भगवान‍्के शरण हो जाइये

सप्रेम हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि आप धीरे-धीरे भगवान‍्में प्रेम बढ़ावें। भगवान‍्में तभीतक अधिक प्रेम नहीं होता, जबतक कि हमारा मन सांसारिक विषयोंमें फँसा रहता है। जब हम संसारके भोगोंको भगवान‍्से भी ऊँचा स्थान देने लग जाते हैं, तब भगवान् हमें कैसे अपनावें, वे हमारे सामने कैसे प्रकट हों। अत: पहले भगवान‍्के महत्त्वको समझना और उसपर मनन करना चाहिये। संसार-के सभी पदार्थ नाशवान् तथा मलिन हैं। भगवान् ही परम सुन्दर, नित्य, अविनाशी, परम प्रेमी तथा अत्यन्त दयालु हैं। उनके इन गुणोंका चिन्तन कीजिये। जब मन यह अच्छी तरह समझ लेगा कि संसारके विषय अत्यन्त घृणित हैं और भगवान् ही सबसे श्रेष्ठ हैं तो वह निश्चय ही भगवान‍्की ओर अग्रसर होगा। इसके लिये आप भगवान‍्के नामोंका जप करें। भगवान‍्के गुणोंकी चर्चा, उनकी लीलाओंकी कथा-वार्ता पढ़ें और सुनें। इससे भगवान‍्का महत्त्व समझमें आयेगा और प्रेम भी बढ़ेगा।

भगवान् बड़े दयालु हैं, उनकी दया सबपर बरसती रहती है। वे सबको अपनानेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं। कोई उनकी ओर एक पग भी चले तो वे सौ पग आगे बढ़कर मिलने आते हैं। अत: आपको भगवान् पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिये। वे आपको अपना सब कुछ बना लेंगे। आप उनके हो तो जाइये। अपनेको उनकी शरणमें डाल दीजिये और रो-रोकर प्रार्थना कीजिये—‘भगवन्! मैं जैसा भी हूँ, आपका हूँ। मेरे सारे पाप-ताप हर लीजिये और अपना पावन प्रेम प्रदान कर मुझे कृतार्थ कीजिये।’ इस प्रकार आर्तभावसे पुकारते रहनेसे कभी-न-कभी आपकी सुनवायी भी होगी ही। आपको हिम्मत नहीं हारनी चाहिये। आप भगवान‍्से नाता जोड़िये। वे स्वयं ही अपनी ओर आपको खींचेंगे। शेष सब प्रभुकी दया।