महामना मालवीयजी और भगवन्नाम-महिमा

(श्रद्धेय पं० श्रीमदनमोहनजी मालवीय महाराजके व्याख्यानका सारांश और उनके नाम-सम्बन्धी कुछ संस्मरण)

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत:

स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-

र्वेदै: सांगपदक्रमोपनिषदै-

र्गायन्ति यं सामगा:।

ध्यानावस्थिततद‍्गतेन मनसा

पश्यन्ति यं योगिनो

यस्यान्तं न विदु: सुरासुरगणा

देवाय तस्मै नम:॥

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं

द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव।

पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदु-

स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम:॥

कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं

पावनं पावनानां।

पाथेयं यन्मुमुक्षो: सपदि परपद-

प्राप्तये प्रस्थितस्य।

विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां

जीवनं सज्जनानां।

बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां

भूतये रामनाम॥

नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।

प्रणामो दु:खशमनस्तं नमामि हरिं परम्॥

सज्जनो! यह प्रयाग-स्थान परम पवित्र प्राचीन तीर्थ है। पृथ्वीमण्डलमें कोई नगर प्रयागके समान प्राचीन नहीं है। ऋग्वेदतकमें, जो संसारका सबसे प्राचीन ग्रन्थ है, प्रयागकी महिमा आयी है। इसीलिये इसे तीर्थोंका राजा कहते हैं। भीष्मने युधिष्ठिरको भगवती भागीरथीका माहात्म्य बतलाते हुए कहा—‘प्रयागमें शरीर छोड़नेकी बड़ी महिमा है।’ मैं भी जब-जब प्रयाग आता हूँ तब-तब गंगाजीको पार करते हुए उनसे प्रार्थना करता हूँ कि ‘माँ! अन्त समयमें मुझे अपनी गोदमें अवश्य स्थान देना।’ प्रयागके आसपास जितने स्थान हैं, उनमें किसी समय देवता और ऋषि बसते थे। इसीलिये इनमेंसे एकका नाम है—देवरिखा। माघमें दस हजार तीर्थ प्रयागमें आकर एकत्र होते हैं। आज हमलोगोंकी अपनी संस्कृति और अपने धर्मके साथ-साथ तीर्थोंमें भी श्रद्धा जाती रही। यह अंग्रेजी शिक्षाका बुरा प्रभाव है।

पुरुषोंकी अपेक्षा हमारी बहिनोंमें अधिक श्रद्धा पायी जाती है। तीर्थ-स्नानके लिये पुरुषोंकी अपेक्षा वे ही अधिक संख्यामें आती हैं।

भगवन्नामकी महिमा आपलोग बहुत बार सुन चुके हैं और आगे भी सुनेंगे। संसारमें बहुत-से भाई कहते हैं—‘नामके उच्चारणसे क्या होता है। भगवान‍्के नामको भूलकर भी एक बार लेनेसे मनुष्य संसार-सागरसे तर जाता है, ऐसा वेद-पुराण कहते हैं। फिर उसे बार-बार रटनेसे क्या लाभ?’ बात बिलकुल ठीक है। संसार-समुद्रसे तारनेके लिये एक ही नाम काफी है। परंतु संतोंने इस मनको पारेसे भी चंचल बताया है—‘यह मन पारद हूँ तें चंचल’। इसे बाँध रखनेके लिये बार-बार नाम लेनेकी आवश्यकता है। बार-बार नामोच्चारण करनेसे जब यह स्थिर हो जायगा, तब एक ही नाम हमारे लिये पर्याप्त होगा। जबतक यह स्थिर नहीं हो जाता, तबतक बार-बार नाम लेना आवश्यक है। वेद-शास्त्र—सबने भगवान‍्के नामकी महिमा गायी है। शुक्लयजुर्वेदका ‘नमस्ते रुद्र मन्यव०’ आदि सारा अध्याय नामकी महिमासे भरा है। पुराणोंमें तो स्थान-स्थानपर नामकी महिमाका उल्लेख मिलता है।

मनुस्मृतिपर कुल्लूक भट्टकी टीका है। उसमें तपका स्वरूप इस प्रकार वर्णित है—

ब्रह्मचर्यं जपो होम: काले शुद्धोऽल्पभोजनम्।

अरागद्वेषलोभाश्च तप उक्तं स्वयम्भुवा॥

अर्थात् ब्रह्मचर्य, जप, होम, समयपर शुद्ध एवं अल्प भोजन करना तथा राग, द्वेष एवं लोभसे रहित होना—इसीको ब्रह्माजीने ‘तप’ कहा है। इसी तपका साधन करनेसे आपलोग नामकी महिमाको जान गये हैं।

भीष्म जब सब धर्मोंका उपदेश कर चुके तब युधिष्ठिरने उनसे प्रश्न किया—

युधिष्ठिर: शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत॥

को धर्म: सर्वधर्माणां भवत: परमो मत:।

किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व १४९। १,३)

‘सब धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म आपको कौन-सा जँचता है! जीव किस मन्त्रका जप करनेसे जन्म-मृत्युके बन्धनसे छूट जाता है!’

इसके उत्तरमें भीष्म बोले—

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम्।

स्तुवन्नामसहस्रेण पुरुष: सततोत्थित:॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम्।

ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम्।

लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदु:खातिगो भवेत् ॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम्।

लोकनाथं महद‍्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम्॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मत:।

यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नर: सदा॥

(महाभारत, अनुशासनपर्व १४९। ४—८)

मनुष्यको चाहिये कि वह निरन्तर सावधान रहकर संसारके स्वामी, देवाधिदेव, अनन्त पुरुषोत्तम भगवान‍्की सहस्रनामके द्वारा स्तुति करे, उन्हीं अव्यय पुरुषका भक्तिपूर्वक नित्य अर्चन करे, उन्हींका ध्यान, उन्हींका स्तवन, उन्हींको नमस्कार एवं उन्हींकी पूजा करे। उन आदि-अन्तसे रहित, समस्त लोकोंके महेश्वर, जगत‍्के अधिनायक, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाले, सारे धर्मोंको जाननेवाले, सारे लोकोंकी कीर्तिको बढ़ानेवाले, लोकनाथ, महद‍्भूत तथा समस्त भूतोंकी उत्पत्तिके कारण भगवान् नारायणका नित्य स्तवन करनेसे मनुष्य समस्त दु:खोंसे तर जाता है। सारे धर्मोंमें श्रेष्ठ धर्म मुझे यही मान्य है कि मनुष्य भक्तिपूर्वक सदा कमलनयन भगवान‍्का स्तुतियोंद्वारा पूजन करे।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि जिनकी स्तुतिका ऊपर विधान किया गया है वे भगवान् कैसे हैं, इसी शंकाके उत्तरमें भीष्मपितामह कहते हैं—

परमं यो महत्तेज: परमं यो महत्तप:।

परमं यो महद‍्ब्रह्म परमं य: परायणम्॥

पवित्राणां पवित्रं यो मंगलानां च मंगलम्।

दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्यय: पिता॥

(महाभारत, अनुशासन पर्व १४९।९-१०)

‘वे भगवान् परम महान् तेज हैं, परम महान् तप हैं, परम महान् ब्रह्म हैं, सबसे श्रेष्ठ गति हैं, पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले हैं, मंगलोंके भी मंगल हैं, देवताओंके भी देवता हैं और भूतप्राणियोंके अविनाशी पिता हैं।’

ऊपरके वर्णनसे हम भगवन्नामकी महिमाको कुछ-कुछ समझ सकते हैं। जो भगवान् ऐसे हैं उनका नाम कितना महान् होगा, इसका हम कुछ-कुछ अनुमान लगा सकते हैं। दूसरे धर्मवाले भी भगवान‍्के नामको जपते हैं। मुसलमान तथा ईसाई भी नामका आदर करते हैं। मुसलमानोंके ९९ मन्त्रोंकी माला तो प्रसिद्ध ही है। परंतु नामकी महिमा जैसी सनातनधर्मके ऋषियोंने समझी, वैसी किसीने नहीं समझी। ऊपर विष्णुसहस्रनामका उल्लेख हम कर ही चुके हैं। महाभारतके उसी (अनुशासन) पर्वमें शिवसहस्रनाम भी है। नामके सम्बन्धमें हमलोगोंकी आदरबुद्धि वैदिक ऋषियों तथा पुराणोंके कालसे चली आती है। मध्ययुग तथा अर्वाचीन कालके संतोंने भी नामकी महिमा बहुत गायी है। गोस्वामी तुलसीदासजी तो नामकी महिमामें बहुत कुछ कह गये हैं। वे कहते हैं—

बरषा रितु रघुपति भगति

तुलसी सालि सुदास।

राम नाम बर बरन जुग

सावन भादव मास॥

आखर मधुर मनोहर दोऊ।

बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥

सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू।

लोक लाहु परलोक निबाहू॥

इसका स्मरण सबके लिये सुलभ एवं सबको सुख देनेवाला है। इससे संसारमें लाभ और परलोकका भी निबाह होता है। ऐसा मधुर यह राम-नाम है। गोसाईंजी महाराज फिर कहते हैं—

कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके।

रामलखन सम प्रिय तुलसी के॥

नर नारायन सरिस सुभ्राता।

जग पालक बिसेषि जग त्राता॥

नामु सप्रेम जपत अनयासा।

भगत होहिं मुद मंगल बासा॥

राम एक तापस तिय तारी।

नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥

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सबरी गीध सुसेवकनि

सुगति दीन्हि रघुनाथ।

नाम उधारे अमित खल

बेद बिदित गुन गाथ॥

गोसाईंजी रामसे भी नामको बड़ा मानते हैं। वे कहते हैं—रामने तो एक तपस्वीकी स्त्री अहल्याका ही उद्धार किया, किंतु नामने तो करोड़ों खलोंकी कुमतिको सुधार दिया। श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, गीध आदि सुसेवकोंको ही श्रेष्ठ गति दी, किंतु नामने तो इतने खलोंका उद्धार किया जिनकी कोई गिनती ही नहीं है।

फिर कहते हैं—

नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं।

करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥

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सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।

बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥

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ब्रह्म राम तें नामु बड़

बर दायक बर दानि।

रामचरित सत कोटि महँ

लिय महेस जियँ जानि॥

इस प्रकार गोसाईंजीने युक्तियोंसे यह सिद्ध कर दिया कि नाम नामीसे भी बड़ा है। गोसाईंजी रामनामकी महिमाको कहते हुए अघाते नहीं। वे फिर कहते हैं—

नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू।

भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥

ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ।

पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥

नामु राम को कलपतरु

कलि कल्यान निवासु।

जो सुमिरत भयो भाँग तें

तुलसी तुलसीदासु॥

राम नाम नरकेसरी

कनककसिपु कलिकाल।

जापक जन प्रहलाद जिमि

पालिहि दलि सुरसाल॥

राम सच्चिदानंद दिनेसा।

नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥

सहज प्रकासरूप भगवाना।

नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥

राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना।

परमानंद परेस पुराना।

जेहि इमि गावहिं बेद बुध

जाहि धरहिं मुनि ध्यान।

सोइ दसरथ सुत भगत हित

कोसलपति भगवान॥

गुरु नानकने भी नामकी महिमामें बहुत कुछ कहा है। वे कहते हैं—

नानक राम नाम बिस्तारा

कंचन भरा मनूरा।

कह नानक सोई नर सुखिया

राम नाम गुन गावे॥

और सकल जग माइया

निरभय पद नहि पावे॥

नाम न जपहु अभाग तुम्हारा।

जुग दाता प्रभु राम हमारा।

कबीरजी भी कहते हैं—

तजि अभिमान लेहु मन मोल।

रामनाम हिरदे महँ तोल॥

अब कहु राम भरोसा तोरा।

तब काहूका कौन निहोरा॥

कहै कबीर जो खोजहु जहाना।

राम समान न देखहु आना॥

कोई गावै कोई सुनै हरीनाम चित लाय।

कह कबीर संसय नहीं अंत परम गति पाय॥

राम जपहु जिय ऐसे ऐसे।

ध्रुव प्रहलाद जपेउ जिअ जैसे॥

राम राम जपि निरमल भए।

जनम जनमके किलिबिष गए॥

यहाँ यह प्रश्न होता है कि जिस रामनामकी इतनी महिमा शास्त्रों और संतोंने एक स्वरसे गायी है वह रामनाम किसका वाचक है? यह रामनाम दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामचन्द्रका ही वाचक है, जो साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा थे और जो त्रेतायुगमें इस धराधाममें अवतीर्ण हुए थे। ‘राम’ का अर्थ शास्त्रोंमें इस प्रकार भी किया गया है—

रमते सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।

अन्तरात्मस्वरूपेण यश्च रामेति कथ्यते॥

अर्थात् जो परमात्मा निराकाररूपसे स्थावर-जंगम सारे भूतप्राणियोंमें रमण कर रहे हैं, वही राम है।

नामकी महिमा मैं आपको कहाँतक सुनाऊँ? अजामिलका आख्यान तो आपने कई बार सुना होगा। वह महान् पापी था। उसने अपने छोटे पुत्रका नाम रख छोड़ा था ‘नारायण’। जब वह मरने लगा तब यमदूत आकर उसके सूक्ष्म शरीरको ले जाने लगे। उसने भयभीत होकर अपने छोटे पुत्रको पुकारा। अन्त समय उसके मुखसे पुत्रके बहाने भी ‘नारायण’ नामका उच्चारण सुन वहाँ भगवान् श्रीविष्णुके दूत उपस्थित हो गये और उसके सूक्ष्म शरीरको यमदूतोंसे छीन लिया। यमदूत दौड़े हुए यमराजके पास पहुँचे और उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इसपर यमराजने कहा कि ‘भूलसे भी भगवान‍्का नाम लेनेवालेको हम नहीं पकड़ सकते।’ क्योंकि ‘यतस्तद्विषया मति:।’ जिस वस्तुका हम नाम लेते हैं उसीके आकारका हमारा मन हो जाता है। जब हम किसी बधिकका नाम लेते हैं तो हमारे सामने उस बधिकका चित्र खड़ा हो जाता है। सतीका नाम लेनेसे सतीका आदर्श हमारे ध्यानमें आ जाता है। साधुका नाम लेनेसे हमें साधुका ध्यान होता है। हलवाईका नाम लेनेसे हमें तुरंत पूरी-कचौरीका खयाल हो जाता है। ज्योतिषीका नाम लेनेसे हमें पत्रा खोलकर फलादेश कहते हुए ज्योतिषीका ध्यान हो जाता है। इसी प्रकार परमात्माका नाम लेनेसे अन्य सब विषयोंसे हमारा ध्यान हट जायगा और हमारी परमात्मविषयक मति हो जायगी। ‘शिव-शिव’ कहते ही हमारे सामने मंगलका रूप खड़ा हो जाता है। शिवका अर्थ है—मंगल, आनन्दका बधावा। शिव कहते ही हमारे मनमें आनन्दका बधावा बजने लगता है। ‘ॐ नम: शिवाय’ मन्त्रका उच्चारण करते ही शिवजीका मन्दिर ध्यानमें आ जाता है। मैं जब मृत्युंजय मन्त्रका जप करने लगता हूँ, उस समय मेरा मन हठात् भगवान् विश्वनाथके दरबारमें पहुँच जाता है, शरीरसे अन्यत्र रहते हुए भी मैं अपनेको मनसे वहीं पाता हूँ। उस समय मुझे और कोई बात याद नहीं रहती। परमात्माका नाम लेनेसे हमें उस दीनोपकारी, सर्वव्यापक, त्रिकालसत्, जगत‍्की रचना-पालन और संहार करनेवाले महान् तत्त्वका ध्यान हो आता है।

एक अनंत त्रिकाल सच,

ब्यापक शक्ति दिखाय।

सिरजत पालत हरत जग,

महिमा बरनि न जाय॥

संसारभरको नियन्त्रणमें रखनेवाली एक महान् शक्ति है, जो अनन्त है, तीनों कालोंमें सत्य है, सदा सब जगह व्याप रही है। उसीने सबको बनाया है, वही सबका पालन करती है और वही सबका संहार करनेवाली है। उसीके बलसे सारे नक्षत्र घूम रहे हैं, उसीकी शक्तिसे संसारके सारे व्यवहार चलते हैं। वह थी भी, रहेगी भी और है भी। उसकी महिमाका वर्णन कौन कर सकता है? भगवान‍्का नाम लेनेसे हमें इस शक्तिका ध्यान आयेगा। फिर वह शक्ति कैसी है? ‘पवित्राणां पवित्रम्’ पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाली है। उसके सामने किसी मलिन वस्तुका ध्यान ही नहीं आयेगा, क्योंकि वह पवित्रतम है। उसका नाम लिया नहीं कि मनका पाप भागा। जिस प्रकार लालटेन देखते ही चोर भाग जाते हैं, उसी प्रकार भगवन्नामरूप दिव्य प्रकाशके सामने पापरूपी चोर ठहर नहीं सकते। अपने बापके सामने क्या कोई पाप कर सकता है? अपने पिताकी मौजूदगीका ध्यान आते ही मन पापसे हट जाता है। फिर भगवान् तो जगत‍्के पिता हैं, पिताओंके भी पिता हैं और वे सब जगह मौजूद हैं। उनका ध्यान होनेपर क्या पाप ठहर सकते हैं?

हमने प्रारम्भमें कहा था कि कुछ लोग यह शंका करते हैं कि भगवान‍्का नाम बार-बार लेनेसे क्या लाभ है? इसका उत्तर हम पहले दे चुके हैं। फिर भी इस सम्बन्धमें कुछ कहते हैं। बात यह है कि रात-दिनके २४ घंटोंमें हमारा जो कुछ है, सब उन्हींकी कृपासे है। उनके बिना हमारा कुछ भी नहीं है। गोसाईं तुलसीदासजीने विनय-पत्रिकामें कहा है—

हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों।

साधन-धाम बिबुध दुरलभ तनु

मोहि कृपा करि दीन्हों॥

कोटिहुँ मुख कहि जात न प्रभुके,

एक एक उपकार।

तदपि नाथ कछु और माँगिहौं,

दीजै परम उदार॥

तुलसीदासजी कहते हैं—हे प्रभो! आपने इस दासपर बड़ा अनुग्रह किया जो इसे देवताओंको भी दुर्लभ, यह मनुष्य-देह दिया। हमारे यदि करोड़ मुख हों तो भी हम भगवान‍्के उपकारोंका वर्णन नहीं कर सकते। फिर भी मनुष्य इतना मूर्ख है कि ऐसे परम दयालु प्रभुको भी वह क्षणमात्र भी नहीं भजता। इस मनको साढ़े तेईस घंटे मनमानी तौरपर उछल-कूद करने दो, कम-से-कम आधे घंटे तो इसे बाँधकर रखो। जिस समय तुम भगवान‍्के सहस्रनामका पाठ करोगे, कम-से-कम उस समय तो तुम्हें और-और बातोंका ध्यान नहीं आयेगा, भगवान‍्का ही ध्यान आयेगा। तेज बुखारकी हालतमें जबतक हमारे सिरमें बर्फकी पट्टी बँधी रहेगी, तबतक हमें सुख और शान्ति मिलती रहेगी। ज्यों ही हमने उसपर बर्फ रखना छोड़ा कि फिर दाह शुरू हो जायगा। इसी प्रकार जितने क्षणोंतक हम भगवान‍्के मंगलमय नामकी आवृत्ति करते रहेंगे, तबतक हमें अपार शान्ति और आनन्द मिलता रहेगा और हमारा मन पाप और दोषोंसे बचा रहेगा। इसलिये कम-से-कम दिनमें दो बार दस-दस, पंद्रह-पंद्रह मिनटतक भी यदि हम नाम-स्मरणका अभ्यास करेंगे तो उससे हमें मनको निगृहीत करनेमें बड़ी सहायता मिलेगी। मैं जिस समय विष्णुसहस्रनामका पाठ करता हूँ, उस समय मेरी वृत्तियाँ सब ओरसे खिंचकर भगवान‍्में लग जाती हैं। मनुष्य भगवान‍्के स्मरणमात्रसे निर्भय हो जाता है। सप्तशतीमें कहा है—

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।

‘दुर्गे! रक्षा करो।’ यह कहते ही मनमें शक्ति आ जाती है, धर्ममें प्रवृत्ति होती है। इसलिये हम सबको चाहिये कि भगवान‍्के नामका नित्य नियमपूर्वक जप करें।

जप किस प्रकार होना चाहिये, इसका आदर्श आपलोग संसारके सामने रख रहे हैं। ऐसा तुलसीदासजी महाराजने कहा है—

पय अहार फल खाइ जपु

रामनाम षटमास।

सकल सुमंगल सिद्धि सब

करतल तुलसीदास॥

आपलोग वही कर रहे हैं। राग-द्वेष-लोभको छोड़कर, जीभके चटोरेपनको त्यागकर तपस्या करनेसे और साथ-ही-साथ भगवान‍्के नामका जप करनेसे किस पापीका पाप नहीं छूटेगा और किस पुण्यात्माका पुण्य नहीं बढ़ेगा? अत: यथालाभसंतुष्ट साधकलोग फिर इस यज्ञमें शामिल हों, यही मेरी आकांक्षा है।

नाम-स्मरणकी आवश्यकता

(गीतावाटिका, गोरखपुरके अखण्ड हरिनाम-संकीर्तन-यज्ञमें दिये हुए महामना पं० मदनमोहनजी मालवीयके व्याख्यानका सारांश)

आजकल नाम-जपपर बहुत जोर दिया जाता है। आप सब लोग भी भगवन्नामके जप और कीर्तनमें ही लगे हुए हैं। किंतु आप यह तो बतलाइये कि नाम-जप क्यों करना चाहिये? इससे क्या लाभ है? लोग कहते हैं, भगवान‍्का नाम लेनेसे पाप कटते हैं, परंतु इसमें युक्ति क्या है? आपमेंसे कोई भी इसका उत्तर दें। बात यह है कि हम जिस समय किसी वस्तुका नाम लेते हैं तो तत्काल हमें उसकी आकृति और गुण आदिका भी स्मरण हो जाता है। जब हम ‘कसाई’ शब्दका उच्चारण करते हैं तो हमारे मानसिक नेत्रोंके सामने एक ऐसे व्यक्तिका चित्र अंकित हो जाता है जिसकी लाल-लाल आँखें हैं, काला शरीर है, हाथमें छुरा है और बड़ा क्रूर स्वभाव है। ‘वेश्या’ कहते ही हमारे हृदयपटलपर वेश्याकी मूर्ति अंकित हो जाती है। इसी प्रकार जब हम भगवान‍्का नाम लेते हैं तो सहसा हमारे चित्तमें भगवान‍्के दिव्य रूप और गुणोंकी स्मृति जाग्रत् हो जाती है। भगवन्नाम-स्मरणसे चित्त अनायास ही भगवदाकार हो जाता है। भगवदाकार चित्तमें भला पाप-तापके लिये गुंजाइश कहाँ है। इसीलिये नाम-स्मरण पापनाशकी अमोघ ओषधि है।

बिना जाने भगवान‍्का नाम लेनेसे भी किस प्रकार पाप नष्ट हो जाते हैं, इसके विषयमें श्रीमद्भागवतके छठे स्कन्धमें आया हुआ अजामिलका अद‍्भुत प्रसंग प्रख्यात है। मरते समय मुखसे ‘नारायण’ शब्द निकलते ही वहाँ विष्णुभगवान‍्के पार्षद उपस्थित हो गये। उन्होंने तुरंत ही उसे यमदूतोंके पाशसे छुड़ा लिया। जब यमदूतोंने उसके पापमय जीवनका वर्णन करते हुए उसे यमदण्डका पात्र बतलाया तो भगवान‍्के पार्षदोंने उनके कथनका विरोध करते हुए कहा—

अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि।

यद् व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरे:॥

एतेनैव ह्यघोनोऽस्य कृतं स्यादघनिष्कृतम्।

यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम्॥

सर्वेषामप्यघवतामिदमेव सुनिष्कृतम्।

नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मति:॥

(श्रीमद्भागवत ६। २। ७-८,१०)

‘इसने तो अपने करोड़ों जन्मोंके पापोंका प्रायश्चित्त कर दिया, क्योंकि इस समय इसने विवश होकर भगवान‍्का मंगलमय नाम उच्चारण किया है। इसने जो ‘नारायण’ यह चार अक्षरोंका नाम उच्चारण किया है, इतनेसे ही इस पापीके समस्त पापोंका प्रायश्चित्त हो गया। समस्त पापियोंके लिये भगवान् विष्णुका नाम लेना ही सबसे अच्छा प्रायश्चित्त है, क्योंकि ऐसा करनेसे भगवद्विषयक बुद्धि होती है।’

विष्णुदूतोंके इस प्रकार समझानेपर यमराजके सेवक यमलोकको चले गये और वहाँ ये सब बातें धर्मराजको सुनाकर उन्होंने उनसे पूछा कि महाराज! इस लोकमें धर्माधर्मका शासन करनेवाले कितने अधिकारी हैं और हमें किसकी आज्ञामें रहना चाहिये? भला, ये दिव्य पुरुष कौन थे और उस महापापीको हमारे पाशसे छुड़ाकर क्यों ले गये, तब यमराजने कहा—

परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च

ओतं प्रोतं पटवद्यत्र विश्वम्।

(श्रीमद्भागवत ६। ३। १२)

इत्यादि। अर्थात् मेरे भी ऊपर एक और स्वामी है, जो समस्त स्थावर-जंगमका शासक है और जिसमें यह सम्पूर्ण जगत् ओत-प्रोत है। उन सर्वतन्त्र स्वतन्त्र श्रीहरिके ‘दूत’ जो उन्हींके समान रूप और गुणवाले हैं, लोकमें विचरते रहते हैं और श्रीहरिके भक्तोंको, उनके शत्रु और मृत्यु आदि सब प्रकारकी आपत्तियोंसे बचाते रहते हैं। संसारमें मनुष्यका सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह नाम-जपादिके द्वारा भगवान‍्के चरणोंमें भक्ति करे। देखो, यह भगवन्नामोच्चारणका ही माहात्म्य है कि अजामिल-जैसा पापी भी मृत्युके पाशसे मुक्त हो गया।

महाभारत, अनुशासनपर्वके विष्णुसहस्रनाम प्रसंगमें पितामह भीष्मने भगवान‍्के सहस्रनामोंके पाठको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाकर यह कहा—

‘भगवान् ही सबसे अधिक पूजनीय देव हैं और भगवन्नामस्मरण ही सबसे बड़ा धर्म और तप है।’

भगवन्नामकी महिमा ऐसी ही विचित्र है। इसके उच्चारणमात्रसे ग्रह, नक्षत्र एवं दिक्शूलादिके दोष निवृत्त हो जाते हैं। मुझको मेरी माताजीने यह आशीर्वादात्मक वरदान दिया था कि ‘तू यात्रा आरम्भ करनेसे पूर्व ‘नारायण’ इस नामका उच्चारण कर लिया कर, फिर कोई विघ्न नहीं होगा।’ माताजीके इस आशीर्वादसे मुझे इसका प्रत्यक्ष अनुभव है। मैं जिस समय ‘नारायण’ इस प्रकार उच्चारण करके यात्रा आरम्भ करता हूँ तो सारे विघ्न दूर खड़े रहते हैं।

यही बात श्रीमद्भागवतके ‘नारायणकवच’ नामक प्रसिद्ध स्तोत्रमें भी बतलायी गयी है। यह स्तोत्र भी भागवतके छठे स्कन्धमें ही है। वहाँ कहा है—

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।

सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा॥

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।

प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये न: श्रेय: प्रतीपका:॥

(६। ८। २७-२८)

‘ग्रह, नक्षत्र, मनुष्य, सरीसृप, हिंस्र जीव अथवा पापोंसे हमें जो भय प्राप्त हो सकते हैं तथा हमारे श्रेयोमार्गके जो-जो प्रतिबन्ध हैं, वे इस भगवन्नामरूप अस्त्र (कवच)-का कीर्तन करनेसे क्षीण हो जायँ।’

नाम लेनेसे मनुष्यके सारे पाप उसी प्रकार कट जाते हैं जैसे दूध डालनेसे चीनीका मैल कट जाता है। नामका प्रभाव हमारे चित्तको सर्वथा व्याप्त कर लेता है। जिस प्रकार जलमें तेलकी एक बूँद डालनेपर भी वह सारे जलके ऊपर फैलकर उसे ढक लेती है, उसी प्रकार अर्थानुसंधानपूर्वक किया हुआ थोड़ा-सा भी नाम-जप मनुष्यके सारे पापोंको नष्ट कर देता है। अत: नाम-जपसे पापका नाश होकर दिव्य शान्ति प्राप्त होती है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।

महामना मालवीयजीके कुछ भगवन्नाम-सम्बन्धी संस्मरण

(१) महामना एक बार गोरखपुर पधारे थे और मेरे पास ही दो-तीन दिन ठहरे थे। उनके पधारनेके दूसरे दिन प्रात:काल मैं उनके चरणोंमें बैठा था। वे अकेले ही थे। बड़े स्नेहसे बोले—“भैया! मैं तुम्हें आज एक दुर्लभ तथा बहुमूल्य वस्तु देना चाहता हूँ। मैंने इसको अपनी मातासे वरदानके रूपमें प्राप्त किया था। बड़ी अद‍्भुत वस्तु है। किसीको आजतक नहीं दी, तुमको दे रहा हूँ। देखनेमें चीज छोटी-सी दीखेगी पर है महान् ‘वरदान-रूप’।” इस प्रकार प्राय: आधे घंटेतक वे उस वस्तुकी महत्तापर बोलते गये। मेरी जिज्ञासा बढ़ती गयी। मैंने आतुरतासे कहा—‘बाबूजी! जल्दी दीजिये, कोई आ जायँगे।’

तब वे बोले—‘लगभग चालीस वर्ष पहलेकी बात है। एक दिन मैं अपनी माताजीके पास गया और बड़ी विनयके साथ उनसे यह वरदान माँगा कि मुझे आप ऐसा वरदान दीजिये, जिससे मैं कहीं भी जाऊँ सफलता प्राप्त करूँ।’

“माताजीने स्नेहसे मेरे सिरपर हाथ रखा और कहा—‘बच्चा! बड़ी दुर्लभ चीज दे रही हूँ। तुम जब कहीं भी जाओ तो जानेके समय ‘नारायण’, ‘नारायण’ उच्चारण कर लिया करो। तुम सदा सफल होओगे।’ मैंने श्रद्धापूर्वक सिर चढ़ाकर माताजीसे मन्त्र ले लिया। हनुमानप्रसाद! मुझे स्मरण है, तबसे अबतक मैं जब-जब चलते समय ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण करना भूला हूँ, तब-तब असफल हुआ हूँ। नहीं तो, मेरे जीवनमें—चलते समय ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण कर लेनेके प्रभावसे कभी असफलता नहीं मिली। आज यह महामन्त्र परम दुर्लभ वस्तु मेरी माताकी दी हुई महान् वस्तु तुम्हें दे रहा हूँ। तुम इससे लाभ उठाना।” यों कहकर महामना गद‍्गद हो गये।

मैंने उनका वरदान सिर चढ़ाकर स्वीकार किया और इससे बड़ा लाभ उठाया। अब तो ऐसा हो गया है कि घरभरमें सभी इसे सीख गये हैं। जब कभी घरसे बाहर निकला जाता है, तभी बच्चे भी ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण करने लगते हैं। इस प्रकार रोज ही किसी दिन तो कई बार ‘नारायण’ की और साथ ही पूज्य माताजीकी पवित्र स्मृति हो जाती है।

(२) महामनाके एक पुत्र बड़े अर्थ-संकटमें थे। उनको महामनाने यह लिखा “तुम आर्त होकर विश्वाससे गजेन्द्र-स्तुतिका पाठ करो, इससे तुम्हारा संकट दूर हो जायगा। फिर एक पत्रमें उनको लिखा—‘भगवान् पर विश्वास रखो, धैर्य मत छोड़ो और गजेन्द्र-स्तुतिका आर्तभावसे विश्वासपूर्वक पाठ करो*।’ मैं एक बार नाकतक ऋणमें डूब गया था, गजेन्द्र-स्तुतिके पाठसे मैं ऋणमुक्त हो गया, तुम भी इसका आश्रय लो।” अपने कष्टमें पड़े पुत्रको बिना पूर्ण विश्वासके कौन पिता ऐसा लिख सकता है।