चोरी-बेईमानी
वह मनुष्य बड़ा ही भाग्यवान् है, जो दूसरेके हितके लिये अपने स्वार्थकी चोरी करता है, वह भी बड़ा ही पुण्यात्मा है जो दूसरेको लाभ पहुँचानेके लिये अपने स्वार्थके साथ बेईमानी तथा बेइंसाफी कर जाता है। चोरी-बेईमानी पाप है; परंतु वही चोरी-बेईमानी यदि अपने स्वार्थके प्रति होती है और दूसरेका हित-साधन करनेवाली होती है तो पुण्य बन जाती है। वह हितकारी चोर तो बहुत ही श्रेष्ठ है जो निरन्तर दूसरोंका हित ही करता रहता है, परंतु उनको मालूम भी नहीं होता कि हमारा हित कौन कर रहा है। यों अपनेको जरा भी बिना जताये, सदा छिपा हुआ जो चोरी-चोरीसे हित-साधन किया करता है, उसका वह कार्य बड़े ही महत्त्वका होता है।
अनन्त करुणासिन्धु भगवान् तो दिन-रात इस चोरी करनेमें ही लगे रहते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डके अनन्त प्राणियोंका निरन्तर हित-साधन करते रहते हैं, परंतु अपना कहीं जरा भी पता नहीं लगने देते। सब यही समझते हैं कि हमारे पुरुषार्थसे, हमारी बुद्धिमानी या चातुरीसे, हमारे कर्मफलसे हमारा हित हो गया। भगवान्का यह छिप-छिपकर हित करना परम आदर्श है।
भगवान् राघवेन्द्र लड़कपनमें अपने छोटे भाइयोंको हारा खेल जिता देते थे। भगवान्को कौन जीत सकता है, वे तो सदा अजेय हैं, परंतु वे जान-बूझकर हार जाते थे, पर कभी उनको बताते नहीं थे कि ‘तुम हार रहे थे—मैंने जान-बूझकर तुम्हें जिता दिया और स्वयं हार स्वीकार कर ली।’ इस प्रकार जताकर हारना तो जीतनेसे भी बढ़कर होता है। इसमें जीतनेवाला अपनेको हारा हुआ ही मानता है। भगवान् सचमुच उन्हें जिताते थे और सचमुच स्वयं हार जाते थे। इसमें न दम्भ था, न दिखौआपन। भगवान्का सहज स्वभाव ही है—भक्तोंके सामने हार जाना। भगवान् श्रीकृष्णके व्रज-सखा भगवान्के हारनेके इसी स्वभावके कारण ही उन्हें जीतकर उनको घोड़ा बनाया करते थे। कितनी मधुर होती है यह हार!
अपनी हानि स्वीकारकर दूसरेको लाभ पहुँचानेमें जो सुख होता है, उस जातिका सुख दूसरेके सुखकी परवा न करके सुखी होनेवालेको कभी नहीं होता और वह तो इस जातिके सुखसे सदा ही वंचित रहता है, जो दूसरेको दु:खी बनाकर सुखी होना चाहता है।
सेवा करे, हित करे और पता भी न लगे कि यह कौन कर रहा है। अपनी बड़ी-से-बड़ी हानि करके भी दूसरेको लाभ पहुँचा दे और अपने इस कृत्यको सदा छिपाकर ही रखे—कभी किसीपर भी प्रकट न होने दे। ऐसा परार्थसाधक निज-स्वार्थचोर पुरुष ही सचमुच सत् पुरुष है और ऐसे ही पुरुषसे जगत्का यथार्थ उपकार होता है।
जो पुरुष सेवा करता है, सच्चे हृदयसे लाभ पहुँचाता है, पर बतानेका लोभ संवरण नहीं कर सकता, वह अपने इस सत्कर्मका मूल्य घटा देता है, जो बतानेके लिये ही सेवा-हित या उपकार करता है, उसकी भावना बहुत नीची होती है और जो करता कम है और अहसान ज्यादा करता है, वह तो अपने कर्मका मूल्य ही खो देता है। एवं वे लोग तो बहुत ही निम्न श्रेणीके हैं कि जो करते नहीं, पर विज्ञापन करते हैं तथा दूसरेके स्वार्थकी चोरी करके, दूसरेके हितके साथ बेईमानी करके स्वयं लाभ उठाना चाहते हैं वे तो महान् नीच हैं।
परोपकार करो—पर कभी जताओ मत।
त्याग करो—पर कभी बताओ मत।
सेवा करो—पर सेव्यको पता न लगने दो कि कौन कर गया।
हित करो—पर उसका हक समझकर चुपकेसे करो। चोरी करो अपने स्वार्थकी, दूसरोंके हितके लिये। बेईमानी करो अपने नीच स्वार्थके साथ, दूसरोंका हित-साधन करनेके लिये।