आत्महत्या महापाप है

सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके माता-पिता आपसे सन्तुष्ट नहीं रहते। घरमें लड़ाई-झगड़ा बना रहता है। इस दु:खसे घबराकर आपके मनमें आत्महत्या करनेकी बात आयी है, सो भाई साहब! आत्महत्याका विचार सर्वथा पापमय है। आत्महत्या करके मर जानेवाला मरते ही सुखी हो जायगा, ऐसी बात कदापि नहीं माननी चाहिये। आत्महत्या महापाप है। नास्तिक भले ही आत्महत्यामें सुख माने। कर्मफल तथा परलोकको माननेवाले पुरुष सजग अवस्थामें कभी आत्महत्याका विचार नहीं कर सकता। माता-पिता प्रसन्न नहीं रहते—इसमें यदि आपका दोष है तो उसे सुधारनेकी चेष्टा कीजिये। असलमें आपको अपना ही दोष मानना चाहिये। गहराईसे ढूँढेंगे तो आपको अपना दोष मिल ही जायगा। नम्रताके साथ अपना दोष स्वीकार करके उनकी सेवा कीजिये। अपने-आप ही वे प्रसन्न हो जायँगे। यदि ऐसा सम्भव न हो तो मनमें कोई द्वेष-बुद्धि न रखते हुए उनसे अलग हो जाइये तथा भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये कि वे आपको उनकी सेवाके योग्य बनावें और उनकी आपपर दयादृष्टि हो। आत्महत्याका विचार सर्वथा त्याग दीजिये।