संसार ‘नहीं’ है और परमात्मा ‘है’

(परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजके प्रात:कालीन प्रवचन)

अपना कल्याण चाहनेवाला साधक यदि दृढ़तासे यह मान ले कि ‘परमात्मा है’ और ‘संसार नहीं है’। तो संसारका आकर्षण मिटकर परमात्मासे स्वत: प्रेम हो जायगा।

‘संसार है’ ऐसा माननेसे ही विषय-भोग भोगते हैं और सुख-सामग्री मानकर पदार्थोंका संग्रह करते हैं—इतनी ही बात नहीं है बल्कि अपना निर्णय भी कर लेते हैं—

कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥

(गीता १६। ११)

जो मनुष्य कामनाके अनुसार उपभोग परायण हैं उनका यह निश्चय होता है कि सुख भोगना और संग्रह करना—इसके सिवा और कुछ नहीं है।

शास्त्र, सत्संग, अपने विचार और अनुभवसे प्राय: हम सभी यह जानते हैं कि संसारका कोई भी पदार्थ अथवा सुख सदा रहनेवाला नहीं है। हमारे पूर्वज (बाप-दादा आदि) भी नहीं रहे—कालके गालमें समा गये, तो हमारे शरीर (जो उन्हीं धातु-पदार्थोंसे बने हैं) सदा कैसे रहेंगे? इसी प्रकार सुखके रहने और मिलनेका केवल बहम है। भगवान् कहते हैं—

ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।

आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

(गीता ५। २२)

‘जो इन्द्रिय तथा विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले सब भोग हैं, वे विषयी पुरुषोंको सुखरूप दीखते हैं, पर दु:खके कारण हैं और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन! बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमा करता।’

अगर संसार अपना होता तो हमें याद रहता, किन्तु पिछले जन्मके धन, शरीर, कुटुम्ब आदि कितने थे, कौन थे, कहाँ थे, यह आपको यादतक नहीं है। जैसी दशा पिछले जन्मके व्यक्ति, पदार्थोंके सम्बन्धकी हुई, वही दशा वर्तमानके धनादिकी होगी। अत: इन नाशवान् पदार्थों आदिके लिये समझ, समय और सामर्थ्यको नष्ट नहीं करना चाहिये। इन धन, शरीरादिके द्वारा निष्कामभावसे अर्थात् बदलेमें कुछ न चाहकर सबकी सेवा कर देनी चाहिये। नि:स्वार्थभावसे जिनकी सेवा करते हैं, उनके ही पदार्थ समझकर सेवामें लगा देंगे तो उनको प्रसन्नता होगी और आप असंग हो जायँगे। संसारमें अपनापनका सम्बन्ध केवल दूसरोंकी सेवा करनेके लिये है। ऐसा करनेसे आपको परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।

यह नियम है कि हम जिसे सर्वोपरि और अपना मानते हैं उस तरफ स्वत: आकर्षण होता है, उसका भजन भी अपने-आप होने लगता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥

(गीता १५। १९)

‘हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्वसे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकारसे निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वरको ही भजता है।’ जो पुरुष परमात्माको सर्वोत्तम जान लेता है, वही सर्वज्ञ है अर्थात् उसकी दृष्टिमें परमात्माके अतिरिक्त कुछ नहीं है।

प्राय: लोग ‘परमात्मा है’ ऐसा मानते हुए भी नहीं मानते अर्थात् शास्त्र-विरुद्ध, लोकमर्यादा-विरुद्ध आचरण करते हुए डरते नहीं। जो सर्वत्र परमात्माकी सत्ता मानता है, उससे दोष-पाप हो ही कैसे सकते हैं? और परमात्माको परम सुहृद्, परम कृपालु माननेपर चिन्ता, भय, दीनता आदि आ ही नहीं सकते। काकभुसुंडिजीको शाप मिलनेपर भी ‘नहिं कछु भय न दीनता आई’।

चिन्ता दीनदयालको मो मन सदा अनन्द।

जायो सो प्रतिपालसी ‘रामदास’ गोविन्द॥

ऐसे अवसरपर साधकको सावधान रहना चाहिये अर्थात् ऐसी विपरीत धारणा कभी नहीं करनी चाहिये कि भय, चिन्ता, शोक आ गये तो मैंने परमात्माको माना ही नहीं, बल्कि यह कसौटी करनी चाहिये कि परमात्माके रहते हुए भय, चिन्ता, शोक मेरेमें कैसे आ सकते हैं?

परमात्मा है—इस तत्त्वका ठीक अनुभव न होनेपर तथा संसार है—इस मान्यताके न मिटनेपर ऐसी एक तीव्र व्याकुलता होनी चाहिये, जिससे परमात्मा और संसार दोनोंका तत्त्वबोध हो जाय। संसार दिखायी देते हुए भी ‘नहीं है’ और हमारा नहीं है। परमात्मा दिखायी नहीं देते हुए भी ‘है’ और ‘हमारे हैं’। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि सांसारिक वस्तुओंसे ही संसार दीखता है, क्योंकि जिस धातुका संसार है, उसी धातुके मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ हैं—‘मन:षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि’ (गीता १५। ७) मनसहित पाँचों इन्द्रियाँ प्रकृति (संसार)-में स्थित हैं। हमारा स्वरूप (आत्मा) और परमात्मा (है) दोनों एक ही तत्त्व हैं—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।’ (गीता १५।७) ‘इस देहमें यह सनातन जीवात्मा मेरा ही अंश है।’ अतएव यदि हम अपनी सत्ता (स्वरूप)-में स्थित हो जायँ तो अभी परमात्मा दीखने लगेंगे। संसारके अंशसे संसार दीखता है और परमात्माके अंशसे परमात्मा दीखते हैं। जबतक हमारी स्थिति ‘नहीं’ (संसार)-में रहेगी, तबतक परमात्मा (सर्वत्र होते हुए भी) नहीं दिखायी देंगे, परन्तु स्थिति जब ‘है’ (परमात्मा)-में हो जायगी तब परमात्मा ही दिखायी देंगे। अतएव हमें आज—अभीसे ही दृढ़तापूर्वक यह मान लेना चाहिये कि ‘परमात्मा हैं’ सर्वत्र परिपूर्ण हैं और हमारे अपने हैं।