भगवान‍्की कृपापर विश्वास करके उनके निज-जन बन जाइये

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। मेरी आपसे बार-बार यही प्रार्थना है कि आप भगवान‍्की अहैतुकी कृपापर विश्वास करें। छोटे बालककी भाँति आप अपनेको श्रीभगवान‍्के सामने छोड़ दें। फिर आपको प्रार्थना करनेकी आवश्यकता नहीं होगी। सुन्दर सुधरी हुई भाषामें और अच्छे सुरीले शब्दोंमें पदगान करके उनको रिझानेकी बाहरी क्रिया नहीं करनी पड़ेगी। जैसे स्नेहमयी जननी मलमें सने हुए बच्चेको, उसके बिना कहे ही, स्वयं अपने हाथोंसे धोती, पोंछती और सजाकर उसे गोदमें बैठा लेती है, वैसे ही भगवान् भी आपकी अपने-आप ही सँभाल करेंगे। अपनेको शिशुकी भाँति भगवान् पर छोड़ देनेवालेके ‘योग-क्षेम’ का स्वयं वहन करनेकी भगवान‍्ने प्रतिज्ञा की है—‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’। माताके हृदयमें अपत्य-स्नेह है, एक वात्सल्य है जो उसे अबोध शिशुकी सार-सँभाल करनेको बाध्य करता है। फिर भगवान् तो माताओंकी माता हैं। अनन्त मातृहृदयोंमें अनादिकालसे लेकर अनन्त कालतक जो स्नेहका अखण्ड स्रोत बहता रहता है, कभी सूखता ही नहीं, उसका मूल उद‍्गमस्थान कहाँ है? वह है भगवान् में। जगत‍्में जो स्नेह-सुधा-रसके बिखरे हुए अनन्त कण दिखायी पड़ते हैं, वे सब-के-सब एकत्र कर लिये जायँ तो भी वे भगवान‍्के अनन्तगम्भीर स्नेह-सुधार्णवकी एक बूँदके बराबर भी नहीं होंगे। अतएव जगत‍्के जीवोंके प्रति भगवान‍्की स्वाभाविक कृपा है, सहज सौहार्द है। सब जीव उन्हींके अंश हैं, सदा उन्हींकी गोदमें हैं। पर जैसे कभी-कभी बालक अपने अज्ञानवश स्नेहमयी माताको कठोर समझ लेता है, उसके व्यवहारमें रूक्षता, कटुता, विषमता और उपेक्षा देख पाता है, वैसे ही अज्ञानी जीव भी भगवान‍्को स्नेहशून्य, कठोर, पक्षपाती और उदासीन मान लेता है एवं कह बैठता है कि भगवान् मेरी एक भी नहीं सुनते। पर वास्तवमें ऐसा नहीं है। भगवान‍्के समान शीघ्र पुकार सुननेवाला और कोई है ही नहीं। हम किसी भी भाषामें—अथवा बिना ही कुछ बोले मन-ही-मन भगवान‍्को अपने मनकी बात कहें, भगवान् तुरन्त सुनते हैं और हमारे समझानेमें त्रुटि होनेपर भी उसे यथार्थ समझ लेते हैं तथा उसी क्षण उसका आशापूर्ण उत्तर भी दे देते हैं। वे हमारे पूर्वके पापोंको नहीं देखते, हमारे पापाचरणपर ध्यान नहीं देते; क्योंकि वे पतितपावन हैं। वे तो बस, इतना ही चाहते हैं कि मुझपर विश्वास करके जीव मेरा आश्रय ले ले, वैसे ही जैसे छोटा शिशु माताके आश्रित होता है। उनके सामने हृदयको खोलनेकी आवश्यकता है, वाणीको नहीं। वे हृदयमें रहते हैं, उनसे कुछ भी छिपा नहीं है। इसलिये जो लोग अपना हृदय खोलकर उनके सामने अपने पाप-तापोंको रख देते हैं, भगवान् उन्हें अपना लेते हैं और ऐसा बना देते हैं जिसमें फिर उन्हें पाप-ताप छू नहीं सकते। परन्तु जो लोग पापोंको छिपाकर भगवान‍्को धोखा देना चाहते हैं, उनके सामने दम्भ करते हैं, वे अन्तर्यामी भगवान‍्के सामने कुछ छिपा तो सकते ही नहीं, उनकी पतित-पावनताके प्रभावसे अवश्य वंचित रह जाते हैं!

अतएव आप श्रीभगवान‍्की कृपापर विश्वास करके उनके निज-जन बन जाइये। फिर वे आपके दोषोंको नहीं देखेंगे। भगवान् इतने मृदुल स्वभावके हैं कि वे अपने जनोंका दोष नहीं देखकर उन्हें सहज ही अपना लेते हैं—

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ।

दीनबंधु अति मृदुल सुभाऊ॥

श्रीगोस्वामीजी महाराजने विनय-पत्रिकामें गाया है—

जौ पै हरि जनके औगुन गहते।

तौ सुरपति कुरुराज बालिसों,

कत हठि बैर बिसहते॥

जौ जप जाग जोग ब्रत बरजित,

केवल प्रेम न चहते।

तौ कत सुर मुनिबर बिहाय ब्रज,

गोप-गेह बसि रहते॥

जौ जहँ-तहँ प्रन राखि भगतको,

भजन-प्रभाउ न कहते।

तौ कलि कठिन करम-मारग जड़,

हम केहि भाँति निबहते॥

जौ सुत हित लिये नाम अजामिल-

के अघ अमित न दहते।

तौ जम-घट साँसति-हर हम-से

बृषभ खोजि-खोजि नहते॥

जौ जगबिदित पतित-पावन, अति

बाँकुर बिरद न बहते।

तौ बहु कलप कुटिल तुलसी-से

सपनेहुँ सुगति न लहते॥

‘हे हरि! यदि तुम निज-जनोंके दोषोंको मनमें लाते तो इन्द्र, दुर्योधन और बालिसे हठ करके क्यों शत्रुता मोल लेते? यदि तुम जप, यज्ञ, योग, व्रत आदि छोड़कर केवल प्रेमपर ही नहीं रीझते तो देवता और श्रेष्ठ मुनियोंको छोड़कर व्रजमें गोपोंके घर किसलिये निवास करते? यदि तुम जहाँ-तहाँ भक्तोंका प्रण रखकर भजनका प्रभाव न बताते तो हम-सरीखे मूर्खोंका कलियुगके कठिन कर्म-मार्गमें किस प्रकार निर्वाह होता? हे कष्टहारी! यदि तुमने पुत्रके संकेतसे नारायणका नाम लेनेवाले अजामिलके अनन्त पापोंको भस्म न किया होता तो फिर यमराजके दूत तो हम-सरीखे बैलोंको खोज-खोजकर हलमें ही जोतते। और यदि तुमने जगत्-प्रसिद्ध पतितपावनताका बाँका विरद न धारण किया होता तो तुलसी-सरीखे कुटिल तो अनेक कल्पोंतक स्वप्नमें भी शुभ गतिको प्राप्त नहीं होते।’

इस प्रकार जब भगवान् आपको अपना लेंगे तब आप सहज ही पाप और सन्तापसे सर्वथा रहित हो जायँगे। एवं समस्त दिव्य गुण अपने-आप ही अपनेको सार्थक करनेके लिये आपकी शरणमें आ जायँगे—

जाको हरि दृढ़ करि अंग करॺो।

सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद,

बिद्या गुननि भरॺो॥