भगवान्की शरण ग्रहण कीजिये
आपकी प्रार्थनाका मैं क्या उत्तर दूँ? मैं न कोई सिद्ध हूँ न महात्मा। आप उच्च कुलमें उत्पन्न भगवद्भक्त ब्राह्मण हैं। मैं एक साधारण वैश्य हूँ। आपने इष्टदेवकी तरह मेरी स्तुति की है। इससे मैं तो संकोचके भारसे दबा जाता हूँ। मैं न आपकी स्थितिसे परिचित हूँ और न आपकी कठिनाइयोंको समझता हूँ; फिर आपको क्या सलाह दूँ? आपने तो शायद मुझे अन्तर्यामी और सर्वज्ञ ही समझकर मेरी शरण ली है; परन्तु मुझमें ऐसी शक्ति कहाँ है जो किसीका संसार-बन्धन काट सकूँ। मैं तो उन दयामयका एक नगण्य दास हूँ। वे विश्वविधाता जिस प्रकार सारे विश्वकी व्यवस्था कर रहे हैं, उसी प्रकार मुझे भी नचा रहे हैं और मैं उनकी प्रेरणाका अनुसरण करते हुए ही कुछ कर रहा हूँ। उससे संसारके कुछ प्राणियोंकी यदि सेवा होती है तो यह उनपर उन दयामयकी ही कृपा है। मुझे यन्त्र बनाकर वे जगन्नियन्ता ही उनकी किसी आवश्यकताकी पूर्ति कर रहे हैं। मैं मिट्टीका पुतला भला क्या कर सकता हूँ। आपको भी यदि उन प्राणनाथसे कुछ पानेकी लालसा है तो आप उन्हींकी शरण लीजिये। उनके राज्यमें मेरे-जैसे असंख्य किंकर धूलिकण-सरीखे भरे पड़े हैं। वे आपकी सच्ची पुकार अवश्य सुनेंगे और जिसे उपयुक्त समझेंगे, आपकी सेवामें नियुक्त कर देंगे। उनके द्वारसे खाली हाथ कभी कोई नहीं लौटता; आप उन्हींको पुकारिये, उन्हींके आगे गिड़गिड़ाइये, उन्हें ही अपना दु:ख सुनाइये और उन्हींकी यादमें सब कुछ भूल जाइये। जब उनके बिना आपको जीवन भार हो जायगा तो वे जगज्जीवन अवश्य आपपर कृपा करेंगे।
इस प्रकार उनके शरणागत होकर उनका भजन-स्मरण करते हुए यदि आपको कोई साधन-सम्बन्धी समस्या पूछनी हो तो आप मुझसे या अन्य किसी पुरुषसे पूछ सकते हैं। उस समय यदि मुझसे हो सकेगा तो मैं उसका कोई समाधान करनेका प्रयत्न करूँगा। परन्तु मेरा तो विश्वास है कि जो उनका होकर सच्चे हृदयसे उनकी शरण ले लेता है, उसके मार्गके सारे विघ्नोंको वे स्वयं ही निवृत्त कर देते हैं। उसे फिर और किसीका मुँह नहीं ताकना पड़ता। अत: आप और सबका आश्रय छोड़कर एकमात्र उन्हींके शरणापन्न हो जाइये।