अहंकार ही दु:खका कारण है
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके ही नहीं, सभीके दु:खके कारण अहंकार, ममता, कामना और आसक्ति हैं। इनमें सबकी जड़ अहंकार है। जितना ही जिसका अहंकार बढ़ा है, उतनी ही ममता, कामना और आसक्ति बढ़ी हैं और उतनी ही मात्रामें वह अधिक-से-अधिक सन्तप्त, अशान्त और बन्धनग्रस्त है। अहंकारी मनुष्यको बात-बातमें अपमानका बोध होता है और वह पद-पदपर अनेकों शत्रु पैदा कर लेता है। किसीसे सीधी बात करनेमें भी उसे पीड़ा-सी होती है। वह अपने हठके सामने किसीकी भली बात भी नहीं सुनना चाहता। वह अपने ही हाथों नित्य बड़े गर्वके साथ अपने ही पैरोंपर कुल्हाड़ी मारता है और उन्मत्त नशेबाजकी भाँति उसीमें गौरव मानकर निर्लज्जताके साथ नाचता है। भगवान्ने गीतामें कहा है—
विहाय कामान् य: सर्वान् पुमांश्चरति नि:स्पृह:।
निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति॥
(२। ७१)
‘जो पुरुष सारी कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकार-रहित और नि:स्पृह होकर संसारमें आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।’
इसके लिये आपको भगवान्का भजन करना चाहिये। भगवान्की माया बड़ी दुरत्यय है। मायाका आवरण हटे बिना अहंकारादिसे छुटकारा पाना बहुत ही कठिन है। और मायाके महासागरसे वही पार हो सकता है, जो मायापति भगवान्के शरणापन्न होकर उनका भजन करता है— ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।’ भगवान् कहते हैं—‘जो मेरा ही भजन करते हैं, वे इस मायासे तरते हैं।’
भजन करनेवालेमें ज्यों-ज्यों भक्तिका विकास होता है, त्यों-ही-त्यों उसमें दैन्य आता है, उसका अपना और अपने पुरुषार्थ तथा बलका गर्व गल जाता है। वह सभी बातोंमें सर्वसमर्थ प्रभुका ही कर्तृत्व देखता है। उसकी ममता जगत्में सब जगहसे हटकर एकमात्र प्रभुके पादपद्मोंमें ही केन्द्रित हो जाती है, एकमात्र प्रभुकी प्रीति ही उसकी कामनाका विषय बन जाती है, और प्रभुके नाम-रूप-लीला-गुणादिमें ही उसका अनन्य अनुराग हो जाता है। फलत: प्रपंचसे उसका अहंकार, उसकी ममता और कामना तथा उसकी आसक्ति अपने-आप ही हट जाती है। वह प्रभुका प्यारा बन जाता है और प्रभु उसे अपने हृदयमें बसाकर निहाल कर देते हैं—
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥
सो सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदय बसइ धनु जैसें॥
बस, भगवान्को ही एकमात्र अपना मानकर लोभीके धनकी भाँति उनके हृदयमें बसनेका सौभाग्य प्राप्त कीजिये। शेष भगवत्कृपा।