भगवान‍्का स्वरूप

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। धन्यवाद! आपके प्रश्नोंका उत्तर इस प्रकार है—

(१) भगवान‍्का स्वरूप क्या है? यह ठीक-ठीक भगवान् ही जानते हैं। अथवा वे कृपा करके जिसे जना दें, वह भगवत्-स्वरूपके विषयमें कुछ-कुछ जान सकता है। कुछ-कुछ इसलिये कि मानवी बुद्धि भगवान‍्के स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकती। उनकी महिमाके एक अंशका भी सम्यक्-रूपसे ग्रहण नहीं कर सकती। जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी बुद्धि कुण्ठित हो जाती है, शेष-शारदाकी भी वाक्-शक्ति अवरुद्ध हो जाती है वहाँ मानवीय मन-बुद्धिकी क्या गति होगी—यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है। शास्त्रकी वाणीमें—जहाँ सम्पूर्ण ऐश्वर्य, सम्पूर्ण धर्म, सम्पूर्ण यश, सम्पूर्ण श्री, सम्पूर्ण ज्ञान तथा सम्पूर्ण वैभव प्रतिष्ठित हैं, वे ही भगवान् हैं। श्रीमद्भागवतमें भगवत्-स्वरूपकी त्रिविध अभिव्यक्ति सूचित की गयी है—ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्। ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।’ ब्रह्म निर्गुण निराकार हैं, परमात्मा सगुण निराकार हैं और भगवान् सगुण साकार मंगलविग्रह दिव्य सच्चिदानन्दघनस्वरूप हैं। जैसे भगवान् सूर्यकी त्रिविध अभिव्यक्ति होती है—एक सूर्यका प्रकाश है, जो सर्वत्र व्यापक है। दूसरा सूर्यमण्डल है, जो प्रकाशका घनीभूत पुंज है तथा तीसरी अभिव्यक्ति साक्षात् सूर्यनारायणकी है, जो सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता हैं। यहाँ प्रकाश सूर्यमण्डलके आश्रित है और सूर्यमण्डल सूर्यनारायणके। इस प्रकार भगवान् सूर्य ही सम्पूर्ण तेज और प्रकाशके उद्भावक हैं। वे एक देशमें स्थित होकर भी प्रकाशके रूपमें सर्वत्र व्याप्त हैं और तेजोमण्डलके रूपमें सम्पूर्ण लोकके प्रकाशक एवं सविता (उत्पादक और पालक) हैं। इसी प्रकार सर्वव्यापक प्रकाशस्थानीय ब्रह्म ही विभु हैं। वही अनन्त, असीम, अगुण एवं अवाङ्मनस-गोचर तत्त्व है। इस ब्रह्मका भी आश्रय—घनीभूत प्रकाश, जिसे चिन्मय परम धाम, परम पद, परम व्योम, त्रिपाद, अमृत एवं वैकुण्ठ आदि धाम कहते हैं, परमात्मा है; और इस घनीभूत प्रकाश-पुंजके भी प्राण, आत्मा एवं आधार सच्चिदानन्दरसघन-विग्रह अखिलरसामृत-सिन्धु साक्षात् भगवान् हैं, जिन्हें शास्त्र श्रीकृष्ण, श्रीराम, महानारायण, सदाशिव आदि नामोंके द्वारा वर्णन करता है। यह त्रिविध अभिव्यक्ति एक ही है। एक ही तत्त्वके तीन नाम दे दिये गये हैं। इस प्रकार सगुण साकार सच्चिदानन्दमय मधुरातिमधुर विग्रहका ही नाम भगवान् है। यहाँ दिग्दर्शनमात्र कराया गया है। वास्तवमें भगवत्-स्वरूपका किंचित्-मात्र बोध भी केवल भगवत्कृपासाध्य है। यह स्वानुभवैकगम्य विषय है।

(२) आत्माका स्वरूप क्या है? यह प्रश्न करते समय आप ‘आत्मा’ के मानी ‘जीव’ समझ रहे हैं। भागवत, गीता तथा रामायण आदि सद‍्ग्रन्थोंमें जीवको ‘ईश्वरका अंश’ कहा गया है। स्वरूपत: वह भी विमल चैतन्यरूप एवं सहज आनन्दराशि है, किन्तु मायावश वह अपने स्वरूपको भूल गया है; अतएव वह अपनेको बद्ध, दु:खी, जरा-मृत्युसे ग्रस्त मानता है। जब सत्-समागम तथा पुण्यविशेषसे वह भगवान‍्की शरण जाता है, तब वे कृपा करके जीवको अपनी भक्ति देते और उसे अपने स्वरूपका बोध कराते हैं। फिर तो वह अपनेको प्राकृत शरीरसे अतीत, अजर, अमर, अजन्मा एवं नित्यमुक्त देखने लगता है और भगवत्सेवाजनित सुखके सिन्धुमें निमग्न हो जाता है। जीवभावकी निवृत्ति होनेपर यह विशुद्ध आत्मा बन जाता है। विशुद्ध आत्मा तो वह अब भी है ही, जीवत्वके भ्रमसे इस सत्यको देख नहीं पाता। भ्रम दूर होनेपर सत्यका उसे साक्षात्कार होने लगता है। फिर तो वह परमात्मासे भिन्न नहीं रह जाता। केवल भगवत्सेवा-रसका आस्वादन करनेके लिये अपने पार्थक्य-अभिमानको बनाये रखता है। ‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।’ यह उसकी सहज निष्ठा है।

(३) ‘परमात्माका स्वरूप क्या है?’ इस विषयमें ऊपर कुछ प्रकाश डाला जा चुका है। जब केवल परमात्माके विषयमें प्रश्न हो, तब उसे सम्पूर्ण परमात्मतत्त्व—समग्र ब्रह्मविषयक समझा जाता है। अत: परमात्मपदसे यहाँ ईश्वर, भगवान्, ब्रह्म आदि सभी नामोंका ग्रहण हो जाता है। अत: जो सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्डका आत्मा और आधार है, जिससे यह सब कुछ उत्पन्न होता है, जहाँ इसकी स्थिति है और पालन होता है तथा अन्तमें जहाँ इसका विलयन हो जाता है; वह सर्वात्मा, सर्वाधार, सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वपोषक तत्त्व ही परमात्मा है। वह सम्पूर्ण प्राकृत प्रपंचमें व्याप्त होकर भी उससे परे है। वह मायाके अधीन नहीं, माया उसके अधीन है। वही बन्धन और मुक्ति देनेवाला है। उसीके स्वरूपगत प्रकाशसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित हो रहा है। वह मनका भी मन, बुद्धिकी भी बुद्धि, प्राणोंका भी प्राण तथा आत्माका भी महान् आत्मा है। वह सगुण, निर्गुण, साकार, निराकार, सर्वमय, सर्वातीत, भेद-अभेद तथा उभयातीत-स्वरूप, मन-बुद्धिसे अगोचर, परम तत्त्व, सारे सिद्धान्तों और फलोंका अन्तिम अनिर्वचनीय और अचिन्त्य फल है।

(४) ‘आत्मा कितने हैं?’ यह प्रश्न जीवको लेकर ही बन सकता है। तो जीव अनन्त हैं, असंख्य हैं। यह भेद-भ्रम अज्ञानजनित है। जैसे समुद्रकी बूँदें असंख्य हैं, उसमें उठनेवाली लहरें अपरिमित हैं, तथापि पृथक् नहीं गिनी जा सकतीं। वे सब मिलकर एक समुद्र है। इसी प्रकार असंख्य चिन्मय जीव एक परमात्माके ही अंश हैं। अत: परमात्मरूपसे सब एक है और जीवरूपसे तो उनकी कोई नियत संख्या सम्भव ही नहीं है।

(५) ‘एक है तो कैसे जाना जाय और अनेक है तो कैसे जाना जाय;’ इस प्रश्नका उत्तर भी ऊपर आ चुका है। परमात्मरूपसे सब एक है, जैसे समुद्ररूपसे सब लहरें एक हैं। जैसे समुद्रकी लहरोंकी गणना अशक्य है, वैसे ही जगत‍्के अनन्त जीवोंकी गणना भी असम्भव है। फिर भी शास्त्रकारोंने जीवजगत‍्की चार श्रेणियाँ मानी हैं—अण्डज, पिण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज। चौरासी लाख योनियाँ हैं, जिनमें जीवोंका जन्म होता रहता है। एक-एक योनियोंमें अनन्त जीव देखे जाते हैं, फिर चौरासी लाख योनियोंके जीवोंकी गणना कौन कर सकता है। शेष भगवत्कृपा।