परमात्मा सगुण हैं या निर्गुण?

शास्त्रमें आया है कि जीवकी उपाधि अविद्या है, जो मलिन सत्त्वप्रधान है और ईश्वर (सगुण)-की उपाधि माया है, जो शुद्ध सत्त्वप्रधान है। इस बातको लेकर ऐसी मान्यता है कि परमात्माका सगुण रूप मायिक है, वास्तविक रूप तो निर्गुण-निराकार ही है। परन्तु वास्तविक दृष्टिसे देखें तो यह मान्यता सही नहीं है। जीवको नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप ब्रह्म माना गया है—‘अयमात्मा ब्रह्म’, ‘तत्त्वमसि’ आदि। विचार करना चाहिये कि जब अविद्यामें पड़ा हुआ, मलिन-सत्त्वकी उपाधिवाला जीव भी स्वरूपसे ब्रह्म ही है, तो फिर शुद्ध-सत्त्वप्रधान ईश्वर नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वरूप क्यों नहीं है? वह मायिक कैसे हो गया? ईश्वर तो मायाका अधिपति है। सेठजी (श्रीजयदयालजी गोयन्दका)-से किसीने कहा कि ईश्वर और जीव—ये दोनों मायारूपी धेनुके बछड़े हैं। सेठजी बोले कि मायारूपी धेनुका बछड़ा जीव है, ईश्वर नहीं। ईश्वर तो साँड़ अर्थात् मायाका अधिपति है। जैसे साँड़ गायोंका मालिक होता है, ऐसे ही ईश्वर मायाका मालिक है—

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥

(गीता ४। ६)

माया बस्य जीव अभिमानी।

ईस बस्य माया गुन खानी॥

परबस जीव स्वबस भगवंता।

जीव अनेक एक श्रीकंता॥

(मानस ७। ७८। ३-४)

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू।

मायाधीस ग्यान गुन धामू॥

(मानस १। ११७। ४)

भागवतमें आया है—

वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥

(१। २। ११)

‘तत्त्वज्ञ पुरुष उस ज्ञानस्वरूप एवं अद्वितीय तत्त्वको ही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन नामोंसे कहते हैं।’ तात्पर्य है कि परमात्मतत्त्व निर्गुण-निराकार (ब्रह्म) भी है, सगुण-निराकार (परमात्मा) भी है और सगुण-साकार (भगवान्) भी है।

गीतामें निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकार और सगुण-साकार—तीनोंके लिये ‘ब्रह्म’ शब्द आया है। जैसे, निर्गुण-निराकारके लिये ‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता:॥ ’ (५। १९), ‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’ (८।३), ‘अनादिमत्परं ब्रह्म’ (१३।१२) आदि; सगुण-निराकारके लिये ‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥ ’ (३।१५), ‘ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृत:।’ (१७। २३) आदि और सगुण-साकारके लिये ‘ब्रह्मण्याधाय कर्माणि’ (५। १०), ‘परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्।’ (१०। १२) पद आये हैं।

जैसे किसी आदमीको कपड़ोंके सहित कहें अथवा कपड़ोंसे रहित कहें, आदमी तो वही है, ऐसे ही परमात्माको गुणोंके सहित (सगुण) कहें अथवा गुणोंसे रहित (निर्गुण) कहें, परमात्मा तो वही (एक ही) हैं। भेद हमारी दृष्टिमें है। परमात्मामें भेद नहीं है। सगुण-निर्गुणका भेद बद्ध जीवकी दृष्टिसे है। मुक्तकी दृष्टिसे तो एक परमात्मतत्त्व ही है—‘वासुदेव: सर्वम्।’ बद्धकी दृष्टि वास्तविक नहीं होती, प्रत्युत मुक्तकी दृष्टि वास्तविक होती है। अत: कोई सगुणकी उपासना करे अथवा निर्गुणकी, उसकी मुक्तिमें कोई सन्देह नहीं है। कारण कि वह गुणोंकी उपासना नहीं करता, प्रत्युत भगवान‍्की उपासना करता है। गुण तो बाँधनेवाले होते हैं*।

कोई परमात्माको सगुण मानता है और कोई निर्गुण मानता है तो यह उनका अपना दृष्टिकोण है। इस विषयको समझनेके लिये एक दृष्टान्त है। पाँच अन्धे थे। उन्होंने एक आदमीसे कहा कि भाई, हमें हाथी दिखाओ। हम जानना चाहते हैं कि हाथी कैसा होता है? उस आदमीने उनको एक हाथीके पास ले जाकर खड़ा कर दिया। एक अन्धेके हाथमें हाथीकी सूँड़ आयी। दूसरेके हाथमें हाथीका दाँत आया। तीसरेके हाथमें हाथीका पैर आया। चौथेके हाथमें हाथीकी पूँछ आयी। पाँचवेंको हाथीके ऊपर बैठा दिया। उन्होंने अपने-अपने हाथ फेरकर हाथीको देख लिया कि ठीक है, यही हाथी है! अब वे पाँचों आपसमें झगड़ा करने लगे। एकने कहा कि हाथी तो ओवरकोटकी बाँहकी तरह होता है। दूसरेने कहा कि नहीं, हाथी तो मूसलकी तरह होता है। तीसरा बोला कि तुम दोनों झूठे हो, हाथी तो खम्भेकी तरह होता है। चौथेने कहा कि बिलकुल गलत कहते हो, हाथी तो रस्सेकी तरह होता है। पाँचवाँ बोला कि हाथी तो छप्परकी तरह होता है, यह मेरा अनुभव है। इस तरह सबका वर्णन सही होते हुए भी गलत है; क्योंकि वह एक अंगका वर्णन है, सर्वांगका नहीं। सबने हाथीके एक-एक अंगको हाथी मान लिया, पर वास्तवमें सब मिलकर एक हाथी है। ऐसे ही सगुण-निर्गुण, साकार-निराकारका झगड़ा है। वास्तवमें सब मिलकर एक ही परमात्माका वर्णन है। एक ही वस्तु अलग-अलग कोणसे देखनेपर अलग-अलग दिखायी देती है, ऐसे ही एक ही परमात्मा अलग-अलग दृष्टिकोणसे अलग-अलग दीखते हैं।

गीतामें आया है कि परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं—‘सदसच्चाहम्’ (९। १९), वे सत्-असत् से पर भी हैं—‘सदसत्तत्परं यत्’ (११। ३७) और वे न सत् हैं, न असत् हैं—‘न सत्तन्नासदुच्यते’ (१३। १२)। तात्पर्य है कि परमात्माका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे सगुण भी हैं, निर्गुण भी हैं, साकार भी हैं, निराकार भी हैं और इन सबसे विलक्षण भी हैं, जिसका अभीतक शास्त्रोंमें वर्णन नहीं आया है! उसका पूरा वर्णन हो सकता भी नहीं। प्राकृत मन, बुद्धि, वाणीके द्वारा प्रकृतिसे अतीत तत्त्वका वर्णन हो ही कैसे सकता है?

द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि जितने भी मत-मतान्तर हैं, उन सबसे परिणाममें एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है—

पहुँचे पहुँचे एक मत, अनपहुँचे मत और।

संतदास घड़ी अरठ की, ढुरे एक ही ठौर॥

अरहटकी घड़ियाँ अलग-अलग, ऊँची-नीची रहती हैं। जब वे नीचे जाकर पानीसे भरकर ऊपर आती हैं, तब अलग-अलग होनेपर भी वे ढुलती एक ही जगह हैं।

नारायण अरु नगर के, रज्जब राह अनेक।

भावे आवो किधर से, आगे अस्थल एक॥

एक ही नगरमें जानेके कई मार्ग होते हैं। कोई पूर्वसे आता है, कोई पश्चिमसे आता है, कोई उत्तरसे आता है, कोई दक्षिणसे आता है। उनसे कोई पूछे कि नगर किस दिशामें है तो पूर्वसे आनेवाला कहेगा कि नगर पश्चिममें है। पश्चिमसे आनेवाला नगरको पूर्वमें बतायेगा। उत्तरसे आनेवाला नगरको दक्षिणमें बतायेगा। दक्षिणसे आनेवाला कहेगा कि नगर उत्तरमें है। सभी अपने-अपने अनुभवको सच्चा बतायेंगे और दूसरेके अनुभवको झूठा बतायेंगे कि तुम झूठ कहते हो, हमने तो खुद वहाँ जाकर देखा है। वास्तवमें सभी सच्चे होते हुए भी झूठे हैं! पूर्व, पश्चिम आदिका भेद तो अपने दृष्टिकोण, आग्रहके कारण है। नगर न तो पूर्वमें है, न पश्चिममें है, न उत्तरमें है और न दक्षिणमें है। वह तो अपनी जगहपर ही है। अलग-अलग दिशाओंमें बैठे होनेसे ही वे नगरको अलग-अलग जगहपर बताते हैं।

हम किसी महात्माके विषयमें पहले कल्पना करते हैं कि वह ऐसा होगा, ऐसी उसकी दाढ़ी होगी, ऐसा उसका शरीर होगा आदि-आदि। परन्तु वहाँ जाकर उस महात्माको देखते हैं तो वह वैसा नहीं मिलता। ऐसे ही किसी शहरके विषयमें जैसी धारणा करते हैं, वहाँ जाकर देखनेपर वह वैसा वहीं मिलता। जब लौकिक विषयमें भी हम जो धारणा करते हैं, वह सही नहीं निकलती, फिर जो सर्वथा असीम, अनन्त अपार, अलौकिक, गुणातीत परमात्मा हैं, उनके विषयमें धारणा सही कैसे निकलेगी?

उपासना करनेवालोंके लिये ‘भगवान‍्का स्वरूप क्या है’—इस विषयमें दो ही बातें हो सकती हैं, एक तो भगवान् पहले अपना स्वरूप दिखा दें, फिर उसके अनुसार उपासना करें और दूसरी, हम पहले भगवान‍्का कोई भी स्वरूप मान लें, फिर उपासना करें। इन दोनोंमें दूसरी बात ही ठीक बैठती है। कारण कि भगवान् पहले अपना स्वरूप दिखा दें, फिर हम साधन करें तो उस स्वरूपका ध्यान, वर्णन आदि करनेमें हमारेसे कहीं-न-कहीं गलती हो ही जायगी, जिसका हमें दोष लगेगा। भगवान् भी कह सकते हैं कि तुमने भूल क्यों की? इसलिये भगवान‍्ने कृपा करके यह नियम बनाया है कि साधक उनके जिस रूपका ध्यान करें, जिस नामका जप करें, उसको वे अपना ही मान लेते हैं; क्योंकि भगवान् सब कुछ हैं।

अगर हमने यह सिद्धान्त बना लिया कि परमात्मतत्त्व सगुण ही है अथवा निर्गुण ही है तो फिर उसकी प्राप्ति हो ही गयी, हमने उसको जान ही लिया, फिर साधन करनेकी क्या जरूरत रही? अगर हम उसकी प्राप्ति नहीं मानते, अपनेको ज्ञात-ज्ञातव्य नहीं मानते और साधन करनेकी जरूरत समझते हैं तो हमने अभी उसको तत्त्वसे जाना नहीं है। वास्तवमें आजतक वेद, पुराण, सन्तवाणी आदिमें परमात्माका जितना वर्णन हो चुका है, जितना वर्णन वर्तमानमें हो रहा है और जितना वर्णन भविष्यमें होगा, वह सब-का-सब मिलकर भी परमात्माका पूरा वर्णन हो ही नहीं सकता। परमात्माके विषयमें हम जितनी कल्पना कर सकते हैं, परमात्मा उससे भी विलक्षण हैं?*

वेद, पुराण, सन्तवाणी आदिमें परमात्माका जो वर्णन हुआ है, वह वाद-विवादके लिये नहीं है, प्रत्युत उसका उद्देश्य, उसकी सार्थकता यही है कि मनुष्य परमात्माको वैसा मानकर उनके सम्मुख हो जाय और उनकी प्राप्तिमें तत्परतासे लग जाय तथा उनकी प्राप्ति कर ले।

परमात्मा सगुण हैं, निर्गुण नहीं हैं अथवा परमात्मा निर्गुण हैं, सगुण नहीं है—इसमें विधि-अंश (परमात्मा सगुण हैं या परमात्मा निर्गुण हैं—ऐसा) मानना तो ठीक है, पर निषेध-अंश (परमात्मा सगुण नहीं हैं या परमात्मा निर्गुण नहीं हैं—ऐसा) मानना बहुत बड़ी गलती है। कारण कि निषेध-अंश माननेसे हमने एक तो परमात्माको सीमित मान लिया, उनमें कमी मान ली और दूसरे, जिसका हमने निषेध किया, उसकी उपासना करनेवालोंके हृदयको ठेस पहुँचायी, उनको विचलित किया, जो कि एक बड़ा अपराध है। कारण कि दूसरे मतको माननेवाला साधक कोई निषिद्ध आचरण (पाप) नहीं करता, प्रत्युत जिस किसी प्रकारसे भगवान‍्में ही लगा हुआ है। अत: उसकी निन्दा करनेसे उसका तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर अपनी हानि हो ही जायगी अर्थात् हमारी उपासनामें बाधा लग ही जायगी। परमात्मा सगुण नहीं हैं अथवा निर्गुण नहीं हैं—इस प्रकार हम अपने उपास्यको सीमित बनायेंगे तो उसकी उपासना भी सीमित ही होगी। भगवान‍्के एक रूपको माननेवालोंके साथ राग होगा और दूसरे रूपको माननेवालोंके साथ द्वेष होगा तो इस प्रकार राग-द्वेषके रहते हुए परमात्माकी प्राप्ति कैसे होगी? हम अपनी समझ बता सकते हैं कि हमें तो भगवान‍्का अमुक रूप समझमें आता है, पर परमात्माका ठेका लेना कि वे ऐसे ही हैं—यह गलतीकी बात है।’

हमें तो सगुण ही प्रिय लगता है अथवा हमें तो निर्गुण ही ठीक लगता है या हमें तो द्वैत सिद्धान्त ही ठीक जँचता है अथवा हम तो अद्वैत सिद्धान्तको ही ठीक समझते हैं—ऐसा कहना तो साधकके लिये ठीक है, पर दूसरेके इष्ट, सिद्धान्त, मत आदिकी निन्दा या खण्डन करना साधकके लिये महान् बाधक है। भगवान‍्के एक रूपको ही मानकर उसका आग्रह, पक्षपात रखना ‘अनन्यता’ नहीं है। अनन्यताका तात्पर्य है—भगवान‍्के सिवाय संसारमें कहीं भी आसक्ति न करना।

साधकको अपने मत, सम्प्रदाय आदिका आग्रह नहीं रखना चाहिये, प्रत्युत उसका अनुसरण करना चाहिये। अपने मतका आग्रह रखनेसे उसका दूसरे मतसे द्वेष हो जायगा, जिससे वह दूसरे मतकी बातोंको निष्पक्ष होकर नहीं सुन सकेगा। सभी मत, सम्प्रदाय आदिमें अच्छे-अच्छे सन्त-महापुरुष हुए हैं। अपने मतका आग्रह रहनेसे साधक उन सन्त-महापुरुषोंकी अच्छी-अच्छी बातोंसे वंचित रह जायगा। अत: साधकको चाहिये कि वह प्रत्येक मत, सम्प्रदाय आदिकी बातोंको निष्पक्ष होकर सुने, उनपर गहराईसे विचार करे और जो बातें उपयोगी लगें, उनको ग्रहण करे। साधकको सारग्राही बनना चाहिये। अगर उसको अपने या दूसरेके मतमें कोई शंका पैदा हो जाय तो जिनपर उसकी श्रद्धा हो, उनसे पूछकर समाधान कर लेना चाहिये। न समझनेके कारण अपने मतमें कोई कमी या बाधा दीखे तो उसका त्याग कर देना चाहिये। उपनिषद् में आचार्य अपने शिष्योंको उपदेश देते हैं—

‘यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकॸ सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि। नो इतराणि।’

(तैत्तिरीय० १। ११)

‘जो-जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका कभी आचरण नहीं करना चाहिये। हमारे आचरणोंमेंसे भी जो-जो अच्छे आचरण दीखें, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरोंका कभी नहीं।’

इसका अर्थ यह नहीं है कि उन आचार्योंमें कोई कमी या दोष है। कमी हमारी समझमें है, उनमें नहीं। अत: उनकी कोई क्रिया हमारी समझमें न आये, उसमें हमारी दोषदृष्टि हो जाय तो उसका अनुसरण नहीं करना चाहिये।

साधकका वास्तविक गुरु उसका ‘विवेक’ ही है। अत: अपने विवेकका आदर करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। जितना जानते हैं, उसको मान लें—यह विवेकका आदर है। यह नाशवान् है—ऐसा जानते हुए भी उसमें प्रियता करना अपने विवेकका अनादर है। जिसकी नाशवान‍्में प्रियता है, वह अविनाशी तत्त्वको कैसे समझेगा? अगर वह असत् में ही उलझा रहेगा तो सत्-तत्त्वकी प्राप्ति कैसे होगी? जिसकी भोग और संग्रहमें प्रियता है, वह परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति तो दूर रही, उसकी प्राप्तिका निश्चय भी नहीं कर सकता—

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।

व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते॥

(गीता २। ४४)

‘उस पुष्पित (भोगोंका वर्णन करनेवाली) वाणीसे जिनका अन्त:करण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।’

साधकके लिये केवल इतना ही मान लेना आवश्यक है कि ‘परमात्मतत्त्व है’ अथवा ‘संसार नहीं है’। परमात्मतत्त्व कैसा है—यह जाननेकी जरूरत नहीं है। कारण कि परमात्मतत्त्व विचारका विषय नहीं है, प्रत्युत श्रद्धा-विश्वासका, मान्यताका विषय है* परन्तु ‘परमात्मा है’—इसकी दृढ़ताके लिये संसार नहीं है’—यह विचार करनेकी आवश्यकता है।

जैसे, शरीर प्रतिक्षण बदल रहा है, अभावमें जा रहा है—यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है। बचपनमें जैसा शरीर था, वैसा अब नहीं रहा, सर्वथा बदल गया, पर मैं (स्वयं) वही हूँ—इस प्रकार शरीरके बदलनेका ज्ञान सबको है, पर अपने बदलनेका ज्ञान किसीको भी नहीं है; क्योंकि अपना स्वरूप कभी बदलता ही नहीं। ऐसा विचार करके साधक बदलनेवाले (संसार)-से विमुख हो जाय तो उसको न बदलनेवाले (परमात्मतत्त्व)-का अनुभव हो जायगा।