आत्मा और ईश्वर

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपके पत्रका उत्तर आज दिया जा रहा है। इतने दिनोंतक अन्यान्य कर्मोंमें व्यस्त रहनेके कारण इधर ध्यान देनेका समय नहीं मिला। कृपया विलम्बके लिये क्षमा करेंगे। आपके तीनों प्रश्नोंपर क्रमश: विचार किया जा रहा है—

(१) प्रश्न—कहा जाता है आत्मा अनादि तथा अनन्त है। फिर जो आज संसारकी जनगणना दूने-चौगुने वेगसे बढ़ रही है, इसमें क्या कारण है? ये शेष आत्माएँ कहाँसे आयीं? यदि कहा जाय कि अन्य योनियोंसे तो यह केवल अनुमानमात्र (जो कि गलत भी हो सकता है) ही है अथवा इसमें दूसरा भी प्रमाण है?

उत्तर—‘आत्मा’ शब्दसे आपका क्या अभिप्राय है, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। हिन्दू-दर्शनोंमें इसका प्रयोग अनेक अर्थोंमें आया है। यह आत्मा शुद्ध चेतन परमात्माका भी वाचक है। यदि इसी अर्थमें आपने प्रयोग किया है तब तो वह जैसे अनादि और अनन्त है वैसे ही अजन्मा और अद्वितीय भी है। उसका न जन्म होता है और न वह एकसे कभी दूसरा हुआ। वह तो नित्य एक और सर्वव्यापी है।

आत्माके विषयमें प्रमाणोंकी कमी नहीं है। समस्त हिन्दू-दर्शन आत्माके स्वरूपका ही विश्लेषण करते हैं। यदि आपकी रुचि हो तो उपनिषदोंका तथा उनमें भी कठोपनिषद्का विशेषरूपसे स्वाध्याय कीजिये। यदि आत्माका अर्थ आप ‘जीव’ मानते हैं तो यह शुद्ध आत्माका स्वरूप नहीं है। बन्धनावस्थामें उसे ‘जीव’ संज्ञा प्राप्त होती है। यह बन्धन अनादि होनेपर भी अनन्त नहीं है, उसका अन्त होता है। ज्ञानसे अज्ञानरूप बन्धनका नाश होनेपर मुक्तावस्थामें जीवभाव नहीं रहता; फिर तो शुद्ध सच्चिदानन्दमय आत्मा ही कहलाता है। यदि आपका संकेत न्याय-वैशेषिक मतमें माने हुए अणु परिणाम, नित्य, अनेक जीवात्माकी ओर है तब वहाँ अनन्तका अर्थ असंख्य किया जा सकता है। उस दशामें भी जनगणना बढ़नेमें कोई आपत्ति नहीं आती। जब असंख्य जीव हैं और असंख्य विभिन्न लोकोंमें अज्ञात योनियों तथा स्थानोंमें रहते हैं, तब एक स्थानसे दूसरे स्थानमें तथा एक योनिसे दूसरी योनिमें उनका आना-जाना नितान्त स्वाभाविक है। फिर उसे केवल अनुमानमात्र कहकर उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता। अनुमान एक विश्वसनीय प्रमाण है। न्याय-वैशेषिक मतमें उसका बड़ा आदर है। उसके बारेमें ऐसा कहना ठीक नहीं कि वह गलत भी हो सकता है। वह केवल कल्पना नहीं है। प्रत्यक्ष अनुभवसिद्ध हेतुके बलपर अनुमान किया जाता है। धुआँ देखकर अग्निका अनुमान होता है। जहाँ-जहाँ धुआँ है वहाँ-वहाँ अग्नि अवश्य है। इसी प्रकार जहाँ अनुकूल तर्क एवं निर्दोष हेतुके द्वारा अनुमान होता है वह कभी असत्य या गलत नहीं हो सकता। हमारे देखनेमें आनेवाले संसारकी जनगणना जिस वेगसे बढ़ रही है, उसी वेगसे सम्भव है अन्य लोकोंमें घट रही हो। फिर नरसंहार भी तो हो रहा है। यूरोपमें कई वर्षोंतक तो लगातार युद्ध चल रहा था उसमें कितना नरसंहार हुआ। स्वाभाविक मृत्युसे जो लोग मरते हैं उनकी संख्या अलग है।

(२) प्रश्न—ईश्वरका स्वरूप क्या है? तथा वह प्राणिजगत‍्से किस प्रकार सम्बन्ध रखता है। आज जबकि चारों ओर मेटेरियेलिज्म (जडवाद) तथा नेचर (प्रकृति)-के ठोस प्रमाण मौजूद किये जा रहे हैं, ईश्वरकी सत्ता किस प्रकार मानी जाय?

उत्तर—ईश्वरके स्वरूप तथा उसके प्राणिजगत‍्से सम्बन्धपर प्रकाश डालते हुए भगवान् श्रीकृष्णने गीतामें कहा है—

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥

(१८।६१)

अर्थात् ‘ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विराजमान है तथा शरीररूपी यन्त्रमें आरूढ़ हुए उन सब प्राणियोंको वह अपनी मायासे घुमाता रहता है।’

सारांश यह कि ईश्वर घट-घटवासी, अन्तर्यामी, कर्मफलोंका दाता तथा सम्पूर्ण भूतोंका नियामक है। वह सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् है। शास्त्रोंमें ईश्वरको ‘कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ:’ कहा है। अर्थात् वह करने, न करने अथवा अन्यथा करनेमें भी समर्थ है। वह ज्ञान और आनन्दका अक्षय भण्डार है। जगत‍्की उत्पत्ति, पालन और संहार सब उसीके द्वारा होते हैं। वह सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार, अस्ति, भाति, प्रिय, सत्, चित्, आनन्द सब कुछ है। सर्वस्वरूप होते हुए भी सबसे विलक्षण है। वह क्या है और क्या नहीं है इसका वर्णन नहीं हो सकता। उसका स्वरूप जाननेमें ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हैं। मन और वाणीकी वहाँतक पहुँच ही नहीं है। वेद भी ‘नेति-नेति’ कहकर उसकी ओर संकेतमात्र करता है। उसके स्वरूपको ‘इदमित्थम्’ रूपसे वह प्रतिपादन नहीं कर सकता। वह अज्ञेय, अप्रमेय और अनिर्वचनीय है।

इस प्रकार वह हमारी पहुँचसे दूर होकर भी सदा हम सबमें रम रहा है। हम उसकी गोदमें हैं। वह हमारा लालन-पालन करनेवाला पिता है। हमें ज्ञान, सुख तथा प्रेम उसीसे प्राप्त होते हैं। सखा, सुहृद् एवं सहायक भी वही है। हमसे दूर इतना है जहाँ पहुँच नहीं सकते, और हमसे निकट इतना है जहाँतक उसके सिवा दूसरेका पहुँचना असम्भव है। सब तथा सब रूपोंमें वही तो है। जिसको उसने आँखें दी हैं, उसे उसके सिवा कहीं भी और कुछ नहीं दिखायी देता। आँखें तो उसने सभीको दे रखी हैं पर कुछ लोग उनको बन्द रखते हैं जिससे उसके प्रकाशका दर्शन नहीं होता। ठीक उसी तरह जैसे उलूकको नेत्र बन्द रखनेके कारण सूर्यके प्रकाशका दर्शन नहीं हो पाता।

गोस्वामी तुलसीदासजीने ईश्वरकी सत्ता और महत्ताका वर्णन इस प्रकार किया है—

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी।

सत चेतन घन आनँद रासी॥

आदि अंत कोउ जासु न पावा।

मति अनुमानि निगम अस गावा॥

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।

कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥

आनन रहित सकल रस भोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

तन बिनु परस नयन बिनु देखा।

ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥

असि सब भाँति अलौकिक करनी।

महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥

‘द्वा सुपर्णा सयुजा’ इस मन्त्रके द्वारा श्रुतिने जीव और ईश्वरके सख्य-सम्बन्धका प्रतिपादन किया है। एक दूसरी श्रुतिमें यह भी कहा है कि परमात्मा जिसे स्वयं ही प्रेमवश अपनाता है उसीके सामने अपने रहस्यको व्यक्त करता है।

यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूॸ स्वाम्॥

(कठ० १। २। २३)

इससे मधुर प्रेमसम्बन्धकी सूचना मिलती है। ईश्वर सबका कर्ता, धर्ता, संहर्ता और पालन-पोषण करनेवाला है। इस बातको बतानेवाली बहुत-सी श्रुतियाँ हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में अन्तर्यामी परमात्माके स्वरूप और कार्यका विश्लेषण इस प्रकार किया है—

य: सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं य: सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृत:। (बृहदारण्यक० ३। ७। १५)

अर्थात् ‘जो सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर रहकर उन सबकी अपेक्षा आन्तरिक है; जिसे सम्पूर्ण प्राणी नहीं जानते, सम्पूर्ण प्राणी जिसके शरीर हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियोंका उनके भीतर रहकर शासन (नियमन) करता है, वह तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा है। वह अमृत है।’

केनोपनिषद् में अनेक मन्त्रोंद्वारा यह बात बतायी गयी है कि ईश्वर ही हमारी सम्पूर्ण इन्द्रियोंमें शक्ति और प्रकाश दे रहा है।

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो हि वाक्स उ प्राणस्यप्राण:।

‘वही कानोंकी श्रवणशक्ति, मनकी मननशक्ति, वाणीकी वाक्शक्ति और प्राणकी जीवनशक्ति है।

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि।

‘जिसका मनके द्वारा मनन नहीं हो सकता, जिसकी शक्ति पाकर ही मन मननशक्तिसे सम्पन्न हुआ है वही ब्रह्म समझो।’

यहाँतक ईश्वरकी सत्ता, महत्ता, स्वरूप तथा सम्बन्धके विषयमें कुछ थोड़े-से शास्त्रीय प्रमाणोंका दिग्दर्शन कराया गया। तर्क और युक्तिके द्वारा विचार करनेसे भी ईश्वरकी सत्ता प्रत्यक्षवत् सिद्ध हो जाती है।

हम यह प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं कि हमारा ज्ञान, हमारी शक्ति और हमारी विद्या सब थोड़ी है; किन्तु हम सदा उसे बढ़ानेकी चेष्टामें लगे रहते हैं। प्रत्येक स्वल्पता महत्ताकी ओर अग्रसर होती है। स्वल्पता ही महत्ताकी सत्ता सिद्ध करती है।

जीवमें अल्पशक्ति है, तो कहीं पूर्ण या सर्वशक्ति भी होगी ही। जहाँ होगी, वही सर्वशक्तिमान् ईश्वर है। इसी प्रकार पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनन्द तथा पूर्ण विद्याके भण्डार ईश्वरका होना निश्चित है। नदीकी सीमित जलधारा अक्षय और अनन्त जलके भण्डार समुद्रकी ओर अग्रसर होती है। इसी प्रकार सीमित ज्ञान, शक्ति और विद्यावाला जीव असीम आनन्दके सागर परमात्मामें मिलकर पूर्णतम होनेके लिये सदा यत्नशील रहता है। यह प्रयत्न ही उसकी साधना है। जबतक उसे सिद्धि नहीं मिलती तभीतक वह बद्ध या अमुक्त कहलाता है। सिद्धिकी अवस्था आयी कि वह ससीमसे असीम, बद्धसे मुक्त हुआ। यद्यपि यह अवस्था कहींसे उपलब्ध नहीं होती, वह नित्यसिद्ध सहजावस्था है तथापि जबतक उसका प्रकाश नहीं हुआ रहता तबतक उसे व्यवहारमें अप्राप्त या अनुपलब्ध कहते हैं।

कार्य-कारणभावसे भी हम ईश्वरको जान सकते हैं। बालूके ढूहे अथवा पर्वतोंकी श्रेणियोंको हम केवल प्रकृतिका कार्य मान भी लें तो भी किसी सुन्दर महलको हम केवल प्रकृतिका कार्य नहीं मान सकते। उसमें उपादानमात्र प्रकृति है। निमित्त कारण तो कोई चतुर कारीगर ही है। इसी प्रकार इस शरीररूपी महलको, जिसमें सभी अवयवोंकी उपयोगिता सोचकर विशेष उद्देश्यसे उनका निर्माण किया गया है, किसी चेतन परमात्माका ही कार्य कह सकते हैं। इस विशाल ब्रह्माण्डका निर्माता भगवान‍्के सिवा और कौन हो सकता है। सुन्दर और कलापूर्ण सृष्टि प्राकृत तत्त्वोंके आकस्मिक संयोगमात्रसे नहीं हो सकती। उसमें किसी कलाकारका हाथ मानना ही पड़ेगा। क्या कोई कह सकता है कि बिना कुम्हार और बढ़ईका हाथ लगे ही घड़े और तरह-तरहके फर्नीचर बन गये हैं। प्रकृति केवल मिट्टी और पेड़का उत्पादन कर सकती है। कुर्सी, मेज और घड़े नहीं बना सकती। ज्ञान, विवेक और विचारपूर्ण कार्य जड प्रकृतिसे असम्भव है। प्रकृति कारणमात्र है। कर्ता उससे पृथक् और विलक्षण है। यदि स्याही ढलक जाय तो वहाँ काला धब्बा बन जायगा, अक्षर और वाक्य नहीं बन जायँगे। वे तो किसी चेतन कर्ताके बुद्धिपूर्वक लिखनेसे ही लिखे जा सकते हैं।

जड विज्ञानकी यही सबसे बड़ी दुर्बलता है कि वह कार्य-कारण-सम्बन्धको तो मानता है; किन्तु उपादान और भेदके निमित्तको नहीं समझ पाता। कार्यका कोई लक्ष्य और उद्देश्य नहीं मानता। परन्तु हम देखते हैं कि कार्यके पहले मनमें इच्छा उत्पन्न होती है, हम कार्यके लक्ष्य और उद्देश्यपर विचार करके उसमें प्रवृत्त होते हैं। ‘प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते।’ बिना प्रयोजनके मूर्ख भी किसी काममें नहीं लगता। इस प्रकार प्रत्येक प्राकृत कार्यमें किसीकी इच्छा-शक्ति, संकल्प, उद्देश्य और लक्ष्यका विचार अवश्य है। इतना स्वीकार कर लेनेपर अनीश्वरवादकी जड़ स्वयं कट जाती है।

पत्र कुछ बढ़ गया। फिर भी सभी बातें, जो यहाँ कही जा सकती हैं, नहीं आ सकी हैं। आ भी नहीं सकतीं। यह वस्तु तो बहुत समयतक अध्ययन और मनन करनेकी है। यदि इससे आपको कुछ सन्तोष हो सके तो प्रसन्नताकी बात है।

(३) आपने जिस प्रकारके योगी-महात्माका पता मुझसे पूछा है, वह मुझे मालूम नहीं है। फिर भी भारतवर्षमें ऐसे योगी-महात्मा या पहुँचे हुए सन्तका सर्वथा अभाव नहीं है। अधिकारियोंको उनके दर्शन भगवत्कृपासे हो ही जाते हैं।

आपने कुछ ऐसी पुस्तकोंका नाम भी पूछा था जिनसे ईश्वर-सम्बन्धी विचारपर कुछ प्रकाश पड़े। इसके लिये मैं आपको श्रीमद्भगवद‍्गीता, रामचरितमानस और उपनिषद् पढ़नेकी सलाह दूँगा। ‘कल्याण’ का ईश्वरांक भी मिल सके तो अवश्य पढ़ें।

शेष सब श्रीहरिकी कृपा है। उत्तरमें विलम्बके लिये पुन: क्षमा-प्रार्थना है।