हम भगवान‍्के ही हैं

यह सारा जगत् —जगत‍्के सब चेतनाचेतन प्राणी भगवान‍्से निकले हैं और भगवान् ही सर्वत्र व्याप्त हैं।१ हम सभी जीव भगवान‍्के सनातन अभिन्न अंश हैं।२ भगवान् ही हमारे अभिन्न निमित्तोपादान कारण हैं। सब कुछ वही हैं।३ भगवान् हमारे आत्मा हैं।४ भगवान् ही हमारे प्राण हैं। हमारा जीवन, हमारा प्रेम, हमारा आनन्द, हमारे श्वास-प्रश्वास—सब कुछ भगवान् ही हैं। हम कभी भी, किसी प्रकार भी भगवान् से, भगवान‍्के प्रेमसे, भगवान‍्के आनन्दसे, भगवान‍्की योगक्षेम करनेवाली वृत्तिसे अपनेको अलग नहीं कर सकते। उसकी व्यापकतासे बाहर नहीं जा सकते।

भगवान् हमारे परम अन्तरात्मा हैं—अत: भगवान् हमको जितना यथार्थरूपमें जानते हैं, उतना हम स्वयं अपनेको नहीं जानते। वे हमारे मनके अन्दर छिपी-से-छिपी बातको जानते हैं। वे परम आत्मीय हैं। वे स्वभावसे ही परम सुहृद् हैं। उनका सहायक हस्तकमल सदा ही हमारे सिरपर है, उनकी कृपास्नेहमयी दृष्टिकी सुधावृष्टि अनवरत हमपर हो रही है। वे नित्य-निरन्तर हमारे ऐहिक, पारलौकिक, पारमार्थिक योगक्षेमका वहन करते हैं। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा हमारे सभी काम करनेको वे तैयार हैं; बशर्ते कि हम अपनी मूर्खतावश उनके सहायक हाथको उनके इच्छानुसार कार्य करनेसे रोकें नहीं। फिर हमारे सभी कामोंमें उनका सहायक वरद हस्त काम करेगा—चाहे हमारा वह काम घरमें झाड़ू लगाना हो, चाहे व्यापार करना हो, चाहे सेवा-सहायता करना हो और चाहे पारमार्थिक साधन करना हो। भगवान‍्के लिये छोटे-बड़े सभी काम एक-से हैं। क्षुद्र चींटीके जीवनका संचालन भी वे ही करते हैं और सृष्टिकर्ता ब्रह्माका जीवन भी उन्हींसे चलता है।

हमें इस बातका अनुभव करना चाहिये कि भगवान् सदा हमारे साथ हैं, वे सर्वशक्तिमान्, सर्वात्मा, सर्वलोक-महेश्वर, सर्वातीत होते हुए ही हमपर आत्मीयतापूर्ण अनन्त प्रेम करते हैं। जिस क्षण हमारा यह विश्वास हो जायगा और हम ऐसी अनुभूति करेंगे, उसी क्षण हम समस्त बाधा-विघ्नोंसे मुक्त होकर, सारी बन्धनमयी परिस्थितियों और संकुचित सीमाओंको लाँघकर नित्य निर्भय, निश्चिन्त तथा आनन्द और शान्तिके मूर्तस्वरूप बन जायँगे। सर्वदा स्मरण रखिये कि ‘हम भगवान‍्के ही हैं और भगवान् हमारे ही हैं।’