भगवान‍्में सच्चे विश्वासका स्वरूप

आपका कृपापत्र मिला। आपको पहले भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास था पर अब वह श्रद्धा-विश्वास कम मालूम होता है सो ठीक ही है। पहले लौकिक स्थिति आपके मनके अनुकूल थी और आपकी कामना सफल होती थी, इससे आपका श्रद्धा-विश्वास था। अब स्थिति प्रतिकूल है और कामनाकी पूर्ति नहीं हो रही है इसलिये आपका श्रद्धा-विश्वास घट रहा है। सच्ची बात तो यह है कि वास्तवमें आपका भगवान‍्में सच्चा विश्वास हुआ ही नहीं था। ईश्वरमें सच्ची श्रद्धा, सच्चा विश्वास तभी हुआ मानना चाहिये जब उनके मंगल-विधानमें श्रद्धा हो; फिर वह विधान देखनेमें चाहे जितना भयंकर हो, चाहे जितनी कठोर-से-कठोर विपत्तियोंसे भरा हो, चाहे जैसे अत्यन्त दु:खों, अभावों, क्लेशों, अपमानों और असफलताओंसे पूर्ण हो! भयंकर-से-भयंकर प्रतिकूलतामें भी जहाँ यह दृढ़ निश्चय रहता है कि ‘भगवान‍्ने यह जो कुछ मुझे दिया है सो निश्चय ही मेरे कल्याणके लिये है’ तभी सच्चे श्रद्धा-विश्वासका पता लगता है। ऑपरेशनमें कष्ट तो होता ही है, परन्तु जिसको अपने रोगका ज्ञान है और डॉक्टरपर विश्वास है वह बड़े-से-बड़े ऑपरेशनके सफलतापूर्वक हो जानेपर प्रसन्न होता है एवं डॉक्टरका कृतज्ञ होता है। क्योंकि वह जानता है कि इससे मेरे रोगका नाश हो जायगा। इसी प्रकार भगवान‍्में श्रद्धा-विश्वास रखनेवाला पुरुष बड़ी-से-बड़ी लौकिक काट-छाँटमें भी परम प्रसन्न होता है और जैसे रोगी रोगनाशकी भावनासे प्रसन्न होकर डॉक्टरको धन्यवाद देता है, वैसे ही वह विश्वासी पुरुष भी भगवान‍्का कृतज्ञ होकर उनका नित्य दास बन जाता है। ऊपरसे देखनेमें बड़ी भयानक ऐसी घटनाओंसे उसका विश्वास जरा भी हिलता नहीं, बल्कि बढ़ता है। यह सत्य है कि ऐसा विश्वास होना हँसी-खेल नहीं है। भगवान‍्का भजन और भगवत्-प्रार्थना करते-करते अन्त:करणकी मलिनताका नाश होनेपर ही इस प्रकारका विश्वास उत्पन्न होता है।

भगवान‍्में ऐसा अटल विश्वास होनेपर किसी भी स्थितिमें मनुष्य हताश, निराश, उदास और विषादग्रस्त नहीं होता। वह सदा सुखी और प्रसन्न रहता है। उसका यह निश्चय रहता है कि चाहे जैसे भी भयानकरूपमें आवे, मेरे समीप आती है मेरे भगवान‍्की कृपा ही। इसलिये वह कभी निषिद्ध पथपर पैर भी नहीं रखता। उसके जीवनमें शान्ति, क्षमा, अहिंसा, सरलता, साधुता, निर्भयता, निश्चिन्तता, उदारता, प्रेम, आनन्द और प्रसाद आदि दिव्य भावरत्नोंका भण्डार खुल जाता है। वह स्वयं तो इनको अपने अन्तर्बाह्य धारण करके कृतार्थ होता ही है, सहज ही दूसरोंमें भी वितरण करके उनके जीवनको भी कृतार्थ करता है। भगवान् पर श्रद्धा-विश्वास रखनेवाले ऐसे पुरुष ही धन्य हैं।

आप ऐसी चेष्टा कीजिये, जिससे आपको भगवान‍्की केवल कृपामयी मूर्तिमें और भगवान‍्के मंगलमय विधानमें विश्वास हो। ऐसा हो जायगा तो आपको आज जो प्रतिकूल स्थितिमें श्रद्धा-विश्वासकी कमी मालूम होती है वह नहीं होगी और आप सदा प्रत्येक स्थितिमें सुख-शान्तिका अनुभव कर सकेंगे। अन्यान्य उपायोंसे सफलता होती न दीखे तो अपनी असमर्थता प्रकटकर भगवान‍्से ही प्रार्थना कीजिये कि ‘हे नाथ! आप ही अपनी कृपाशक्तिसे मुझे आपकी कृपामयतामें और मंगलमय विधानमें विश्वास प्रदान कीजिये।’ आपकी सच्ची और सतत प्रार्थना होगी तो भगवान‍्की कृपाशक्ति आपको यह वरदान अवश्य देगी।