मानव-जीवनका उद्देश्य और छात्रों तथा सरकारसे प्रार्थना

मनुष्य-जीवनका प्रधान और एकमात्र उद्देश्य है, भगवत्प्राप्ति। इसीको ‘मोक्ष’, ‘मुक्ति’ या ‘आत्म-साक्षात्कार’ कहते हैं। अन्यान्य योनियोंमें इस उद्देश्यकी सिद्धि नहीं होती; इसीलिये इस मानव योनिकी विशेष महत्ता है और इसीलिये अनुभवी, ज्ञानी, सर्वभूतोंके हितमें रत महात्मा ऋषियों-मुनियोंने जीवनके आरम्भसे ही नहीं, गर्भाधानकालसे ही, गर्भाधानको भी एक पवित्र संस्कारका रूप देकर मानव-जीवनको ब्रह्मप्राप्ति या भगवत्प्राप्तिका साधन बनानेका प्रयत्न किया है। इसीसे हमारे यहाँ चार वर्ण और चार आश्रमोंका विधान है और इसीलिये कठोर संयम तथा त्याग-तपस्या एवं कर्तव्य-पालनको मुख्य बनाकर जीवन-यापन करनेकी विधियोंका निर्माण हुआ है। इसीलिये हमारा पुरुषार्थ जीवनका ध्येयोपयोगी साधन कामोपभोगपरक नहीं है—वरं धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके रूपमें चार तत्त्वोंसे ग्रथित है। जगत‍्में अर्थ, काम (भोग)-की आवश्यकता है, इसलिये उसकी अवहेलना नहीं है। परंतु वह अर्थ, काम (भोग) स्वच्छन्द नहीं है; वह है धर्मके द्वारा अर्जित और संयमित-नियमित। इसीलिये उसका परिणाम ‘मोक्ष’ है। धर्मसे अनियन्त्रित यथेच्छ अर्थ और काम तो महान् अनर्थकारी, दु:खोत्पादक (गीताकी भाषामें ‘दु:खयोनि’) जीवनको पतनके गम्भीर गर्तमें गिरानेवाला होता है। वह मानवको मानवतासे गिराकर क्रूर, पिशाच और भोग-प्रमत्त असुरके रूपमें परिणत कर मानव-जगत‍्को हिंसामयी क्रूर वधस्थली बना देता है। आज सर्वत्र यही हो रहा है और यह मोक्षकामनाशून्य तथा धर्मसे अनियन्त्रित स्वच्छन्द अर्थ-कामकी अभिलाषा ही अवश्यम्भावी दुष्परिणाम है। इसलिये मानवको अपने जीवनके प्रधान लक्ष्यको तो कभी भूलना ही नहीं चाहिये। श्रीमद्भागवतमें अवधूतके वाक्य हैं—

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते

मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर:।

तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु याव-

न्नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात्॥

(११। ९। २९)

‘अर्थात् यह मनुष्य-शरीर यद्यपि अनित्य है, मृत्यु सदा इसके पीछे लगी रहती है, तथापि यह है इतने महत्त्वका कि परम पुरुषार्थ—मोक्षकी प्राप्ति इसी शरीरसे हो सकती है। इसलिये अनेक जन्मोंके बाद इस अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीरको पाकर बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह शीघ्र-से-शीघ्र मृत्युके पहले ही मोक्ष-प्राप्तिका प्रयत्न कर ले। इस जीवनका मुख्य उद्देश्य मोक्ष ही है। विषय-भोग तो सभी योनियोंमें प्राप्त हो सकते हैं, इसलिये उनके संग्रहमें यह अमूल्य जीवन नहीं खोना चाहिये।’

संसारके अर्थ-भोगकी उपेक्षा नहीं; परंतु वही जीवनका लक्ष्य नहीं है। उसकी वहाँतक आवश्यकता है, जहाँतक वह धर्म-सेवा, लोक-सेवाका हेतुभूत, सबके दु:खका नाशक और सब जीवोंके सुखका साधन, तथा धर्म-न्याय एवं अपने वर्णाश्रमानुकूल जीवन-निर्वाहके अनुरूप हो, ऐसा अर्थ-भोग भी हो, केवल इन माध्यमोंके द्वारा ही, और भगवत्पूजाके लिये ही—भगवत्प्रीत्यर्थ ही, भगवान‍्की प्रसन्नताके हेतु ही। फिर यदि वह प्रारब्धवश प्रचुर मात्रामें हो तो आपत्ति नहीं और अल्प मात्रामें हो तो भी क्षोभका कारण नहीं। क्योंकि उसका उपयोग यथेच्छ भोगमें तो करना ही नहीं है, उसका उपयोग होगा भगवत्-सेवामें, और होगा उपर्युक्त धर्म-सेवा, लोक-सेवा आदि शुभ तरीकोंसे ही। इसीलिये ऐसे धनमें किसीके अर्थापहरणका, चोरी-डकैतीका, चोरबाजारी, घूसखोरी, अनाचार-भ्रष्टाचारका तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि यहाँ तो प्रत्येक क्रिया ही धर्मार्थ, यज्ञार्थ, भगवत्-सेवार्थ करनी है और जबतक ऐसा नहीं होगा, जबतक स्वच्छन्द कामोपभोगके लिये, इन्द्रिय-तृप्तिके लिये, प्रबल-भोगवासनाकी पूर्तिके लिये अज्ञानान्ध होकर अर्थ-भोगका किसी भी प्रकारसे अर्जन और संग्रह-संचय होता रहेगा, तबतक यह पाप बन्द नहीं हो सकता, चाहे उसका रूप कैसा ही क्यों न रहे। परस्वापहरण होगा ही—चाहे वह गैरकानूनी हो, व्यक्तिके नामपर हो, राष्ट्रके नामपर हो, विश्वहितके नामपर हो, साम्यवादके सिद्धान्तसे हो, मार्क्सवादके मतसे हो या अन्य किसी भी उच्च या अत्यन्त नीच भावनासे हो। भावनाके अनुसार उसके स्वरूपमें कुछ तारतम्य अवश्य होगा, परंतु भोगवासना-जनित कार्य विशुद्ध भगवत्सेवा या लोक-सेवाका कभी नहीं हो सकता, यह सिद्धान्त अटलरूपसे स्वीकार करना पड़ेगा। इसीसे हमारे यहाँ भोग-वासनाके बदले मोक्षको जीवनकी कामना माना गया, इसीलिये प्रत्येक क्रियाके साथ धर्मका सम्बन्ध जोड़ा गया और इसीलिये ‘अधिकार’ के बदले ‘कर्तव्य’ को प्रधानता दी गयी है एवं इसीलिये धर्मका स्वरूप बतलाते हुए कहा गया—

यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:।

(वैशेषिकदर्शन सू० २)

‘जिसके द्वारा अभ्युदय और नि:श्रेयसकी सिद्धि हो, वह धर्म है।’ अभ्युदयका अभिप्राय है—ऐहिक उन्नति, अर्थात् ऐसा भौतिक अभ्युदय, जिससे सबके दु:खोंका नाश हो, सबको सुख मिले, जीवन-जगत‍्के सभी प्राणी सुविधा प्राप्त करें, किसीके साथ अन्याय, पक्षपात न हो और किसीके भी किसी प्रकारके भी न्याय्य स्वत्वपर आघात न पहुँचे तथा सबके सुखसम्पादनके साथ ही इस धर्मका सेवन करनेवाला भी सुखी हो, वह भी जीवनमें सुख-सुविधाका उपभोग करे। पर यही धर्म नहीं है। जिसका फल परमकल्याण या मोक्षकी सिद्धि हो, जो जीव-जीवनकी अनादिकालीन साधको पूरी कर उसे आत्यन्तिक सुख-शान्तिकी स्थितिमें—आत्माके निर्मल शुद्ध सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें पहुँचा दे, वह धर्म है। तभी मानव-जीवनकी सफलता है और तभी धर्मका यथार्थ पालन हुआ तथा उसके महान् फलकी प्राप्ति हुई। बस, इसी उद्देश्यसे मानव-जीवनका आरम्भ है और इसी उद्देश्यकी पूर्तिके लिये जन्म तथा शिशुपनसे लेकर मरणपर्यन्त उसकी सारी चेष्टा और क्रियाओंका होना आवश्यक है। आर्य-संस्कृतिके इसी महान् लक्ष्यको लेकर मानवको तन-मन-वचनसे सावधान होकर धर्ममय जीवन बिताना है। श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—

धर्म आचरित: पुंसां वाङ्मन:कायबुद्धिभि:।

लोकान् विशोकान् वितरत्यथानन्त्यमसंगिनाम्॥

(श्रीमद्भागवत ४। १४। १५)

‘मनुष्य यदि मन, वाणी, शरीर और बुद्धिसे धर्मका आचरण करता है तो वह धर्म उसे शोकरहित दिव्य लोकोंकी प्राप्ति कराता है और यदि धर्म करनेवाले पुरुष स्वर्गादि लोकोंके भोगोंमें आसक्त नहीं होते तो उन्हें वही धर्म मोक्षकी प्राप्ति करवा देता है।’

धर्म वही है जो जगत‍्के परम कल्याणके साथ ही अपना कल्याण करनेवाला हो, वही धर्म भगवान‍्की पूजा बनता है और उसीसे परम सिद्धि—मोक्षकी प्राप्ति होती है। अतएव बालकपनसे ही धर्मपालनका अभ्यास करना चाहिये। इसीलिये हमारे यहाँ गुरुकुल-निवास तथा ब्रह्मचर्याश्रमकी सुन्दर व्यवस्था है। ब्रह्मचर्याश्रमका अभिप्राय ही है—विद्याध्ययनके साथ-ही-साथ इन्द्रिय और मनके संयमकी क्रियात्मक शिक्षा प्राप्त करना और फिर अपने वर्णाश्रमोचित सत्कर्मके द्वारा विश्वव्यापी प्रभुकी सेवाके लिये योग्यता प्राप्त करना एवं सेवामें संलग्न हो जाना। भगवान‍्ने कहा है—

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(१८। ४६)

‘जिस परमात्मासे समस्त भूतोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरको अपने स्वाभाविक कर्मके द्वारा पूजकर मनुष्य सिद्धिको—मोक्षको प्राप्त होता है।’ इसी स्वकर्मद्वारा भगवान‍्की पूजाके लिये, ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये बालकको ब्रह्मचर्याश्रममें तैयार होना—ब्रह्मचर्यके कठोर नियमोंका बड़ी श्रद्धा तथा आदर-बुद्धिसे पालन करना पड़ता है। वहाँके कुछ बड़े ही सुन्दर नियम मनु महाराज बतलाते हैं—

नित्यं स्नात्वा शुचि: कुर्याद् देवर्षिपितृतर्पणम्।

देवताभ्यर्चनं चैव समिदाधानमेव च॥

वर्जयेन्मधु मांसं च गन्धं माल्यं रसान् स्त्रिय:।

शुक्तानि यानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम्॥

अभ्यंगमंजनं चाक्ष्णोरुपानच्छत्रधारणम्।

कामं क्रोधं च लोभं च नर्तनं गीतवादनम्॥

द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथा नृतम्।

स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च॥

(मनु० २। १७६—१७९)

‘ब्रह्मचारी प्रतिदिन स्नान करके शुद्ध होकर देवता, ऋषि और पितरोंका तर्पण करे, देवताओंकी भलीभाँति पूजा करे और सुबह-शाम समिधाके द्वारा हवन करे। ब्रह्मचारी मधु (मदिरा) और मांसका त्याग करे, इत्रादि सुगन्ध द्रव्य, पुष्पोंकी मालाएँ, शर्करा आदि रस तथा स्त्रीका सर्व प्रकारसे परित्याग करे। जो वस्तुएँ सहज मधुर होनेपर भी किसी दूसरे संयोगसे विकृत हो जाती हैं, ऐसी शुक्त वस्तुओं—दही इत्यादिका त्याग करे और प्राणियोंकी कभी किसी प्रकार हिंसा न करे। तेल लगाना, आँखोंमें काजल या सुरमा डालना, जूते पहनना, छाता लगाना, काम-क्रोध-लोभके वश होना, नाचना, गाना, बजाना, जुआ आदि खेलना, परचर्चा करना, कलह करना, असत्य बोलना, स्त्रियोंकी ओर देखना, उनका आलिंगन करना, दूसरेकी बुराई करना—इन सबसे ब्रह्मचारी सदा दूर रहे।’ इस प्रकार इन्द्रियसंयमका अभ्यास करके बुद्धिको स्थिर करे। भगवान‍्ने कहा कि जिस पुरुषकी इन्द्रियाँ वशमें होती हैं, उसीकी बुद्धि स्थिर होती है—

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

(गीता २। ६१)

हमारे शास्त्रकारोंने कहा है—

आपदां कथित: पन्था इन्द्रियाणामसंयम:।

तज्जय: सम्पदां मार्गो येनेष्टं तेन गम्यताम्॥

‘इन्द्रियोंके असंयमको विपत्तिका तथा उनपर विजय प्राप्त कर लेनेको ही सम्पत्तिका मार्ग कहा गया है। इन दोनों पथोंपर विचार करके ही मनुष्योंको लाभदायक मार्गपर चलना चाहिये।’

प्राचीन युगके इस ब्रह्मचर्याश्रमके संयमित छात्रजीवनके साथ आजके विश्वविद्यालय और महाविद्यालयोंसे सम्पर्कित छात्रावासोंके छात्र-जीवनकी तुलना कीजिये। शरीरकी शुद्धि तथा देव-ऋषि-पितृतर्पण एवं हवनकी तो कल्पना ही नहीं, शरीरकी सफाई अपवित्र वस्तुओंके द्वारा अवश्य की जाती है। मद्य, अंडे और मांस-सेवनका शौक बढ़ाया जाता है। इत्र नहीं, परंतु शराब मिले अन्यान्य सुगन्धित-द्रव तथा शुष्क पदार्थोंका सिंचन-लेपन आवश्यक है। शर्करादि रसकी बात दूर रही, अपवित्र और स्वास्थ्यनाशक रसोंका सेवन किया जाता है। किसीकी भी जूठन खानेमें कोई हानि नहीं मानी जाती। प्राणियोंकी हिंसा तो शौकसे की जाती है और शिक्षालयोंकी अनुसन्धान तथा प्रयोगशालाओंमें भी अबाध प्राणिहिंसा होती है। काजल-सुरमा तो असभ्यताके भयसे नहीं डाला जाता, पर तैलाभ्यंग तथा अन्यान्य बुरी चीजोंका इस्तेमाल होता है। जूते तो समय-समयके लिये कई रखे जाते हैं। छातेके साथ ही पानीसे बचानेवाले कोट तथा हैट आदिका व्यवहार होता है। काम-क्रोध-लोभको तो प्रकारान्तरसे जागृतिके, विकासके या उन्नतिके लक्षण ही स्वीकार कर लिया गया है। नाचना, गाना, बजाना शिक्षाक्रममें आ गया है, जुए भी कई प्रकारके चलते हैं। परचर्चा, परनिन्दा तो अखबारी अध्ययनका प्राण ही है, असत्य-भाषण चातुरी है। परायी बुराई भी व्यक्तिगत या दलगत लाभके लिये आवश्यक है। सिनेमा देखनेवाले तथा सहशिक्षा प्राप्त करनेवाले स्त्रीदर्शनादिसे कैसे बच सकते हैं। यों इन्द्रिय-संयमके स्थानपर इन्द्रिय-असंयमकी मानो बाढ़-सी आ गयी है। यह बड़े ही खेदका विषय है और ऐसे छात्र-जीवनसे कैसे संयमकी आशा की जाय?

परंतु केवल स्थितिपर खेद प्रकट करनेसे या निराश होनेसे काम नहीं चलेगा। बहुत बुरे दोष आ गये हैं, वे चाहे किसी भी कारणसे आये हों। इसके लिये भी किसीपर दोषारोपणकी प्रयोजनीयता नहीं है—आवश्यकता है दोषोंके सुधारकी। आज छात्र-छात्राओंमें प्राय: निम्नलिखित दोष विचारों तथा क्रियाओंके द्वारा न्यूनाधिक रूपमें आये और आते हुए बताये जाते हैं—

(१) ईश्वरपर अविश्वास, अतएव ईश्वर-भजनकी अनावश्यकता।

(२) कर्मफल, पुनर्जन्म, परलोकपर अविश्वास।

(३) देवपूजन, श्राद्ध, तर्पण, धार्मिक क्रिया, अनुष्ठान, नित्य-नैमित्तिक शास्त्रीय कर्मोंपर अविश्वास।

(४) प्राचीनकालकी सभ्यता तथा संस्कृतिकी उच्चतापर अविश्वास। अबसे पूर्वकी सभ्यता-संस्कृति पूर्व-से-पूर्व निम्नश्रेणीकी तथा अविकसित थी—ऐसी धारणा।

(५) संसार उत्तरोत्तर सभी विषयोंमें उन्नत हो रहा है—ऐसी धारणा।

(६) चार हजार वर्षके पूर्वका इतिहास नहीं है। वेद, दर्शन, उपनिषद्, स्मृतियाँ, पुराण, महाभारत, रामायण आदि सभी आधुनिक हैं—ऐसी धारणा।

(७) आर्यजाति भारतमें मूलत: नहीं रहती थी, बाहरसे आयी है—ऐसी धारणा।

(८) माता-पिताकी भक्ति, सेवा तथा उनके आज्ञा-पालनमें अरुचि।

(९) शास्त्र, वर्णाश्रम, समाज, कुल, शिक्षा-संस्था तथा अन्य सम्बन्धित संस्थाओंका अनुशासन माननेमें आपत्ति।

(१०) आचार्य, अध्यापक, गुरुका अपमान तथा उनके साथ दुर्व्यवहार।

(११) खान-पानमें असंयम, तामसी (मद्य, मांस, अपवित्र जूठन आदि) आहारमें रुचि।

(१२) यौन-सम्बन्धमें स्वेच्छाचारिता।

(१३) सिनेमा आदि असंयम बढ़ानेवाले खेलोंके देखनेमें, उनमें क्रियात्मक भाग लेने तथा अशुभ सदाचारनाशक साहित्यके लेखन, वाचन तथा प्रचारमें उत्साह और प्रवृत्ति।

(१४) विलासिताकी सामग्रियोंका अवबोध और अमर्याद-सेवन तथा अत्यन्त खर्चीला जीवन।

(१५) हिंसात्मक तथा मिथ्यापूर्ण कार्योंमें उत्साह तथा प्रवृत्ति।

(१६) प्राचीनमात्रके विरोध तथा नवीनमात्रके ग्रहणमें विचारशून्य प्रवृत्ति।

(१७) प्राचीन सांस्कृतिक कार्योंमें, व्यवहारोंमें तथा सदाचारमें अरुचि तथा उनका विरोध।

(१८) वैदिक, महाभारत तथा रामायणके गौरवपूर्ण इतिहास तथा महापुरुषोंसे अपरिचय।

संक्षेपमें सूत्ररूपसे दोषोंकी बात कही गयी है, इनके अतिरिक्त अन्य बहुत-से दोष भी हैं; किंतु ये दोष सभीमें हों ऐसी बात भी नहीं है। साथ ही यह बात भी नहीं माननी चाहिये कि ऊपर अपने दृष्टिकोणसे जो दोष बतलाये गये हैं, वे सभीकी दृष्टिमें दोष ही हों। जो कुछ भी हो, कुछ दोष तो ऐसे हैं, जिनको प्राय: सभी अथवा अधिकांश विचारशील लोग दोष मानते हैं और छात्र-छात्रागण भी उन्हें दोषरूपमें स्वीकार करते हैं। इन दोषोंके आनेके अनेकों कारण हैं, पर प्रधान कारण है उनके सामने इसी प्रकारके दोषपूर्ण आदेशोंका रखा जाना और उनको ऊपरसे रोकनेकी बात कहते हुए भी उन्हीं आदेशोंका अनुकरण करनेके लिये बाध्य करना।

बालक तो निर्दोष होते हैं। यद्यपि पूर्व-संस्कारानुसार उनमें रुचिभेद तथा स्वभावभेद अवश्य होता है, फिर भी वे बनते हैं उनके बीचके और आसपासके वातावरणके अनुसार ही। इसलिये इसका दायित्व बालकोंके अभिभावकोंपर है और इसके लिये प्रधान उत्तरदायी तो हैं समाज तथा राष्ट्रके वे अगुआ पुरुष, जिनके हाथोंमें विधि-निर्माणकी सत्ता है तथा जिनके आदर्श एवं आदेशपर लोग चलते हैं। बालक तो अनुकरणपरायण होता है। उसके सामने जैसी चीज आती है वह उसीकी नकल करता है। अवांछनीय शिक्षा देनेवाले विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, विद्यालय किसने बनाये? उनका संचालन कौन करता है? पाठ्यक्रमका निर्माण किसने किया? ईश्वरका खण्डन, शास्त्रका विरोध, पुनर्जन्म और परलोकपर अविश्वास पैदा करनेवाले साहित्यका प्रणयन किसने किया? प्राचीन शास्त्रोंको आधुनिक किसने बतलाया? माता, पिता तथा गुरुकी आज्ञा न मानकर अनुशासन-भंग करनेकी शिक्षा किसने दी? आहार-विहारमें उच्छृंखलता, यौन-सम्बन्धमें स्वेच्छाचारिता और हिंसात्मक कार्योंमें प्रवृत्तिका आदर्श किसने उपस्थित किया? चलचित्रोंका निर्माण, प्रचलन किसने किया? किसने गन्दे चित्रोंको चलानेकी अनुमति दी? चोर-बाजारी, घूसखोरी, मिथ्यापूर्ण कार्योंमें उत्साहपूर्ण प्रवृत्ति किसने की? और सहशिक्षाकी बुरी चाल किसने चलायी? ऐसी ही अन्यान्य बातें हैं। परिस्थितिवश विदेशी शिक्षा तथा संस्कृतिके प्रभावमें आकर, जोशमें होशको खोकर इन्द्रियोंके वेगको रोकनेमें असमर्थ होकर या अन्य किसी भी कारणसे हो—इन सब प्रवृत्तियोंके प्रेरक, प्रवर्तक, पोषक, प्रचारक प्राय: बड़े लोग ही हैं। यह सत्य है और इसे सभीको समझना चाहिये। बालकको तो जैसे साँचेमें आप ढालेंगे, उसीमें वह ढलेगा। अतएव विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयोंके छात्र-छात्राओंको दोष देना व्यर्थ तथा अनुचित है, उनको सुधारना है तो पहले अपनेको सुधारना होगा। आजकल शिक्षाप्रणाली तथा शिक्षा-संस्थाओंके दोष प्राय: सभी बतलाते हैं, पर उनमें सुधारका कार्य नहींके बराबर ही हो रहा है। इस ओर देशके सभी मनीषियोंको विशेष ध्यान देकर इस विषयपर विचार करना चाहिये।

यहाँ मैं अपने देशके भावी आशास्थल और भावी मानव-जातिके आदर्श पूर्वपुरुष—छात्र-छात्राओंकी सेवामें नम्रताके साथ कुछ निवेदन करना चाहता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि वे मेरे विनीत निवेदनपर कृपया ध्यान दें। मेरा बहुत-से छात्रोंसे परिचय और पत्र-व्यवहार है, बहुत-से ऐसे अध्यापकों तथा आचार्योंसे मेरा बड़ा स्नेहका सम्बन्ध है, जो कुछ ही दिनों पहले छात्रावस्थामें थे। उनमें बहुत-से बड़े ही भले, सात्त्विक स्वभावके और दोषों तथा पापोंसे डरनेवाले सदाचारी तथा सुशील व्यक्ति हैं। ऐसे लाखों और भी होंगे। इसलिये छात्र-समाज बुरा नहीं है। छात्रोंमें जो बुराइयाँ आ रही हैं, उसे वे समझें और उन्हें दूर करनेमें उनकी शक्ति आने लगे तो बहुत शीघ्र बहुत कुछ सच्चा लाभ होना सम्भव है।

ईश्वर है, अवश्य है, प्रकृतिका प्रत्येक कार्य ईश्वरकी सत्ताका प्रमाण दे रहा है। ईश्वरकी सच्ची सत्ताको माननेमें बड़ा लाभ है। यह संत-महात्माओंका अनुभव है।

धर्म है, धर्म ही जीवनका प्रधान अवलम्बन है। धर्महीन जीवन पशुजीवन है।

श्राद्ध-तर्पणसे मृत पितरोंकी तृप्ति होती है, इसमें अनेकों प्रमाण हैं और यह सर्वथा अनुभवसिद्ध तथ्य है।

हमारी सभ्यता तथा धर्म बहुत प्राचीन है। हमारा प्राचीन इतिहास अनन्त गौरव-गाथाओंसे युक्त है, सच्चा है। हमारे बहुत-से पूर्वपुरुष ज्ञानी, योगी, तपस्वी, सिद्ध तथा महान् ऐश्वर्यवान् थे।

आर्यजातिका मूल देश आर्यावर्त या भारतवर्ष ही है और हमारी सभ्यता करोड़ों वर्ष पुरानी है।

महाभारत-रामायण इतिहास है, पुराणोंमें प्राचीन ऐतिहासिक तथा धार्मिक महत्त्वके प्रसंग हैं। इनमें न्यूनाधिकता समय-समयपर की गयी है, ऐसे अनुमान होता है, पर मूल वस्तुतत्त्व सर्वथा यथार्थ है।

यह तो विजेता जातिका एक महान् कूटनैतिक प्रचार था कि आर्यजातिका मूलनिवास भारतवर्ष न माना जाय, जिससे उनकी इस देशपर भक्ति न रहे। विकासका सिद्धान्त माना जाय तो इनकी अपने पूर्व पुरुषों तथा अपनी प्राचीन संस्कृतिपर अनास्था हो जाय एवं पुराना इतिहास न माना जाय तो इन्हें अपनी गौरवगाथाका ज्ञान ही न हो।

वस्तुत: हमारा जीवन अत्यन्त गौरवमय था। तप, योग, ज्ञान, सिद्धि आदिके साथ ही मन्त्रविज्ञान बड़े उच्च स्तरपर था। विज्ञान तथा ऐश्वर्य भी बहुत ऊँची स्थितिमें था। हमारे यहाँके शास्त्रोंके समान शास्त्रोंका निर्माण जगत‍्में अभीतक नहीं हो सका है। मन्त्रात्मक, चेतन, इच्छारूप शस्त्रास्त्र थे। उन्हें लौटाया भी जा सकता था। जिस प्रकारके अस्त्रोंका वर्णन रामायण तथा महाभारतादिमें मिलता है, उनके सामने आजका अणुबम सर्वथा नगण्य तथा दोषयुक्त है।

प्राचीनकालमें विमानविज्ञान भी बड़ा अद‍्भुत था। रामायणमें चेतनकी भाँति कार्य करनेवाले तथा हजारों व्यक्तियोंको लेकर उड़नेवाले पुष्पक विमानका वर्णन है। कर्दमजीके विमानका वर्णन श्रीमद्भागवतमें मिलता है। वह विमान कान्तिमान् था और इच्छानुसार चलनेवाला तथा चाहे जिस लोकमें जानेवाला था। उसमें सब प्रकारकी सामग्रियाँ थीं। लिखा है वे उस महान् विमानमें बैठकर वायुके समान सभी लोकोंमें विचरते हुए विमानचारी देवताओंसे भी आगे बढ़ गये। शाल्व राजाके ‘सौभ’ विमानके सम्बन्धमें वर्णन है कि वह इतना विचित्र था कि कभी अनेक रूपोंमें दीखता, कभी एक रूपमें, कभी दीखता तो कभी न दीखता, कभी पृथ्वीपर आ जाता, कभी आकाशमें उड़ने लगता, कभी पहाड़की चोटीपर चढ़ जाता तो कभी जलमें तैरने लगता, वह अलातचक्रके समान घूमता रहता। वह विमान आकारमें नगरके समान था। विमानसम्बन्धी प्राचीन ग्रन्थोंमें लिखा है कि (१) मार्गकी यासा, वियासा, प्रयासा आदि वायुशक्तियोंके द्वारा सूर्यकिरणोंमें रहनेवाली अन्धकारशक्तिका आकर्षण करनेसे विमान छिप जाता है। (२) रोहिणी-विद्युत् के फैलानेसे विमानके सामने आनेवाली प्रत्येक वस्तुको देखा जा सकता है। (३) शब्दग्राहक यन्त्रके द्वारा दूसरे विमानपरके लोगोंकी बातचीत आदि सुनी जा सकती है। (४) रूपाकर्षण-यन्त्रद्वारा दूसरे विमानोंकी वस्तुओंका रूप देखा जा सकता है। (५) दिशाम्पति नामक यन्त्र (की सूई)-के द्वारा विमानके आनेकी दिशा जानी जा सकती है। (६) ‘सन्धिमुख’ नामक नलीके द्वारा ‘अपस्मार’ नामक धूमको एकत्र करके स्तम्भन-यन्त्रके द्वारा दूसरे विमानपर फेंकनेसे उस विमानपर रहनेवाले सम्पूर्ण व्यक्ति स्तब्ध हो जाते हैं और भी बहुत-सी बातें हैं। इससे विमान-विज्ञानका अनुमान होता है। पिछले दिनों समाचारपत्रोंमें आया था कि महाराष्ट्रके एक सज्जनने प्राय: गत सौ वर्ष पूर्व एक विमान प्राचीन पद्धतिके अनुसार बनाया था और वह बहुत ऊँचेपर उड़ा भी था, परंतु प्रोत्साहन न मिलनेसे कार्य रुक गया और उसका बचा हुआ सारा सामान रैली ब्रदर्सको बेच दिया गया।

प्राचीनकालका मन्त्रविज्ञान भी बड़ा चमत्कारिक था। मन्त्रशक्तिसे चाहे जिस वस्तुका निर्माण हो सकता था। पिछले दिनों स्वामी विशुद्धानन्दजीके द्वारा काशीमें सूर्यविज्ञानके द्वारा वस्तुनिर्माणकी बहुत-सी घटनाएँ लोगोंने प्रत्यक्ष देखी थीं।

हमारे शास्त्र ऋषि-प्रणीत तथा सत्य-तत्त्वोंसे भरे हैं। वेद अपौरुषेय हैं।

हमारा सदाचार, मातृ-पितृभक्ति, गुरुभक्ति अत्यन्त लाभदायक हैं। उनके पालनसे आयु, विद्या, आरोग्य, यश, बल, धर्म और मोक्षसाधनकी वृद्धि होती है।

बाजारकी, होटलोंकी, प्रमोद-गृहोंकी बनी हरेक चीज बाजारू सोडा-लैमन बर्फका पानी, हर किसीकी जूठन कभी नहीं खानी चाहिये। खराब चीजोंसे तथा गंदगीमें बनी होनेके कारण उनसे स्वास्थ्यनाश होता है, बीमारियाँ फैलती हैं, व्यर्थ व्यय होता है और आचार तथा धर्मका नाश होता है।

विलासिताके प्रसार-प्रचारसे बड़ी हानि हो रही है। गंदे साहित्यसे लोकहानि बहुत बड़ी मात्रामें होती है। चरित्र ही महान् निधि है और विलासिताकी सामग्री, विलासी जीवन तथा गंदे साहित्यसे चरित्रका नाश निश्चित होता है। चलचित्र इनमें बहुत बड़ी हानिकारक चीज है। मेरी छात्र-छात्राओंसे प्रार्थना है कि वे विलासिता-प्रसार, गंदे साहित्य तथा चल-चित्रोंके विरुद्ध जोरकी आवाज उठायें। रुपयोंके लोभसे जो व्यापारी, साहित्यिक, चल-चित्र-निर्माता तथा सरकारी अफसर छात्र-छात्राओंसे तथा समाजके नैतिक स्तरको बुरी तरहसे गिरानेका पाप-प्रयत्न कर रहे हैं, उन्हें ऐसा करनेका क्या अधिकार है? छात्रगण प्रबल आन्दोलन करके जगह-जगह अपना विरोध करें और प्रतिज्ञाएँ करायें। सरकारको बाध्य करें, जिसमें विलासिताकी सामग्रियोंका प्रचार रुके, गंदा साहित्य बंद हो और कम-से-कम गंदे चलचित्रोंका प्रणयन और प्रचार सर्वथा रुक जाय। छात्रोंको याद रखना चाहिये कि उनके निर्मल तथा निर्दोष मनमें मनोरंजनके तथा कलाके नामपर मीठा जहर भरा जा रहा है और कुप्रवृत्ति, कदाचार, कुसंग, कुकर्मके प्रति उनके मनमें आसक्ति तथा मोह उत्पन्न करके उन्हें पतनके गहरे गर्तमें गिराया जा रहा है। उनके साथ यह बहुत ही जघन्य छलपूर्ण बर्ताव हो रहा है। नहीं तो भला, अच्छे-भले घरकी युवतियों और युवकोंके मनमें पापवासना क्यों पैदा होती? क्यों वे कुल-कुमारियाँ कलाके नामपर पुरुषोंका नीच स्पर्श और उनके साथ शृंगार आलापका अभिनय करने तथा लाखों-करोड़ों पुरुषोंकी पापदृष्टि अपने ऊपर गिरानेके लिये जगह-जगह गली-गलीमें अपने शृंगार-रूपके पोस्टर छपकर चिपके देखनेमें सुख और गौरव समझतीं? क्यों सात्त्विक घरके कुलका नाम ऊँचा करनेके लिये उत्पन्न नवयुवक इस पाप-पंकमें फँसते और उस कीचड़में सने रहनेमें निन्द्य गौरवका अनुभव करते? और क्यों किसी स्टेशनपर, किसी रेलके डिब्बेमें, किसी मकानके बरामदेमें या किसी मैदानमें चलचित्रमें अभिनय करनेवाले उच्छृंखल तथा आदर्शहीन तरुण नट-नटियोंके महात्मा तथा पुण्यपुरुषोंकी भाँति देखने, देखकर आनन्दध्वनि करने, उनके नामपर नारे लगाने तथा उनपर फूल बरसानेका अनैतिक तथा अनाचारपूर्ण कार्य करते? क्यों उन नट-नटियोंके नामोंको अपने पवित्र नामों और कामोंके साथ जोड़ते और क्यों उनके नामके बुशर्ट और साड़ी पहननेमें गौरव मानते! इस सबका कारण यही है कि धन-लोलुप तथा विषय-लोलुप बड़ी उम्रके व्यापारियों तथा अन्य लोगोंने निर्दोष छात्र-छात्राओं तथा समाजके तरुण-तरुणियोंको मोह-मदिरा पिलाकर उन्हें पागल बना दिया है। वे अपने ऊपर होनेवाले इस सभ्यताभरे जुल्म, इस मीठे अत्याचारको देखें, अपनी स्थिति समझें, समाजकी स्थिति समझें और इस मायाजालसे मुक्त होकर सबको अपने चेतमें आ जानेकी चेतावनी दे दें और आगेसे इस पापको असम्भव बना दें।

सहशिक्षा हानिकर है और लड़के-लड़कियोंका अबाध मिलना-जुलना अत्यन्त बुरा है, इसका कुफल प्रत्यक्ष है। आये दिन ऐसी अवांछनीय घटनाएँ होती रहती हैं, जो समाज तथा कुलके लिये कलंकरूप हैं तथा अधर्म तो हैं ही। इससे दूर रहना तथा भले लड़के-लड़कियोंको इसके विरुद्ध भी जोरोंसे आवाज उठानी चाहिये।

दलबंदियोंसे तथा गुटोंसे बड़ी हानि है, उनसे छात्र-समाज यथासाध्य अलग रहे। जहाँतक हो, भगवान‍्को मानें और रोज याद करें। कुलधर्मका मान करें, माता-पिता-गुरु तथा श्रेष्ठोंका सम्मान करें। पातिव्रत्यके आदर्शकी पूजा करें। इद्रियसंयम तथा मनोनिग्रह करना सीखें, अनुशासन तथा सदाचारका पालन करें, जहाँतक बने सबके साथ सम्मान, प्रेम, हित तथा सत्यसे पूर्ण व्यवहार करें। सबका भला चाहें, भला करें और भला होते देखकर प्रसन्न हों।

दो महामन्त्र और उनका भाव सब लोग अपने हृदयोंमें भर लें तथा उनके अनुसार भावना एवं क्रिया करें—

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।

आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥

‘धर्मका सार-सर्वस्व सुनो और उसे धारण करो। जो कुछ भी अपनेसे प्रतिकूल हो दूसरोंके साथ वैसा बर्ताव कभी न करो।’

यही मनाओ कि ‘सब जीव सुखी हों, सब तन-मनसे नीरोग हों, सब कल्याणों (मंगलका—भगवान्)-का दर्शन करें और दु:खका भाग किसीको न मिले।’

इस प्रकार अपने जीवनको संयमपूर्ण, मंगलमय और सदाचार-परायण बनाकर इस लोकमें उपर्युक्त अभ्युदयको प्राप्त करें और मानव-जीवनके चरम लक्ष्य ‘नि:श्रेयस’ या मोक्षको प्राप्त करके—भगवत्प्राप्ति करके जीवनकी चरम सफलताको प्राप्त हों। यही पवित्र धर्मसम्पादन है। बालकों, तरुणों तथा उनके अभिभावकों एवं राज्यके अधिकारी पुरुषोंको यही करना चाहिये। यही सबसे सादर प्रार्थना है।

साथ ही सरकारसे भी प्रार्थना है कि वह विशेष विचार करके भारतकी प्राचीन अध्यात्मप्रधान संस्कृतिकी रक्षा करे। संस्कृतिका विनाश, ‘स्व’ पर अनास्था यह बहुत बड़ी हानि है। ‘स्वराज्य’ प्राप्त करके भी यदि हमने ‘स्व’ को भुला दिया और खो दिया तो वस्तुत: हम हानिमें ही रहेंगे। अतएव अपनी पवित्र संस्कृतिकी रक्षाके लिये पूर्ण प्रयत्न करना चाहिये। सरकारके एक बहुत बड़े उच्चपदस्थ महानुभावने मुझसे कहा था कि ‘आजकल पढ़े-लिखे लोगोंमें ऐसे पुरुष बहुत मिलते हैं जो रामकी माता, भ्राता तथा पत्नीका नाम नहीं जानते, पाण्डवोंका नाम नहीं बता सकते आदि’ यह बड़ी दु:खद स्थिति है। जब अपने गौरवजीवन पूर्वजोंका ही परिचय नहीं रहेगा, तब उनकी संस्कृतिसे तो सरोकार ही कैसे रहेगा। इस दिशामें सरकारके सम्मानित पुरुषोंको, साथ ही देशके प्रत्येक विचारशील नर-नारीको विचार तथा कर्तव्यका निश्चय करना चाहिये।

शिक्षा-सुधारकी भी बड़ी ही आवश्यकता है। शिक्षाके वास्तविक उद्देश्यका निर्धारण, शिक्षापद्धति तथा परीक्षापद्धतिमें आमूल परिवर्तन तथा उसे अर्थकरी बनानेके साथ ही अध्यात्मपरक बनानेकी व्यवस्था, अध्यापकों, आचार्योंके पवित्र उच्च चरित्रका निर्माण, समस्त संस्थाओंमें मानव-धर्मकी अनिवार्य शिक्षा, संस्कृत भाषाके प्रचार-प्रसारकी व्यवस्था आदि ऐसे कार्य हैं, जिनपर अविलम्ब ध्यान देना तथा प्रयत्न करना चाहिये। दु:ख है कि संस्कृतके जो विद्वान् पण्डित चले जा रहे हैं उनके स्थानकी पूर्ति असम्भव हो गयी है। यही क्रम रहा तो कुछ वर्षों बाद दर्शन-शास्त्रके तथा व्याकरणके ग्रन्थोंको लगानेवाले भी मिलेंगे या नहीं, इसमें सन्देह है। परीक्षा-पद्धतिके दोषसे यही दशा अंग्रेजीमें भी है। प्राचीन एंट्रेंस पास लोगोंमें जो योग्यता थी, वैसी आजके ग्रेजुएटमें नहीं मिलती। परीक्षाका ध्येय भी घटना आवश्यक है। छुट्टियोंका कम किया जाना तथा पढ़ाईकी उम्रका घटाया जाना बड़ा ही आवश्यक है, इसमें धन तथा समयका बड़ा ही दुरुपयोग तथा व्यर्थ-व्यय होता है। धर्म-शिक्षापर भी विशेष ध्यान देना उचित है। ‘सैक्यूलर’ का अर्थ ‘धर्मनिरपेक्ष’ होना चाहिये, धर्महीन नहीं। व्यावहारिक क्षेत्रमें भी सरकारको ऐसी प्रजाके निर्माणकी आवश्यकता है, जो धर्मसहिष्णु अवश्य हों, पर साथ ही धर्मपरायण भी हों। तभी मानव मानव रह सकेगा। इसके साथ ही गंदे चलचित्रोंको रोकनेकी तुरंत व्यवस्था होनी चाहिये। इससे बहुत बड़ी नैतिक और आर्थिक हानि हो रही है। मेरी प्रार्थनापर ध्यान दिया जायगा तो मैं कृतज्ञ होऊँगा।