भगवान‍्के आश्रयसे सब दोष नष्ट हो जाते हैं

सादर हरिस्मरण। कृपापत्र मिला, आपने बहुत अच्छी बात लिखी है। ब्रह्माजीने श्रीभगवान‍्से कहा था कि ‘प्रभो! जबतक यह मनुष्य आपके अभय प्रदान करनेवाले चरणारविन्दोंका आश्रय नहीं लेता, तभीतक उसको धन, घर, सुहृद्-बन्धुओंके निमित्तसे होनेवाले भय, शोक, स्पृहा, पराभव और बड़ा भारी लोभ आदि दोष सताते हैं और तभीतक उसको दु:खके मूल मैं तथा मेरेपनका असत् आग्रह रहता है’—

तावद्भयं द्रविणगेहसुहृन्निमित्तं

शोक: स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभ:।

तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं

यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोक:॥

(श्रीमद्भा० ३। ९। ६)

आप अपनेको जिन सब मानस-शत्रुओंसे घिरा देखते हैं, वे सब शत्रु तुरन्त भग जायँगे, यदि आप श्रीभगवान‍्के चरणकमलोंका आश्रय ले लेंगे। असलमें हमारा ममत्व, जो लौकिक सम्बन्धियोंमें हो रहा है, वही हमें सता रहा है। यदि हम प्रयत्न करके अपने इस सम्बन्धको सबसे तोड़कर एकमात्र प्रभुमें जोड़ सकें और सबके साथ प्रभुके सम्बन्धसे ही सम्बन्ध रखें तो फिर हमें कोई नहीं सता सकता एवं ऐसा करनेमें किसीके साथ व्यावहारिक सम्बन्ध तोड़नेकी भी आवश्यकता नहीं होती। जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके सम्बन्धसे ही पतिके माता, पिता, बन्धु, मित्र, अतिथि, अभ्यागत आदिके साथ यथायोग्य व्यवहार करती है, वैसे ही भगवान‍्के सम्बन्धसे हम भी सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करें; पर मनसे ममत्व रहे केवल प्रभु-चरणोंमें ही।

भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने भक्त विभीषणजीसे बड़ी सुन्दर बात कही है—

जननी जनक बंधु सुत दारा।

तनु धनु भवन सुहृद परिवारा॥

सब कै ममता ताग बटोरी।

मम पद मनहि बाँध बरि डोरी॥

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अस सज्जन मम उर बस कैसें।

लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें॥

अपने ममताके कच्चे सूतके धागोंको, जो इधर-उधर सर्वत्र अटके हुए हैं, सबसे तोड़कर (सारे ममत्वको) एकत्र कर लें और फिर उन सबको बटकर (ममत्वको एकनिष्ठ करके) एक मजबूत रस्सी बना लें एवं उसके द्वारा अपने मनको श्रीभगवान‍्के चरणोंसे बाँध दें तो भगवान‍्के इतने प्रिय हो जायँ कि फिर भगवान् हमको अपने हृदयमें वैसे ही स्थान दे दें, जैसे लोभी धनको बसाये रखता है। भगवान‍्ने अपनेको बाँधनेका कैसा सुन्दर उपाय बता दिया है। ममता नहीं छूटती तो मत छोड़ो, उसे इधर-उधर बिखेरकर जो दु:ख पा रहे हो, कभी इधर खिंचते हो, कभी उधर, फिर तनिक-से स्वार्थका धक्‍का लगते ही ममताके कच्चे धागे टूट भी जाते हैं—इस नित्यकी अशान्तिसे अपनेको छुड़ा लो। इतना करो कि उन धागोंको सबसे हटा लो। बस, सुखी हो जाओगे और फिर इस बटोरी हुई ममताको केवल भगवच्चरणोंमें जोड़ दो। यह मान लो कि एकमात्र भगवच्चरणारविन्द ही मेरे हैं, उनके अतिरिक्त मेरा कुछ भी नहीं है। इस प्रकार अपने मनके साथ भगवान‍्के चरणोंको ममताकी मजबूत रस्सीसे बाँध दो। फिर न तो कच्चा धागा है जो जरा-सी स्वार्थकी ठेससे टूट जायगा और न तो लौकिक पदार्थोंकी भाँति भगवच्चरण ही विनाशी हैं, जो कभी नष्ट हो जायँगे। पक्‍की दृढ़ ममत्वकी डोरी और अचल, अटल नित्य भगवच्चरण जहाँ एक बार बँधे कि फिर कभी छूटनेके नहीं। फिर तो भगवान् वशमें ही हो जायँगे और बाध्य होंगे हमको अपने हृदयमें स्थान देनेके लिये। ऐसे ही एक ममतानिष्ठ भक्तोंके लिये भगवान‍्ने सुदर्शनचक्रसे डरे हुए दुर्वासा मुनिसे कहा था—

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥

नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तै: साधुभिर्विना।

श्रियं चात्यन्तिकीं ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा॥

ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणान् वित्तमिमं परम्।

हित्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे॥

मयि निर्बद्धहृदया: साधव: समदर्शना:।

वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पतिं यथा॥

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साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।

मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६३—६६,६८)

‘ब्राह्मणदेवता! मैं भक्तोंके अधीन हूँ, मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे साधुस्वभावके भक्तोंने मेरे हृदयको अपने वशमें कर रखा है, वे भक्तगण मुझसे प्रेम करते हैं और मैं उनसे करता हूँ। हे ब्रह्मन्! जिन भक्तोंका एकमात्र मैं ही परम आश्रय हूँ, उन साधु-स्वभाव भक्तोंको छोड़कर न तो मैं अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाशरहिता लक्ष्मीजीको ही। जो भक्त स्त्री, पुत्र, घर, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबका (ममत्व) त्याग करके एकमात्र मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें त्याग करनेकी कल्पना भी भला मैं कैसे करूँ। जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रतसे सत्-स्वभाव पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्त अपनी भक्तिके द्वारा मुझको अपने वशमें कर लेते हैं। .......मेरे वे साधु भक्त मेरे हृदय हैं और मैं उन साधुओंका हृदय हूँ। वे मेरे सिवा और कुछ भी नहीं जानते तो मैं उनके सिवा और कुछ भी नहीं जानता।’

भगवान‍्के एकान्त आश्रयकी बात कठिन अवश्य मालूम होती है; परन्तु समझमें आ जानेपर वस्तुत: बड़ी आसान है। नया कुछ भी करना नहीं पड़ता। केवल ममताके विषयको मनसे बदल देना पड़ता है। आपने इस विषयपर बड़ा विचार भी किया है। फिर क्यों देर करते हैं।

अब रही मेरी बात, सो मैं तो सचमुच फँस रहा हूँ। ‘पर उपदेश कुशल’ की बात आपको लिखता हूँ, पर स्वयं कुछ भी नहीं करता। हाँ, यह विश्वास अवश्य है कि मुझ दीन-हीनपर भी दीनबन्धुकी कृपा तो अनन्त-अपार है ही। अपने लिये क्या लिखूँ—

श्रीगोसाईंजीके शब्दोंमें—

सकल अंग पद बिमुख नाथ मुख

नामकी ओट लई है।

है तुलसी परतीति एक

प्रभु मूरति कृपामई है॥

पर सच पूछिये तो जैसी मेरी धारणा है, उसके अनुसार मुखने भी नामकी ओट नहीं ले रखी है और प्रभुकी कृपामयी मूर्तिपर विश्वास है ऐसा प्रतीत होनेपर भी, वह विश्वास किस स्तरका है, इसका भी ठीक पता नहीं है। कभी-कभी ऐसा मन होता है कि अब जीवनकी समाप्तिके दिन समीप आते जा रहे हैं, अत: ये सब दिन तो केवल प्रभुके चिन्तनमें ही बीतें, पर ऐसा हो नहीं पाता। इसमें भी मेरी आसक्ति ही कारण है। प्रभुकी क्या इच्छा है, यह तो वही जानें। कभी-कभी यह भी मन होता है कि उनकी मंगलमयी इच्छापर ही अपनेको छोड़ दूँ, पर पता नहीं क्यों, ऐसा भी नहीं हो पाता। शायद कोई छिपा अभिमान इसमें बाधक हो। जो कुछ भी हो, अच्छा-बुरा हूँ तो उनका ही।

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती।

जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥

राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो।

निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥

मो सम दीन न दीन हित

तुम्ह समान रघुबीर।

अस बिचारि रघुबंसमनि

हरहु बिषम भव-भीर॥