बालगोपालका पूजन
प्रिय महोदय, सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला, धन्यवाद। ‘कल्याण’ पढ़नेसे आपके मनका झुकाव भगवान्की ओर हुआ, यह बड़ी प्रसन्नताकी बात है। अब आप सब प्रकारके प्रपंचसे अलग रहकर श्रीभगवान्के चिन्तनमें ही संलग्न रहना चाहते हैं, यह बहुत उत्तम विचार है, इसके लिये भगवान्से ही प्रार्थना कीजिये। वे ही आपके लिये उचित एवं अनुकूल व्यवस्था कर सकते हैं। आपके हृदयकी सच्ची पुकार होगी तो दयामय भगवान् अवश्य सुनेंगे।
सबसे अच्छी बात तो यह है कि भगवान्का भजन-पूजन केवल भगवान्के लिये ही किया जाय, किसी तुच्छ लौकिक स्वार्थकी सिद्धिके लिये कदापि नहीं। किन्तु जब जीवननिर्वाह होना भी कठिन हो जाय, तब जगत्के स्वार्थपरायण मनुष्योंके समक्ष हाथ फैलानेकी अपेक्षा भगवान्से ही याचना करना अवश्य उत्तम है; क्योंकि वे दयामय हैं, दीनोंके दु:खोंको देखकर द्रवित होते हैं, उनके आँसुओंका मखौल नहीं उड़ाते। इसके सिवा उनका ऐश्वर्य अनन्त है, अक्षय है, उनके यहाँ किसी बातका अभाव नहीं है, उनका अक्षय भण्डार निरन्तर लुटाते रहनेपर भी कभी किंचित् भी न्यून नहीं होता। अगाध समुद्रकी भाँति सदा परिपूर्ण ही रहता है, उनसे—केवल उनसे ही भक्त ध्रुवकी भाँति एकनिष्ठाके साथ याचना करनेपर याचकता जल जाती है। भगवान्का याचक किसी अन्यके सामने हाथ नहीं फैलाता।
‘जेहि जाँचत जाँचकता जरि जाय
जो जारत जोर जहानहि रे।’
अत: लौकिक अभावकी पूर्तिके लिये भी आपने ‘कृष्णाय नम:’ इस पंचाक्षर मन्त्रके जपका जो निश्चय किया है, वह बहुत उत्तम है। प्रतिदिन सूर्योदयसे पहले उठकर स्नान-सन्ध्यादिसे निवृत्त हो, एकान्तमें शुद्ध आसनपर बैठकर श्रद्धा-विश्वासपूर्वक निष्ठाके साथ जप करना चाहिये। सात्त्विक भोजन करना चाहिये। दिनमें उपवास या फलाहार उत्तम है। शामको सात्त्विक अन्नका सेवन करना चाहिये। मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते हुए सदा भगवान्का चिन्तन करना आवश्यक है। ब्रह्मचर्यके पालनपर ध्यान रखना चाहिये। किसीसे अनावश्यक बातें न करके मौन रहना, दुष्ट-संगसे बचना और एकान्तमें रहना लाभदायक है।
अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरा, हस्त, अनुराधा, श्रवण आदि नक्षत्र अनुष्ठान आरम्भ करनेके लिये उत्तम हैं। भद्रा और व्यतीपात आदि दोषोंसे बचना चाहिये। प्रात:कालका समय सर्वोत्तम है। तर्पणकी विधि पूछी, सो नित्यतर्पण तो सन्ध्या-वन्दनके साथ होता ही है। करनेकी विधि भी नित्यकर्मकी पुस्तकोंमें मिलती ही है। इस अनुष्ठानके मध्यमें तर्पणकी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। हाँ, हवनके बाद तर्पण अवश्य होगा। इसमें तर्पणकी संख्या उतनी ही बतायी गयी है, जितनी कि हवनकी। यह हवन किसी विद्वान् ब्राह्मणकी देख-रेखमें कुछ अन्य ब्राह्मणोंके साथ स्वयं भी बैठकर करना चाहिये। हवनका अंगभूत तर्पण कैसे होता है, इसको हवन करनेवाले विद्वान् ब्राह्मण जानते हैं। हवनकी विधि भी आप अकेले नहीं कर सकते। अत: किसी अच्छे पण्डितकी सहायता लेनी होगी।
हवन करते समय मन्त्रोंके अन्तमें ‘स्वाहा’ अवश्य लगेगा। हवन स्वयं भी करे और पण्डितसे भी कराये। इसके जपमें मुख्य बात है मन्त्रकी पूजा, अंगन्यास, करन्यास और ध्यान। सो निम्न प्रकारसे करने हैं—
एक ताँबेके पात्रपर मन्त्र खुदवा लें अथवा शुद्ध पात्रमें चन्दन आदिके द्वारा स्वयं ही बना लें। बनानेकी विधि यह है कि पहले अष्टदल कमल बनाकर उसकी बिचली कर्णिकामें ‘क्लीं’ लिख दे, उसके चारों ओर चौकोर रेखा खींच दे, परन्तु सब ओर एक-एक द्वार अवश्य रखे।
यह गोपालयन्त्र कहलाता है। इसमें बालकृष्णका आवाहन, स्थापन आदि करके प्रतिदिन विधिपूर्वक षोडश उपचारोंसे पूजन करना चहिये।
अंगन्यासविधि
क्लां हृदयाय नम:। क्लीं शिरसे स्वाहा। क्लूं शिखायै वषट्। क्लैं कवचाय हुम्। क्लौं नेत्राभ्यां वौषट्। क्ल: अस्त्राय फट्।
करन्यासविधि
क्लां अंगुष्ठाभ्यां नम:। क्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा। क्लूं मध्यमाभ्यां वषट्। क्लैं अनामिकाभ्यां हुम्। क्लौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। क्ल: करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्।
ध्यान
अव्याद्व्याकोषनीलाम्बुजरुचिररुणा-
म्भोजनेत्रोऽम्बुजस्थो
बालो जङ्घाकटीरस्थलकलितरणत्
किङ्किणीको मुकुन्द:।
दोर्भ्यां हैयङ्गवीनं दधदतिविमलं
पायसं विश्ववन्द्यो
गोगोपीगोपवीतो रुरुनखविलस-
त्कण्ठभूषश्चिरं व:॥
‘भगवान् बालमुकुन्दके श्रीविग्रहकी कान्ति खिले हुए नील-कमलके समान श्याम है। उनके नेत्र सुन्दर लाल कमलके सदृश हैं। वे बालरूपमें कमलपर नृत्य कर रहे हैं, उनकी जाँघ और कटिभागमें करधनीकी मनोहर छन-छन ध्वनि हो रही है। वे एक हाथमें नवनीत और दूसरेमें अत्यन्त विमल खीर लिये हुए हैं। गौएँ, गोपाल और गोपियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी हैं। उनके कण्ठमें बघनखाका आभूषण है। ऐसे विश्ववन्द्य गोपाल आपकी चिरकालतक रक्षा करते रहें।’
यहाँ अंगन्यास-करन्यासका मन्त्रमात्र दिया गया है। उसके करनेकी विधि वहीं किसी विद्वान्से समझ लें अथवा ‘मानसांक’ में अंगन्यास, करन्यास करनेकी जो प्रणाली बतायी गयी है, वैसे ही यहाँ भी है। अत: उसीके अनुसार कार्य करें। केवल मन्त्रमें अन्तर है। विधि वही है।
शेष सब बातें आपको ‘कल्याण’ से अवगत हो ही गयी होंगी।
पर असल बात तो यह है कि सांसारिक लाभके लिये भगवान्के भजन-पूजनका उपयोग करना बुद्धिमत्ता नहीं है। यहाँकी कोई चीज मिल भी गयी तो क्या होगा। आखिर तो, वह अनित्य ही है। फिर क्या लाभ हुआ। वही भजन-पूजन यदि विशुद्ध भावसे केवल भगवान्के लिये होता तो भगवान्की प्राप्ति होती, जो मानव-जीवनका परम ध्येय है और जो केवल मानवजन्ममें ही साध्य है। यदि हमने उसके बदलेमें अपने जीवनको सांसारिक अभावोंकी पूर्तिके साधनमें ही खो दिया तो हमें जीवनके परम और चरम लक्ष्यसे वंचित रहना पड़ेगा।
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
इसलिये जहाँतक हो, विचारकर भगवान्का भजन-पूजन केवल श्रीभगवान्के लिये ही कीजिये। इसीमें बुद्धिमानी है और इसीमें जीवनकी सार्थकता है।