अपराधीकी वैध सहायता करना धर्म है
सप्रेम हरिस्मरण। आपका कार्ड मिला। आपने लिखा कि ‘एक कैदी (जिसको उसके कुकर्मोंके फलस्वरूप दण्ड मिला है)- के प्रति सहानुभूति प्रकट करना या उसकी किसी प्रकारकी सहायता करना जैसे पापमें सहायक होना और गवर्नमेण्टका अपराध करना है, उसी प्रकार ईश्वरीय न्यायालयमें दण्डित दीन-अपाहिजोंकी सहायता करना ईश्वरीय व्यवस्थाका उल्लंघन है, जो कि ईश्वरका एक अपराध ही है। यदि ऐसा ही है तो धर्मशास्त्रोंमें इसके विपरीत उपदेश क्यों है?’
इसका उत्तर यह है कि किसी अपराधके लिये दण्डित मनुष्यके प्रति सहानुभूति प्रदर्शन करना या उसकी वैध रीतिसे सहायता करना कानूनकी दृष्टिमें अपराध नहीं है। अपराध तो उसके अपराधमें सहायता करनेमें है। किसीके साथ भी उसके दु:खमें सहानुभूति करना या सहायता पहुँचाना कहीं भी अपराध नहीं हो सकता। न्यायालयसे जिसे दण्ड दिया जाता है, उसमें भी उसके प्रति द्वेष या वैर नहीं है; वह पुन: वैसा अपराध न करे अर्थात् वह भावी दु:खसे बच जाय, इसी उद्देश्यसे दण्ड-विधानकी रचना हुई है। कारावासमें पड़े हुए कैदियोंके लिये भी नाना प्रकारसे सहायताके आयोजन होते हैं और उनमें बाहरके लोगोंसे भी सहायता माँगी तथा ली जाती है। असलमें घृणा पापसे होनी चाहिये, पापीसे नहीं। इसलिये अपराध भी पापमें सहायता करनेसे होता है, न कि पापीकी सहायता करनेसे। कैदीको क्या खाने-पहननेको नहीं दिया जाता? या क्या बीमारीमें उसका इलाज नहीं करवाया जाता है? बल्कि कैदमें भी उसके प्रति किसीके द्वारा यदि दुर्व्यवहार होता है तो न्यायत: दुर्व्यवहार करनेवाला अपराधी माना जाता है। न्याय न हो और यथेच्छाचार हो, वहाँकी बात दूसरी है।
दु:खमें सहानुभूति और सहायता सदा ही धर्म है। यही लौकिक न्याय है और यही ईश्वरीय न्याय है। हाँ, न्यायपूर्ण विधानको माननेकी आवश्यकता सभी जगह है। अत: कैदीकी सहायता भी विधानके अनुकूल ही करनी चाहिये और दीन-अपाहिजकी सहायता भी शास्त्र-विधानके अनुसार ही।
कोई दीन-अपाहिज यदि अभक्ष्य-भक्षण करना चाहे, किसीके साथ वैर-विरोध करनेको कहे, किसी निर्दोषको सतानेके लिये कहे तो इन कार्योंमें उसकी सहायता नहीं करनी चाहिये। धर्मशास्त्रोंमें जो दीन-दु:खियोंकी सहायता करनेका आदेश है वह तो बहुत ही सुन्दर है। उससे ईश्वरीय न्यायमें बाधा नहीं पड़ती वरं उसमें सहायता मिलती है। भयानक दु:ख और कष्टमें जिसकी सहायता होती है वही सहायताके मूल्यको भी जान सकता है, जैसे अन्नके महत्त्वको अत्यन्त भूखा मनुष्य ही जानता है। जिसको खाते-खाते अजीर्ण हो गया है, उसे अन्नके महत्त्वका क्या पता। और जो जिस वस्तुके महत्त्वको जानता है, वह उस वस्तुको प्राप्त भी करना चाहता है। दीन-दु:खी सहायता पाकर यह चाहेंगे कि हम भी कभी किसीकी सहायता करें। इससे उनके हृदय शुद्ध होंगे और पाप-बुद्धिका नाश होगा। एवं वे यदि पाप नहीं करेंगे तो भविष्यमें पापके परिणामरूप दु:खोंसे बच जायँगे। साथ ही, ईश्वर भी सहायता करनेवालोंसे प्रसन्न होंगे। अपराधी हो या निरपराधी, माँके लिये सभी बच्चे समान प्रिय होते हैं; बल्कि दु:खमें पड़े हुएके प्रति माताकी विशेष सहानुभूति होती है। ऐसी अवस्थामें उस दु:खी बच्चेकी जो सहायता करता है, वह उसकी माताके विशेष स्नेह तथा आशीर्वादका पात्र होता है। इसी प्रकार भगवान् भी, जो उनकी दु:खी सन्तानोंपर दया करके उनके साथ सहानुभूति तथा उनकी सहायता करते हैं, उनपर बड़े प्रसन्न होते हैं। इसलिये दीन-दु:खियोंकी सहायता-सेवामें मनुष्यको बड़े उल्लासके साथ सदा प्रस्तुत रहना चाहिये। और ऐसा करते यदि कोई विपत्ति आवे तो उसे भगवान्का कृपा-प्रसाद समझकर सानन्द सिर चढ़ाना चाहिये।