अधिकार संसारपर नहीं, परमात्मापर
हम सबका परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें अधिकार है। संसारकी वस्तुओंपर हमारा अधिकार नहीं है। परिवार, कुटुम्ब, जमीन, जायदाद, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण—इनपर हमारा अधिकार नहीं है।
गीताजीमें भगवान् कहते हैं:—
ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।
(१५।७)
और गोस्वामीजी महाराजकी वाणीमें भी आता है—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी॥
इस प्रकार भगवान् और भक्त दोनों जीवको ईश्वरका अंश मानते हैं। वास्तवमें देखा जाय तो ये दो ही अर्थात् भगवान् और उनके भक्त ही बिना स्वार्थके प्रीति करनेवाले हैं। अन्य तो सब स्वार्थवश प्रीति करते हैं।
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं।
सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
सुर नर मुनि सब कै यह रीती।
स्वारथ लागि करैं सब प्रीती॥
जीवात्मा भगवान्का अंश होनेके कारण हमारा अधिकार भगवान् पर चल सकता है। परन्तु प्रकृति और प्रकृतिके पदार्थोंपर अधिकार नहीं चल सकता। इन्हें प्राप्त करनेके लिये योग्यता, समय, परिश्रम, बल, बुद्धि, विद्या आदि चाहिये। जैसी-जैसी योग्यता होगी, वैसे-वैसे अधिकार प्राप्त होंगे। परंतु भगवान्की प्राप्तिमें किसी योग्यता, बल, बुद्धि, विद्या आदिकी आवश्यकता नहीं है। बच्चा दूसरी किसी वस्तुपर अधिकार जमा ले तो उसके हाथमें नहीं है। परंतु वह अपनी माँपर तो अधिकार जमा ही सकता है। बालक स्वाभाविक ही माँकी गोद चढ़ जाता है और बड़ा भाई गोदमें हाथ भी रख देता है तो उस हाथको हटा देता है कि मेरी माँ है तू मेरे हुक्म बिना हाथ कैसे रख सकता है। ऐसे ही भक्त कहता है—‘ना मैं देखूँ और को, ना तोय देखन देऊँ’—भगवन्! मैं और की तरफ देखूँगा नहीं और आपको भी और की तरफ देखने नहीं दूँगा।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
(गीता ४। ११)
भगवान् कहते हैं कि जो मुझे जैसे भजता है, मैं भी उसे वैसे ही भजता हूँ। अत: भगवान् हमारे हैं और हम भगवान्के हैं। हम भगवान्से कभी वियुक्त हो नहीं सकते, बिछुड़ नहीं सकते। परंतु संसार हमसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहा है। यदि संसार, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, धन-सम्पत्ति आदि अपने हैं तो शरीर, इन्द्रियोंको दुर्बल मत होने दो, भोगोंमें मत फँसने दो, मनको इधर-उधर मत जाने दो, करोड़पति, अरबपति बन जाओ। तो कहते हैं यह हाथकी बात नहीं है।
भगवान् हमारे हैं और हम भगवान्के हैं। चाहे कपूत (कुपुत्र) हों या सपूत (सुपुत्र)। कपूतपना क्या है? संसारको अपना मानना कपूतपना है। सपूतपना क्या है? भगवान्को अपना मानना और संसारको अपना न मानना सपूतपना है। इस वास्ते भगवान्ने अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भजनेकी बात कही—
‘मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।’
(गीता १४। २६)
अव्यभिचारिणी भक्ति क्या? संसार अपना नहीं है, मैं संसारके साथ नहीं हूँ। और संसारको अपना मानना व्यभिचार है। अपना संसार नहीं, अपने तो भगवान् हैं। भगवान्की प्राप्तिको असम्भव या कठिन मानना गलती है। इसमें बाधा है धन तथा पदार्थोंके संग्रहकी तथा सुख-भोगकी चाहना—यह माया है। इस मायामें यह तोते और बन्दरकी तरह बँधा हुआ है:—
सो माया बस भयउ गोसाईं।
बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
एक तोता पकड़नेवाला जंगलमें तोता पकड़ता था। उसने एक पानीकी गहरी कुण्डी बनायी थी। उसपर आड़ी लकड़ी रखी हुई थी। उसपर ज्यों ही तोता बैठे कि उलटा हो जाय। अब नीचे देखे तो पानी और चारों ओर दिवाल। उसे लगता है कि फँस गया। उस लकड़ीको वह तोता छोड़ता नहीं। इतनेमें आकर तोता पकड़नेवाला उसे पकड़ लेता है। यह दृश्य देखकर एक सन्तको दया आ गयी तो उन्होंने एक तोता लिया और उसे पढ़ाया—देखो तोता, जहाँ जलकी ऐसी कुण्डी हो, वहाँ नहीं जाना। तो तोतेने भी ऐसा ही याद करके कह दिया। फिर सन्तने कहा कि बीच डंडेपर मत बैठना। तोतेने यह भी याद कर लिया। फिर सन्तने कहा कि बैठ जाओ तो उड़ जाना। तोतेने भी वैसा कह दिया। लटक जाओ तो भी उड़ जाना, बन्धन नहीं होगा। तोतेने वह भी वैसा ही कह दिया। सन्तने ऐसा सिखाकर तोतेको छोड़ दिया। उस तोतेने और कई दूसरे तोतोंको भी यह पढ़ा दिया। सन्तने देखा कि अब तोते नहीं फँसेंगे। फिर एक दिन तोता पकड़नेवालेने जलकी कुण्डी रखी तो तोता वहाँ डंडापर बैठ गया। ‘जलकी कुण्डीपर नहीं बैठना है’ ऐसा मुँहसे सारी बात कहते-कहते तोता पकड़ लिया गया।
इसी प्रकार हम लोग भी सन्तकी बतायी हुई बात सुनकर मुखसे कहते रहते हैं; परन्तु आचरण नहीं करते।
ऐसे ही बन्दरको पकड़नेवाले छोटे मुँहके घड़ेमें चने रख देते हैं। बन्दर आता है और दोनों हाथ घड़ेमें डालकर चनोंसे मुट्ठी भर लेता है। बँधी हुई मुट्ठी वह घड़ेके छोटे मुँहसे बाहर नहीं निकाल सकता और चने छोड़ना भी नहीं चाहता। इस प्रकार बन्दर और तोता दोनों खाने-पीनेमें बँधते हैं। ऐसे ही हम लोगोंकी, पढ़े-लिखोंकी दशा है कि हम भी यह बोलते रहते हैं कि—
ईस्वर अंस जीव अबिनासी।
चेतन अमल सहज सुखरासी॥
सो माया बस भयउ गोसाईं।
बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
बातें बना लेंगे। बातें सुनाना सीख लेंगे। परन्तु स्वयं आचरण नहीं करेंगे।
परोपदेशबेलायां सर्वे शिष्टा भवन्ति हि।
दूसरोंको उपदेश देना होता है तो सब विद्वान् बन जाते हैं।
विस्मरन्ति हि तत्सर्वं स्वकार्ये समुपस्थिते॥
अपना काम सामने आता है तो याद नहीं रहती, भूल जाते हैं।
जब कोई दूसरा मर जाता है तो वह धीरज बँधाते हैं कि संसार अनित्य है। यहाँ सब नाशवान् हैं। प्रभुकी ऐसी ही मर्जी थी। अत: रोओ मत। परन्तु अपना कोई मर जाता है तो रोते हैं।
पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
अत: हमारे भगवान् हैं और हम भगवान्के हैं, यह उपदेश हमें देना नहीं है। अपितु लेना है। भगवान्से अपनेपनमें हताश होनेकी किंचिन्मात्र, कहीं भी आवश्यकता नहीं है। सांसारिक आशाएँ किसीकी भी आजतक पूरी हुई नहीं और परमात्मप्राप्तिकी आशा आजतक किसीकी बाकी रही नहीं। परन्तु संसारसे तो रखी आशा और भगवान्से रहे निराश, यह गलती की। अत: आज अबहीसे स्वीकार कर लें कि भगवान् हमारे हैं। उनपर हमारा पूरा अधिकार है। और संसार हमारा नहीं है। हमारा संसारपर अधिकार नहीं है। यह बहुत बढ़िया सार बात है।