भगवान् दु:ख नहीं देते
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—
(१) भगवान् दु:ख नहीं देते, दु:खनिवारणका उपाय करते हैं, परन्तु अपनी नासमझीके कारण हम उसको दु:ख मानने लगते हैं। भगवान् करुणामयी माताके सदृश स्वभावसे ही दयालु हैं। जैसे माताको अपने बालकपर सहज स्नेह होता है, उसी प्रकार भगवान् हम सबपर स्वभावत: स्नेह रखते हैं। बालक इच्छानुसार घूमता हुआ अपने अंगोंमें मल-कीचड़ आदि लगा लेता है और उसे धोना भी नहीं चाहता। दयामयी जननी बालकके हितके लिये ही उसकी इच्छाके विपरीत उसे ठण्डे जलसे नहलाती है। बालक रोता है, चिल्लाता है और मन-ही-मन समझता है कि माँ उसे दु:ख दे रही है, परन्तु बात ऐसी नहीं है। माता उसे सुखी और स्वस्थ बने रहनेके लिये ही वह क्षणिक कष्ट उसको स्वीकार कराती है। इस प्रकार जीव भी भगवान्का बालक है। वह स्वरूपसे शुद्ध है, फिर भी अज्ञानी शिशुकी भाँति पापपंकमें लिप्त हो जाता है। भगवान् माताकी भाँति सहज स्नेहके कारण उसे इस पाप-तापसे मुक्त करनेका यत्न करते हैं, जीव उस प्रयासका रहस्य न समझकर भगवान्को निष्ठुर बताता और उन्हें दु:ख देनेवाला मानता है। जो घाव सारे शरीरमें जहर फैलाता हो, उसको चीर डालनेमें ही शरीरका हित है, सहलानेमें नहीं। इसी प्रकार पापरूपी मैलको धोने या अघरूपी घावका घातक प्रभाव मिटानेके लिये जीवको क्षणिक दु:खरूपी उपचार स्वीकार ही करना चाहिये और इसमें भगवान्की परम दया मानकर प्रसन्न ही होना चाहिये।
(२) यह ठीक है कि सारा जगत् श्रीकृष्णका स्वरूप है। इसके अणु-अणुमें श्रीकृष्ण ही व्याप्त हैं, वे ही इसके उपादान भी हैं; अत: सब कुछ परमानन्दस्वरूप ही है; क्योंकि श्रीकृष्ण परमानन्दमय हैं। फिर भी तो सबको आनन्दका ही अनुभव नहीं होता अथवा किसीको भी दु:खका अनुभव होता है, इसका कारण भ्रम अथवा अज्ञान ही है। मनुष्य बड़े आनन्दसे घरमें खाटपर सो रहा है, किन्तु स्वप्नमें उसे हाथी खदेड़ रहा है, अत: वह रोता है, डरता है, घबराता है और व्यथाका भी अनुभव करता है। जब सहसा नींद खुल जाती है, तब उसके सभी दु:ख शान्त हो जाते हैं। वह पूर्ण निर्भय एवं सुखी हो जाता है। वह समझ जाता है कि यह दु:ख-शोक भ्रमके कारण था। अब वह भ्रम या अज्ञान नहीं रहा, अत: दु:ख भी चला गया। इसी प्रकार संसारके जीव अपनेको श्रीकृष्णसे सर्वथा भिन्न मानकर अहंकारवश देहमें आसक्त हो जाते हैं और अनेक प्रकारके राग-द्वेषमूलक सम्बन्धोंमें उलझकर दु:ख-शोकके अधीन होते रहते हैं। जब भगवान्की दयासे उनका यह स्वप्न या मोह भंग होता है और वे अपनेको श्रीकृष्णसे अभिन्न अनुभव करने लगते हैं, तब वे सचमुच परमानन्दमें ही निमग्न रहते हैं; फिर उन्हें कभी दु:ख-शोकका अनुभव नहीं होता।
(३) मानसमें जिन चौदह व्यक्तियोंको जीवित शवके समान बताया गया है, वे भी यदि आत्मघात करें तो पापके भागी होंगे। उन्हें जीते-जी जो दु:ख या कष्ट है, वह उनका प्रारब्ध-भोग या अपने ही कर्मोंका फल है। उसे धैर्यपूर्वक भोग लेनेसे वे पाप-ताप धुल जायँगे, फिर उनका भावी जीवन सुखमय हो सकता है; किन्तु यदि उस भोगसे बचनेके लिये वे आत्मघात करते हैं तो भविष्यमें शेष भोग तो उन्हें भोगना ही पड़ेगा। आत्मघाती अनन्तकालतक अन्धकारपूर्ण नरकमें यातना भोगते हैं—
असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृता:।
ताॸस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:॥
जीवित शव-सम कहनेका अभिप्राय उन मनुष्योंको मृत्युकी ओर प्रेरित करना नहीं, उनमें आत्मचेतना जाग्रत् करना है।
(४) आकाशवाणी पहले भी किसी-किसीके जीवनमें ही व्यक्त होती थी। अब भी व्यक्त हो सकती है। पर यह सब ईश्वरकी इच्छाके अधीन है। मनुष्य इसको स्वेच्छानुसार नहीं सुन सकता। भगवान् जब जिसको आकाशवाणीद्वारा कोई सन्देश देना चाहेंगे, तभी वह उसे सुनायी पड़ेगी। अब भी अधिकारी महापुरुष आकाशवाणी सुनते हैं, सुन सकते हैं।
(५) भगवान्का दर्शन उसीको होता है, जिसके हृदयमें भगवद्दर्शनकी उत्कट अभिलाषा रहती है और जो दर्शनके लिये व्याकुल होकर निरन्तर भगवान्को पुकारता रहता है।
(६) जो प्रभुको चाहनेवाले हैं, प्रभुता उनकी चेरी है। वे प्रभुताको ठुकराकर प्रभुके चरणोंमें आत्मसमर्पण करते हैं। आजके अर्थप्रधान युगमें जो अधिक लोग लक्ष्मी चाहते हैं, वे प्रभुके प्रति अनन्य भक्ति रख ही नहीं सकते। वे तो धनके लिये भक्तिका सौदा करते हैं। सब छोड़कर प्रभुका भजन करनेसे प्रभु मिलते हैं और प्रभुके मिलते ही सब कुछ मिल जाता है। फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।
(७) सुख-दु:खका अनुभव मन ही करता है। मन जिसे अनुकूल समझता है, उसमें सुख मानता है; जिसे प्रतिकूल समझता है उसमें दु:ख मानता है। मनको अनुकूल-प्रतिकूल वस्तुकी प्राप्ति प्रारब्धके अनुसार होती है; अत: उससे होनेवाले सुख-दु:खका अनुभव भी अनिवार्य है। फिर भी हर्ष-शोकसे छुटकारा पाना पुरुषार्थ-साध्य है। अज्ञानी पुरुष सुखमें हर्ष और दु:खमें शोक करता है। ये हर्ष और शोक विकार हैं। ज्ञानीमें हर्ष-शोक नहीं होते। मनुष्य साधनाके द्वारा विवेक प्राप्त करके हर्ष-शोकसे पिण्ड छुड़ा सकता है। हर्ष-शोक प्रारब्धके नहीं, अज्ञानके फल हैं। गृहस्थ ज्ञानीके यहाँ किसीकी मृत्यु हो जाय तो उसे लोक-दृष्टिमें दु:ख-शोक होना चाहे दिखायी दे; पर वास्तवमें दु:ख-शोक नहीं होगा। हाँ, प्रतिकूलता-अनुकूलताका अनुभव मनको होगा।
(८) मनुष्यको जीविकाके लिये कुछ उपार्जनका प्रयत्न करना चाहिये। सफलता दैवके हाथमें है। असफलता होनेपर भी दु:ख न मानकर प्रयत्नमें लगा रहे। घरवालोंका कलह भी मौन होकर सह ले। क्षमासे दूसरोंका हृदय जीता जा सकता है। विवेकसे ही विचारोंपर संयम रखना सम्भव है। विवेक सत्संगसे प्राप्त होता है।
(९) त्रिकालाबाधित तत्त्व ही अक्षय काल कहलाने योग्य है। अक्षय देश और अक्षय काल भगवान् ही हैं। लोकमें काल-शब्दसे व्यवहृत होनेवाले जो मास, वर्ष आदि विभाग हैं, वे नश्वर हैं; जहाँ समस्त प्राकृत प्रपंचका विलय हो जाता है, वे सनातन परमेश्वर ही अक्षय या सनातन काल हैं। अत: भगवान्ने जो अपनेको अक्षय काल बताया है, वह ठीक ही है।
(१०) जैसे वायुका कोई आकार नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार परमात्माकी आकृति भी सबके प्रत्यक्ष नहीं है; अत: वे निराकार हैं। फिर भी जैसे वायुमें स्पर्श गुण है, उसी प्रकार परमात्मामें अनन्त कल्याणमय गुण संचित हैं। जैसे आकाश निराकार है, तो भी उसमें शब्द-गुणका सम्बन्ध है। यही नहीं, सबको अवकाश देनेका गुण भी उसमें मौजूद है। ऐसे ही परमात्मा सर्वव्यापक एवं निराकार हैं, फिर भी वे सबके स्रष्टा, पालक और संहारक हैं। वे सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् हैं। वे मनके भी मन, बुद्धिकी भी बुद्धि, प्राणके भी प्राण और आत्माके भी आत्मा हैं। उनकी शक्तिके बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। ये सब उस परमात्माके गुण हैं। इन सब बातोंका विचार ही सगुण-निराकारका चिन्तन एवं ध्यान है।
(११) श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन हो और उनका माधुर्यभाव ठीक समझमें आ जाय, इसका सरल और अमोघ उपाय है—सब ओरसे ममता, आसक्ति हटाकर सर्वथा श्रीराधाजीके चरणोंमें आत्मसमर्पण। श्रीराधाकी कृपासे ही श्रीकृष्णके माधुर्यरसका समास्वादन हो सकता है।
(१२) भगवान् श्रीकृष्ण भक्तवांछाकल्पतरु हैं। उनका यह अवतार भक्तोंको सुख देनेके लिये ही हुआ है। भक्तोंको सुख देकर प्रसन्न होना, यह श्रीकृष्णका सहज स्वभाव है। यशोदा मैया डराती हैं, धमकाती हैं, ऊखलमें बाँधती हैं और भगवान् रोते हैं— यह सब यशोदाके वात्सल्य-रसको पुष्ट करनेके लिये है। इस लीलाकी अन्तिम झाँकी यही है कि यशोदाको अपनी भूलपर पश्चात्ताप होता है, उनके हृदयमें वात्सल्यका समुद्र उमड़ आता है और वे अपने कन्हैयाको छातीसे लगाकर स्नेहाश्रुओंकी वर्षा करती हुई एक अनिर्वचनीय सुखमें डूब जाती हैं। सखाओंको पीठपर चढ़ाना उन्हें सख्यरसका आस्वादन करानेके लिये होता है तथा श्रीराधारानीकी इच्छाके अनुरूप सखी आदिका वेष धारण करके वे उन्हें दिव्यातिदिव्य माधुर्य रस-सिन्धुमें निमग्न करते रहते हैं। इन लीलाओंमें भगवान् को, उनके परिकरोंको तथा प्रेमी भक्तोंको कितना आनन्द होता है—यह वाणीका विषय नहीं है। यह सुख और यह रस केवल स्वानुभवगम्य है। इसका आस्वादन श्रीप्रिया-प्रियतमकी अहैतुकी कृपासे ही सम्भव है।