ्वीतत्त्व उस धरणीमें समा जाय, जिसपर श्रीकृष्ण चलते-फिरते हों और वायुतत्त्व उस ताड़के पंखेकी हवामें समा जाय जो प्रियतम श्रीकृष्णको हवा देता हो।’ यह भावसमुद्र अगाध, अनन्त है, इसका वर्णन करके पार पाना असम्भव है। यहाँ यत्किंचित् दिग्दर्शनमात्र करानेकी चेष्टा की गयी है।