सार बात

संसारको सत्ता और महत्ता देकर उसमें अपनापन कर लेनेसे मनुष्य पराधीन हो जाता है; क्योंकि संसार ‘पर’ है। पराधीन मनुष्य सदा दु:खी रहता है—‘पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं’ (मानस, बाल० १०२। ३)। वह ऊँच-नीच योनियोंमें भटकता रहता है और दु:ख पाता रहता है। इस दु:खसे छुटकारा पानेके लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य संसारके मालिक परमात्माकी सत्ता और महत्ता स्वीकार करके उनमें अपनापन कर ले कि केवल वे ही हमारे हैं। परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करनेके बाद फिर साधकके लिये किसी अन्यकी सत्ताको स्वीकार करनेकी जरूरत ही नहीं रहती। कारण कि एक परमात्मा ही ऐसे हैं, जो पहलेसे ही सदा हमारे साथ रहते हैं, कभी हमसे बिछुड़ते नहीं। परमात्माके सिवाय जो भी है, वह सब-का-सब मिलने और बिछुड़नेवाला है।

परमात्माकी सत्ता और महत्ताको स्वीकार करनेसे साधक व्यर्थ चिन्तनसे छूट जाता है। कारण कि हम जिसकी सत्ता और महत्ता स्वीकार करते हैं, उसीका चिन्तन होता है। जबतक साधक एक परमात्माके सिवाय अन्यकी सत्ता और महत्ता स्वीकार करता रहता है, तबतक उसके मनमें न तो स्थिरता आती है, न निर्भयता आती है और न प्रसन्नता ही आती है। वह न तो मुक्तिका अधिकारी होता है और न भक्तिका ही अधिकारी होता है। यह नियम है कि मनुष्य जिसकी सत्ताको स्वीकार करता है, उसका चिन्तन स्वत: होने लगता है। अगर साधक संसारके चिन्तनसे छूटना चाहता हो तो उसको संसारकी सत्ताको अस्वीकार करना होगा।

संसार प्रतिक्षण बदल रहा है। उसका पहले भी अभाव था, पीछे भी अभाव हो जायगा और अभी भी वह निरन्तर अभावमें जा रहा है। आजतक किसीको भी संसारकी प्राप्ति नहीं हुई। संसारकी प्रतीति तो होती है, पर प्राप्ति नहीं होती। प्राप्त होनेवाली वस्तु परमात्मा ही है। इसलिये प्रतीतिके आधारपर संसारकी सत्ता मानना अज्ञान है। संसारकी प्रतीति होनेपर भी उसकी सत्ता विद्यमान नहीं है और परमात्माकी प्रतीति न होनेपर भी उसकी सत्ता विद्यमान है—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:’ (गीता२। १६)। जिसकी प्राप्ति होती है, वही वास्तवमें अपना है, अपने लिये है और अपनेमें है। उसकी प्राप्ति क्रियासे नहीं होती, प्रत्युत स्वीकृतिमात्रसे होती है। जो अपना, अपने लिये और अपनेमें नहीं है, उस संसारकी मानी हुई सत्ताको अस्वीकार करनेके लिये अपनेमें परमात्माकी सत्ताको स्वीकार करना आवश्यक है। अगर हम संसारकी सत्ताको न मानें तो परमात्माकी प्राप्ति स्वत:सिद्ध है। असत् की निवृत्ति होनेपर सत् की प्राप्ति और सत् की प्राप्ति होनेपर असत् की निवृत्ति स्वत: हो जाती है।

भगवान‍् अपने हैं, अपने लिये हैं और अपनेमें हैं—इस प्रकार भगवान‍्पर दृढ़ विश्वास उनकी प्राप्तिका अचूक उपाय है। कारण कि भगवान‍्के सिवाय अन्यपर विश्वास करके ही जीव भगवान‍्से विमुख हुआ है। इसलिये अन्यका विश्वास छोड़नेसे भगवान‍्पर विश्वास दृढ़ हो जाता है। भगवान‍्पर विश्वास दृढ़ होनेपर उनमें आत्मीयता अर्थात् अपनापन हो जाता है और आत्मीयता होनेपर भगवान‍्में प्रेम हो जाता है। प्रेमकी प्राप्तिमें ही मानव-जीवनकी पूर्णता है।

कोई भी मनुष्य अभाव नहीं चाहता; क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वरूपसे भावरूप परमात्माका अंश है। परन्तु अभावरूप संसारको सत्ता और महत्ता देनेसे मनुष्यको अपनेमें अभावका अनुभव होने लगता है। जब साधक अपनेमें परमात्माको स्वीकार कर लेता है, तब सब प्रकारके अभावोंका अन्त हो जाता है और वह सदाके लिये स्वाधीन हो जाता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह परमात्माकी सत्ता और महत्ताको स्वीकार करके उनको अपना मान ले—‘मेरे तो गिरधर गोपाल,दूसरो न कोई।’जिसको हम अपना मान लेते हैं, उसमें हमारी स्वाभाविक प्रियता हो जाती है—यह नियम है। इसलिये प्रेम-प्राप्तिके लिये भगवान‍्को अपना मान लेना आवश्यक है। भगवान‍्के सिवाय और कोई भी अपना तथा अपने लिये नहीं है—ऐसा माननेसे प्रेममें दृढ़ता आ जाती है।

अगर साधक निर्विकार होना चाहे तो वह ममताका त्याग कर दे। अगर वह शान्ति प्राप्त करना चाहे तो कामनाका त्याग कर दे। अगर वह मुक्त होना चाहे तो असंग हो जाय। अगर वह प्रेमी होना चाहे तो भगवान‍्को अपना मान ले।