दु:खमें भगवत्कृपा
जब मनुष्य केवल संसारके अनुकूल भोगपदार्थोंकी प्राप्तिमें भगवत्कृपा मानता है, तब वह बड़ी भारी भूल करता है। भगवान्की कृपा तो निरन्तर है, सबपर है और सभी अवस्थाओंमें है; किंतु जो ये अनुकूल भोगपदार्थ हैं, जिनमें अनुकूल बुद्धि रहती है, ये सब तो मनुष्यको मायाके, मोहके बन्धनमें बाँधनेवाले होते हैं। मायाके मोहमें बाँधकर जो भगवान्से अलग कर देनेवाली चीज है, उसकी प्राप्तिमें भगवत्कृपा मानना ही गलती है। पर होता यह है कि जब मनुष्य भगवान्का भजन करता है, भगवान्के नामका जप करता है, रामायण और गीतादिका पाठ करता है और संसारके भोगोंकी प्राप्तिमें जरा-सी सफलता प्राप्त होती है, तब वह ऐसा मान लेता है कि मेरी यह कामना पूरी हो गयी, मुझे यह लाभ हो गया है। ऐसे पत्र मेरे पास बहुत आते हैं और मैं उन्हें प्रोत्साहित भी करता हूँ, परंतु यह चीज बड़ी गलत है। जहाँ मनुष्य अनुकूल भोगोंमें भगवान्की कृपा मानता है, वहाँ प्रतिकूलता होनेपर वह उलटा ही सोचेगा। वह कहेगा—‘भगवान् बड़े निर्दयी हैं, भगवान्की मुझपर कृपा नहीं है।’ अधिक क्षोभ होगा तो वह कह बैठेगा कि ‘भगवान् न्याय नहीं करते।’ इससे भी अधिक और क्षोभ होगा तो वह यहाँतक कह देगा कि ‘भगवान् हैं ही नहीं, यह सब कोरी कल्पना है। भगवान् होते तो इतना भजन करनेपर भी ऐसा क्यों होता।’ यों कहकर वह भगवान्को अस्वीकार कर देता है। इसलिये अमुक स्थितिकी प्राप्तिमें भगवत्कृपा है, यह मानना ही भूल है। पहले-पहले जब मनुष्यको सफलता मिलती है, तब तो उसमें वह भगवान्की कृपा मानता है, पर आगे चलकर वह कृपा रुक जाती है, छिप जाती है, वह कृपाको भूल जाता है। फिर तो वह अपनी कृतिको एवं अपने ही अहंकारको प्रधानता देता है। अमुक कार्य मैंने किया, अमुक सफलता मैंने प्राप्त की। इस प्रकार वह अपनी बुद्धिका, अपने बलका, अपनी चतुराईका, अपने कला-कौशलका घमंड करता है, अभिमान करता है। भगवान्को भूलकर वह अपने अहंकारकी पूजा करने लगता है। सफलता मैंने प्राप्त की है, इसलिये मेरी पूजा होनी चाहिये जगत् में। ‘मैंने धनोपार्जन किया, मैंने विजय प्राप्त किया, मैंने अमुक सेवा की, मैंने राष्ट्रका निर्माण किया, मैंने राज्य, देश तथा धर्मकी रक्षा की’—इस प्रकार सर्वत्र प्रत्येक कर्ममें अपना ‘अहम्’ लगाकर वह अहंका पूजक तथा प्रचारक बन जाता है और जब इस ‘अहम्’ की, ‘मैं’ की पूजा नहीं होती, उसमें किसी प्रकारका किंचित् भी व्यवधान उपस्थित होता है, तब वह बौखला उठता है, दल बनाता है और परस्पर दलबंदी होती है। राग-द्वेष एवं शत्रुताका वायुमण्डल बनता है, बढ़ता है। मनुष्य जब ऐसे किसी प्रवाहमें बहने लगता है, तब भगवान् दया करके ब्रेक लगाते हैं। उसे उस पतनके प्रवाहसे लौटानेके लिये भगवान् कृपा करते हैं। श्रीमद्भागवतमें आया है—
बलिकी शक्ति बढ़ी। बलि विश्वविजयी हो गये। देवताओंकी शक्ति क्षीण हो गयी। देवता भयभीत होकर छिप गये। बलिका प्रतापसूर्य सम्पूर्ण विश्वपर छा गया। बलि भगवान्के भक्त थे। वे भगवान्की कृपा मानते थे। पर बलिके मनमें भी अपने इस विषयका अहंकार तो आया ही। उसमें निमित्त चाहे जो कुछ बना हो, पर भगवान्ने बलिपर कृपा की। बलिका सारा राज्य हरण कर लिया, बलिका सारा ऐश्वर्य अपहरण कर लिया। उक्त प्रसंगमें यह प्रश्न हो सकता है कि बलिके साथ भगवान्ने ऐसा क्यों किया? स्पष्ट उत्तर है कि भगवान्ने बलिपर कृपा करनेके लिये ऐसा किया। भगवान्ने उनपर यह कृपा किसलिये की? दयामय भगवान्ने उनपर अपनी कृपा-वृष्टि इसलिये की कि बलिको जो अपने राज्यका, विजयका अहंकार हो गया था। उनका मोह इस प्रकार बढ़ता रहता तो पता नहीं बलि क्या कर बैठते भगवान्को भूलकर। बलि कुछ कर न बैठें, बलिका ऐश्वर्य-विजय-मद न रहे, बलि भगवान्की ओर लग जायँ, इसलिये भगवान्ने बलिपर कृपा की। बलिने स्वयं इसे स्वीकार किया है। यह बात समझमें आनी कठिन है कि बलिका राज्य ले लिया, उनका सर्वनाश कर दिया, इसमें क्या कृपा की, पर सचमुच भगवान्ने उनपर बड़ी कृपा की।
बलिके पितामह भक्तराज प्रह्लादने वहाँ भगवान्की स्तुति करते हुए कहा—‘प्रभो! आपने ही बलिको ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रत्व दिया था। आज आपने उसे छीनकर इसपर बड़ी कृपा की है। आपकी कृपासे आज यह आत्माको मोहित करनेवाली राज्यश्रीसे अलग हो गया है। लक्ष्मीके मदसे बड़े-बड़े विद्वान् मोहित हो जाते हैं। ऐसी लक्ष्मीको छीनकर महान् उपकार करनेवाले, समस्त लोकोंके महेश्वर, सबके अन्तर्यामी तथा सबके परम साक्षी आप श्रीनारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ।’ (भागवत ८। २२)
जब भगवान् किसीपर इस प्रकार कृपा करते हैं, तब उसके ऐश्वर्यका विनाश कर देते हैं। एक बार तो वह दु:खी हो जाता है। इसी प्रकार जिसके सम्मानकी वृद्धि हो जाती है, भगवान् उसका अपमान करवा देते हैं, लांछित कर देते हैं, जिससे वह मानकी मायासे छूटकर भगवान्की ओर बढ़े। जितनी भी इस प्रकारकी लीलाएँ होती हैं, सबमें भगवान्की कृपा ही हेतु होती है। जो बढ़ रहा है, वह भगवान्को मानेगा ही क्यों? जबतक जगत्में सफलता होती है, तबतक मनुष्य बुद्धिका अभिमान करता ही है और इसलिये भगवान् तथा धर्म दोनों ही उससे दूर हो जाते हैं। वह मोहवश अपने लिये असम्भव और अकर्तव्य कुछ भी नहीं मानता। ‘मैं चाहे जो कर सकता हूँ, कौन बोलनेवाला है। किसकी जगत्में शक्ति है जो मेरी उन्नतिमें बाधा दे सके।’ यों वह बकने लगता है, पर भगवान्की कृपासे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जो उसकी सारी सफलताको चूर्ण कर देती है। तब वह फिर भगवान्की ओर देखता है। जबतक मनुष्यको संसारका आश्रय मिलता है, तबतक वह भगवान्की ओर ताकता भी नहीं। जबतक उसकी प्रशंसा करनेवाले, उसे आश्रय देनेवाले, उसकी बुरी अवस्थामें भी कुछ भी मित्र, बन्धु-बान्धव रहते हैं, तबतक वह उन्हींकी ओर देखता है। द्रौपदीके चीर-हरणका प्रसंग देखिये। भगवान्की ओर उसने तबतक नहीं देखा, तबतक उसने भगवान्को नहीं पुकारा, जबतक उसे तनिक भी किसीकी आशा बनी रही। वह उनकी ओर ताकती रही। उसने पाण्डवोंकी ओर देखा, द्रोणकी ओर देखा, विदुरकी ओर देखा और देखा पितामह भीष्मकी ओर। उसे आशा थी, ये मुझे बचा लेंगे, किंतु वह जब सब ओरसे निराश हो गयी, उसे कहीं किंचित् भी आश्रय नहीं रह गया, तब उसने निराश्रयके आश्रय और निर्बलके बल भगवान्का स्मरण किया और भगवान्को आते कितनी देर लगती है। जहाँ अनन्यभावसे करुण आह्वान हुआ कि वे भक्तवत्सल प्रभु दौड़ पड़े।
सारे जगत्के अपनत्व, बन्धुत्व आदिके प्रति मनुष्यकी ममता जब नहीं छूटती, तब भगवान् कृपा करके ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देते हैं जिससे उसे उनसे मुक्ति मिल जाय, उस ममताके बन्धनसे छूटनेके लिये वह विवश हो जाय और जब उस ममतासे वह छूटता है, तब उसकी आँख खुलती है और वह सोचता है कि मैं धोखा खा रहा था। मुझे ‘मेरा-मेरा’ करनेवाले सब पराये ही रहे। सब समय धोखा ही देनेवाले रहे। संसारका यह नियम ही है कि सांसारिक लोग सफलताके साथ चलते हैं और असफलताकी गन्ध आते ही सब-के-सब धीरेसे सरक जाते हैं। फिर ढूँढ़नेपर भी उनका पता नहीं चलता। सुखके समय जो प्रगाढ़ मैत्रीका प्रदर्शन करता था, तब वैसा प्रेम नहीं दिखाता। उस समय केवल भगवान् ही दीखते हैं और वे बड़े ही मधुर एवं स्नेहपूरित शब्दोंमें कहते हैं—‘भाई! निराश मत हो, मेरे पास आओ।’ सच बात तो यह है कि अपने परम सुखद अंकमें लेनेके लिये ही वे ऐसा करते हैं। अपनानेके लिये ही वे उसे जगत्से निराश करते हैं। फिर भी हम भूल करते हैं। धनमें, मानमें, कीर्तिमें, जगत्की प्रत्येक सफलतामें भगवान्की कृपाका अनुभव करे, यह अत्युत्तम है; किंतु दीनता, दु:ख, अभाव, अकीर्ति और असम्मानकी स्थितिमें हमें उनकी मधुर मंगलमय कृपाका विशेष अनुभव करना चाहिये।
एक विधवा बहिन हैं, अच्छे घरकी हैं। भगवान्की प्रेमी हैं, भजन करती हैं। उन्होंने बताया कि ‘मैं परिवारमें रहती, मेरे बाल-बच्चे होते, देवरानियों-जेठानियोंकी भाँति मैं वस्त्राभूषण पहनती, इस प्रकार मैं संसारमें रम जाती, भजन करनेकी जैसी सुविधा और मन आज है, वैसा तब नहीं रहता। यह भगवान्की कृपा थी, जिसने मुझे जगत्के सारे प्रलोभन और सारे विषयोंसे दूर कर दिया, हटा दिया और इधर लगनेका सुअवसर दिया।’ वास्तवमें यही बात है। भगवान्की दी हुई वह विपत्ति हमारे लिये परम मंगलमयी है, जिसने हमें भगवान्में लगा रखा है। मनुष्य अमुक-अमुक प्रकारके वस्त्र पहननेको, अमुक-अमुक प्रकारके मकानमें रहनेको, अमुक प्रकारके भोजन करनेको और लोग मुझसे अमुक प्रकारसे बात करें, इसको तथा ऐसे ही अन्यान्य सांसारिक सुविधाओंको सुख मान रहा है; पर वस्तुत: वह सुख नहीं है। किसीने आपको आदरसे बुलाया और किसीने दुत्कार दिया—ये दोनों शब्द ही हैं। इससे कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं। किसीने पाँच सम्मानकी बात कह दी और किसीने पाँच गाली दे दी। यद्यपि गाली देनेवालेने अपनी हानि अवश्य की। पर यदि आपके मनमें मानापमानकी भावना न हो, तो आपका उससे कुछ नहीं बिगड़ा। किन्तु हमलोगोंने एक कल्पना कर ली। जगत्में हमारी कितनी अप्रतिष्ठा हो गयी, कितने हम अपदस्थ हो गये—हमें नित्य बड़ा भारी डर लगा रहता है। जरा-सी निन्दा होने लगती है, तो हम डर जाते हैं, काँप उठते हैं। पर भगवान् यदि जानते हैं कि निन्दासे ही इसका गर्व-ज्वर उतर सकेगा तो वे चतुर चिकित्सकके द्वारा कड़वी दवा दी जानेकी भाँति उसकी निन्दा करा देते हैं। निन्दा, अपमान, अकीर्ति, तिरस्कार, अप्रतिष्ठा तथा लांछन आदि अवसरोंपर यदि हम भगवान्की कृपा मान लें, तो कृपा तो वह है ही, पर हमें तो अवकाश ही नहीं है कि हम इसपर विचार भी कर सकें। जबतक सफलता है, तबतक मिथ्या आदर है, पर हम मानते हैं ‘हमें अवकाश कहाँ है, कितना काम है, हमारे बहुत-से प्रिय सम्बन्धी हैं, कितने मित्र हैं, कितने बन्धु-बान्धव हैं, कहीं पार्टी है, कहीं मीटिंग है, कहीं खेल है, कहीं कुछ है। सब लोग हमें बुलाते हैं, वहाँ हमें जाना ही है। क्या करें।’ इत्यादि। पर भगवान् तनिक-सी कृपा कर दें, लोगोंके मनमें यह बात आ जाय कि इसके बुलानेसे बदनामी होगी तो आज सब बुलाना बंद कर दें। मुँहसे बोलनेमें भी सकुचाने लगें। भगवान्ने तनिक-सा उपाय कर दिया कि बस, अवकाश-ही-अवकाश मिलने लगा।
संत कबीरको इसी प्रकार लोगोंने बुलाना छोड़ दिया था। पास बैठनेसे निन्दा हो जायगी, इतना जानते ही लोग पास बैठना छोड़ देंगे। संसार तो वहीं रहता है, जहाँ कुछ पानेकी आशा रहती है। वह पानेकी वस्तु चाहे प्रशंसा ही क्यों न हो जहाँ कुछ पाना नहीं, वहाँ संसार क्यों जायगा, फिर तो लोग दूर ही रहेंगे।
एक बहुत बड़े धनी हैं, मानी हैं, उनके साथ बैठनेको मिल जाय, वे अपने साथ बैठा लें, कितनी प्रसन्नता होती है। यश जो बढ़ता है, और कहीं वे हमारे घर आ जायँ, तब तो ‘ओ हो हो! कितने भाग्यवान् हैं हम। इतने बड़े आदमी हमारे घर आये।’ यह बड़ाई पानेका रोग है। मान पाना, बड़ाई पाना, यश पाना, धन पाना, आराम पाना—कुछ भी, जहाँ पानेकी इच्छा है और जहाँ यह पूरी होती है वह हम सब चाहते हैं, वहाँ हम सब जाते हैं। पर जहाँ यह पानेकी इच्छा पूरी न हो, कुछ देना पड़े, कुछ त्याग करना पड़े, चाहे मानका ही त्याग करना पड़े, कुछ बदनामी मिले, वहाँसे आदमी हट जाता है, कहता है यहाँ मेरा क्या काम। फिर जगत् वाले सब अलग हो जायँगे, जब उनको पानेकी कोई आशा नहीं रह जायगी। अपने घरके प्राणप्रिय व्यक्तियोंके मनमें भी, जिनके लिये लोग प्राण देते रहते हैं, ऐसी बात आ जाती है। पिता कमाते थे, उनसे कुछ मिलता था। बड़े पूज्य थे, पर जब उनसे कुछ भी मिलनेकी आशा नहीं रहती, सेवा-शुश्रूषा करनी पड़ती है, तब पुत्र भी सोचने लगता है—‘अब तो ये वृद्ध हो गये। बड़ा कष्ट है इन्हें’, दूसरे शब्दोंमें ‘ये मर जायँ तो अच्छा है।’ अपने परिवारवालोंको जाने दीजिये, अपना ही शरीर दो-चार वर्ष रुग्ण रह जाता है, ओषधि खानेपर भी अच्छा नहीं होता है, तो निराशा हो जाती है और मनमें आता है कि शरीर छूट जाय तो अच्छा हो। साथ रहनेवाले मित्र, बन्धु-बान्धव तरह-तरहकी बातें कहने लगते हैं। ‘घर नरक हो गया, रहना तो यहीं है, क्या किया जाय, बड़ा दु:ख है।’ वे लोग उसके साथ रहनेमें सुख नहीं मानते। उस समय मित्रता नहीं रह जाती। बन्धुता विलीन हो जाती है। सारा प्रेम और सारी आत्मीयता हवा हो जाती है। ऐसे अवसर भगवान् मनुष्यको चेतनेके लिये ही देते हैं। भगवान् क्या करते हैं? मनुष्य जिसे-जिसे सुखकी सामग्री मानता है, उसे मिटा डालते हैं। सुखकी सारी सामग्रियोंको तहस-नहस कर डालते हैं और जहाँ सुखकी सामग्री मिटी कि सब झंझट मिटा। जहाँतक चीलकी चोंचमें मांसका टुकड़ा है, वहींतक कौए-चील उसके पीछे-पीछे उड़ते हैं। जहाँ मांसका टुकड़ा गिरा कि उससे दूर भागे। जगत्की वस्तुएँ मांसके टुकड़ेकी तरह हैं और सारे मनुष्य कौएकी तरह हैं। भागवतमें आता है—अवधूतने चीलसे यही शिक्षा ली। मान नहीं रहे, धन नहीं रहे, स्वास्थ्य नहीं रहे, यश नहीं रहे, मकान नहीं रहे, नौकर-चाकर नहीं रहे, खानेको न रहे, तो फिर कौन पास आयेगा? पर यदि कोई बुद्धिमान् हो तो निश्चय ही सोचेगा कि भगवान्ने कितनी कृपा की कि मेरे जितने गिरनेके अवसर थे, सबको हटा लिया।
श्रीमद्भागवतमें नलकूबर और मणिग्रीवकी कथा आती है। ये दोनों कुबेरके पुत्र थे। अलकामें रहते थे। दिन-रात विहार किया करते थे। इनको कोई रोकनेवाला नहीं था।
यौवनं धनसम्पत्ति: प्रभुत्वमविवेकता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
यौवन, धन-सम्पत्ति, प्रभुत्व और अविवेक—इन चारोंमेंसे एक भी हो तो अनर्थका कारण होता है, पर जहाँ ये चारों साथ हो जायँ, वहाँ तो फिर कहना ही क्या है। कुबेर-पुत्रोंमें ये चारों थे। वे जवान थे, धन-सम्पत्ति थी, प्रभुत्व था और था अविवेक। यौवनका मद था, धनका मद था, अधिकारका मद था, कुबेरके पुत्र थे, स्वेच्छाचारी थे, अविवेकी थे। एक दिनकी बात है। ये दोनों अप्सराओंके साथ नंगे नहा रहे थे—विलास कर रहे थे। उधरसे श्रीनारदजी आ निकले। श्रीनारदजीको देखते ही स्त्रियाँ तो जल्दी बाहर निकल गयीं और वस्त्र पहन लिये, किंतु ये दोनों बड़े उद्दण्ड थे, उसी तरह नंगे खड़े रहे। नारदजीने कहा—‘तुम दोनों जडकी भाँति खड़े हो, जाकर वृक्ष हो जाओ।’
प्रश्न होता है ऋषि-मुनि तो क्षमाशील होते हैं, बुरा करनेवालेका भी भला करते हैं। उनमें क्रोध कैसे उत्पन्न हुआ और उन्होंने नलकूबर और मणिग्रीवको शाप कैसे दे दिया? वहाँ आता है, संतोंकी अवमानना बड़े विनाशकी चीज है करनेवालेके लिये। दूसरी बात, जब धनमें, राज्यमें, अधिकारमें, सफलतामें आदमी अंधा हो जाता है, तब जबतक उसके पास वे चीजें रहती हैं तबतक उसका अंधापन नहीं मिटता। उसे प्रेमपूर्वक समझानेका प्रयत्न किया जाय तो वह उलटा नाराज हो जाता है, बिगड़ खड़ा होता है। ऐसी अवस्थामें उसकी दवा यही है कि वह वस्तु उसके पास न रहे। जो धन-दुर्मदान्ध होते हैं, जिनको धनके मदने अंधा कर दिया है, अपनी सफलताके नशेमें जो बिलकुल पागल हो रहे हैं, अंधे हो रहे हैं ऐसे दुष्टोंके लिये दरिद्रता ही परम ओषधि है।
‘असत: श्रीमदान्धस्य दारिद्रॺं परमांजनम्।
उनके पाससे उन वस्तुओंका हट जाना ही उनको नेत्रदान करना है। किसीको ज्ञान-मद हो जाता है। भगवान् उसे हर लेते हैं। भगवान् हमारी मनचाही नहीं करते। नारदजीने इसीलिये उन्हें शाप दिया कि जिससे उन बेचारोंका यह रोग—धन-मद नष्ट हो जाय। उनको आँखें मिल जायँ और वे भगवान्को प्राप्त करें। जडतारूप इस कड़ी दवाके साथ श्रीनारदजीने उनको मधुरतम दुर्लभ आशिष् भी दिया कि ‘वृक्षयोनि प्राप्त होनेपर भी मेरी कृपासे इन्हें भगवान्की स्मृति बनी रहेगी और देवताओंके सौ वर्ष बीतनेपर इन्हें भगवान् श्रीकृष्णका सांनिध्य प्राप्त होगा, तब इनकी जडता दूर हो जायगी। इन्हें भगवच्चरणोंका प्रेम प्राप्त होगा। ये कृतार्थ हो जायँगे।’
स्वयं श्रीनारदजीने चाहा था—‘हम राजकुमारीसे विवाह कर लें; पर भगवान्ने उन्हें वानरका मुँह दे दिया।’ यह कथा शिवपुराण और रामचरितमानसमें आती है। श्रीनारदजीको बड़ा दु:ख हुआ। श्रीभगवान्को बहुत कुछ कह गये, ‘भगवान् तो स्वेच्छाचारी हैं, उन्हें किसीका सुख-सौभाग्य नहीं सुहाता। वे अपना ही भला चाहते हैं आदि’ न जाने क्या-क्या मोहमें वे कह गये। परंतु भगवान्ने उनपर कृपा की। पीछे उन्हें पश्चात्ताप भी हुआ। भगवान्ने उन्हें बताया, ‘हमने आपके हितके लिये ऐसा किया था—
अवगुन मूल सूल प्रद
प्रमदा सब दुख खानि।
ताते कीन्ह निवारन
मुनि मैं यह जिय जानि॥
आप-सरीखे विरक्तके लिये स्त्री सारे अवगुणोंकी जड़, शूलप्रद तथा समस्त दु:खोंकी खान है, यही मनमें विचारकर मैंने आपका विवाह नहीं होने दिया।’
भगवत्कृपाका यह विलक्षण भाव देखकर नारदजीका शरीर रोमांचित हो गया। नेत्रोंमें प्रेम तथा आनन्दके अश्रु छलक उठे—
‘मुनि तन पुलक नयन भरि आए।’
यह समझ लेनेकी बात है। कहीं हमारे विषयोंका हरण होता है, मनचाही वस्तु नहीं मिलती, वहाँ निश्चय ही समझना चाहिये कि भगवान् हमपर कृपा करते हैं। भगवान्की कृपाका कोई एक रूप नहीं है। वह न मालूम कब किस रूपमें प्रकट होती है। पर जागतिक असफलता उसका एक रूप है। हम संसारके भोगोंकी, विषयोंकी, अनुकूल विषयोंकी प्राप्तिमें जो भगवान्की कृपा मानते हैं, यह भगवान्की कृपाका एकांगी दर्शन है और एक प्रकारसे असत्-दर्शन है। भगवान्की कृपा निरन्तर है, सबपर है, सब समय है, बल्कि जहाँ भगवान् हमारे अनुकूल विषय-भोगोंका अपहरण करते हैं, विनाश करते हैं, वहाँ भगवान्की कृपा विशेषरूपसे प्रस्फुटित होती है। जब मनुष्य भगवान्को भूल जाता है, उनकी अवहेलना करता है, जब वह अध्यात्मको, परमार्थको सर्वथा भूलकर जागतिक, लौकिक, स्वार्थकी सिद्धिमें लग जाता है, तब भगवान् कृपा करते हैं। जो पापके प्रवाहमें बह रहा है, भगवान् उसको उस प्रवाहसे बचानेके लिये उसके ऐश्वर्यको, उसकी सफलताको बलात् अपहरण करते हैं। जो वस्तु उसे अभिलषित है, उसे प्राप्त नहीं होने देते और जो वस्तु उसे प्राप्त है, जिसने उसे मोहित कर रखा है, उसे छीन लेते हैं, नष्ट कर देते हैं—
‘यमहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै:।’
यह मानभंग, यह ऐश्वर्य-नाश आदि भगवान्की बड़ी कृपासे होता है। यदि कोई धनका होकर रह रहा है, तो भगवान् चाहते हैं कि वह धनका न होकर हमारा होकर रहे। उसका धन, ऐश्वर्य आदि सब कुछ ले लेते हैं। भगवान् तो चाहते हैं उसे अपनाना। वे उसे अपनी गोदमें लेना चाहते हैं। पर जबतक जगत् उसे अपनाये है, तबतक वह ऐसा मोहमें रहता है कि मानो सारा जगत् ही हमारा है। तबतक उसे भ्रम रहता है कि मानो सारा जगत् ही हमसे प्यार करता है। वह जगत्में चारों ओर आशा लगाये रहता है। उसमें फूलकर वह भगवान्को भूल जाता है। उसमें जगत्का प्रेम, जगत्की ममता, जगत्का बन्धन प्रगाढ़ और विस्तृत होता जाता है। भगवान् उसे दिखाते हैं कि तुम्हारे साथ प्रेम करनेवाला, तुम्हें अपना माननेवाला, तुम्हें आश्रय देनेवाला मेरे अतिरिक्त कोई स्थिति, कोई अवस्था, कोई प्राणी और कोई सम्बन्धी है ही नहीं। ये सब धोखेकी चीजें हैं। वह धोखेकी चीज मान ले इसके लिये भगवान् ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं। जैसे हम आपसे प्रेम करते हैं, आपके लिये प्राण देनेकी बात करते हैं, पर कहीं आपपर कोई लांछन लग जाय, आपका कोई पाप प्रकट हो जाय, जगत् आपसे घृणा करने लगे, आपके पास बैठनेमें लोक-लज्जाका अनुभव होने लगे, उस समय हम आपके पास नहीं बैठ सकेंगे। उस समय बड़ा सुन्दर तर्क देते हुए हम कह देंगे—‘अंदरसे हमलोगोंका प्रेम तो बना ही है, पर बाहर प्रकट करके अपयश लेनेसे क्या लाभ?’ कल जो उसकी बड़ाईमें, उसके यशमें, उसके सुखमें हर समय हिस्सा ले रहे थे; आज वह बुरा आदमी माना गया है, इसलिये उसे अपना स्वीकार नहीं करते। उनका प्रेम, ममत्व, अपनत्व कहाँ चला गया? मनुष्य पाप करता है, पर क्या वह अपनेसे घृणा करता है। श्रीनारदजीने प्रेमका स्वरूप बताया ‘गुणरहितम्’, ‘कामनारहितम्।’ प्रेम गुणरहित और कामनारहित होता है। प्रेम गुण और वस्तुकी अपेक्षा नहीं करता।
सच बात तो यह है कि भोगासक्त संसारवालोंका प्रेम है ही नहीं, सच्चे प्रेमी तो प्रभु हैं, जो गुण नहीं देखते और कामना तो उनके मनमें है ही नहीं। भगवान्का प्रेम ही असली प्रेम है। अतएव भगवान्को छोड़कर भोगोंमें जो मन लगता है, सो बड़े ही दुर्भाग्यकी बात है। मजेकी बात तो यह है कि जगत्में जिन लोगोंके पास जगत्की कुछ वस्तुएँ हैं, वे अपनेको भाग्यवान् मानते हैं और मूर्खतावश और लोग भी उन्हें ‘भाग्यवान्’ कहते हैं। किंतु एक फकीर, जिसके पास जगत्की कोई वस्तु नहीं है और जिनकी उसे कामना भी नहीं है तथा जो अपनी स्थितिमें भगवान्का स्मरण करते हुए सर्वथा निश्चिन्त और मस्त है, उसे लोग गरीब या अभागा कहते हैं और कह देते हैं—‘बेचारेको सुख कहाँ?’ पर जो पदार्थ हमें भगवान्से दूर कर दे और जो नरकानलमें दग्ध करनेमें सहायक हो, उस पदार्थजनित भाग्यशीलताके लिये क्या कहा जाय? गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने कहा है—
सुनहु उमा ते लोग अभागी।
हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी॥
श्रीशिवजी कहते हैं—‘वे अभागे हैं, भाग्य फूटा है उनका जो भगवान्को छोड़कर विषयोंसे प्रेम करते हैं।’ सौभाग्यवान् कौन? जो सबको छोड़कर भगवान्की सेवामें लग जाता है। भरतजीने श्रीलक्ष्मणके भाग्यकी सराहना करते हुए कहा था—
अहह धन्य लछिमन बड़भागी।
राम पदारबिंदु अनुरागी॥
लक्ष्मणके समान कौन बड़भागी है, जिसका श्रीरामके चरणोंमें अनुराग है। श्रीतुलसीदासजीने कहा है—
रमा बिलास राम अनुरागी।
तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥
‘रमाके वैभवको जो रामानुरागी जन वमनके समान त्याग देते हैं, वे ही बड़भागी हैं।’ भोगरूपसे तो लक्ष्मी अलक्ष्मीके रूपमें—दुर्भाग्यके रूपमें ही रहती हैं। उस दुर्भाग्यके रूपको दूर करनेके लिये भगवान् कृपा करते हैं और कृपा करके हमने जिसे सौभाग्य मान रखा है, उसको हर लेते हैं। भगवान्के प्रेमको हरनेवाली सम्पूर्ण चीजोंको भगवान् हर लेते हैं, दूर कर देते हैं। मान गया, धन गया, यश गया, प्रतिष्ठा गयी, सब कुछ चला गया—मनुष्य रोने लगता है, छटपटाने लगता है, पर उस समय दयामय प्रभु मधुर-मधुर मुसकराने लगते हैं, हँसने लगते हैं कि ‘यह मेरा प्यारा बच्चा विपत्तिसे बच गया।’ जिसे हम सम्पत्ति मानते हैं, सचमुच वह विपत्ति ही है।
विपदो नैव विपद: सम्पदो नैव सम्पद:।
विपद् विस्मरणं विष्णो: सम्पन्नारायणस्मृति:॥
‘जगत्की विपत्ति विपत्ति नहीं, जगत्की सम्पत्ति सम्पत्ति नहीं, भगवान्का विस्मरण ही विपत्ति है और भगवान्का स्मरण ही सम्पत्ति है।’
श्रीतुलसीदासजीके शब्दोंमें—
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई।
जब तव सुमिरन भजन न होई॥
जिस कालमें भगवान्का साधन-भजन—उनका मधुर स्मरण नहीं होता, वह काल भले ही सौभाग्यका माना जाय, उस समय चाहे चारों ओर यश, कीर्ति, मान, पूजा होती हो, सब प्रकारके भोग उपस्थित हों, समस्त सुख उपलब्ध हों, पर जो भगवान्को भूला हुआ हो, भगवान्की ओरसे उदासीन हो, तो वह विपत्तिमें ही है—असली विपत्ति है यह। इस विपत्तिको भगवान् हरण करते हैं, अपने स्मरणकी सम्पत्ति देकर। यहाँ श्रीभगवान्की कृपा प्रतिफलित होती है।
जब हम धन-पुत्रकी प्राप्ति, व्यापारकी उन्नति, कमाई, प्रशंसा, शरीरके आराम, अच्छे मकान, कीर्ति, अधिकार आदिको भगवान्की कृपा मान लेते हैं, तब उसे बहुत छोटे-से दायरेमें ले आते हैं और गलत समझते हैं। भगवान्की कृपा यहाँ भी है, परंतु ये समस्त सामग्रियाँ भगवान्की पूजाके उपकरण बनी हुई हों तो। और यदि ये सब भोगसामग्रियाँ, सारी-की-सारी चीजें भगवान्के पूजनका उपकरण न बनकर अपने ही पूजनमें मनुष्यको लगाती हैं, तो वहाँ भगवान्का तिरस्कार होता है, अपमान होता है। वस्तुत: भगवान् इनको इसीलिये देते हैं कि इनके द्वारा भगवान्की पूजा करके मनुष्य कृतार्थ हो जाय, पर ऐसा न करके वह यदि इनका स्वामी बनकर भगवान्को भूल गया, तो वह भोगोंका स्वामी नहीं, भोगोंका किंकर है। भोग उसे चाहे जहाँ ले जाते हैं। वे उसे धर्मच्युत कर देते हैं। वह भोगका गुलाम है। इसलिये भगवान्ने भोगोंको ‘दु:खयोनि’ कहा है। भोगोंपर स्वामित्व हो, मन निगृहीत हो, सारे-के-सारे भोग और अन्त:करण निरन्तर भगवान्की सेवामें लगे हों, तभी भोगोंका स्वामित्व है। ऐसा नहीं है तो भोगका स्वामी कहलाकर भी वह भोगका गुलाम बना हुआ है और जहाँ भोगोंकी गुलामी है, वहाँ भगवान्की कृपा कैसी! भगवान्की कृपा तो वहाँ आती है, जहाँ सारी गुलामी छूटकर केवल भगवान्की दासता होती है। तमाम परतन्त्रता टूट गयी, रह गया केवल भगवान्का चरणाश्रय। वहीं होता है भगवान्की कृपाका प्राकट्य। जितनी-जितनी भोगोंकी वृद्धि होती है, उतनी-उतनी उनकी दासता बढ़ती है। जिसकी जितनी बड़ी ख्याति है, बड़ी कीर्ति है, उसकी उतनी ही अधिक बदनामी होती है; इसलिये भोगबाहुल्य भगवान्की कृपाका लक्षण नहीं है। भगवान्की कृपा तो वहाँ होती है, जहाँ भगवान्का प्रेम है और भगवच्चरणानुराग है। कितने साधक कहते हैं कि ‘अमुक आदमी कितना सुखी हो गया। कितने पैसेवाला हो गया, उसके व्यापार हो गया, आपने उनपर कृपा की। हमारे साथ तो आपका दुर्भाव है।’ पर उन्हें कैसे समझाया जाय कि भोगबाहुल्य तो भगवान्की अकृपाका लक्षण है। तुलसीदासजीने घोषणा की—
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद बिभीषन बंधु भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत-ब्रजबनितनि भे जग मंगलकारी॥
जिसको भगवान् सीताराम प्यारे नहीं हैं, वे यदि प्यारे-से-प्यारे हों, परम सनेही हों, तब भी वे त्याज्य हैं। यदि हम किसीके माता, पिता, भाई, गुरु, स्वामी हैं, तो हमारा यह कर्तव्य है कि हम उन्हें भगवान्में लगानेका प्रयास करें, न कि उन्हें नरकोंमें पहुँचानेका प्रबन्ध कर दें। वह पिता पिता नहीं, वह माता माता नहीं, वह भाई भाई नहीं, वह गुरु गुरु नहीं और वह देवता देवता नहीं जो भगवान्से हटाकर हमें भोगोंमें लगा दे। इसीलिये तुलसीदासजीने कहा—
तुलसी सो सब भाँति परम हित
पूज्य प्रान तें प्यारो।
जातें होय सनेह राम पद
एतो मतो हमारो॥
‘वही परम हितैषी है, वही परम पूज्य है, वही प्राणोंका प्यारा है, जिससे रामके चरणोंमें स्नेह बढ़े, यह हमारा निश्चित मत है।’ भगवान्में मन लगे, भोगोंसे मन हटे। वास्तवमें भोगको प्रोत्साहन देना मनुष्यको बिगाड़ना है, उसे बुरे मार्गमें लगाना है। ऐसे मार्गमें लगा देना तो उसके साथ शत्रुता करनी है। ऐसी कोई वस्तु कोई किसी प्राणीको दे दे कि वह भगवान्को भूल जाय। अमृत भूलकर विष खा ले तो वह मित्र नहीं। उसका मुँह ऊपरसे मीठा है, पर भीतर उसके हालाहल भरा हुआ है। मित्र वह है जो अंदरसे मित्र है और जो हमें सुधार देता है। विषय-भोगोंमें लगानेवाले मित्र कदापि मित्र नहीं। ऐसे ही मित्रके लिये कहा गया है—‘विषकुम्भं पयोमुखम्।’ ऐसे जहर-भरे दुधमुँहे घड़ेके सदृश ऊपरसे मीठे बोलकर विषयोंमें लगानेवाले मित्रोंको छोड़ देनेमें ही कल्याण है। संसारके विषय-भोग ठीक ऐसे ही हैं। वे देखनेमें अमृत लगते हैं, पर परिणाममें विष ही सिद्ध होते हैं। ‘परिणामे विषमिव।’ माता, पिता, गुरु, भाई, मित्र किसीको दूध बताकर विष दे देना, उसका उपकार करना नहीं, बुरा करना है। अतएव सबको स्पष्ट बता देना चाहिये कि इस विषसे बचो। यह मार देगा, यह नरकोंमें डाल देगा। पर यह कहना तो तभी बनता है, जब हम स्वयं इससे बचे हुए हों। असली चीज तो यही है कि भोगोंकी प्राप्ति, भोगोंकी स्पृहा, भोगोंको प्राप्त करनेकी कामना, मकान, मोटर, अधिकार, पद, पाँच आदमी मेरे आगे-पीछे चलें, यह कामना तथा यह सब देखकर मनका ललचाना, यह सब नरकरूप ही कहे गये हैं।
ते नर नरकरूप जीवत जग।
भव-भंजन-पद-बिमुख अभागी॥
इसीलिये वे अभागे हैं, उनका जीवन नरकरूप है। संसारके इन प्रलोभनीय वस्तुओंको दे देना, इनमें लगा देना, इनमें आकर्षण उत्पन्न कर देना, उनकी महत्ता बता देना हितकर नहीं है, अत: उचित नहीं है। यह तो उसके साथ वैर करना है। जिनके पास ये सामग्रियाँ हैं, उनको भी इनकी बुराइयाँ बता देनी चाहिये।
भगवान्की कृपाका आश्रय करें और भगवान्की कृपा जब जिस रूपमें आये, स्वागत करें। यदि वह कृपा हमारा मान भंग करनेवाली हो, इज्जत मिटानेवाली हो, जगत्से सम्पर्क हटानेवाली हो, तब यह समझना चाहिये कि भगवान्का सांनिध्य प्राप्त होनेवाला है। यह संसारका नियम है कि जगत् तभीतक पकड़ता है, जबतक उससे कुछ मिलता रहे। बूढ़े माता-पिताको भी लोग कहते हैं, भगवान् सुन लें तो अच्छा है, अर्थात् ये चल बसें, तो सुख रहे। जगत्के भोग किसीके नहीं हैं। किसीका यथार्थ प्रेम नहीं है। धनमें, मानमें, कीर्तिमें कहीं भी सुख नहीं है। केवल जो आत्मा है, जो हमारा अपना स्वरूप है, जो सदा हमारे साथ है, इस शरीरके नष्ट होनेपर जो हमारे साथ रहेगा, उसीमें सुख है। ये धन, कीर्ति और मानका सुख तो उधार लिया मिथ्या सुख है, हम इन्हें सुखका स्वरूप समझ लेते हैं। यह हमारी भूल है, ये न तो सुख हैं और न ये सदा रहते ही हैं। साधकको चाहिये कि वह निरन्तर भोगोंसे मन हटाता रहे, भोग हमारे शत्रु हैं, यह भाव मनमें बार-बार भरता रहे और प्रेममय—आनन्दमय भगवान्में मन लगाता रहे।
इसके लिये पूरा प्रयत्न करें। भोगोंका नाश हो तो दु:खी न होकर परम सौभाग्य मानें, उसमें सहज सुहृद् श्रीभगवान्की कृपाका अनुभव करें। भगवान् हमारे नित्य सुहृद् हैं। वे कभी अकृपा करना जानते ही नहीं। मलेरिया होनेपर डॉक्टरने कड़वी दवा दे दी, हम मानते हैं कि यह हमारे लाभके लिये है। इसी प्रकार आवश्यक होनेपर भगवान् हमें कड़वी दवा देंगे। डॉक्टरके द्वारा हमारे हितके लिये किये जानेवाले अंगच्छेद (ऑपरेशन)-की भाँति आवश्यकता होनेपर वे हमारा अंग भी काट सकते हैं, पर उसमें हमारा लाभ ही होगा। हमारे भयानक दु:खदायी रोग-दोष और हमारी बीमारी दूर करनेके लिये भगवान् हमपर कृपा कर रहे हैं, यह समझना चाहिये। भगवान्की कृपा समझकर निरन्तर उनका नाम लेता रहे और अपना जीवन भगवान्की इच्छाके अनुकूल बनावे। भगवान् हमारा सारा कार्य करते हैं, वे नित्य हमारा हित ही करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे, यह विश्वास रखें तो निश्चय ही हम निहाल हो जायँगे। हरि: ॐ तत्सत्।