सच्चे गुरुकी दुर्लभता
गुरवो बहव: सन्ति शिष्यवित्तापहारका:।
तमेकं दुर्लभं मन्ये शिष्यहृत्तापहारकम्॥
(गुरुगीता)
‘शिष्यके धनका हरण करनेवाले गुरु तो बहुत हैं, पर शिष्यके हृदयका ताप हरण करनेवाले गुरु दुर्लभ हैं।’
गीताने प्राणिमात्रके हितमें प्रीतिकी बात कही है—‘सर्वभूतहिते रता:’ (५। २५, १२। ४)। सच्चे सन्तोंकी दृष्टि प्राणियोंके हितकी तरफ रहती है, उनको अपनी तरफ खींचनेकी नहीं। वे न तो किसीको अपना चेला बनाते हैं, न अपनी टोली बनाते हैं और न किसीसे कुछ लेते हैं, प्रत्युत दूसरेका कल्याण कैसे हो—इस तरफ दृष्टि रखते हैं और केवल शिष्योंके लिये ही नहीं, प्रत्युत प्राणिमात्रके कल्याणके लिये भगवान् से प्रार्थना करते हैं—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
कारण कि वे भुक्तभोगी होते हैं। अत: वे जानते हैं कि संसारमें कितना दु:ख है और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें कितना सुख है। इसलिये वे चाहते हैं कि दूसरे लोग भी संसारके दु:खोंसे छूट जायँ और सदाके लिये परम सुखका अनुभव कर लें।
इस जमानेमें सच्चे सन्त-महात्मा देखनेको नहीं मिलते। सच्चे महात्मा पहले जमानेमें भी बहुत कम थे, वर्तमानमें तो विशेष कम हो गये हैं। वर्तमानमें तो गुरु बननेका एक पेशा (व्यवसाय) ही बन गया है। चेला इसलिये बनाते हैं कि अपनी जीविका चलती रहे, अपनी मनमानी होती रहे, अपनी मान-बड़ाई (शरीरका मान और नामकी बड़ाई) होती रहे, अपना स्वार्थ सिद्ध होता रहे। यही भाव चेलोंका भी रहता है!
गुरु लोभी सिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों डूबा ‘परसराम’, बैठ पथरकी नाँव॥
आजकल नकली चीजोंका जमाना है। ब्राह्मण भी नकली, क्षत्रिय भी नकली, वैश्य भी नकली, शूद्र भी नकली, ब्रह्मचारी भी नकली, गृहस्थ भी नकली, वानप्रस्थ भी नकली, साधु भी नकली, यहाँतक कि साग-सब्जी, फूल-पत्ती, मिर्च-मसाले, दूध आदि भी नकली मिलते हैं। हर चीज नकली है तो गुरु भी नकली हैं—
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई।
ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी।
कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥
(मानस, उत्तर० ९८। २, ४)
साधु होनेमात्रसे कल्याण नहीं होता। मैंने खुद साधु होकर देखा है। इसलिये अपना कल्याण चाहनेवालोंको किसी मनुष्यके फेरमें नहीं आना चाहिये, किसीको गुरु नहीं बनाना चाहिये।
वास्तवमें कल्याण, मुक्ति, तत्त्वज्ञान, परमात्मप्राप्ति गुरुके अधीन नहीं है। अगर बिना गुरु बनाये तत्त्वज्ञान नहीं होता तो सृष्टिमें जो सबसे पहला गुरु रहा होगा, उसको तत्त्वज्ञान कैसे हुआ होगा? अगर बिना किसी मनुष्यको गुरु बनाये उसको तत्त्वज्ञान हो गया तो इससे सिद्ध हुआ कि बिना किसी मनुष्यको गुरु बनाये भी जगद्गुरु भगवान् की कृपासे तत्त्वज्ञान हो सकता है। परन्तु आजकल तो ऐसी प्रथा चल रही है कि पहले चेला बनो, गुरुमन्त्र लो, पीछे उपदेश देंगे। ऐसी दशामें गुरु बनानेपर चेलेकी बड़ी दुर्दशा होती है। भाव बैठता नहीं, लाभ भी दीखता नहीं, भीतरका भ्रम भी मिटता नहीं और छोड़कर दूसरी जगह जा सकते नहीं। मेरेसे कोई सम्मति ले तो मैं कहूँगा कि सत्संग करो और जितना ले सको, उतना लाभ लो, पर किसीको गुरु मत बनाओ। जहाँ-जहाँसे अच्छी बातें मिलें, वहाँ-वहाँसे उनको लेते रहो और जहाँ अच्छी बात न मिले, वहाँसे चल दो। गुरु बनाकर बँधो मत।
मधुलुब्धो यथा भृङ्ग: पुष्पात् पुष्पान्तरं व्रजेत्।
ज्ञानलुब्धस्तथा शिष्यो गुरोर्गुर्वन्तरं व्रजेत्॥
(गुरुगीता)
‘मधुका लोभी भ्रमर जैसे एक पुष्पसे दूसरे पुष्पकी ओर जाता है, ऐसे ही ज्ञानका लोभी शिष्य एक गुरुसे दूसरे गुरुकी ओर जाय।’
गुरु बनानेके बाद आगे जाकर न जाने क्या दशा होगी! मेरेसे ऐसे कई आदमी मिले हैं, जिन्होंने अपनी दृष्टिसे अच्छे-अच्छे गुरु बनाये, पर पीछे उनपर अश्रद्धा हो गयी। अत: जो अपना कल्याण चाहता है, उसको किसीसे भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये। संसारसे सम्बन्ध जोड़नेवाला अपना ही कल्याण नहीं कर सकता, फिर दूसरेका कल्याण कैसे करेगा?
आजकल असली गुरु मिलना बहुत कठिन है। जो ठीक तत्त्वको जाननेवाला हो, ऐसा देखनेमें नहीं आता। जो स्वयं तत्त्वको नहीं जानता, वह शिष्यको क्या बतायेगा? ठीक तत्त्वको जाननेवाले गुरु पहले भी बहुत कम हुए हैं। पहले हो चुके सन्तोंकी पुस्तकें पढ़ते हैं तो उनसे भी हमें पूरा सन्तोष नहीं होता। सबसे बढ़कर सन्त वे होते हैं, जिनमें मतभेद नहीं होता अर्थात् द्वैत, अद्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि किसी एक मतका आग्रह नहीं होता। इसलिये साधकके लिये सबसे बढ़िया बात यही है कि वह सच्चे हृदयसे भगवान् में लग जाय। किसी व्यक्तिको न पकड़कर परमात्माको पकड़े। व्यक्तिमें पूर्णता नहीं होती। पूर्णता परमात्मामें होती है। हम सच्चे हृदयसे परमात्माके सम्मुख हो जायँ तो वे योग, ज्ञान, भक्ति—सब कुछ दे देते हैं*।