गुरु-विषयक प्रश्नोत्तर

प्रश्न—गुरुके बिना उद्धार कैसे होगा; क्योंकि रामायणमें आया है—‘गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई’ (मानस, उत्तर० ९३।३)?

उत्तर—उसी रामायणमें यह भी आया है—

गुर सिष बधिर अंध का लेखा।

एक न सुनइ एक नहिं देखा॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई।

सो गुर घोर नरक महुँ परई॥

(मानस, उत्तर० ९९। ३-४)

तात्पर्य हुआ कि बनावटी गुरुसे उद्धार नहीं होगा। बनाया हुआ गुरु कुछ काम नहीं करेगा। किसी-न-किसी सन्तकी बात मानेंगे, तभी उद्धार होगा और जिसकी बात माननेसे उद्धार होगा, वही हमारा गुरु होगा। श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धमें दत्तात्रेयजीने अपने चौबीस गुरुओंका वर्णन किया है। तात्पर्य है कि मनुष्य किसीसे भी शिक्षा लेकर अपना उद्धार कर सकता है। अत: गुरु बनानेकी जरूरत नहीं है, प्रत्युत शिक्षा लेनेकी जरूरत है। जिसकी शिक्षा लेनेसे, जिसकी बात माननेसे हमारा उद्धार हो जाय, वह बिना गुरु बनाये भी गुरु हो गया। अगर बात न मानें तो गुरु बनानेपर भी कल्याण नहीं होगा, उलटे पाप होगा, अपराध होगा।

आजकल एक साथ कई लोगोंको दीक्षा दे देते हैं और सामूहिक रूपसे सबको अपना चेला बना लेते हैं। न तो गुरुमें चेलोंके कल्याणकी चिन्ता होती है और न चेलोंमें ही अपने कल्याणकी लगन होती है। गुरु चेलोंका कल्याण कर सकता नहीं और चेले दूसरी जगह जा सकते नहीं। अत: चेले बनाकर उलटे उन लोगोंके कल्याणमें बाधा लगा दी!

प्रश्न—यह बात प्रचलित है कि निगुरेका कल्याण नहीं होता। अत: गुरु बनाना आवश्यक हुआ?

उत्तर—जिसको अच्छाई-बुराईका ज्ञान है, वह निगुरा कैसे हुआ? अच्छाई-बुराईका ज्ञान (विवेक) सबमें है। भगवान् का नाम लेना चाहिये, उनका स्मरण करना चाहिये, किसीको भी दु:ख नहीं देना चाहिये आदि बातें सब जानते हैं। इन बातोंका ज्ञान उनको जिससे हुआ, वह गुरु हो गया, चाहे उसको जानें या न जानें, मानें या न मानें।

जिसने गुरु तो बना लिया, पर उनकी बात नहीं मानी, वही निगुरा होता है। उसको अपराध लगता है। जिसने गुरु बनाया ही नहीं, उसको अपराध कैसे लगेगा?

गुरु बनानेसे कल्याण हो ही जायगा—ऐसा कोई विधान नहीं है। कल्याण अपनी लगनसे होता है, गुरु बनानेसे नहीं।

भगवान् जगत् के गुरु हैं—‘कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।’ आप जगत् से बाहर नहीं हैं, फिर आप निगुरे कैसे हुए? इसलिये अच्छे महात्माओंका सत्संग करो और उनकी बातोंको काममें लाओ। गुरु-शिष्यका सम्बन्ध जोड़ना ठीक नहीं है। वास्तवमें जो जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्प्रेमी महात्मा होते हैं, वे कल्याणकी बात तो बताते हैं, पर चेला नहीं बनाते। उनको गुरु बनाये बिना उनकी जितनी बातें मानोगे, उतना लाभ तो अवश्य होगा ही, और किसी बातको नहीं मानोगे तो पाप नहीं लगेगा। परन्तु गुरु बनानेपर बात नहीं मानोगे तो पाप ही नहीं, अपराध लगेगा।

प्रश्न—कहते हैं कि गुरुसे मन्त्र लेनेसे उस मन्त्रमें शक्ति आती है?

उत्तर—मन्त्र देनेवालेमें शक्ति होगी, तभी तो उसके दिये मन्त्रमें शक्ति आयेगी। जिसमें खुदमें शक्ति नहीं हो, उसके दिये मन्त्रमें शक्ति कैसे आयेगी? इसलिये कहा है—

वचन आगले सन्त का, हरिया हस्ती दन्त।

ताख न टूटे भरम का, सैंधे ही बिनु सन्त॥

अर्थात् अनुभवी सन्तका वचन हाथी-दाँतकी तरह होता है, जो अज्ञानरूपी द्वारको तोड़ देता है। हाथी अपने दाँतोंसे किलेका द्वार तोड़ देता है। परन्तु हाथीके बिना केवल उसके दाँतोंसे कोई द्वार तोड़ना चाहे तो नहीं तोड़ सकता। कारण कि वास्तवमें शक्ति हाथीमें है, केवल उसके दाँतोंमें नहीं। ऐसे ही शक्ति सन्तके अनुभव में है, केवल उसके वचनोंमें नहीं।

आजकल गुरु बननेका, अपने सम्प्रदायकी टोली बनानेका शौक तो है, पर जीवका कल्याण हो जाय—इस तरफ खयाल कम है। अपने सम्प्रदायके अनुसार मन्त्र देनेसे अपनी टोली तो बन जाती है, पर तत्त्वप्राप्तिमें कठिनता होती है। तत्त्वप्राप्ति तब होती है, जब अपनी श्रद्धा, विश्वास, रुचि और योग्यताके अनुसार साधन किया जाय। सभी उपासनाएँ ठीक हैं, पर जो उपासना स्वाभाविक होती है, वह असली होती है और जो की जाती है, वह नकली होती है। आजकल साधन करनेवालोंके सामने बड़ी उलझन आ रही है। गुरुजीने कृष्ण-मन्त्र दे दिया, पर हमारा मन लगता है राम-मन्त्रमें, अब क्या करें? इस विषयमें मेरी प्रार्थना है कि अगर आपकी रुचि, श्रद्धा-विश्वास राम-मन्त्रमें है तो राम-मन्त्रका ही जप करना चाहिये। गुरुजीने दूसरा मन्त्र बताया है तो एक माला उसकी जप सकते हैं, पर अन्य समय अपनी रुचिवाला मन्त्र ही जपना चाहिये। उपासना वही सिद्ध होती है, जिसमें स्वत:स्वाभाविक रुचि होती है। ऊपरसे भरी हुई उपासना जल्दी सिद्ध नहीं होती।

जिस मन्त्रमें आपका श्रद्धाभाव अधिक होगा, उस मन्त्रमें स्वत: शक्ति आ जायगी। कारण कि मूलमें शक्ति परमात्माकी है, किसी व्यक्तिकी नहीं। अगस्त्य, विश्वामित्र आदि बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंमें जो शक्ति थी, वह उनको गुरुसे प्राप्त नहीं हुई थी, प्रत्युत अपनी तपस्या आदिके कारण भगवान् से प्राप्त हुई थी। भगवान् की शक्ति सर्वत्र है, नित्य है और सबके लिये है। उसमें किसीका पक्षपात नहीं है, जो चाहे, उस शक्तिको प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न—गुरुके बिना कुण्डलिनी कैसे जगेगी?

उत्तर—कुण्डलिनी जगनेसे परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती, कल्याण नहीं होता, किसी सोयी हुई सर्पिणीको छेड़ दो तो क्या मुक्ति हो जायगी? श्रीशरणानन्दजी महाराजसे किसीने पूछा कि कुण्डलिनीके विषयमें आप क्या जानते हैं? उन्होंने उत्तर दिया कि हम यह जानते हैं कि कुण्डलिनीके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है। कुण्डलिनी सोती रहे अथवा जाग जाय, उससे हमारा क्या मतलब? कुण्डलिनी शरीरमें है, स्वरूपमें नहीं। अत: कुण्डलिनीके जगनेसे साधक शरीरसे अतीत कैसे होगा? शरीरसे अतीत हुए बिना कल्याण कैसे होगा? कल्याण तो शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर ही होता है।

प्रश्न—कई लोगोंको गुरुके द्वारा कुण्डलिनी-जागरण आदिकी अलौकिक अनुभूतियाँ होती हैं, वह क्या है?

उत्तर—वह चमत्कार तो होता है, पर उससे कल्याण नहीं होता। कल्याण तो जड़ता (शरीर-संसार) से ऊँचा उठनेपर ही होता है।

प्रश्न—हमने गुरुसे कण्ठी तो ले ली, पर अब उनमें श्रद्धा नहीं रही तो क्या कण्ठी उनको वापिस कर दें?

उत्तर—कण्ठी वापिस करनेके लिये मैं कभी नहीं कहता। मैं यही सम्मति देता हूँ कि रोजाना एक माला गुरु-मन्त्रकी फेर लो और बाकी समय जिसमें श्रद्धा हो, उस मन्त्रका जप करो और सत्संग-स्वाध्याय करो।

प्रश्न—पहले गुरु बना लिया, पर अब उनमें श्रद्धा नहीं रही तो उनका त्याग करनेसे पाप तो नहीं लगेगा?

उत्तर—जब आपके मनमें गुरुको छोड़नेकी इच्छा हो गयी, उनसे श्रद्धा हट गयी तो गुरुका त्याग हो ही गया। इसलिये उस गुरुकी निन्दा भी मत करो और उसके साथ सम्बन्ध भी मत रखो।

जिसमें रुपयोंका लोभ हो, स्त्रियोंमें मोह हो, कर्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान न हो, खराब रास्तेपर चलता हो, ऐसे गुरुका त्याग करनेमें कोई पाप, दोष नहीं लगता। शास्त्रोंमें ऐसे गुरुका त्याग करनेकी बात आती है—

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानत:।

उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते॥*

(महाभारत, उद्योग० १७८। ४८)

‘यदि गुरु भी घमण्डमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान खो बैठे और कुमार्गपर चलने लगे तो उसका भी त्याग कर देनेका विधान है।’

ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो मिथ्यावादी विकल्पक:।

स्वविश्रान्तिं न जानाति परशान्तिं करोति किम्॥

(सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, गुरुगीता)

‘ज्ञानरहित, मिथ्यावादी और भ्रम पैदा करनेवाले गुरुका त्याग कर देना चाहिये; क्योंकि जो खुद शान्ति नहीं प्राप्त कर सका, वह दूसरोंको शान्ति कैसे देगा?’

पतिता गुरवस्त्याज्या माता च न कथञ्चन।

गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी॥

(स्कन्दपुराण, मा० कौ० ६। ७; मत्स्यपुराण २२७। १५०)

‘पतित गुरु भी त्याज्य है, पर माता किसी प्रकार भी त्याज्य नहीं है। गर्भकालमें धारण-पोषण करनेके कारण माताका गौरव गुरुजनोंसे भी अधिक है।’

प्रश्न—क्या स्त्री किसीको गुरु बना सकती है?

उत्तर—स्त्रीको कोई गुरु नहीं बनाना चाहिये। अगर बनाया हो तो छोड़ देना चाहिये। स्त्रीका पति ही उसका गुरु है। शास्त्रमें आया है—

गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरु:।

पतिरेव गुरु: स्त्रीणां सर्वस्याऽभ्यागतो गुरु:॥

(पद्मपुराण, स्वर्ग० ५१।५१, ब्रह्मपुराण ८०।४७)

‘अग्नि द्विजातियोंका गुरु है, ब्राह्मण चारों वर्णोंका गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोंका गुरु है और अतिथि सबका गुरु है।’

वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक: स्मृत:।

पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया॥

(मनुस्मृति २।६७)

‘स्त्रियोंके लिये वैवाहिक विधिका पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत), पतिकी सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है।’

स्त्रीको पतिके सिवाय किसी भी पुरुषसे किसी प्रकारका भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये। स्त्रियोंसे प्रार्थना है कि वे कभी किसी साधुके फेरमें न पड़ें। आजकल बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है। मेरे पास ऐसे पत्र भी आते हैं और भुक्तभोगी स्त्रियाँ भी आकर अपनी बात सुनाती हैं, जिससे ऐसा लगता है कि वर्तमान समयमें स्त्रीके लिये गुरु बनाना अर्थात् किसी भी परपुरुषसे सम्बन्ध जोड़ना अनर्थका मूल है।

साधुको भी चाहिये कि वह किसी स्त्रीको चेली न बनाये। दीक्षा देते समय गुरुको शिष्यके हृदय आदिका स्पर्श करना पड़ता है, जबकि संन्यासीके लिये स्त्रीके स्पर्शका कड़ा निषेध है। श्रीमद्भागवतमें आया है कि हाड़-मांसमय शरीरवाली स्त्रीका तो कहना ही क्या है, लकड़ीकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करे और हाथसे स्पर्श करना तो दूर रहा, पैरसे भी स्पर्श न करे—

पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।

(श्रीमद्भा० ११।८।१३)

शास्त्रमें यहाँतक कहा गया है—

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥

(मनु० २।२१५)

‘मनुष्यको चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्रीके साथ भी कभी एकान्तमें न रहे; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान् मनुष्यको भी अपनी तरफ खींच लेती हैं।’

सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु

योगस्य पारं परमारुरुक्षु:।

मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो

वदन्ति या निरयद्वारमस्य॥

(श्रीमद्भा० ३। ३१। ३९)

‘जो पुरुष योगके परम पदपर आरूढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवाके प्रभावसे आत्मा-अनात्माका विवेक हो गया हो, वह स्त्रियोंका संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुषके लिये नरकका खुला द्वार बताया गया है।’

विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशना-

स्तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गता:।

शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवा-

स्तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरे॥

(भर्तृहरिशतक)

‘जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर रहते थे, वे विश्वामित्र, पराशर आदि भी स्त्रियोंके सुन्दर मुखको देखकर मोहको प्राप्त हो गये, फिर जो लोग शाली धान्य (सांठी चावल) को घी, दूध और दहीके साथ खाते हैं, वे यदि अपनी इन्द्रियका निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा!’

ऐसी स्थितिमें जो जवान स्त्रियोंको अपनी चेली बनाते हैं, उनको अपने आश्रममें रखते हैं, उनका स्वप्नमें भी कल्याण हो जायगा—यह बात मेरेको जँचती नहीं! फिर उनके द्वारा आपका भला कैसे हो जायगा? केवल धोखा ही होगा।

प्रश्न—ऐसा कहते हैं कि जीवन्मुक्त महात्मा भोग भी भोगे तो उसको दोष नहीं लगता। क्या यह ठीक है?

उत्तर—ऐसा सम्भव ही नहीं है। जीवन्मुक्त भी हो जाय और भोग भी भोगता रहे—यह सर्वथा असम्भव बात है। भोग तो साधनकालमें ही छूट जाते हैं, फिर सिद्ध पुरुषको भोग भोगनेकी जरूरत भी क्यों पड़ेगी? ऐसी बातें दम्भी-पाखण्डी लोग ही अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये फैलाते हैं। इसलिये रामायणमें आया है—

मिथ्यारंभ दंभ रत जोई।

ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥

निराचार जो श्रुतिपथ त्यागी।

कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥

(मानस, उत्तर० ९८। २, ४)

पर त्रिय लंपट कपट सयाने।

मोह द्रोह ममता लपटाने॥

तेइ अभेदबादी ग्यानी नर।

देखा मैं चरित्र कलिजुग कर॥

(मानस, उत्तर० १००। १)

बुद्धाद्वैतसतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि।

शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचि भक्षणे॥

‘यदि अद्वैत तत्त्वका ज्ञान हो जानेपर भी यथेच्छाचार बना रहा तो फिर अशुद्ध वस्तु (मांस-मदिरा आदि) खानेमें यथेच्छाचारी तत्त्वज्ञ और कुत्तेमें भेद ही क्या रह गया?’

यस्तु प्रव्रजितो भूत्वा पुन: सेवेत मैथुनम्।

षष्टिवर्षसहस्राणि विष्ठायां जायते कृमि:॥

(स्कन्दपुराण, काशी० पू० ४०।१०७)

‘जो संन्यास लेनेके बाद पुन: स्त्रीसंग करता है, वह साठ हजार वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होता है।’

भोगोंका कारण कामना है और कामनाका सर्वथा नाश होनेपर ही जीवन्मुक्ति होती है। भोगोंकी कामना तो साधककी भी आरम्भमें ही मिट जाती है। अगर किसी ग्रन्थमें ऐसी बात आयी हो कि जीवन्मुक्त भोग भी भोगे तो उसको दोष नहीं लगता, तो यह बात उसकी महिमा बतानेके लिये है, विधि नहीं है। इसका तात्पर्य भोग भोगनेमें नहीं है। जैसे, गीतामें जीवन्मुक्तके लिये आया है कि ‘जिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है’* तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जीवन्मुक्त महात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंको मार देता है!

प्रश्न—गुरु बनानेसे वे शक्तिपात करेंगे; अत: गुरु बनाना जरूरी हुआ?

उत्तर—शक्तिपात कोई तमाशा नहीं है। वर्तमानमें शक्तिपातकी बात देखनेको तो दूर रही, पढ़नेको भी प्राय: मिलती नहीं! एक सन्त थे। उनके पीछे एक आदमी पड़ा कि शक्तिपात कर दो। वे सन्त बोले कि शक्तिपात कोई मामूली चीज नहीं है; उसको तुम सह नहीं सकोगे, मर जाओगे। वह पीछे पड़ा रहा कि महाराज, किसी तरह कर दो। सन्तने शक्तिपातका थोड़ा-सा असर डाला तो वह आदमी घबरा गया और चिल्लाने लगा कि मेरे स्त्री-पुत्र, माँ-बाप सब मिट गये! संसार सब मिट गया! मैं कहाँ जाऊँगा? मेरेको बचाओ! तात्पर्य है कि शक्तिपात करनेवाला भी मामूली नहीं होता और उसको सहनेवाला भी मामूली नहीं होता।

प्रश्न—चेला इसलिये बनाते हैं कि कोई ईसाई या मुसलमान न बने; अत: चेला बनानेमें क्या दोष है?

उत्तर—यह बिलकुल झूठी बात है! जो ईसाई या मुसलमान बनना चाहते हैं वे गुरुके पास आयेंगे ही नहीं! अगर चेला न बनानेके कारण कोई ईसाई या मुसलमान बन जाय तो गुरुको दोष नहीं लगेगा। परन्तु उसने चेला बनाकर उसको दूसरी जगह जानेसे रोक दिया और खुद उसका कल्याण नहीं कर सका—यह दोष तो उसको लगेगा ही। चेला बननेसे वह भगवान् के शरण न होकर गुरुके शरण हो गया, भगवान् के साथ सम्बन्ध न जोड़कर गुरुके साथ सम्बन्ध जोड़ लिया—यह बड़ा भारी दोष है।

प्रश्न—‘गुरु कीजै जान के, पानी पीजै छान के’ तो गुरुको जाननेका उपाय क्या है? गुरुकी परीक्षा कैसे करें?

उत्तर—गुरुकी परीक्षा आप नहीं कर सकते। अगर आप गुरुकी परीक्षा कर सकें तो आप गुरुके भी गुरु हो गये! जो गुरुकी परीक्षा कर सके, वह क्या गुरुसे छोटा होगा? परीक्षा करनेवाला तो बड़ा होता है। ऐसी स्थितिमें आपको चाहिये कि किसीको गुरु न बनाकर सत्संग-स्वाध्याय करो और उसमें जो अच्छी बातें मिलें, उनको धारण करो। जिनका संग करनेसे परमात्मप्राप्तिकी लगन बढ़ती हो, दुर्गुण-दुराचार स्वत: दूर होते हों और सद्गुण-सदाचार स्वत: आते हों, भगवान् की विशेष याद आती हो, भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास बढ़ते हों, बिना पूछे ही शंकाओंका समाधान हो जाता हो और जो हमसे कुछ भी लेनेकी इच्छा न रखते हों, उन सन्तोंका संग करो। उनसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध जोड़े बिना उनसे लाभ लो। अगर वहाँ कोई दोष दीखे, कोई गड़बड़ी मालूम दे तो वहाँसे चल दो।

वास्तवमें परीक्षा गुरुकी नहीं होती, प्रत्युत अपनी होती है। इस विषयमें एक कहानी है। एक युवावस्थाके राजा थे। उन्होंने अपने राज्यके बड़े-बूढ़े और समझदार आदमियोंको बुलाया और उनसे पूछा कि आप सच्ची बात बताओ कि मेरे दादाजीका राज्य ठीक हुआ या मेरे पिताजीका राज्य ठीक हुआ अथवा मेरा राज्य ठीक हुआ? आपने तीनोंके राज्य देखें हैं तो किसका राज्य श्रेष्ठ हुआ? यह सुनकर सब चुप हो गये। तब उनमेंसे एक बूढ़ा आदमी बोला कि महाराज! हम आपकी प्रजा हैं, आप हमारे मालिक हो। आपकी बातका निर्णय हम कैसे करें? हम आपकी परीक्षा नहीं कर सकते, पर मेरी बात पूछें तो मैं अपनी बात बता सकता हूँ। राजाने कहा—अच्छा, तुम अपनी बात बताओ। वह बूढ़ा आदमी बोला कि जब आपके दादाजी राज्य करते थे, उस समय मैं बीस-पचीस वर्षका जवान था। हाथमें लाठी रखता था। कुश्ती करना, लाठी चलाना आदि सब मेरेको आता था। एक दिन मैं कहीं जा रहा था तो जंगलमें मैंने किसीके रोनेकी आवाज सुनी। आवाजसे पता चला कि कोई स्त्री रो रही है; क्योंकि स्त्रीका पंचम स्वर होता है, षड्ज स्वर नहीं होता। मैं उधर गया तो देखा कि अच्छे वस्त्रों एवं गहनोंसे सजी एक स्त्री बैठी रो रही है। मैंने पूछा कि तू रो क्यों रही है? तो वह मेरेको देखकर एकदम डर गयी। मैंने उसको आश्वासन दिया कि बेटी, तुम डरो मत, अपनी बात बताओ। उसने बताया कि मैं अपने सम्बन्धियोंके साथ पीहरसे ससुराल जा रही थी। बीचमें सहसा डाकू आ गये और उनके तथा हमारे साथियोंके बीच लड़ाई छिड़ गयी। मैं डरकर जंगलमें भाग गयी। अब मेरेको पता नहीं कि पीछे क्या हुआ? अब मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? मेरेको पता नहीं कि पीहर किधर है और ससुराल किधर है? मैंने उससे ससुरालका गाँव पूछा तो उसने गाँवका नाम बताया। मैंने कहा कि तेरे ससुरालका गाँव नजदीक ही है, मैं तेरेको पहुँचा दूँगा, डर मत। मैंने उसके ससुरका नाम पूछा तो उसने जमीनपर लिखकर बता दिया। मैंने कहा कि मैं तेरे ससुरको जानता हूँ। मैं पहुँचा दूँगा।

रात्रिका समय था। मैं उस स्त्रीको लेकर उसके ससुरके घर पहुँचा। वहाँ सब चिन्ता कर रहे थे कि हम तो डाकुओंके साथ लड़ाईमें लग गये, उन्होंने हमारी बहूको मार डाला होगा! उसका हजारों रुपयोंका गहना था, उसको लूट लिया होगा! अब उसका पता कैसे मिले? आदि-आदि। अपनी बहूको देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए। उस स्त्रीने भी घरकी स्त्रियोंसे कहा कि ये पिताकी तरह बड़े स्नेहपूर्वक, आदरपूर्वक मेरेको यहाँ लाये हैं। उन्होंने मेरेसे चार-पाँच सौ रुपये लेनेके लिये आग्रह किया तो मैंने कहा कि रुपयोंके लिये मैंने काम नहीं किया है, कोई मजदूरी नहीं की है, मैंने तो अपना कर्तव्य समझकर काम किया है। उनके बहुत आग्रह करनेपर भी मैंने कुछ लिया नहीं और चला गया। मेरे चित्तमें बड़ी प्रसन्नता रही कि आज मेरेसे एक अबलाकी सेवा बन गयी! यह उस समयकी बात है, जब आपके दादाजी राज्य करते थे।

बहुत समय बीतनेपर मेरे व्यापारमें घाटा लग गया और पैसोंकी बड़ी तंगी हो गयी। तब मेरे मनमें विचार आया कि मैंने बड़ी गलती की कि उस स्त्रीको छोड़ दिया! अगर मैं उसको एक थप्पड़ लगाता तो दस-पन्द्रह हजारका गहना मिल जाता। फिर आज यह तंगी नहीं भोगनी पड़ती। उसके ससुरने रुपये दिये, पर वे भी मैंने नहीं लिये। पर अब क्या हो, बात हाथसे निकल गयी! यह उस समयकी बात है, जब आपके पिताजीका राज्य था। अब तो महाराज! आपके सामने कहनेसे मेरेको शर्म आती है; क्योंकि आप मेरे पोतेकी तरह हो। पर आप पूछते हो तो कहता हूँ। अब मेरे मनमें आती है कि उस स्त्रीको डरा-धमकाकर अथवा फुसलाकर अपनी स्त्री बना लेता तो स्त्री भी आ जाती और गहना भी आ जाता! आज इस अवस्थामें दोनों मेरे काम आते। मैंने अपनी बात कह दी। आपका राज्य कैसा है—यह मैं कैसे कहूँ? राजा समझ गया कि यह बूढ़ा बहुत बुद्धिमान् है! अपनी दशा कहकर बता दिया कि जैसा राजा होता है, वैसी प्रजा होती है—‘यथा राजा तथा प्रजा।’

तात्पर्य है कि हम गुरुकी परीक्षा तो नहीं कर सकते, पर अपनी परीक्षा कर सकते हैं कि उनका संग करनेसे हमारे भावोंपर क्या असर पड़ा? हमारे आचरणोंपर क्या असर पड़ा? हमारे जीवनपर क्या असर पड़ा? हमारे राग-द्वेष, काम-क्रोध कितने कम हुए?

प्रश्न—इतिहासमें ऐसे उदाहरण भी आते हैं, जिनसे गुरु बनाना अनिवार्य सिद्ध होता है?

उत्तर—इतिहासके आधारपर सत्यका निर्णय नहीं हो सकता। इतिहासकी बात ठोस नहीं होती, पोली होती है। कारण कि किस व्यक्तिने पूर्वके किस सम्बन्धसे और किस परिस्थितिमें क्या किया और क्यों किया—इसका पूरा पता नहीं चल सकता। इसलिये इतिहासमें आयी अच्छी बातोंसे मार्गदर्शन तो हो सकता है, पर सत्यका निर्णय शास्त्रके विधि-निषेधसे ही हो सकता है। इतिहाससे विधि प्रबल है और विधिसे भी निषेध प्रबल है।

गुरु-सम्बन्धी अधिकतर बातोंका प्रचार उन्हीं लोगोंने किया है, जिनको गुरु बननेका शौक है। अत: वर्तमान कलियुगमें विशेष सावधानीकी जरूरत है।