असली धन कमानेके साधन
काम-काज मजेमें चलता होगा। रुपये कमाते ही होंगे! असली धन कमानेका भी कुछ खयाल रखते हैं या नहीं? मायाकी मोहिनीमें फँसकर प्रवाहमें बह न जाइयेगा। यह सत्य और निस्सन्देह है कि किसी भी प्रकारसे किया हुआ भगवान्का थोड़ा-सा भी भजन मनुष्यको छोड़ता नहीं, वह स्वयं कभी नष्ट न होकर उसे बार-बार भगवान्की ओर प्रेरित करता रहता है और मौका पाते ही इस लोक या परलोकमें उसे परमात्माके पावन पथमें लगा ही देता है।
‘स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।’
इसी प्रकार महापुरुषका संग भी महान् भयसे तारनेवाला होता है। आपने महापुरुषका संग किया या नहीं, इस बातका तो पता नहीं; परन्तु भगवान्का भजन तो किया ही है। यही कारण है कि वह अब भी समय-समयपर आपके चित्तमें भजनकी प्रेरणा करता है और अपना अनुमान तो यही है कि देर-सबेर आपको वह सीधी राहपर लाकर ही छोड़ेगा। आप जरा सावधान रहेंगे, और प्रवाहमें सहज ही नहीं बहेंगे तो उसे अपने कार्यमें सुविधा होगी।
आपका यह लिखना कि ‘मेरा ऐसा विश्वास है कि आपके आदेशके अनुसार करनेपर जरूर लाभ होता है’ मेरे प्रति आपका अकृत्रिम प्रेम प्रकट करता है। इस प्रेमके कारण ही आपको ऐसा भासता है। मैं तो आपके इस प्रेमका ऋणी हूँ ही। वस्तुत: मैं यदि कभी कोई ऋषि-प्रणीत शास्त्रोंके अथवा महात्माओंके द्वारा अनुभूत साधन-सम्बन्धी बात कह देता हूँ और उसके अनुसार करनेपर किसीको लाभ होता है तो इसमें श्रेय उन ऋषियों और सन्तोंको है अथवा श्रद्धानुसार साधन करनेवाले साधकको। ग्रामोफोनके रिकार्डमें यदि सुन्दर गान सुना जाता है, उसमें रिकार्डका क्या है। जो कुछ है सो गाना गानेवाले, भरनेवाले और सुननेवालेके ही पुरुषार्थका फल है। मुझे तो जड रिकार्ड-सा समझना चाहिये। आपने पूछा कि ‘मुझे किस-किस समय क्या-क्या करना चाहिये, पहलेकी भाँति रातमें या दिनमें कुछ करनेका आदेश मिलना चाहिये।’ सो आदेश देनेका तो मुझमें न अधिकार है न मेरी योग्यता है, आपके प्रेमके भरोसे नम्र सलाह देनेमें संकोच अवश्य ही नहीं होता और इसी अभिप्रायसे नीचे कुछ लिखता हूँ। समय, सुविधा और चित्तकी अनुकूलता हो तो इसके अनुसार श्रद्धापूर्वक करना चाहिये। श्रद्धा फलवती तो होती ही है।
(१) दूसरेका अहित करनेकी या अहित देखनेकी भावना मनमें कभी न आने पावे। याद रखना चाहिये कि दूसरेका अहित चाहनेवालेका परिणाममें कभी हित नहीं होता।
(२) परस्त्रीकी ओर बुरी दृष्टि कभी नहीं होनी चाहिये।
(३) व्यापारमें यथासाध्य सत्य, न्याय और पर-हितका खयाल रखना चाहिये।
(४) लोभकी वृत्तियोंको यथासम्भव दबाना चाहिये।
(५) नित्य-निरन्तर भगवान्के नामका स्मरण और जप करते हुए ही संसारके काम करनेकी चेष्टा करनी चाहिये।
(६) सबमें—खास करके जिनसे व्यवहार हो उनमें— परमात्माकी भावना करके मन-ही-मन उन्हें नमस्कार करना चाहिये; तथा इस तत्त्वको याद रखते हुए ही व्यवहार करना चाहिये।
(७) किसी मनुष्यमें भी—खास करके सत्पुरुषमें दोषबुद्धि नहीं करनी चाहिये।
(८) यथासाध्य वाणीको असत्य, परनिन्दा, परचर्चासे बचाना चाहिये, और पराया अहित हो, ऐसी बात तो करनी ही नहीं चाहिये।
(९) अपनी धर्मपत्नीको प्रेमके व्यवहारसे परमात्माकी ओर लगाना चाहिये। रामायणादि पढ़नेका अभ्यास और नाम-जपका अभ्यास डलवाना चाहिये। विषयोंकी ओर उनका प्रलोभन न बढ़ने पावे। विषयासक्ति आपमें भी नहीं बढ़नी चाहिये।
(१०) बहिनोंके साथ अधिक-से-अधिक अच्छे-से-अच्छा उदार व्यवहार करना चाहिये।
अब आपके लिये कुछ खास साधन लिखता हूँ।
(१) दोनों वक्त सन्ध्या-वन्दन और एक-एक गायत्रीकी मालाका जप यथासाध्य ठीक कालपर करना चाहिये।
(२) प्रात:काल पाँच माला ‘ॐ नम: शिवाय’ की शुद्ध बुद्धि प्राप्त करनेके उद्देश्यसे जपनी चाहिये।
(३) रातको सोनेसे पूर्व ग्यारह माला या कम-से-कम सात माला षोडश नामके महामन्त्र। (हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥) की जपनी चाहिये।
(४) कुत्ते और गौओंको रोज कुछ रोटी, घास तथा दीन-दु:खियोंकी यथायोग्य कुछ सहायता अवश्य करनी चाहिये।
(५) कमाईमेंसे कुछ हिस्सा भगवान्की सेवाके लिये निकालना चाहिये और उसे जमा न करके हाथों-हाथ खर्च कर देना चाहिये।