प्रभुकी प्राप्ति साधनासे नहीं, केवल मान्यतासे

हम सबका अनुभव है कि मैं तो वही हूँ जो बचपनमें था, परन्तु यह शरीर और संसार प्रतिक्षण बदल रहे हैं। इसी प्रकार शास्त्र बताते हैं कि परमात्मा हैं। ‘मैं’ और ‘परमात्मा’ न बदलनेवाले हुए और शरीर और संसार बदलनेवाले हुए। ‘मैं’ की ‘परमात्मा’ से एकता हुई और शरीरकी संसारके साथ एकता हुई। इस शरीरमें जो गाढ़ापन दीखता है, वह पृथ्वीका अंश है। इसमें जो गर्मी है, वह सूर्य तथा अग्निका अंश है। इसकी वायु वायुका अंश है और इसमें पोलाहट अर्थात् जो अंगुली गड़ती है वह आकाशका अंश है।

मैं हूँ, यह आत्मज्ञान है और परमात्मा है, यह परमात्म-ज्ञान है। मैं और परमात्माकी एकता है और शरीर और हमारी कहलानेवाली सामग्रीकी संसारके साथ एकता है। अत: इन अपनी कही जानेवाली वस्तुओंके द्वारा संसारकी सेवा कर देना है और अपने-आपको परमात्माको देना है। बस इतनी ही बात है।

अब प्रश्न उठता है कि जब बात इतनी सुगम है तो फिर यह ठहरती क्यों नहीं? इसका उत्तर है कि आप इस बातको महत्त्व नहीं देते, आदर नहीं देते। यह अभ्यासजन्य नहीं है। इसे या तो मान लो या जान लो। जैसे यह नेपाल है तो आपने इसका अभ्यास नहीं किया, केवल मान लिया कि यह नेपाल है। आप माननेमें स्वतन्त्र हैं। मानना चाहो तो अभी मान सकते हो और न मानना चाहो तो जन्म-जन्मान्तरतक भी नहीं मान सकोगे। आप ऐसे ही मान लो कि परमात्मा है तो काम बन जाय। या आप जान लें कि मेरा (अविनाशीका) नाशवान् संसारके साथ सम्बन्ध नहीं है तो भी काम बन जाय। मैं नहीं बदलता हूँ, परन्तु शरीर और संसार बदलते हैं, यह बिलकुल जानी हुई बात है। इस जानने और माननेमें अभ्यासकी आवश्यकता नहीं। यह सच्ची और शास्त्रोंकी बात है। यदि आप इस बातको आदरपूर्वक स्वीकार कर लें तो आपको करोड़ों रुपये प्राप्त करनेसे भी उतनी शान्ति नहीं मिलेगी जितनी कि इस बातको माननेसे मिलेगी।

एक बात और है कि आप उस बातको महत्त्व नहीं देते जो बात मुफ्तमें मिल जाती है। यदि एक-एक बातपर सौ-सौ रुपयोंका टैक्स लगा दें, तो शायद उस बातको आदर दोगे। और खूब भटकनेके बाद, बद्रीनारायण-जैसे पहाड़ोंमें घूमनेके बाद यही बात प्राप्त होती तो इसे महत्त्व देते और मान लेते। अभी घर बैठे बिना कीमतके बात मिल रही है अत: महत्त्व नहीं देते। जिस किसी भाईने इस बातको महत्त्व दिया है, इसका मूल्य चुकाया है, उसे लाभ हुआ है। जिस किसी भाईने इस बातके लिये अपमान सहा है, निन्दा सही है, कष्ट सहा है, विपरीत परिस्थिति सही है, उसे लाभ अवश्य हुआ है; क्योंकि उसने मूल्य चुकाया है। अगर जोरदार लगन और तड़पन हो जाय तो तत्त्वज्ञान तत्काल हो जाय। अत: आप इस बातको महत्त्व दें कि अब तो बात हमें मिल गयी, अब यह निकल नहीं सकती।

उदयपुरके राणाके बारेमें सुना है कि वे सत्संगकी बात सुनते और उसमें जो बात अच्छी लगती, उसे सुनते ही तुरन्त चल देते कि यह बात कहीं निकल न जाय। अत: आज ही यह बात दृढ़तासे पकड़ लो कि आप स्वयं रहनेवाले हो और ये शरीर-संसार बदलनेवाले हैं। आप न बदलनेवाले, बदलनेवालोंके साथ मिल जाते हो, अपनी उनसे एकता मान लेते हो, यही गलती होती है। यदि आप इस बदलनेवाले शरीर-संसारके साथ न मिलो तो समतामें स्वत: स्थिति है। आप इनसे भिन्न हो। इसी कारण आप अनुकूलता-प्रतिकूलताका अनुभव करते हो। दोनों परिस्थितियोंका अनुभव वही कर सकता है जो दोनों समय रहता है। आप परिस्थितिके प्रभावको स्वीकार करते हो, तभी सुखी-दु:खी रहते हो। यदि परिस्थितिके प्रभावको स्वीकार न करो तो न सुख होगा, न दु:ख। समतामें स्वत: स्थिति हो जायगी।

आपने सुना होगा कि नारदजीने व्यासजीको अपने पूर्व-जन्मकी बात कही। नारदजी माँके साथ सन्तोंके पास जाते थे तो उनकी भगवान‍्में भक्ति हो गयी। फिर उनकी माँ मर गयी। बालकको माँके मरनेपर बहुत बड़ा दु:ख होता है, क्योंकि माँ बालकका आधार है। परन्तु नारदजी खुश हुए। अत: सुखी-दु:खी होना अपने हाथकी बात है। इस वास्ते भगवान् कहते हैं—

‘न त्वं शोचितुमर्हसि’

(गीता २। २७)

तू शोक करनेके योग्य नहीं है। और अन्तमें कहते हैं ‘मा शुच:’ शोक मत कर। शोक करना, न करना अपने हाथकी बात है। शोक-चिन्ता करना; सुखी-दु:खी होना प्रारब्धका फल नहीं है। अनुकूलता-प्रतिकूलताका आना-जाना प्रारब्ध (कर्मों)-का फल है। परन्तु उसमें सुखी-दु:खी होना या न होना आपकी मर्जी है, ये सुख-दु:ख आने-जानेवाले हैं। इनमें क्या तो सुखी होवें और क्या दु:खी होवें? बड़े आश्चर्यकी बात है। जैसे अभी यदि हम दरवाजेपर खड़े हो जायँ और मोटरें खूब आयें तो हम राजी हो जायँ कि आज तो बहुत मोटरें आयीं। दूसरे दिन मानो मोटर आयी नहीं तो दु:खी हो जायँ और लगें रोने कि आज तो कोई मोटर नहीं आयी। अरे! हर्ज क्या हुआ? मोटरें नहीं आयीं तो धूल नहीं उड़ी। ऐसे ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती-जाती रहती हैं, कभी अनुकूल आ गयी, कभी नहीं आयी। कभी प्रतिकूल आ गयी, कभी नहीं आयी। ये धन-सम्पत्ति और परिवार आदि सभी आने-जानेवाले हैं और आप रहनेवाले हो। इनमें राजी या नाराज क्या हों? ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ सुख-दु:खमें सम रहनेसे अपने ‘स्व’ में स्थित हो जायँगे अर्थात् परम आनन्द तथा परम शान्ति प्राप्त कर लेंगे, लोग भी प्रशंसा करेंगे और महात्मा कहेंगे। भगवान् कहेंगे कि मेरा प्यारा है। परन्तु यदि हम सुख-दु:खमें सुखी-दु:खी होते रहेंगे तो हम तो दु:ख पायेंगे ही, लोग भी निन्दा करेंगे और भगवान् भी राजी नहीं होंगे। तो बताओ क्या फायदा हुआ?

धनवान् हो जाना, स्वस्थ हो जाना, मान-प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेना—यह अपने हाथकी बात नहीं है। तो फिर इनमें सुख-दु:ख क्यों हो? अब इस बातको आदर दो, महत्त्व दो, कीमत दो कि अब सुखी-दु:खी नहीं होंगे। इस बातको सीखना नहीं है। इसका अभ्यास नहीं करना है। इसे तो मानना है। फिर बार-बार याद करनेकी आवश्यकता नहीं है। जैसे आपने अपने-आपको ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य मान लिया। अब काम-धंधा करते हुए, खाना-पीना करते हुए यह याद नहीं करना पड़ता। स्वत: याद रहता है। यदि न याद रहे तो भी कोई भूल नहीं होती। भूल कब मानी जायगी कि आप ब्राह्मण हो, पर अपने-आपको ब्राह्मण स्वीकार न करके शूद्र मान लें।

इसी प्रकार मैं परमात्माका हूँ—यह मान लो फिर भले ही काम आदि करते समय आप भूल जायँ, परन्तु यह भूल नहीं मानी जायगी। भूल कब मानी जायगी? भूल उस समय मानी जायगी, जिस समय आप मान लेंगे कि मैं परमात्माका नहीं हूँ। यदि आप ऐसा नहीं मानते तो अखण्ड मान्यता भीतर रहेगी। जैसे अपने नाम, जाति, स्थान, देशके साथ अखण्ड मान्यता हो जाती है, इसी प्रकार परमात्माके साथ अखण्ड मान्यता हो जायगी। ये नाम, जाति, स्थान, देश, शरीर आदि तो अपने हैं नहीं, केवल माने हुए हैं। परन्तु परमात्मा अपने हैं स्वयं भगवान्, सद‍्ग्रन्थ तथा सन्त ऐसा कहते हैं। अत: आज ही अभी-अभी यह बात मान लो कि मैं परमात्माका हूँ और परमात्मा मेरे हैं।