दोष न देखकर गुण देखिये
तमाम दोषोंसे बचकर, तमाम अवगुणोंको हटाकर सद्गुण-सम्पन्न हों और भगवान्के दैवी गुणोंको अपना लें, यह भगवान्को प्राप्त करनेका एक अन्यतम साधन है। ऐसा करनेके अनेक उपाय हैं—उनमें एक यह है कि हम निरन्तर सद्गुणोंका चिन्तन करें। अपने अवगुणोंको दूर करनेके दो प्रकार हो सकते हैं—(१) हम अवगुणोंसे डरते और उनसे लड़ते रहें और (२) हम लगातार बड़ी सावधानी तथा उत्साहके साथ सद्गुणोंको पुष्ट करते रहें। इनमें मनोवैज्ञानिक सुन्दर तरीका यह है कि हम सद्गुणोंका निरन्तर चिन्तन करें और उनको परिपुष्ट करें। दूसरोंके भी और अपने भी। इसमें और भी बहुत-से लाभ हैं। घरमें, भाई-भाईमें, हिस्सेदारोंमें, घरके सम्बन्धियोंमें, परिवारके लोगोंमें, पड़ोसियोंमें मतभेद तथा झगड़ा हो तो क्या करें! यह बहुत समझने तथा विचार करनेकी बात है। उनके दोषों—अवगुणोंको याद कर उन्हें बताकर और उनकी आलोचना करके एक-दूसरेसे लड़ते रहें, परस्पर दु:ख पहुँचाते तथा दु:खी होते रहें, यह ठीक? या उनके सद्गुणोंको देखकर, उनकी सराहना करें, उनको पुष्ट करते रहें, यह ठीक है? किसीके भी दोषको देखकर, उसे बताकर या उसकी कटु आलोचना करके आप उसे ठीक नहीं कर सकते। इससे वह और भी चिढ़ जायगा तथा यदि बुराई उसमें है तो वह उसे अपनी चीज मानकर दृढ़तासे पल्ले बाँध लेगा और आपको अपना शत्रु मानने लगेगा। पर यदि आपने उससे यथार्थ प्रेम किया, उसके गुणोंकी तारीफ की, झूठ-मूठ नहीं, खुशामदके लिये नहीं, किसी बुरी नीयतसे नहीं, सचमुच आपने उसके गुणोंको देखा और उसकी प्रशंसा की, तो उसके मनमें आपके प्रति सद्भाव उत्पन्न होगा, वह क्रमश: आपका मित्र बन जायगा। झगड़े-कलह शान्त हो जायँगे और आपसमें सहज ही संतोषजनक समझौता हो जायगा। यह दूसरेके लिये ही नहीं, अपने लिये भी आवश्यक है। निरन्तर अपनेको दीन-हीन, साधनहीन और अकर्मण्य मानते रहेंगे तो जीवन उल्लासहीन, साहसहीन और विषादमय हो जायगा। सर्वत्र निराशा छा जायगी। परंतु यदि आपने भगवान्के शुद्ध बलपर अपनेमें साहस, धैर्य, सद्गुण और कर्मण्यताका अनुभव किया तो चित्तमें उल्लास होगा और जीवनमें आशाका संचार होता रहेगा। सफलता आपका चरण चूमनेके लिये लालायित रहेगी। एक ईसाई विश्वासी भक्तने बहुत ही सुन्दर कहा है—
God is my help in every need;
God does my every hunger feed;
God walks beside me, guides my way,
Through every moment of the Day.
I now am wise, I now am true,
Patient, kind, and loving too,
All things I am, can do and be,
Through Christ, the truth that is in me.
God is my health, I can’t be sick;
God is my strength, unfailing, quick;
God is my all, I know no fear,
Since God and love and truth are here.
है प्रत्येक अभाव-दशामें,
मेरा पूर्ण सहारा ईश्वर।
है मेरी प्रत्येक भूखमें
भोजन देता प्यारा ईश्वर॥
चलता मेरे साथ निरन्तर
मार्गदर्शक मेरा बनकर।
रहता मेरे संग सदा वह
दिनभर प्रतिपल मेरा ईश्वर॥
मैं अब प्रज्ञावान् हो गया,
छायी जीवनमें सच्चाई।
धीरज, दया, प्रेमकी मुझमें
ललित त्रिवेणी है लहराई॥
सब कुछ हूँ मैं, सब कुछ कर
सकता, बन सकता हूँ मैं निश्चय।
क्योंकि बस रहा मेरे अंदर
सत्य रूप वह ईश कृपामय॥
रोग न मुझको छू सकता है,
मेरा स्वास्थ्य वही ईश्वर है।
मेरे लिये सतत तत्पर वह
अमित अचूक शक्तिका घर है॥
ईश्वर ही मेरा सब कुछ है
नहीं जानता मैं कोई डर।
क्योंकि यहाँपर सुविराजित हैं
पावन प्रेम, सत्य, परमेश्वर॥
कितना सुन्दर भाव है। कितने दृढ़ विश्वासपूर्ण वाक्य हैं। बस, यों अपने जीवनको भगवान्के साथ जोड़कर अपनेको सद्गुणोंसे सम्पन्न बना लेना चाहिये। इस प्रकारकी मंगल भावनाओंसे, इस प्रकार ईश्वरकी मंगलमयताके विश्वाससे आपमें शक्ति आयेगी, साहस आयेगा, सत्य आयेगा, प्रेम आयेगा, दया आयेगी, सहिष्णुता आयेगी और ईश्वर-विश्वास तथा ज्ञानकी वृद्धि होगी। इसके विपरीत, यदि आप उलटी ऐसी विपरीत भावना करेंगे कि ‘मैं दीन हूँ, असहाय हूँ, अशक्त हूँ, निराश हूँ, मेरा क्या होगा, मेरे लिये आशाकी कोई चीज नहीं, मेरा कोई नहीं है, मैं मन्दभागी हूँ और मैं बीमारियोंसे तथा विपत्तियोंसे घिर गया हूँ।’ तो सचमुच आप ऐसे ही बन जायँगे। ज्यों-ज्यों आपका मन ऐसी भावना करेगा, त्यों-ही-त्यों आपको वही-वही चीजें मिलती जायँगी। आप शक्तिका स्मरण करेंगे तो शक्तिशाली होंगे और दुर्बलताका स्मरण करेंगे तो दुर्बल बनेंगे।
मनोभावनाका कैसा परिणाम होता है, इसे दृष्टान्तसे समझिये—एक यूरोपियन मनोवैज्ञानिक डॉक्टरने एक पुस्तक लिखी है। उसमें उन्होंने लिखा है कि ‘मैं एक रोगीको देखने गया, देखनेपर पता चला कि उन्हें कोई रोग नहीं है’ मैंने उनसे कहा—‘कुछ बात नहीं है, आपको कोई बीमारी नहीं है। एक आदमी भेज दीजियेगा, मैं घरसे रिपोर्ट लिखकर दे दूँगा।’ वास्तवमें उनको कुछ था भी नहीं, कुछ बहम-सा था। मैं अपने घर लौटा और मैंने रिपोर्ट लिखकर भेज दी। कुछ ही देर बाद उनके यहाँसे घबराया हुआ एक आदमी आया। उसने कहा—‘डॉक्टर साहब! जल्दी चलिये, रोगीकी हालत बहुत खराब हो गयी है।’ मैं गया, देखा, सचमुच उनकी स्थिति बड़ी चिन्ताजनक हो रही थी, उनकी आकृति अवसन्न थी, शरीरसे पसीना छूट रहा था, हृदय बैठा जा रहा था, रोगीने निराशापूर्ण बहुत धीमी आवाजसे बताया—‘डॉक्टर साहब! पता नहीं क्यों, आपकी रिपोर्ट पढ़ते ही मेरा हृदय बैठने लगा।’ मैंने कहा—‘जरा रिपोर्ट तो देखूँ।’ मुझे रिपोर्ट दी गयी, उसमें लिखा था—‘अब आपके बचनेकी कोई आशा नहीं है, आपको जो करना हो, तुरन्त कर लेना चाहिये।’ इसी रिपोर्टके पढ़नेसे उनपर इतना भयानक परिणाम हुआ था। मैं अपनी भूल समझ गया। मैंने उनसे कहा—‘आपको कुछ है नहीं, यह रिपोर्ट आपकी नहीं है, यह तो एक दूसरे सज्जनकी है, जो मरणासन्न हैं। मैंने इसे लिखकर टेबलपर रखा था, भूलसे वह आपके पास आ गयी, आप चिन्ता न करें। मैं अभी आपकी रिपोर्ट मँगा रहा हूँ।’ रोगीके चेहरेको मैंने तुरन्त बदलते देखा, उसी क्षण उनके शरीरमें बल आ गया। उन्होंने कहा—‘डॉक्टर साहब! जल्दी मँगवाइये।’ मैंने उसी क्षण एक आदमी भेजकर रिपोर्ट मँगवायी, उसमें लिखा था—‘आप स्वस्थ हैं, कोई खास बीमारी नहीं है, साधारण कमजोरी है, थोड़ा बाहर घूम आइये।’ रिपोर्ट सुनकर वे बैठे हो गये, अपने हाथमें लेकर रिपोर्टको पढ़ा, मुखपर मुसकराहट छा गयी, बोले—‘आपकी भूलने तो मुझे मार ही डाला था डॉक्टर साहब!’ मैं अपनी भूलके लिये स्वयं लज्जित था और पश्चात्ताप कर रहा था। रोगी उसी क्षण अच्छे हो गये।
एक दूसरी सच्ची घटना इस प्रकार है—रक्षा-पूर्णिमाके दिन राजस्थानमें घरोंके दरवाजोंपर दोनों ओर शकुन लिखे जाते हैं, जिन्हें ‘सूँण’ कहा जाता है। उनकी पूजा होती है, भोग लगाया जाता है। एक गृहस्थके यहाँ घरवालीने एक लोटेमें चतुर्दशीकी रात्रिको गेरू भिगोकर रखी। सोचा—भीग जायगी, तब सबेरे उससे सूँण लिख लूँगी। लोटा चारपाईके नीचे रख दिया था। उसी चारपाईपर उसके पति सोये थे। तड़के ही वे उठे और खटियाके नीचे पड़े लोटेको जलसे भरा समझकर उसे लेकर शौचके लिये बाहर चले गये। कुछ अँधेरा था, अत: देखा नहीं कि लोटेमें क्या है। शौच होकर उठे तो देखा कि वहाँकी सारी जमीन लाल हो रही है, सोचा—‘अरे, इतना खून मेरे शरीरसे निकल गया, अब मैं कैसे बचूँगा।’ बस, मनकी कमजोरी शरीरमें आ गयी और वे मरणासन्न होकर वहीं गिर पड़े। जब घरवालोंने देखा—बड़ी देर हो गयी, तब आदमी उन्हें खोजने गये और किसी तरह उठाकर घर लाये। वैद्यने आकर देखा तो हालत बहुत खराब थी। इसी बीच गृहिणीने सोचा—‘भद्रा लग रही है, सूँण लिख लूँ’, पर खोजनेपर उसे गेरूवाला वह लोटा नहीं मिला। तब उसने चिल्लाकर कहा—‘मैंने रातको चारपाईके नीचे सूँण लिखनेके लिये गेरू भिगोकर रखी थी, मेरा वह लोटा कौन ले गया।’ आवाज रोगीके कानोंमें गयी, उसके मनमें कुछ परिवर्तन हुआ, उसने पूछा—‘क्या खाटके नीचे वही लोटा था?’ पत्नीने कहा—‘हाँ’ बस, उसी क्षण रोगीको हँसी आ गयी, बोला—‘अरे, मुझे तो लाल रंग देखकर खूनका बहम हो गया था। वह तो गेरू थी। वैद्यजी! मेरे कोई रोग नहीं।’ वह स्वस्थ होकर उठ बैठा।
यह है मनोवैज्ञानिक तत्त्व। हम जैसी भावना करते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। निराशाकी भावना कीजिये, निराशा आ जायगी, रोगकी भावना कीजिये, रोगी हो जायँगे। सफलताकी, स्वस्थताकी, दृढ़ताकी, निर्मलताकी भावना करेंगे तो मनमें उत्साह आयेगा, शक्तिका और नीरोगताका बोध होगा, धैर्यका संचार होगा और पवित्रताकी प्राप्ति होगी।
एक अमेरिकन पत्रमें एक सज्जनने अपना अनुभव लिखा था—‘वे बहुत दिनोंसे बीमार थे और उन्होंने बहुत-से डॉक्टरोंका इलाज करवाया, पर किसी प्रकार अच्छे नहीं होते थे। डॉक्टरोंने कह दिया कि ‘अब आपके अच्छे होनेकी कोई आशा नहीं है।’ उन्होंने एक पुस्तक पढ़ी, जिसमें लिखा था कि ‘शरीरका प्रत्येक परमाणु भगवान्के द्वारा निर्मित है, सब कुछ भगवान् ही हैं।’ उनके मनमें आया कि ‘शरीरके सारे परमाणु जब भगवान् हैं, तब भगवान् तो नीरोग हैं, फिर मुझे रोगी क्यों होना चाहिये।’ उन्होंने मनमें दृढ़ निश्चय किया—‘मैं रोगी नहीं हो सकता हूँ, यह मेरा सब कुछ भगवान्से बना है, तब मैं रोगी कैसे हो सकता हूँ।’ उनके मनमें दृढ़ निश्चय हो गया और कुछ ही समयमें वे स्वस्थ हो गये।
भगवान् पर विश्वास करके निरन्तर स्वास्थ्यका, सद्गुणोंका, दया, प्रेम, क्षमा, उदारता आदि सद्भावोंका चिन्तन करे। अपनेमें तथा दूसरेमें सदा ही शुभ भावनाका पोषण करे। यह माने कि भगवान्ने दया करके हमें इतने गुण दिये हैं। उन्होंने करुणा दी, सौहार्द दिया, सदाचारिता दी, उदारता, नम्रता, सरलता, शुचिता, अहिंसा, सत्य, प्रेम, समता और सेवा-वृत्ति दी तथा क्षमा, धैर्य, सहनशीलता और शीलता दी। यह भगवान्का कितना बड़ा अनुग्रह है मुझपर। इस प्रकार दृढ़ भावना करनेपर हमारी जो शक्ति दुर्गुणोंसे लड़नेमें, उन्हें हटानेमें लगती, वही फिर सद्गुणोंकी पुष्टि और विस्तारमें लगने लगेगी, जिससे प्रथम तो दुर्गुणोंका स्मरण ही नहीं होगा और कहीं हुआ भी तो यह सद्गुणोंकी भावना उन्हें दबा देगी। दूसरोंके लिये भी ऐसा ही प्रयोग करना चाहिये। किसीके भी अवगुणोंका चिन्तन न करके गुणोंका करना चाहिये और अनिष्टका नाश करनेवाले सद्भावोंकी एक ऐसी शक्ति पैदा कर लेनी चाहिये जो दोष और दुर्गुणोंकी स्मृतिको ही न जगने दे। वह शक्ति है भगवान्के बलपर निरन्तर सद्गुणोंका और सद्भावोंका चिन्तन, मनन और सेवन। दूसरोंसे प्रेम पैदा करना हो तो उनके सद्गुणोंको देखें, दोष कभी न देखें। किसीको अपने अनुकूल बनाना हो तो उसके सच्चे गुणोंको देखिये, उसके गुणोंकी सच्ची प्रशंसा कीजिये। उसके दोषोंको मत देखिये। दोषोंको तो भूल ही जाइये। कभी भूलकर भी उनकी आलोचना मत कीजिये। धीरे-धीरे वह आपका मित्र बन जायगा। यदि किसी वैरीको अपना मित्र बनाना हो तो प्रतिदिन रातको उसके प्रति अपने मनसे मैत्री और प्रेमके भावोंका पोषण कीजिये और उसके पास भेजिये। मन-ही-मन उसके कल्याणके लिये भगवान्से प्रार्थना कीजिये और मनमें सद्भावना भरिये। संसारमें एक ऐसा अभिन्न आत्मसम्बन्ध है कि हमारे मनकी भावना मनसे चलकर उसके मनपर प्रतिफलित होगी, उसपर प्रभाव डालेगी, उसके मनकी विरोधी भावनाको हटायेगी, मिटायेगी, उनका संशोधन-परिमार्जन करेगी। इस प्रकारका यह एक क्रम है—शत्रुको मित्र बनानेका। उसके प्रति मनमें सद्भाव रखना, क्रियामें सद्भाव रखना, मनके सद्भावोंको उसके पास भेजते रहना। नियम कर लेना चाहिये कि प्रतिदिन दो-चार मिनट उसके पास सद्भावना अवश्य भेजी जाय। इससे आपका मन तो सद्भावनामय होगा ही, उसका मन भी पलटेगा—यह अनुभूत तत्त्व है, आप करके देख लें। आप बार-बार रटिये—‘मैं बीमार हूँ, मैं बीमार हूँ, मुझे रोग हो गया, मुझे रोग हो गया’—आप देखेंगे आपका शरीर रोगी हो जायगा। ‘मैं स्वस्थ हूँ, मेरे कोई बीमारी नहीं है’—ऐसी भावना दृढ़ कीजिये तो बीमारी दूसरा स्थान ढूँढ़ेगी, आपके पास नहीं फटक पायेगी। ‘ईश्वर मेरा स्वास्थ्य है, मैं कभी बीमार नहीं हो सकता,’ यह कितनी अच्छी भावना है। इस भावनाको बार-बार अपनाइये। ‘ईश्वर मेरा है, मैं कभी दु:खी नहीं हो सकता। मैं सुखी हूँ।’ आप यह रटिये, इसका प्रभाव पड़ेगा। मनपर प्रभाव होगा और मन वैसा ही बन जायगा। सुख-दु:ख कभी बाहरसे नहीं आते। जिसके मनमें दु:खके लिये स्थान नहीं रहेगा, वह कभी दु:खी नहीं हो सकता। जिसने अपने मनसे दु:खका सर्वथा बहिष्कार कर दिया है, वही सदा सुखी रह सकता है। हमारे अंदर दु:खकी भावना स्पर्श न कर सके तो दु:ख हमारे समीप आ ही नहीं सकता।
जिनके पास विपुल सम्पत्ति है, भोगोंकी विविध सामग्रियाँ जिन्हें सुलभ हैं, वे सुखी नहीं हैं। सुखी तो वे हैं, जो आनन्दमय भगवान्के अधिष्ठानपर अपनेको सुखी मानते हैं। अपने मनमें यदि कोई यह निश्चय कर ले कि ‘भगवान्का प्रेम मेरे अंदर है, मैं प्रेमी हूँ, जगत्में मेरा कोई वैरी नहीं है, तो निश्चय ही उसका कोई वैरी नहीं रहेगा। भले ही कोई उससे वैर कर ले, पर उसका मन तो सदा निर्वैर ही रहेगा। युधिष्ठिरका उदाहरण हमारे सम्मुख है। उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहते हैं। उनका कोई शत्रु उत्पन्न ही नहीं हुआ। आप कह सकते हैं कि ‘उनके कोई वैरी क्यों नहीं था। कौरवराज दुर्योधन तो उनके प्रत्यक्ष ही वैरी थे।’ पर महाभारत देखनेपर पता चलेगा कि दुर्योधनने धर्मराजको अपना वैरी कभी नहीं माना, शत्रुके रूपमें तो वे भीम आदिको ही देखते थे।
एक ऐसी कथा आती है कि महाभारत-युद्ध समाप्त हो चुकनेपर जब भीमसेन दुर्योधनको मारनेकी ताकमें थे, तब माता गान्धारीके कहनेसे धर्मराज युधिष्ठिरपर विश्वास करके स्वयं दुर्योधन अपनी रक्षाका उपाय पूछने उनके पास गये थे और युधिष्ठिरने उनको भीमके हाथसे न मरनेका सच्चा साधन बताया था। पर श्रीकृष्णके द्वारा बुद्धि बदल दिये जानेके कारण दुर्योधन उस उपायको पूरा काममें नहीं ला सके, इसीसे भीमके हाथों मारे गये। युधिष्ठिरपर विश्वास न होता, उन्हें वैरी मानते तो मृत्युसे बचनेका उपाय पूछने उन्हींके पास क्यों जाते? और यदि युधिष्ठिरके मनमें वैरभाव होता तो वे उन्हें मृत्युसे बचनेका सच्चा अचूक साधन कैसे बताते।
कभी नकारात्मक पदार्थोंका स्मरण न करें। नकारात्मक भावना न करें। सद्वस्तुओंका स्मरण करें, पोषण करें, पुष्ट करें, उनको बढ़ावें और उन्हींका वितरण करें। अपने भीतर दो प्रकारके यन्त्र हैं। एक अंदरकी चीजको बाहर भेजता है, दूसरा बाहरवालीको भीतर खींचता है। बाहर भेजनेवालेके द्वारा अपने अंदर जैसे भाव या विचार होते हैं, उनके परमाणु निकल-निकलकर अपनी शक्तिके अनुसार दूर-दूरतक फैलते रहते हैं और दूसरा आकर्षक यन्त्र बाहरके सजातीय परमाणुओंको खींच-खींचकर अंदर लाता रहता है। एक बाहर फेंकता और दूसरा भीतर खींचता है। यदि हमारे मनमें सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया, प्रेम, उपकार आदि सद्भाव हैं तब तो हमारे द्वारा अपने-आप जगत्में इन्हीं सद्भावोंके परमाणुओंका वितरण होता रहता है और हमारे अंदर यदि काम, क्रोध, लोभ, हिंसा, द्वेष, मत्सर आदि भरे होते हैं तो हम विश्वको वही वस्तुएँ दे रहे हैं। हम संसारमें सद्भावों और सद्गुणोंको फैलावें और सबको सद्भावों और सद्गुणोंका ही दान करें, इसकी बड़ी आवश्यकता है। अपने अंदर यदि दुर्भाव और दुर्गुणोंको स्थान मिल रहा है तो इससे हमारे द्वारा अपनी और जगत्की हानि होती है। कोई कहे—‘मैं अपने घरमें अश्लील गीत गाता हूँ, गाली बकता हूँ, शराब पीता हूँ अथवा अपने मनमें चाहे सो सोचता-विचारता हूँ, इससे किसीका क्या होता है। अच्छा-बुरा होगा तो मेरा होगा।’ पर यह ठीक नहीं। वह जो कुछ करता है, उसका प्रभाव जगत् पर अनायास ही पड़ता है। उसके द्वारा जगत्को अपने-आप ही असत् प्रेरणा मिलती रहती है। निरन्तर हानिकर परमाणु विश्वमें प्रसरित होते रहते हैं।
घरमें, अड़ोस-पड़ोसमें, गाँवमें, सम्बन्धियोंमें, देशमें और विभिन्न मतवादियोंमें आपको प्रेम देखना है तो उनके गुणोंको देखना प्रारम्भ कर दें, उनके सच्चे गुणोंकी प्रशंसा करें। आप ऐसा कभी कुछ न करें जिससे उनको अपमान बोध हो, उनकी प्रतिष्ठामें धक्का लगे, उनके मनमें दु:ख-द्वेष हो, प्रतिहिंसा हो और बदला लेनेकी इच्छा जाग उठे। ऐसी स्थिति कभी न आने दें। जगत्में सर्वथा बुरा कोई नहीं है। गुण-दोष सभीमें हैं। आप गुणोंको देखिये। यह निश्चय कीजिये —सबमें भगवान् हैं, वही सबमें आत्मारूपसे विराजमान हैं। वही आत्मा मुझमें है। किसीके अनिष्टकी भावना करके, हम प्रकारान्तरसे अपना ही बुरा करते हैं। किसीकी बुराई करना, किसीका अहित-चिन्तन करना, जान-बूझकर अनिष्टका पोषण करना है और जगत्के अहितमें सहायक होना है। हमें चाहिये हम किसी प्रकार भी बुराईको पोषण न दें। बुराईको स्थान ही न दें। हमारी आँखें ऐसी बन जानी चाहिये कि उन्हें गुण ही दीख पड़े, दोषपर आँख वैसे ही न टिके, जैसे निरामिष-भोजीकी आँख मांसपर जाती ही नहीं। दु:खकी बात तो यह है कि हमारी आँखें आज ऐसी दूषित हो गयी हैं कि वे पद-पदपर दोष ही देखती हैं और बहुत बढ़ाकर देखती हैं। अपना दोष देखनेमें तो मुँद जाती हैं, पर दूसरेका छोटा-सा दोष भी उन्हें बहुत बड़ा दीखता है। ‘आप पापको नगर बसावत, सहि न सकत पर खेरो।’ गुण तो देखती ही नहीं। जहाँ वस्तुत: गुण होता है, वहाँ भी उसे दोष दीखता है। कोई आदमी नाम-जप करता है, तो यह कहा जायगा कि ‘यह दम्भ करता होगा। कोई स्वार्थ होगा, नहीं तो जप क्यों करता।’ इस प्रकार दोष-ही-दोष दिखायी देते हैं। यह बहुत शोचनीय स्थिति है। इससे सदा बचना चाहिये। इससे बुराईको बहुत अधिक आश्रय और पोषण मिलता है।
किसीपर संदेह भी नहीं करना चाहिये। संदेहसे बिना हुए ही दोष दीखता है और बड़े-बड़े अनर्थ हो जाया करते हैं। एक स्थानकी बात है। एक लड़केको कहीं खोटी चवन्नी मिल गयी, चवन्नी चला देनेकी उसे बड़ी चिन्ता थी। वह एक हलवाईकी दूकानपर गया, मिठाई ली और वह चवन्नी दे दी। ग्राहकोंकी भीड़में हलवाईने चवन्नी देखी नहीं और उसे अपनी पेटीमें डाल दिया। लड़का बहुत प्रसन्न हुआ और ‘चल गयी, चल गयी’ चिल्लाता हुआ बाजारमेंसे दौड़कर निकल गया। उन दिनों वहाँ हिन्दू-मुसलिम-वैमनस्य फैला था। परस्पर संदेहका वातावरण हो रहा था। दौड़ते हुए बच्चेके मुखसे ‘चल गयी, चल गयी’ सुनकर लोगोंने समझा ‘लाठी चल गयी।’ फिर तो हिंदुओं और मुसलमानोंने अपनी-अपनी लाठियाँ सँभालीं और घरोंसे निकल पड़े, जमकर लड़ाई हुई। बहुतोंकी जानें गयीं, बहुत घायल हुए। जब बच्चेकी चिल्लाहटके रहस्यका पता चला तो अपनी करनीपर लोगोंको बड़ा खेद हुआ; परंतु निर्दोष प्राणियोंकी जानें तो जा ही चुकी थीं!
बहुत-से झगड़े संदेहसे ही हुआ करते हैं। कुछ आँखोंके दोषसे भी होते हैं। जहाँ मनमें द्वेष होता है, वहाँ गुण भी दोष ही दीखता है। जहाँ आँखमें राग होता है, वहाँ दोष भी गुण दीखते हैं। माँका अपने पुत्रमें राग होता है, इसलिये वह उसके दोषको नहीं देख पाती। अत: दूसरेमें कभी कोई दोष दीखे तो पहले यह सोचना चाहिये कि कहीं मेरे अपने मनकी कलुषता ही तो दोष नहीं दिखा रही है। ऐसा न हो तो फिर यह देखे कि ‘मेरेमें यह दोष है कि नहीं।’ यदि अपनेमें भी वह दोष है तो फिर हमें दूसरेको दोषी कहनेका क्या अधिकार है! अतएव हमें दूसरेकी आलोचना और निन्दासे सदा बचना चाहिये, इसीमें परम लाभ है। एक आदमी भूल करता है, तो वही भूल आप क्यों करते हैं। चोरी बुरी है यह कहते हैं, किसीने चोरी की तो उसको बुरा बताते हैं, फिर आप स्वयं क्यों चोरी करने जाते हैं। चोरी बुरी है तो आपके लिये भी बुरी है और यदि चोरी बुरी नहीं है तो आप उसे बुरा क्यों बताते हैं! अतएव कभी भी बुरेके साथ बुरा बर्ताव न करें और बुरेकी बुराई न देखें, सबमें सद्गुण देखें, सबकी भलाई करें और सबमें भगवान्को देखें। जो मनुष्य संसारमें, सब प्राणियोंमें भगवान्को देखता है, उसे सबमें भगवान् दीखते हैं और जो दोषोंको देखना चाहता है, उसे सबमें दोष दीखते हैं।
किसीको भी कभी ऐसी बात न कहिये, जिससे उसके मनमें क्षोभ हो, उद्वेग हो, जीवनकी निराशा हो, सफलतामें संदेह हो और उसका नैतिक स्तर गिर जाय। यदि हम किसीको बार-बार बुरा बतायेंगे उसमें दोष-ही-दोष देखकर उसकी आलोचना करेंगे तो या तो वह क्रुद्ध होकर हमसे लड़ पड़ेगा, अपने मार्गसे विचलित होगा अथवा उसे अपनेमें निराशाके भाव उत्पन्न हो जायँगे। उसके तेज, साहस, बल तथा बुद्धिका ह्रास हो जायगा। उसके मनमें निराशा उत्पन्न हो जायगी। किसीमें बुराई दिखाकर उसे गिराइये मत, भलाई दिखाकर उसको उठाइये।
महाभारतकी कथा है। जब कौरव-पक्षके सेनापति कर्ण हुए, तब उन्हें अर्जुनके सारथि श्रीकृष्णके मुकाबिलेमें वैसे ही निपुण सारथिकी आवश्यकता हुई। राजा शल्य अश्व चलानेमें बड़े दक्ष थे। दुर्योधनने उनसे प्रार्थना की। शल्यने दुर्योधनके आग्रहसे रथ हाँकना तो स्वीकार कर लिया पर यह शर्त कर ली कि ‘मैं कर्णको युद्धके समय चाहे जैसी बात कह सकूँगा, उसमें वे किसी प्रकारकी आपत्ति नहीं करेंगे।’
शल्यने युद्धक्षेत्रमें कर्णको जली-कटी सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने कहा—‘भला, कहाँ नरश्रेष्ठ अर्जुन और कहाँ नराधम तुम! यदि तुम भयसे भाग न गये तो अवश्य ही मारे जाओगे। तुम मोहवश वृथा ही श्रीकृष्ण और अर्जुनको मारनेकी इच्छा करते हो। हमने यह कभी नहीं सुना कि किसी गीदड़ने युद्धमें सिंहको मार दिया हो। नि:संदेह तुम्हारा काल आ पहुँचा है। कोई जीवित रहनेवाला पुरुष ऐसी ऊटपटाँग बातें कैसे कह सकता है। तुम तो वैसे ही काम करना चाहते हो जैसे कोई भुजाओंके बलसे समुद्रको पार करना चाहे या पहाड़की चोटीसे कूदना चाहे। जिस प्रकार घरके भीतर बैठा हुआ कुत्ता वनके राजा सिंहकी ओर भूँकता है, वैसे ही तुम पुरुषसिंह अर्जुनके लिये बड़बड़ा रहे हो। जिस समय तुम्हारी अर्जुनपर दृष्टि पडे़गी, उस समय तत्काल ही तुम गीदड़ बन जाओगे। जिस प्रकार लोकमें चूहा और बिल्ली, कुत्ता और बाघ, सियार और सिंह, खरगोश और हाथी, मिथ्या और सत्य तथा विष और अमृत प्रसिद्ध है, वैसे ही तुम और अर्जुन हो।’ इस प्रकार वाग्बाणोंसे शल्यने कर्णके हृदयको जर्जरित कर दिया। कर्ण कभी क्रोधसे तिलमिला उठते, कुछ कहते, पर शल्य कहीं सारथिका काम छोड़ न दें, इससे वे चुप रह जाते। उनके हृदयमें उद्वेग हो गया, युद्धमें उनका पूरा ध्यान नहीं जम पाया, तेज घटता गया। शल्य थे तो सारथि, पर उन्होंने शत्रुका काम किया। अतएव किसीको भी कभी दुर्वचन कहकर उसे गिराना नहीं चाहिये।
साथ ही सबके साथ सद्व्यवहार, सद्बर्ताव तथा विनययुक्त आचरण करके सबसे सद्भावना, प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। विशेष करके जब भी कोई कार्य आरम्भ करना हो, तब बड़ोंका आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करना चाहिये।
महाभारत-युद्ध आरम्भ होनेको ही था कि धर्मराज युधिष्ठिरने अपना कवच उतार दिया, शस्त्रोंको छोड़ दिया और रथसे उतरकर हाथ जोड़े हुए वे बड़ी तेजीसे कौरव-सेनाकी ओर पैदल ही चल दिये। सब ओर हाहाकार मच गया। भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव भी उनके पीछे हो लिये, वे पूछ रहे थे—‘महाराज! आप हमें छोड़कर यों कहाँ जा रहे हैं!’ कौरव-पक्षके सैनिकोंने तो कह दिया कि ‘युधिष्ठिर कुलकलंक और डरपोक है। यह डरकर शरण पानेकी इच्छासे भीष्मके पास जा रहा है।’ चतुरचूड़ामणि भगवान् श्रीकृष्णने भीम, अर्जुन आदिसे कहा कि ‘तुमलोग घबराओ मत, युधिष्ठिरके जानेका रहस्य मैं जानता हूँ, वे आशीर्वाद लेने जा रहे हैं।’
युधिष्ठिरने क्रमश: पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कुलगुरु कृपाचार्य और मामा शल्यके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। युद्धके लिये आज्ञा और आशीर्वाद माँगा। चारोंने ही यह कहा कि ‘यदि तुम इस समय हमारे पास नहीं आते तो हम तुम्हें शाप दे देते, जिससे तुम अवश्य पराजित होते, पर तुम आ गये, इससे अब आशीर्वाद देते हैं, तुम्हारी अवश्य विजय होगी।’
युधिष्ठिर एक विशेष बल और विजयका निश्चय प्राप्त करके लौटकर अपनी सेनामें आकर रथपर सवार हो गये। विनययुक्त सद्व्यवहार, प्रणमन, सरलता तथा नम्रतासे दूसरेकी सद्भावना उसका प्रेम तथा आशीर्वाद प्राप्त होता है और ऐंठ, अविनय, अभिमान, टेढ़ेपन तथा गर्वसे दुर्भाव, द्वेष और अभिशाप प्राप्त होता है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्यको विनययुक्त होकर सद्भाव, प्रेम तथा आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। अपनेसे बड़ोंको तो प्रतिदिन नियमपूर्वक प्रणाम करना ही चाहिये, इससे आयु, विद्या, यश तथा बलकी वृद्धि होती है। परंतु सम्मान, प्रेम, विनय, सत्य और हित-भावनासे पूर्ण व्यवहार सबके साथ करना चाहिये। सभीके सद्गुणोंको देखकर उनको बढ़ाना चाहिये, पुष्ट करना चाहिये। इसीमें अपना तथा दूसरोंका हित है। इसीसे प्रेमकी वृद्धि होती है। जहाँ प्रेम है, वहीं शान्ति है और जहाँ शान्ति है, वहीं आनन्द है। नित्य और पूर्ण आनन्द ही जीवनका मुख्य ध्येय है।