नम्र निवेदन

सत्संग-कार्यक्रमके निमित्त मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ अधिकतर लोग मेरेसे गुरुके विषयमें तरह-तरहके प्रश्न किया करते हैं। उन प्रश्नोंका उत्तर पाकर उनको सन्तोष भी होता है। इसलिये अनेक सत्संगी भाई-बहनोंका विशेष आग्रह रहा कि एक ऐसी पुस्तक बन जाय, जिससे लोगोंकी गुरु-विषयक शंकाओंका समाधान हो जाय। इसी उद्देश्यसे प्रस्तुत पुस्तक लिखी गयी है।

गुरु-विषयक मेरे विचारोंको गहराईसे न समझनेके कारण कुछ लोग कह देते हैं कि मैं गुरुकी निन्दा या खण्डन करता हूँ। यह बिलकुल झूठी बात है। मैं गुरुकी निन्दा नहीं करता हूँ, प्रत्युत पाखण्डकी निन्दा करता हूँ। गुरुका खण्डन तो कोई कर सकता ही नहीं। गुरुजनोंकी मेरेपर बड़ी कृपा रही है और गुरुजनोंके प्रति मेरे मनमें बड़ा आदरभाव है। गुरुजनोंसे मेरेको लाभ भी हुआ है। परन्तु जो लोग गुरु बनकर लोगोंको ठगते हैं, उनकी प्रशंसा कैसे होगी? उनकी तो निन्दा ही होगी।

वर्तमान समयमें सच्चा गुरु मिलना बड़ा दुर्लभ होता जा रहा है। दम्भ-पाखण्ड दिनोदिन बढ़ता चला जा रहा है। इसलिये शास्त्रोंने पहलेसे ही इस कलियुगमें दम्भी-पाखण्डी गुरुओंके होनेकी बात कह दी है, जिससे लोग सावधान हो जायँ। अत: अपना कल्याण चाहनेवाले साधकोंके सही मार्गदर्शनके लिये यह पुस्तक लिखी गयी है। इससे पहले भी ‘सच्चा गुरु कौन?’ नामक एक छोटी पुस्तिका प्रकाशित हो चुकी है।

इस पुस्तकमें हमने ‘गुरुगीता’ के कुछ श्लोक भी प्रमाणस्वरूप लिये हैं। परन्तु बहुत खोज करनेपर भी हमें यह पता नहीं चल सका कि ‘गुरुगीता’ का आधार क्या है? इसकी रचना किसने की है? गुरुगीताके अन्तमें इसको स्कन्दपुराणसे लिया गया बताया गया है, पर स्कन्दपुराणकी किसी प्रतिमें हमें गुरुगीता मिली नहीं। अनेक स्थानोंसे प्रकाशित गुरुगीतामें भी परस्पर अन्तर पाया जाता है। अगर कोई विद्वान् इस विषयमें जानते हों तो हमें सूचित करनेकी कृपा करें।

पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे इस पुस्तकको ध्यानपूर्वक पढ़ें और सच्ची लगनके साथ भगवान् में लग जायँ। वे किसी व्यक्तिके अनुयायी न बनकर तत्त्वके अनुयायी बनें।

श्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज