भारतीय चार आश्रमोंके धर्म और पालनीय नियम

ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास—ये चार आश्रम शास्त्रोंमें बताये गये हैं। इनके पालनीय नियमोंका उपनिषद्, स्मृति, महाभारत आदिके अनुसार नीचे संक्षेपमें विवरण दिया जाता है।

ब्रह्मचर्य

यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान् बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनिव्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे। नित्य संध्या-वन्दन करे। नित्य स्नान करके देवता-ऋषियोंका तर्पण, देवताओंकी पूजा तथा अग्न्याधान करे। मधु, मांस, सुगन्धित द्रव्य, माला, रस, स्त्री, सभी प्रकारके आसव तथा प्राणियोंकी हिंसा सर्वथा त्याग दे। शरीरमें उबटन (साबुन-तेल) आदि न लगाये, आँखोंमें सुरमा न डाले, जूता तथा छाताका व्यवहार न करे। काम-क्रोध और लोभ न करे। नाच, गान तथा वाद्यसे दूर रहे। जूआ, कलह, निन्दा, झूठ आदिसे बचे, स्त्रियोंकी ओर सकाम दृष्टिसे न देखे, कभी उनका आलिंगन न करे, किसीकी निन्दा न करे। सदा अकेला सोये। कभी वीर्यपात न करे। अनिच्छासे स्वप्नमें कहीं वीर्यपात हो जाय तो स्नानकर सूर्यका पूजन करके तीन बार ‘पुनर्माम्’ इस ऋचाका पाठ करे। भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे। भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे, गुरुकी आज्ञा लेकर एक बार भोजन करे। एक स्थानपर रहे, एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे। पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे। सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे। रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे। ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे।

गार्हस्थ्य

गृहस्थ-आश्रम ही चारों आश्रमोंका आश्रयभूत तथा मूल है। इस संसारमें जो कोई भी विधि-निषेधरूप शास्त्र कहा गया है, उसमें पारंगत विद्वान् होना गृहस्थ द्विजोंके लिये उत्तम बात है। गृहस्थ-पुरुषके लिये केवल अपनी ही स्त्रीपर प्रेम रखना, सदा सत्पुरुषोंके आचारका पालन करना और जितेन्द्रिय होना परमावश्यक है। इस आश्रममें उसे श्रद्धापूर्वक पंचमहायज्ञोंके द्वारा देवता आदिका यजन करना चाहिये। गृहस्थको उचित है कि वह देवता और अतिथिको भोजन करानेके बाद बचे हुए अन्नका स्वयं आहार करे। वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानमें संलग्न रहे। अपने वर्ण-धर्मके अनुसार निर्दोष अर्थका उपार्जन करके गृहस्थका पालन करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे और दान दे। मननशील गृहस्थको चाहिये कि हाथ, पैर, नेत्र, वाणी तथा शरीरके द्वारा होनेवाली चपलताका परित्याग करे अर्थात् इनके द्वारा कोई अनुचित कार्य न होने दे। यही सत्पुरुषोंका बर्ताव (शिष्टाचार) है। स्वच्छ वस्त्र पहने, उत्तम व्रतका पालन करे, शौच-संतोष आदि नियमों और सत्य-अहिंसा आदि यमोंके पालनपूर्वक यथाशक्ति लोकसेवा करता रहे। शिष्टाचारका पालन करते हुए जिह्वा और उपस्थको काबूमें रखे। सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे। स्वयं सादगीसे रहकर सबका सदा हित-साधन करे। जन्मसे लेकर अन्त्येष्टिपर्यन्त यथायोग्य यथाविधि सब संस्कार करे। शास्त्रका अनुसरण करे। माता-पिता-कुटुम्ब आदिका आदरपूर्वक भरण-पोषण करे।

वानप्रस्थ

वानप्रस्थ मुनि सब प्रकारके संस्कारोंद्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर जन-कोलाहलरहित शान्त स्थानमें निवास करे। प्रात: और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे। अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे। जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा सावाँ खिलाकर सत्कार करे। बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे। अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमश: उपयुक्त वस्तुओंका आहार करे। कभी आलस्य न करे। जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे। नित्यप्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे। उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे। हलका भोजन करे। मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, देवताओंका सहारा ले। इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे। क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य-धर्मका पालन करे। शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मका पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थ स्वर्गपर विजय पाता है।

संन्यास

श्रेष्ठ संन्यासी नाम, गोत्र आदि तथा देश, काल, शास्त्र-ज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, व्रत और शीलका विज्ञापन न करे। किसी भी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी भी स्त्रीका स्मरणतक न करे, उनकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे। सम्भाषण, स्मरण, चर्चा और चित्रावलोकन—स्त्री-सम्बन्धी इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उसके चित्तमें अवश्य ही विकार उत्पन्न होता है और उस विकारसे उसका धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, क्रोध, असत्य, माया, लोभ, मोह, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यानमें योग देना, कामना, राग, संग्रह, अहंकार, ममता, चिकित्साका व्यवसाय, धर्मके लिये साहसका कार्य, प्रायश्चित्त, दूसरेके घरपर रहना, मन्त्र-प्रयोग, औषध-वितरण, विषदान, आशीर्वाद देना—ये सब संन्यासीके लिये निषिद्ध हैं।

संन्यासी स्वप्नमें भी कभी किसीका दिया हुआ दान न ले, दूसरेको भी न दिलाये और न स्वयं किसीको देने-लेनेके लिये ही प्रेरित करे। स्त्री, भाई, पुत्र आदि तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंके शुभ या अशुभ समाचारको सुनकर या देखकर भी संन्यासी कभी कम्पित (विचलित) न हो, वह शोक और मोहको सर्वथा त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (किसी वस्तुका) संग्रह न करना, उद्दण्डताका अभाव, किसीके सामने दीन न बनना, स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, स्नेह न करना, गुरुकी सेवा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, सबके प्रति उदासीनताका भाव, धीरता, स्वभावकी मधुरता, सहनशीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान-विज्ञान-परायणता, स्वल्प आहार तथा धारणा—यह मनको वशमें रखनेवाले संन्यासियोंका विख्यात सुधर्म है। द्वन्द्वोंसे रहित, सत्त्वगुणमें सर्वदा स्थित और सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला तुरीयाश्रममें स्थित परमहंस संन्यासी साक्षात् नारायणका स्वरूप है।

संन्यासी गाँवमें एक रात रहे और बड़े नगरमें पाँच रात; किंतु यह नियम वर्षाके अतिरिक्त समयके लिये ही है, वर्षामें चार महीनेतक वह किसी एक ही स्थानपर निवास करे। भिक्षु गाँवमें दो रात कभी न रहे। यदि रहता है तो उसके अन्त:करणमें राग आदिका प्रसंग आ सकता है। इससे वह नरकगामी होता है। गाँवके एक किनारे किसी निर्जन प्रदेशमें मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए निवास करे। कहीं अपने लिये मठ या आश्रम न बनाये। जैसे कीड़े हमेशा घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आठ महीनेतक संन्यासी इस पृथ्वीपर विचरता रहे। केवल वर्षाके चार महीनोंमें वह किसी एक स्थानपर, जो पवित्र जलसे घिरा हुआ और एकान्त-सा हो, निवास करे। संन्यासी सम्पूर्ण भूतोंको अपने ही समान देखता हुआ अन्धे, जड, बहरे, गूँगे और पागलकी तरह चेष्टा रखता हुआ पृथ्वीपर विचरण करे।

अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना—इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे। पाप, शठता और कुटिलतासे सदा रहित होकर बर्ताव करे। खानेके लिये अन्न और शरीर ढँकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे।

बुद्धिमान् संन्यासीको चाहिये कि न तो दूसरोंके लिये भिक्षा माँगे न सब प्राणियोंके लिये दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा ही करे तथा दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे। काम, क्रोध, घमंड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उन सबका परित्याग करके संन्यासी सब ओरसे ममताको हटा ले। अपने मनमें राग और द्वेषको स्थान न दे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझे। प्राणियोंकी हिंसासे सर्वथा दूर रहे तथा सब ओरसे नि:स्पृह होकर मुनिवृत्तिसे रहे। सबके साथ अमृतके समान मधुर बर्ताव करे—पर कहीं भी आसक्त न हो और किसी भी प्राणीके साथ परिचय न बढ़ावे। जितने भी कामना और हिंसासे युक्त कर्म हैं, उन सबका एवं लौकिक कर्मोंका न स्वयं अनुष्ठान करे और न दूसरोंसे कराये। सब प्रकारके पदार्थोंकी आसक्तिका त्याग करके थोड़ेमें संतुष्ट हो सब ओर विचरता रहे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे। किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो। संन्यासीको उचित है कि भविष्यके लिये विचार न करे, बीती हुई घटनाका चिन्तन न करे और वर्तमानकी भी उपेक्षा कर दे।

नेत्रसे, मनसे और वाणीसे कहीं भी दोषदृष्टि न करे। सबके सामने और दूसरोंकी आँख बचाकर कोई बुरा काम न करे। जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले।

मान-अपमानमें समान भावसे रहे। छहों ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो। निन्दा, दम्भ, ईर्ष्या, असूया, दोष-दृष्टि, इच्छा-द्वेष, सुख-दु:ख, काम-क्रोध, लोभ-मोह आदि छोड़कर अपने शरीरको मुर्देके समान मानकर, आत्मासे अतिरिक्त दूसरी किसी भी वस्तुको बाहर-भीतर न स्वीकार करते हुए, न तो किसीके सामने मस्तक झुकाये, न यज्ञ और श्राद्ध करे, न किसीकी निन्दा या स्तुति करे। अकेला ही स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहे। दैवेच्छासे भोजन आदिके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीपर संतुष्ट रहे। न किसीका आवाहन करे, न विसर्जन। न मन्त्रका प्रयोग करे, न मन्त्रका त्याग करे। कोई उसका अपना घर या आश्रम न हो। जनशून्य भवन, वृक्षकी जड़, देवालय, घास-फूसकी कुटिया, अग्निहोत्रशाला, नदीतट, पुलिन (कछार), भूगृह (गुफा), पर्वतीय गुफा, झरनेके समीप, चबूतरे या वेदीपर अथवा वनमें रहे। जो संन्यासी निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संदेह नहीं है।