आत्महत्या पाप क्यों?

सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला, धन्यवाद! सच्चे सन्तको सच्चा सन्त ही पहचान सकता है। सत्स्वरूप आत्मा अथवा परमात्माका साक्षात्कार ही सन्तका प्रधान लक्षण है; परन्तु यह लक्षण केवल स्वानुभवगम्य है। अत: सन्त अपनेको स्वयं ही पहचान सकता है। बाहरकी दुनिया उसके बाह्य व्यवहारोंको ही देखकर अपना मत स्थिर करती है; किन्तु बाह्य व्यवहारोंके सुधारमात्रसे ही सच्चे सन्तका परिचय नहीं मिलता। बहुधा दम्भी मनुष्य भी मान-प्रतिष्ठाके लिये अपने बाह्य व्यवहार सज्जनोचित बना लेते हैं; पर भीतर उनके स्वार्थपरायणता, दम्भ, पाखण्ड, वंचकता आदिका निवास होता है। अत: व्यवहारोंकी ओर दृष्टि रखकर ही सन्तके सम्बन्धमें कोई निर्णय कर लेना उचित नहीं है। सन्तका वास्तविक रूप अन्तर्जगत‍्में प्रकट होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, अहंता, ममता, राग, द्वेष, दम्भ और दर्प आदि दुर्गुणोंसे शून्य स्वाभाविक शम, दम, शान्ति, प्रसाद आदि सद‍्गुणोंसे अलंकृत वासनारहित निर्मल अन्त:करण ही सच्चे सन्तका परिचय देता है; किन्तु उसे स्वयं सन्तके सिवा और कौन देख सकता है; इसलिये सच्चे सन्त गुफाओंमें भी रह सकते हैं; तथा राजर्षि जनककी भाँति संसारमें भी ‘मामनुस्मर युध्य च’ के आदर्शको अपनाकर निर्लिप्त जीवन बिता सकते हैं। फिर भी उन्हें उनके सिवा दूसरा कोई परख नहीं सकता। दूसरोंके पास उनकी परखका कोई साधन ही नहीं। राजर्षि जनक और शुक सन्तोंद्वारा ही पहचाने गये। सुदीर्घकालतक सन्तोंका संग, सेवन और अनुसरण करनेवाले सच्चे भक्त भी सन्तोंको उनकी ही दयासे पहचान पाते हैं। वे स्वयं जिन-जिनके सामने अपनेको प्रकट कर दें, वे ही उनको जान सकते हैं। गुफामें रहनेवाले सन्त बड़े हैं या संसारके कर्मक्षेत्रमें? यह विचार भी वे ही लोग करते हैं जिन्हें सन्तोंकी महिमाका बिलकुल ज्ञान नहीं है। सन्त, यदि वास्तवमें सन्त हैं, तो वे किसी देश, वेश अथवा परिस्थितिमें हों, हमारे लिये वन्दनीय हैं; वे सभी महान् हैं; उनमें तारतम्य स्थापित करना अपने अज्ञानका परिचय देना है। समुद्रमें मिली हुई कौन-सी बूँद बड़ी और कौन-सी छोटी है? यह प्रश्न किसी समझदार व्यक्तिके मनमें उठ नहीं सकता। सन्त तो परमात्मासे अभिन्न हैं; उनमें तारतम्य कैसा?

साधक भी यदि सत्यके खोजी हैं तो वे गुफामें रहकर साधना करें या कर्मक्षेत्रमें; सर्वथा आदरके पात्र हैं। वास्तवमें सबका स्वभाव पृथक्-पृथक् होता है। सब एक ही पथसे चलनेके अधिकारी नहीं हैं। किसीमें प्रवृत्तिमार्गकी ओर जानेकी रुचि होती है, किसीमें निवृत्तिमार्गकी ओर। कोई कर्मक्षेत्रमें साधना कर सकते हैं, कोई गुफामें। यदि उनका लक्ष्य सत्स्वरूप परमात्माकी ओर है, तब वे किसी भी मार्गसे चलनेवाले साधक क्यों न हों, उन्हें साधु ही मानना चाहिये।

आपने पत्रमें अपनेको अद्वैतवादी बताया है। आपके द्वारा दो-चार पंक्तियोंमें जिस मतका स्पष्टीकरण किया गया है; वह अद्वैतमतके ही अनुकूल है। जगत् मिथ्या है, किन्तु जगत्-रूपमें उसका मिथ्यात्व बताया गया है; ब्रह्मरूपसे तो सब कुछ सत्य है; ‘वासुदेव: सर्वम्’, ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ है। अद्वैतवादी भी ऐसा ही मानते हैं। फिर भी आपने यह लिखा है कि अथवा यों कहिये ‘मैं द्वैताद्वैतवादी हूँ।’ परन्तु द्वैताद्वैतवादसे आपके मतका अधिक मेल नहीं है।

कामके पत्रमें ‘आत्महत्या’ का निषेध किया गया है, उसे पाप बताया गया है। आपका प्रश्न है—‘आत्महत्या पाप क्यों?’ इसके प्रतिपादनमें आपने जो उद‍्गार प्रकट किया है, उसमें आपका सारा अद्वैतज्ञान हवा हो गया है। आप लिखते हैं— ‘मैं पुनर्जन्ममें विश्वास नहीं रखता.......मेरे मतमें मृत्यु मोक्ष देनेवाली है, चाहे पापीकी हो या पुण्यात्माकी। .......जीवन एक अन्धकारमय प्रदेशकी एक यात्राका नाम है, जिसका पथ भयानक अन्धकारमेंसे गुजरता है।’

इन पंक्तियोंमें जो धारणा प्रकट की गयी है, इससे तो अज्ञानका ही परिचय मिलता है। अद्वैतज्ञानमें, जहाँ जीवन और मृत्यु—दोनों ब्रह्मके ही रूप हैं, ऐसी असंगत धारणाओंके लिये स्थान नहीं है। ऐसी निराशा नास्तिकोंके जीवनमें ही अपना-अपना अन्धकार फैलाती है। जीवन दु:खरूप है, भारभूत है; यह सब बाह्यदृष्टिकी कल्पना है। अन्तर्दृष्टिमें जहाँ जीवनके आधारस्तम्भ मंगलमय परमात्मा—सुखरूप भगवान् हैं; वहाँ उसे त्यागनेकी भावना ही क्यों उठे? जो जीवन भगवान‍्की भावनासे शून्य है, वही अनित्य और असुख है; अत: आवश्यकता इस बातकी है कि उसे पाकर भगवान‍्का भजन और चिन्तन किया जाय। ऐसा करते ही यह भगवन्मय हो जायगा। फिर यहाँ दु:ख और अन्धकारका प्रवेश नहीं हो सकता। इसलिये भगवान‍्का यह आदेश है—

अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥

जहाँ आपको पग-पगपर कीचड़ दिखायी देती है, वहीं अमृतकी अमन्द मन्दाकिनी भी बहती है। जहाँ आप मरुकी उत्तप्त बालुकाके सिवा और कुछ नहीं देखते, उसी जगह अनन्त अगाध शीतल सलिलका अपार पारावार भी लहरा रहा है। जहाँ चप्पे-चप्पेपर आपकी दृष्टिमें केवल कण्टक-वृक्ष और झाड़ियाँ ही हैं, वहीं दूसरे लोग मनोहर मधुवनका भी दर्शन करते हैं; क्या आपकी ही दृष्टि सत्य है? दूसरोंकी नहीं? आप क्या कह सकते हैं, जो लोग यहाँ दु:ख-ही-दु:ख देखते हैं, वे अपने जीवनका अन्त कर दें तो क्या हर्ज है? परन्तु यह भी एक भ्रम ही है। सूर्य डूबनेके बाद जब सारे जगत् पर अन्धकार छा जाता है, उस समय क्या कोई भी व्यक्ति इसलिये अपने जीवनका अन्त कर डाले कि संसारमें अन्धकार-ही-अन्धकार है। नहीं, उसे पुन: प्रकाश प्राप्त होगा, ऐसा समझकर उस अन्धकारके कष्टको सहन करना चाहिये। यही बात रोगके सम्बन्धमें भी है। रोग और दु:ख सभी आगमापायी हैं। आते हैं और चले जाते हैं। अत: आनेपर उनके निवारणका उपाय करना ही कर्तव्य है; रोगीके जीवनका अन्त कर डालना नहीं। कीचड़ पड़ जानेपर कपड़ेको धोया जाता है, फेंका नहीं जाता; उसी प्रकार पापपंकमें फँसे हुए तन, मन, जीवनको पुण्यके पावन सलिलसे धोकर स्वच्छ बनानेकी चेष्टा करनी चाहिये, त्यागनेकी नहीं। कपड़ा तो हम स्वयं बनाते और पहनते हैं; अत: स्वेच्छासे उसे त्याग भी सकते हैं, परन्तु यह तन और जीवन हमें किसी दूसरी शक्तिसे प्राप्त हुए हैं। जिसने दिया है वही इसे ले सकता है। हमारा काम है इसका सदुपयोग करना। इसको नष्ट करना हमारी अनधिकार चेष्टा है; इसके लिये हमें दण्ड मिलना चाहिये।

मकान पुराना हो जाय अथवा गिरने लगे तो उसे छोड़नेमें जैसे मकान-मालिकको कष्ट नहीं होता, उसी प्रकार यह शरीर गिर जाय अथवा वृद्ध हो जाय तो मोहवश इसके लिये चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। इतना ही दृष्टान्त लिया जा सकता है। मकान गिर ही जायगा या उसमें खतरा है—इस दृष्टिसे अपनी ही इच्छासे उसको मालिक छोड़ देता है, इसी प्रकार शरीर एक-न-एक दिन नष्ट होगा ही, उसमें रोगका आक्रमण हो चुका है, इसलिये स्वेच्छासे उसको गोली मार दी जाय अथवा अन्य उपायोंसे नष्ट कर दिया जाय, ऐसी सलाह देना पागलपन है। मकान तो आप स्वयं बनाते या बनवाते हैं। एक आदमी कई मकान बनवाकर सबमें बारी-बारीसे रहता है। एक छोड़कर दूसरेमें जाता है, फिर उसको छोड़कर पहलेमें ही आ जाता है। यह स्वतन्त्रता शरीरके सम्बन्धमें नहीं है। यह शरीर हमें प्राप्त हुआ है, हमने बनाया नहीं है। अत: हम स्वेच्छासे इसका त्याग नहीं कर सकते। यह ठीक है कि अपने ही कर्मोंके परिणामस्वरूप यह शरीर मिला है तथापि हम इसके स्रष्टा नहीं हैं। हमें विवश होकर इस शरीरको ग्रहण करना पड़ता है और विवश होकर ही इसे छोड़नेको उद्यत होना पड़ता है। मकानका एक भाग तोड़कर हम उसे अपनी इच्छाके अनुसार बना सकते हैं; परन्तु शरीरके एक अवयवमें भी हमें स्वेच्छानुसार परिवर्तन करनेका अधिकार नहीं है; अत: शरीर हमें एक धरोहरके रूपमें मिला है। इसकी रक्षा और इसका सदुपयोग—इतना ही हमारा कर्तव्य है। इसको नष्ट करना महान् अपराध है। आधुनिक कानूनकी दृष्टिसे भी आत्मघातकी चेष्टा महान् अपराध है। श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर और स्वामी श्रीरामतीर्थके वचनोंसे आत्मघातका समर्थन नहीं होता। उनके कथनका स्पष्ट अर्थ यह है कि परमात्माके अस्तित्वपर सन्देह करना आत्मघातसे भी अधिक भयंकर है। मृत्यु अनिवार्य है, इसलिये जब चाहे तब क्षणिक कष्टको सहन न करके जीवनको नष्ट कर डालना त्याग नहीं, अविवेक है। बच्चा पैदा होते समय प्रत्येक गर्भवतीको बड़ा कष्ट होता है, कई मर भी जाती हैं; अत: सभी गर्भिणी स्त्रियोंको गोली मार देनी चाहिये; ऐसी बातें भी कही जा सकती हैं; किन्तु क्या आप इसका अनुमोदन करेंगे? जीवनमें दु:ख और कष्टके अनेक अवसर आते हैं; इसलिये उनसे बचनेकी इच्छासे क्या नवजात शिशुको मार डालना उचित होगा? यदि ऐसी ही व्यवस्था दे दी जाय तो सारे जगत‍्का प्रलय हो जाय। युद्धमें बहुत कष्ट होता है, प्राणतक देने पड़ते हैं; अत: उनसे बचनेके लिये कायरोंकी तरह मुँह छिपाकर घरमें बैठा रहा जाय, यह सलाह कोई कायर ही दे सकता है। कोई भी ऐसी युक्ति नहीं है, जो आत्मघातकी नैतिकता सिद्ध कर सके। जैनधर्ममें भी आत्मघातकी आज्ञा नहीं दी गयी है। उनके यहाँ एक व्रत है, जिसमें धीरे-धीरे तपस्यासे अपनेको मुक्तिके पथपर अग्रसर कराया जाता है। उसे आत्मघातका प्रयत्न कहना उसकी निन्दा करना है।

उपनिषदोंमें आत्मघातीको नरककी प्राप्ति बतायी गयी है। यह पापका ही दण्ड है। पाप और पुण्यका निर्णय शास्त्रसे ही होता है। शास्त्रोंने आत्मघातको पाप बताया है। अत: वह पाप ही है। कोई भी युक्ति उस पापसे छुटकारा नहीं दिला सकती। हमारा जीवन अनादिकालसे आ रहा है, यदि मुक्त नहीं हुआ तो अनन्तकालतक चलता रहेगा। जन्म और मृत्यु तो उस जीवन-नाटकके एक दृश्यके आरम्भ और पटाक्षेपमात्र हैं। आज जगत‍्में कोई सुखी और कोई दु:खी क्यों है? यह पूर्वजन्मके कर्मोंका ही परिणाम है। इससे पुनर्जन्म स्वत:सिद्ध हो जाता है। नित्य सुखकी प्राप्तिका उपाय आत्मघात नहीं, भगवान‍्का भजन है। शेष भगवान‍्की ही कृपा।