स्वभाव-शुद्धि
मनुष्य-शरीर स्वभावको सुधारनेके लिये मिला है। हम पशु, पक्षी, वृक्ष, लता आदिको समझा नहीं सकते कि तुम ऐसा करो और ऐसा मत करो। विधि-निषेध केवल मनुष्यके लिये हैं। अब प्रश्न है कि स्वभावमें बिगाड़ क्या हुआ है? क्या अशुद्धि है? तो इसका उत्तर है कि जैसे विजातीय वस्तु लगनेसे कपड़ा मैला होता है, ऐसे ही इस मनुष्यके विजातीय द्रव्य लगा है। अब प्रश्न उठता है कि विजातीय द्रव्य क्या है? तो इसका उत्तर है कि यह जीवात्मा स्वयं तो है परमात्माका अंश। यह है नित्य एवं अविनाशी। परन्तु इसने विनाशी एवं अनित्य वस्तुओंके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया, उनको महत्त्व दिया, उनका आश्रय लिया, वही इसके मैल लगा। इसके कारण अशुद्धि आयी। अब इस अशुद्धिको कैसे दूर करें, तो इसका सरल उपाय है कि यदि यह नया मैल न लगावें तो पुराना मैल छूट जायगा। क्योंकि यह स्वयं तो है नित्य और मैल है अनित्य। अनित्य नष्ट होता ही है और नित्य सदा रहता ही है।
अब इस नये मलमें दो बात मुख्य रूपसे आती हैं—एक तो वस्तुओंको ले लूँ अर्थात् उनका संग्रह कर लूँ और दूसरी उन वस्तुओंके द्वारा सुख भोग लूँ। यह रुपयोंका तथा वस्तुओंका संग्रह करना चाहता है और उनसे सुख लेना चाहता है। यह उत्पन्न होनेवाले धन तथा नष्ट होनेवाले धन तथा पद आदिसे अपनेको बड़ा मानता है। परंतु स्वयं तो है नित्य और धन-पद आदि हैं अनित्य। उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली वस्तुओंको महत्त्व देना ही अपना पतन करना है।
अत: आजसे ही विचार कर लें कि उत्पन्न होनेवाली तथा नष्ट होनेवाली वस्तुओंके द्वारा सेवा करनी है, परंतु उनसे अपनेमें बड़प्पनका अनुभव नहीं करना है। धन आ जाय तो बड़ी अच्छी बात और धन चला जाय तो बड़ी अच्छी बात। धन आ जाय तो धनका उपयोग करें और धन चला जाय तो अपनी सेवा करनेकी जिम्मेदारी नहीं। इसमें एक विशेष बात है कि हम मैल लगानेमें स्वाधीन नहीं अपितु पराधीन हैं। परंतु निर्मल होनेमें एकदम स्वाधीन हैं, कोई पराधीन नहीं है। आज यदि मैं चाहूँ कि लखपति बन जाऊँ, तो उम्रभर संग्रह करके भी लखपति बन जाऊँगा क्या? हम मैल लगानेमें स्वतन्त्र नहीं हैं। आप करोड़पति हैं और करोड़ रुपयोंको ठोकर मारकर आज ही चल दें तो कौन मना करे! अत: शुद्ध होनेमें सब स्वतन्त्र हैं, कोई पराधीन नहीं।
उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे पशु, पक्षी, वृक्ष, लता, दूब सभी सुख लेते हैं। वर्षा होनेपर वृक्षोंके पत्ते खिल जाते हैं। लता-दूब हरे हो जाते हैं। प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु मनुष्यमें और पशु, पक्षी, वृक्ष, आदिमें एक अन्तर है। मनुष्यकी विशेषता है कि वह उत्पन्न होनेवाली और नष्ट होनेवाली वस्तुओंको पहचान सकता है। मनुष्यको भगवान्ने बुद्धि और विवेक दिया है। अत: इसे चाहिये कि इस विवेकसे उत्पन्न तथा नष्ट होनवाली वस्तुओंको आदर न दे। महत्त्व न दे। वस्तुको काममें लाये। जैसे जूतीको पहननेके काममें लाते हैं। उसको सिरपर उठा लेना, उसको महत्त्व देना, उसका आश्रय लेना गलती है। यह सोचना कि मैं बड़ा धनी हूँ, बलवान् हूँ, कीर्तिवान् हूँ, बिलकुल गलती है। यह मैल है। अपनेको शुद्ध करनेके लिये इस मैलको छोड़ना पड़ेगा।
परमात्मा और हम स्वयं तो अनुत्पन्न हैं और यह संसार तथा इसकी सामग्री उत्पन्न तथा नष्ट होनेवाली है। नष्ट होनेवालीका साथ करोगे, तो रोना पड़ेगा ही। इस वास्ते चेत करो।
अब प्रश्न उठ सकता है कि धन आदिकी कामना नहीं करेंगे तो धन कैसे आयेगा? इसका उत्तर है कि क्या धनकी कामना या इच्छासे धन मिलता है? क्या इच्छा करनेमात्रसे भोग मिलते हैं? संग्रह तथा भोगकी इच्छाका त्याग कर दोगे तो भी जो चीज आनी होगी—वह तो आयेगी ही; और जो नहीं आनी होगी, वह नहीं आयेगी। यह एकदम पक्की और सिद्धान्तकी बात है। आप यह भी कह सकते हैं कि संग्रह किये बिना काम कैसे चलेगा? इसका उत्तर है कि संग्रहको महत्त्व मत दो। संग्रह की हुई वस्तुओंका सदुपयोग करो। सदुपयोगके लिये मना नहीं है। और दूसरी बात है कि इस संग्रहसे काम कितने दिन चलाओगे! एक दिन मरना पड़ेगा ही। ‘राम-नाम सत् है’ बोला जायगा। फिर सब काम स्वत: बन्द हो जायँगे।
अब एक शंका और हो सकती है कि विधि-निषेध अर्थात् क्या करें और क्या न करें इसका निर्णय कैसे करें? तो इसका उत्तर भगवान् गीताजीके सोलहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें देते हैं—
‘तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।’
कर्तव्य, अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र प्रमाण हैं अर्थात् जो शास्त्रोंमें करनेके लिये कहा गया है, वह तो करेंगे और जो शास्त्रोंमें नहीं करनेके लिये कहा गया है, वह नहीं करेंगे। अपनी इच्छाके अनुसार चलना तो पशु-पक्षियोंमें होता है। मनुष्यको तो शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार कर्तव्यका पालन करना है। मनुष्य-शरीर उत्तम-से-उत्तम है। अत: इससे उत्तम-से-उत्तम काम करना है तथा समयका उत्तम-से-उत्तम उपयोग करना है। अगर संग्रह करनेकी इच्छा रखोगे और भोग भोगनेकी इच्छा रखोगे, तो अशुद्धि तथा अपवित्रता आयेगी। अत: शास्त्रों तथा भगवान्की आज्ञाके अनुसार काम करो जिससे अशुद्धि तथा अपवित्रता नहीं आये।