प्रत्येक परिस्थिति सदुपयोगके लिये
हमारे और आपके—सबके अनुभवकी और बिलकुल सच्ची बात है कि संसारकी सभी चीजें प्रतिक्षण बदल रही हैं और नष्ट हो रही हैं। आज आपका बचपनका शरीर जैसा था, वैसा है क्या? बचपनके भाव हैं क्या? बचपनकी परिस्थितियाँ और मान्यताएँ आज हैं क्या? जिन खेल-खिलौनोंको बचपनमें सुखकी सामग्री मानते थे आज उन्हें मानते हैं क्या? तो बचपनकी सारी चीजें बदल गयी, पर आप वही हैं जो बचपनमें थे। इससे सिद्ध हुआ कि आप तो रहनेवाले हैं, अविनाशी हैं और ये संसारकी वस्तुएँ बदलनेवाली हैं; विनाशी हैं। अत: अविनाशी होकर विनाशीके साथ रहना गलतीकी बात है। मैं आपसे यह नहीं कहता कि घर छोड़ दो, परिवार छोड़ दो, धन छोड़ दो, वस्तु छोड़ दो। परंतु यह कहता हूँ कि इनका आश्रय मत लो। इनका भरोसा मत करो। क्योंकि आप तो रहनेवाले हैं और ये रहनेवाली हैं नहीं! इन जानेवाली चीजोंसे काम कैसे चलाओगे! यह शरीर, यह कुटुम्ब, यह धन, यह मान-आदर सब नष्ट होनेवाले हैं। रहनेवाले तो परमात्मा हैं। अत: उन्हींका आश्रय लो, उन्हींकी शरण लो।
बहुत बड़े आश्चर्य तथा दु:खकी बात है कि जिस जीवनसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर ली जाय, जीवन्मुक्ति प्राप्त हो जाय, प्रभु-प्रेम प्राप्त हो जाय, भगवान् मनुष्यके सामने खेलने लगें और मनुष्यके दास बन जायँ, इतना अधिकार दिया है, वही जीवन हम नाशवान् चीजोंके संग्रहमें और सुख-भोगमें नष्ट कर रहे हैं। ये धन, सम्पत्ति, कुटुम्ब, परिवार आदि नाशवान् हैं, रहनेवाले नहीं हैं। इन चीजोंमें समय बरबाद करके हम प्रभु-प्राप्तिरूपी महान् लाभसे वंचित रह रहे हैं, जिसके लिये प्रभुने कृपा करके मानव-शरीर दिया है। हर एक भाईको सोचना-समझना चाहिये कि हमें मनुष्य-शरीर मिल गया, ‘सबसे दुर्लभ मनुष्य देही’, वह भी भारतवर्षमें जन्म मिल गया। फिर कलियुगमें, जिसमें प्रभु-प्राप्ति अति सरल है। उसमें भी गीता-जैसा ग्रन्थ, भगवान्का नाम, सच्चर्चा तथा सत्संग करनेका सुन्दर मौका मिल गया। क्या राज्य, वैभव, सम्पत्तिसे ऐसा मौका मिल सकता है? फिर किस दिनकी प्रतीक्षामें बैठे हो? किसके भरोसे निश्चिन्त बैठे हो? वह कौन-सी ऋतु, कौन-सा वर्ष, कौन-सी परिस्थिति आयेगी जिससे अपना कल्याण करोगे? हम सोचते हैं कि बेटे, पोते बड़े हो जायँ, वे कारोबार सँभाल लें तो फिर करेंगे। परन्तु शरीरका पता नहीं कि कब ‘राम-नाम सत्’ हो जायगा। अत: असली काम (प्रभु-प्राप्ति) अपना कल्याण कर लेना चाहिये। ये संसारके काम लेना-देना, कारोबार आदि तो बेटा-पोता भी कर लेंगे। कोई वंशमें नहीं होगा तो और कोई राज्य सँभाल लेगा। और यह काम नहीं चलेगा तो भी आपका कोई हर्ज नहीं है। परन्तु पीछे आपका उद्धार कौन करेगा?
मानव-शरीर पाकर यदि भगवान्का भजन न करें तो उसके समान हानि नहीं है और उस हानिको हम सह रहे हैं। अत: सच्चे हृदयसे लगन लग जानी चाहिये कि हमें तो अपना कल्याण करना ही है। जबतक न हो जाय तबतक चैन न पड़े; क्योंकि मानव-शरीर मिला ही कल्याणके लिये और इसका कोई आशय नहीं है। यह संसार जो अपना दीखता है यह अपने साथ रहेगा नहीं। इस बातको आप सोच लें—
वे बड़े-बड़े महाराजे
जिनके बजे रात-दिन बाजे
वे भी बने काल के खाजे
मिले नहीं बारम्बार शरीर,
क्यों गफलतमें खोते हो?
अत: मानव-शरीरमें प्रभु-प्राप्तिका, अपने कल्याणका मौका मिला है, इसे मत चूकने दो, अन्यथा धोखा होगा, धोखा। बेचारे मनुष्यको खाने-कमानेसे फुरसत ही नहीं मिलती। परन्तु चिन्ता नहीं है कि मानव-शरीर क्यों मिला। मैंने कलकत्तेमें एक भाईसे पूछा एकान्तमें कि आपके पास लाखों, करोड़ों रुपये हैं, आप उम्रभर बैठे-बैठे खाओ तो भी खर्च होगा नहीं। फिर आप उत्तर दो कि और कमाकर क्या करोगे? सज्जन आदमी थे। बोले—‘स्वामीजी! इसका उत्तर हमारे पास नहीं है।’
यह हालत है। तो करना क्या है? धनका सदुपयोग करना है। बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करो। रोगियोंकी सेवा करो। गायोंकी सेवा करो। महत्त्व वस्तुका नहीं है, वस्तुके उपयोगका है। मानव-शरीरके भी उपयोगकी महिमा है—
‘नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी।’
इस मानव-शरीरसे नरक, स्वर्ग या मोक्ष कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं। इसी प्रकार धनवत्ताका, निर्धनताका, रोगका, नीरोगताका, मानका, अपमानका, निन्दाका, स्तुतिका, सम्पत्तिका, विपत्तिका, शान्ति और कलहका, प्रतिकूलता-अनुकूलता— सबका सदुपयोग और दुरुपयोग किया जा सकता है। सदुपयोगसे होता है कल्याण और दुरुपयोगसे होता है पतन। अत: जो समय, समझ, सामग्री, सामर्थ्य, शक्ति अपने पास है, उसका सदुपयोग करो। उससे अधिककी आवश्यकता नहीं है। जो हमारे पास है ही नहीं, उसकी भगवान् हमसे कैसे आशा करेंगे? एक छोटा बालक है। आप उससे ढाई मनका बोरा उठानेकी आशा करते हैं क्या? जब आप ही इतने ईमानदार हैं कि बालकसे वही आशा करते हैं कि जितना वह कर सके, तो फिर क्या भगवान् हमसे वह आशा रखेंगे जो हम नहीं कर सकते? क्या भगवान् आप-जितने भी दयालु नहीं हैं या आप-जितने भी जानकार नहीं हैं?
इसमें एक बातकी ओर विशेष ध्यान दें। वह यह है कि आप अनुकूल परिस्थिति तो चाहते हैं और प्रतिकूल परिस्थिति नहीं चाहते हैं। परन्तु यदि विचार करें तो पता चलेगा कि प्रतिकूल परिस्थिति जितनी लाभदायक है, उतनी अनुकूल परिस्थिति लाभदायक नहीं हो सकती। अनुकूल परिस्थितिमें आदमी फँसता है। प्रतिकूल परिस्थितिमें ऊँचा उठता है, उसे वैराग्य होता है, त्याग करनेकी मनमें आती है। अत: प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो हमें खुशी मनानी चाहिये। भागवतमें श्लोक आया है कि जिसपर मैं कृपा करता हूँ ‘हरिष्ये तद्-धनम्’ उसका धन हर लेता हूँ, ‘करोमि बन्धुविच्छेदम्’ और कुटुम्बसे सम्बन्ध-विच्छेद कर देता हूँ। ‘स दु:खेन जीवति’ वह दु:खपूर्वक जीता है तो वह संसारसे उपराम हो जाता है और प्रभुकी शरण हो जाता है। दूसरी बात यह कि अनुकूल परिस्थितिमें पुण्य नष्ट होते हैं और प्रतिकूल परिस्थितिमें पाप नष्ट होते हैं, अत: प्रतिकूल परिस्थितिमें आनन्द मनाना चाहिये कि बड़ी भारी कृपा हो गयी। यह बात बिलकुल सच्ची और सिद्धान्तकी है। आप स्वयं विचार करें। कोई भी व्यक्ति और कोई भी परिस्थिति आपके बाधक नहीं हो सकती। आप स्वयं ही अपने बन्धु तथा स्वयं ही अपने शत्रु हैं।
‘आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥’
(गीता ६। ५)
मनुष्य आप ही अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है और कोई न तो शत्रु है, न मित्र है। परिस्थितिका यदि सदुपयोग करें, तो वही परिस्थिति उद्धार करनेवाली हो जाती है। उदाहरणके लिये ध्रुवजीका दृष्टान्त है। ध्रुवजीसे द्रोह रखनेवाली माँ सुरुचि, प्यार करनेवाली माँ सुनीति और उदासीन नारद बाबा तीनों ही कल्याणमें सहायक बने। अत: जो परिस्थिति प्राप्त हो, उसका पूर्ण सदुपयोग करो। यह मत सोचो कि अनुकूल परिस्थिति आयेगी, तब भजन करेंगे; पैसा कुछ हो जाय, तब भजन करेंगे, छोरा काम सँभाल ले, फिर भजन करेंगे। फिर नहीं होगा। किसीका हुआ नहीं।
एक कथा आती है कि जब रावण मर रहा था, तब भगवान् श्रीरामने लक्ष्मणजीसे कहा—‘आज एक बड़ा विद्वान्, एक बड़ा नीतिज्ञ, जिसने वेदोंपर भाष्य आदि लिखे हैं, वह जा रहा है। अत: उससे कोई लाभ लेना चाहो तो ले लो।’ लक्ष्मणजी जाकर रावणके सिरकी तरफ खड़े हो गये और पूछा कि तुम्हारे जीवनका क्या सार है—यह बताओ। लक्ष्मणजी सिरकी तरफ खड़े थे, इस कारण रावण बोला नहीं। फिर भगवान् श्रीरामके कहनेसे लक्ष्मणजी रावणके पैरोंकी तरफ जाकर खड़े हो गये। तब रावण बोला—‘तपस्वी, एक बात है कि जो काम करना है, उसे जल्दी ही कर लेना चाहिये। मेरा विचार था कि चन्द्रमाको निष्कलंक कर दूँ और चन्द्रमा रोजाना पृथ्वीपर उदय हो। अमृत लाकर समुद्रका जल मीठा कर दूँ। स्वर्गतक सीढ़ी लगा दूँ जिससे वहाँ कभी भी आ-जा सकें। अग्निका धुआँ मिटा दूँ। ऐसा विचार था, परंतु कर नहीं सका। इस वास्ते जो काम करना हो, शीघ्र कर लेना चाहिये।’
अत: प्रत्येक अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति, जो भी आपको प्राप्त है, उसका सदुपयोग करोगे तो वह आपके कल्याणमें सहायक हो जायगी।