नम्र निवेदन
प्रस्तुत पुस्तकमें श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज की वाणीसे निस्सृत सात उपदेशोंका संग्रह है, जो समय-समयपर ‘कल्याण’ में प्रकाशित हो चुके हैं, इन उपदेशोंमें साधनाके गूढ़ रहस्योंका बड़े ही मार्मिक, सरल एवं रोचक ढंगसे उद्घाटन किया गया है। कहना न होगा कि इन उपदेशोंमें जो कुछ है, वह भगवद्गीता आदि शास्त्रोंके दीर्घकालीन मन्थनका परिणाम है, जिसपर स्वामीजीके साधनामय एवं तप:पूत जीवनके अनुभवोंका पुट लगा हुआ है। इसीसे यह पुस्तक साधकोंके लिये तथा उन लोगोंके लिये जो साधन-मार्गमें अग्रसर होना चाहिते हैं, बड़े कामकी वस्तु बन गयी है। इन उपदेशोंमें प्राय: उन सभी प्रश्नोंका उचित समाधान कर दिया गया है, जो एक साधकके जीवनमें स्वाभाविकरूपसे उठते हैं।
इनमें क्रमश: निम्नलिखित विषयोंपर प्रकाश डाला गया है— (१) दृढ़ भावसे लाभ, (२) भक्तिकी सुलभता, (३) गीताका ज्ञेय-तत्त्व, (४) भगवत्प्राप्तिसे ही मानव-जीवनकी सार्थकता, (५)अखण्ड-साधन, (६) सबका कल्याण कैसे हो, (७) उपासना शब्दका अर्थ एवं उसका स्वरूप। ये सभी विषय ऐसे हैं, जिनपर प्रकाश प्राप्त करना साधकके लिये परम उपयोगी है। भावकी दृढ़ता हुए बिना किसी भी साधनमें तत्परता नहीं आयेगी। साधनाके गीतादि ग्रन्थोंमें चार प्रधान मार्ग बताये गये हैं—ज्ञानयोग अथवा सांख्ययोग, भक्तियोग, कर्मयोग एवं ध्यानयोग। इन सभी मार्गोंमें भक्ति सबमें सुगम है, ज्ञानमार्गपर चलनेवालोंके लिये यह जान लेना परम आवश्यक है कि जिस वस्तुका ज्ञान वह प्राप्त करना चाहता है, उसका स्वरूप क्या है। उपर्युक्त चारों साधनमार्गोंका लक्ष्य भगवान्को प्राप्त करना ही है। अन्यथा उनकी ‘योग’ संज्ञा नहीं होगी और भगवत्प्राप्तिके लिये ही यह मनुष्य-शरीर हमें मिला है, अन्यथा जीनेको तो पशु-पक्षी, कीट-पतंग—सभी जीते हैं। साधन जबतक अखण्ड नहीं होगा—बीच-बीचमें उसका तार टूटता रहेगा, तबतक उसमें सफलताकी आशा करना दुरासामात्र होगी। यद्यपि सभी साधन अधिकारिभेदसे उपयोगी हैं, फिर भी साधकके मनमें यह प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है कि सबके लिये कल्याणकारी उपाय क्या है। उपासना-मार्गपर चलनेवालोंके लिये ‘उपासना’ का अर्थ एवं स्वरूप समझना अत्यन्त आवश्यक है। इस प्रकार यह छोटी-सी पुस्तक साधकोंके लिये बहुत ही उपकारक बन गयी है। आशा है, कल्याणकामी लोग इससे समुचित लाभ उठाकर अपने जीवनको सार्थक करेंगे।
निवेदन
हनुमानप्रसाद पोद्दार