निवेदन

उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुका तो निर्माण होता है, पर अनुत्पन्न तथा अविनाशी तत्त्वका निर्माण नहीं होता, प्रत्युत खोज होती है। उसकी खोजके लिये गहरा उतरकर विचार करना आवश्यक है; क्योंकि ‘जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ’। अत: ऐसे ही विचारपूर्ण लेखोंका यह संग्रह तत्त्वान्वेषी जिज्ञासुओंकी सेवामें प्रस्तुत किया जा रहा है। आशा है, परम श्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजकी अन्य पुस्तकोंकी भाँति इस पुस्तकको भी जिज्ञासुजन पसन्द करेंगे और इसका अध्ययन-मनन करके लाभ उठायेंगे।