श्रीमद्भगवद्गीताकी महिमा
उन्नति क्या है? भगवद्गीताके छठे अध्यायके बाईसवें श्लोकमें आया है—
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
जिस परमात्माकी प्राप्तिरूप लाभको प्राप्त करके उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और जिस परमात्माकी प्राप्तिरूप अवस्थामें स्थित होकर बड़े भारी दु:खसे भी विचलित नहीं होता। यह श्लोक मनुष्यकी उन्नतिकी पहचानका थर्मामीटर है। इसका अर्थ हुआ कि अब मेरेको कुछ मिल जाय, यह मनुष्यकी इच्छा नहीं होती। और दूसरी बात है कि दु:ख उसे स्पर्श ही नहीं करता। इसका तात्पर्य हुआ कि मरनेका भय, जीनेकी इच्छा, पानेकी लालसा—सब मिट जाते हैं और करनेको कोई काम बाकी नहीं रहता। तब समझना चाहिये कि मनुष्य-जीवनमें आकर हमने उन्नति की और जीवन सफल हो गया। परन्तु जबतक मरनेका भय रहता है तबतक समझना चाहिये कि जो काम करना चाहिये था, वह नहीं किया है। जानने लायकको नहीं जाना है, पाने लायकको नहीं पाया है और हमारा मनुष्य-जीवन सफल नहीं हुआ है।
स्कूलमें पढ़ते समय अनुभव किया होगा कि यदि पाठ याद होता है तो निरीक्षणके लिये या परीक्षाके लिये कोई आता है और आपसे पूछता है तो इसमें आपको आनन्द आता है। परन्तु किसी छोरेको पाठ याद नहीं होता, तो वह छोरा पीछेको हो लेता है कि कहीं मेरेसे न पूछ लें। ऐसा भय लगता है। भय क्यों होता है? भय इसलिये होता है कि जो पढ़ाई की है वह ठीक नहीं की। ऐसे ही यह मानव-शरीर ब्रह्म-विद्याका अध्ययन करनेके लिये मिला है। यदि मनुष्यको मरनेका भय, जीनेकी इच्छा होती है तो इसका अर्थ है कि उसने ठीक प्रकारसे ब्रह्म-विद्याका पूरा अध्ययन नहीं किया। जब यह अध्ययन पूरा हो जायगा तो मरनेका भय और जीनेकी इच्छा नहीं रहेगी। फिर जीते रहें तो आनन्द, मर जायँ तो आनन्द, कोई चिन्ता नहीं, कोई इच्छा नहीं, कोई भय नहीं। फिर न जानना बाकी रहता है, न प्राप्त करना बाकी रहता है और न करना बाकी रहता है। इन चीजोंका तो खाता ही उठ जाता है। यह बात मैं आपसे सच्ची कहता हूँ। यह मेरी व्यक्तिगत बात नहीं है। मेरे घरकी बात नहीं है। यह सन्तोंकी, शास्त्रोंकी, भगवद्गीताकी बात है।
मनुष्यमें एक करनेकी, एक जाननेकी और एक पानेकी— तीन शक्तियाँ स्वाभाविक हैं। मनुष्य जबतक अपने लिये करता है तबतक वह कृतकृत्य नहीं होता। परन्तु जब करने लायक काम कर लेता है तब मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है अर्थात् उसे कुछ भी करना बाकी नहीं रहता। ऐसे ही चाहे मनुष्यको कितनी ही भाषाओंकी जानकारी हो जाय, वह कितना ही विद्वान् हो जाय, जबतक वह स्वयं अपने-आपको नहीं जानता, तबतक जानना बाकी रहेगा। परंतु जब अपने-आपको ठीक-ठीक जान लेगा, फिर जानना बाकी नहीं रहेगा। इसी प्रकार पाना कबतक बाकी रहता है? जबतक कि प्रभु-दर्शन, प्रभु-प्रेमकी प्राप्ति न हो जाय। जिस समय सर्वोपरि परमात्मा मिल जायँ, उनके दर्शन हो जायँ, उनका प्रेम प्राप्त हो जाय, तत्त्वका बोध हो जाय, फिर पाना बाकी नहीं रहेगा। और ये तीनों बातें मनुष्य-जन्ममें हो सकती हैं। भगवद्गीतासे, सन्तोंकी वाणीसे और सत्संगसे मुझे इस बातका पता चला है कि इसके लिये मनुष्यमात्र अधिकारी है, चाहे वह हिंदू, मुसलमान, बौद्ध, पारसी, ईसाई कोई भी हो। किसी भी सम्प्रदायका हो, वैष्णव, शैव, शाक्त, जैन, सिख आदि कोई क्यों न हो। मेरे सत्संगमें मुसलमान भी आते हैं, आर्य-समाजी भी आते हैं। आर्य-समाजियोंने मुझे बुलाया है, मैं गया हूँ। बहुत-से सम्प्रदायोंमें मेरा जानेका काम पड़ता है। मेरी बात किसी सम्प्रदायके, किसी मजहबके विरुद्ध नहीं होती। जैसे माँ सब बच्चोंको प्यारसे दुलारती है, रखती है, उदारतासे दूध पिलाती है—ऐसे ही हम सब परमात्माके बच्चे हैं। अत: उस परमात्मारूपी माँका मस्तीसे, आनन्दसे दूध पीयें। ‘दुग्धं गीतामृतं महत्’। यह बड़ा विलक्षण दूध है जितना पीओगे, उतनी ही आपकी पुष्टि होती चली जायगी। जब गीतारूपी दूध पीनेमें रस आने लगेगा, तो निहाल हो जायँगे।
गीता एक विलक्षण ग्रन्थ है। इसमें केवल सात सौ श्लोक हैं। परन्तु इसमें अलौकिक तत्त्व भरा है। इसकी संस्कृत सरल है। हम सब इसे पढ़ सकते हैं, याद कर सकते हैं और काममें ला सकते हैं। इनमें नयी-नयी बातें मिलती हैं। पहले भले ही आरम्भमें यह सोच लें कि मैंने तो अब गीता पूरी पढ़ ली और मैं जानकार हो गया। परन्तु जैसे-जैसे इसमें गहरे उतरोगे वैसे-वैसे पता लगेगा कि मैं तो बहुत कम जानता हूँ। इसमें नित्य नये-नये विचित्र भाव मिलते हैं। मुझे पाठ करते-करते गीता याद हो गयी। मैंने सीधा पाठ किया। फिर उलटा पाठ ‘यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:’ से ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे.........’ तक बिना गीताजी देखे एकान्तमें बैठकर किया, बड़ा विलक्षण आनन्द आया केवल पाठमात्र करनेसे। आप करके देखें। उलटा पाठ करनेसे श्लोकोंपर विशेष ध्यान जाता है और श्लोकोंके अर्थका विशेष ज्ञान होता है तथा बहुत शान्ति मिलती है। धन, विद्या, परिवार, मान, आदर आदि प्राप्त करके आप भले ही अपनेको बड़ा मान लें, परन्तु बड़े नहीं बनते। आप अविनाशी, इन विनाशी चीजोंसे क्या बड़े बनेंगे। परंतु गीताका अध्ययन करके आप सर्वोपरि हो जायँगे। आपको परम शान्ति मिलेगी। इनमें संदेह नहीं।
एक वैश्य भाईने मेरेको बताया कि हम तो मानते थे कि गीता अच्छी है, परंतु याद करनेपर मालूम पड़ा कि बड़ी विलक्षण है। आप स्वयं अध्ययन करके, इसके भीतर प्रवेश करके देखें कि इस छोटे-से ग्रन्थमें कितने विचित्र तथा विलक्षण भाव हैं। इसके भीतर प्रवेश करके आप अविनाशी परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लोगे।
‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’
फिर उस लाभको प्राप्त करके न कुछ करना बाकी रहेगा, न कुछ जानना बाकी रहेगा। ऐसा होनेपर फिर जीनेकी और कुछ करनेकी इच्छा नहीं रहती तथा मरनेका भय नहीं रहता। मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है। ज्ञात-ज्ञातव्य हो जाता है। पूर्णता हो जाती है और मनुष्य-जन्म सफल हो जाता है।
संत-महापुरुषोंके उपदेशके अनुसार अपना
जीवन बनाना ही उनकी सच्ची सेवा है!