अन्तिम प्रवचन
२९ जून २००५, सायं लगभग ४ बजे
एक बहुत श्रेष्ठ, बड़ी सुगम, बड़ी सरल बात है। वह यह है कि किसी तरहकी कोई इच्छा मत रखो। न परमात्माकी, न आत्माकी, न संसारकी, न मुक्तिकी, न कल्याणकी, कुछ भी इच्छा मत करो और चुप हो जाओ। शान्त हो जाओ। कारण कि परमात्मा सब जगह शान्तरूपसे परिपूर्ण है। स्वत:-स्वाभाविक सब जगह परिपूर्ण है। कोई इच्छा न रहे, किसी तरहकी कोई कामना न रहे तो एकदम परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, तत्त्वज्ञान हो जाय, पूर्णता हो जाय!
यह सबका अनुभव है कि कोई इच्छा पूरी होती है, कोई नहीं होती। सब इच्छाएँ पूरी हो जायँ यह नियम नहीं है। इच्छाओंको पूरा करना हमारे वशकी बात नहीं है, पर इच्छाओंका त्याग कर देना हमारे वशकी बात है। कोई भी इच्छा, चाहना नहीं रहेगी तो आपकी स्थिति स्वत: परमात्मामें होगी। आपको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जायगा। कुछ चाहना नहीं, कुछ करना नहीं, कहीं जाना नहीं, कहीं आना नहीं, कोई अभ्यास नहीं। बस, इतनी ही बात है। इतनेमें ही पूरी बात हो गयी! इच्छा करनेसे ही हम संसारमें बँधे हैं। इच्छा सर्वथा छोड़ते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मामें स्वत:-स्वाभाविक स्थिति है। प्रत्येक कार्यमें तटस्थ रहो। न राग करो, न द्वेष करो।
तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार॥
(दोहावली ९४)
एक क्रिया है और एक पदार्थ है। क्रिया और पदार्थ यह प्रकृति है। क्रिया और पदार्थ दोनोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करके एक भगवान् के आश्रित हो जायँ। भगवान् के शरण हो जायँ, बस। उसमें आपकी स्थिति स्वत: है। ‘भूमा अचल शाश्वत अमल सम ठोस है तू सर्वदा’—ऐसे परमात्मामें आपकी स्वाभाविक स्थिति है। स्वप्नमें एक स्त्रीका बालक खो गया। वह बड़ी व्याकुल हो गयी। पर जब नींद खुली तो देखा कि बालक तो साथमें ही सोया है—तात्पर्य है कि जहाँ आप हैं, वहाँ परमात्मा पूरे-के-पूरे विद्यमान है। आप जहाँ हैं, वहीं चुप हो जाओ!!
३० जून २००५, दिनमें लगभग ११ बजे
श्रोता—कल आपने बताया कि कोई चाहना न रखे। इच्छा छोड़ना और चुप होना दोनोंमें कौन ज्यादा फायदा करता है?
स्वामीजी—मैं भगवान् का हूँ, भगवान् मेरे हैं, मैं और किसीका नहीं हूँ, और कोई मेरा नहीं है। ऐसा स्वीकार कर लो। इच्छारहित होना और चुप होना—दोनों बातें एक ही हैं। इच्छा कोई करनी ही नहीं है, भोगोंकी, न मोक्षकी, न प्रेमकी, न भक्तिकी, न अन्य किसीकी।
श्रोता—इच्छा नहीं करनी है, पर कोई काम करना हो तो?
स्वामीजी—काम उत्साहसे करो, आठों पहर करो, पर कोई इच्छा मत करो। इस बातको ठीक तरहसे समझो। दूसरोंकी सेवा करो, उनका दु:ख दूर करो, पर बदलेमें कुछ चाहो मत। सेवा कर दो और अन्तमें चुप हो जाओ। कहीं नौकरी करो तो वेतन भले ही ले लो, पर इच्छा मत रखो।
सार बात है कि जहाँ आप हैं, वहीं परमात्मा हैं। कोई इच्छा नहीं करोगे तो आपकी स्थिति परमात्मामें ही होगी। जब सब परमात्मा ही हैं तो फिर इच्छा किसकी करें? संसारकी इच्छा है, इसलिये हम संसारमें हैं। कोई भी इच्छा नहीं है तो हम परमात्मामें हैं।